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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध किस नाम से प्रकाशित हैं। A. मणि B. फुलमणि C. चिंतामणि D. नीलमणि ​

सही विकल्प होगा…

C. चिंतामणि

विस्तृत विवरण :

‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल’ द्वारा लिखे गए निबंध ‘चिंतामणि’ नामक निबंध संग्रह में संग्रहित किए गए हैं। इस निबंध संग्रह का प्रकाशन 1919 में हुआ था। चिंतामणि नामक निबंध संग्रह में आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखे गए कुल 17 निबंधों का संग्रह किया गया है। वह निबंध इस प्रकार हैं…

  1. भाव या मनोविकार
  2. उत्साह
  3. श्रद्धा-भक्ति
  4. करुणा
  5. लज्जा और ग्लानि
  6. लोभ और प्रीति
  7. घृणा
  8. ईर्ष्या
  9. भय
  10. क्रोध
  11. कविता क्या है?
  12. भारतेंदु हरिश्चंद्र
  13. तुलसी का भक्ति मार्ग
  14. ‘मानस’ की धर्म भूमि
  15. काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था
  16. साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद
  17. रसात्मक बोध के विविध रूप

आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के जाने-माने आलोचक कहानीकार निबंधकार रहे हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य में अनेक महत्वपूर्ण निबंधों की रचना की। उनके द्वारा रचित की गई पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के आधार पर हिंदी साहित्य का काल निर्धारण किया जाता है।

उनका जन्म 4 अक्टूबर 1882 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना नामक गांव में हुआ था। उनका निधन 2 फरवरी 1941 को वाराणसी में हुआ।


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कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) में क्या अंतर होता है?

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भारत की सरकार में मंत्रियों के विभिन्न स्तर होते हैं। कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के मंत्री। मंत्रियों के तीन स्तर हैं तो उनके बीच कुछ अंतर भी होता होगा। मंत्रियों के इन तीनों स्तरों के बीच मुख्य अंतर इस प्रकार हैं..

1. कैबिनेट मंत्री

सरकार में सर्वोच्च स्तर के मंत्री होता है। कैबिनेट मंत्री किसी पूर्ण मंत्रालय या विभाग के प्रभारी होते हैं। वे कैबिनेट बैठकों में भाग लेते हैं और नीतिगत निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कैबिनेट मंत्री सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं। कैबिनेट मंत्री को मिलने वाली सारी उच्चतम स्तर की सुविधाएं मिलती हैं।

2. राज्य मंत्री

राज्य मंत्री कैबिनेट मंत्री के अधीन काम करते हैं। आमतौर पर किसी विशिष्ट मंत्रालय या विभाग के एक हिस्से की जिम्मेदारी संभालते हैं। राज्य मंत्री कैबिनेट बैठकों में भाग नहीं लेते, जब तक विशेष रूप से आमंत्रित न किया जाए।
ये अपने सभी कार्यों की रिपोर्ट संबंधित कैबिनेट मंत्री को रिपोर्ट करते हैं।

3. राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार

स्वतंत्र प्रभार वाले कैबिनेट मंत्री और राज्य मंत्री के बीच की स्थिति है। ये मंत्री किसी मंत्रालय या विभाग के स्वतंत्र प्रभारी होते हैं, लेकिन कैबिनेट का हिस्सा नहीं होते। ये अपने मंत्रालय के लिए स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं। ये सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं, लेकिन कैबिनेट बैठकों में भाग नहीं लेते।

वेतन और सुविधाएं

कैबिनेट मंत्रियों को आमतौर पर उच्चतम वेतन और सुविधाएं मिलती हैं। राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और राज्य मंत्रियों के वेतन और सुविधाएं कुछ कम होती हैं, लेकिन फिर भी उच्चमत स्तर की सुविधाएं होती हैं।

कैबिनेट मंत्री को हर महीने 1,00,000 रुपए मूल वेतन मिलता है। इसके अलावा उसे 70,000 रुपये अपने निर्वाचन क्षेत्र का भत्ता 60,000 रुपए कार्यालय भत्ता और 2,000 सत्कार भत्ता मिलता है।

राज्य मंत्रियों को 1,000 रुपए प्रतिदिन का भत्ता मिलता है तो उनका वेतन कैबिनेट मंत्री के समान ही होता है। इसके अलावा उन्हें संसद सदस्य की तरह की यात्रा भत्ता, यात्रा सुविधाएं, रेल यात्रा सुविधाएं, स्टीमर पास, आवास, टेलीफोन सुविधाएं और वाहन क्रय हेतु भत्ता मिलता है।

मुख्य अंतर शक्तियों, जिम्मेदारियों और निर्णय लेने की क्षमता में है। कैबिनेट मंत्री सबसे अधिक शक्तिशाली होते हैं, उसके बाद राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार, और फिर राज्य मंत्री आते हैं।


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आत्मत्राण : रवींद्रनाथ ठाकुर (कक्षा-10 पाठ-7 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

आत्मत्राण : रवींद्रनाथ ठाकुर (कक्षा-10 पाठ-7 हिंदी स्पर्श 2)

ATMATRAN : Ravindranath Thakur (Class 10 Chapter 7 Hindi Sparsh 2)


आत्मत्राण : रवींद्रनाथ ठाकुर

पाठ के बारे में…

इस पाठ में रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित कविता ‘आत्मत्राण’ को प्रस्तुत किया गया है। यह कविता मूल रूप से बांग्ला में लिखी गई थी, जिसका अनुवाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी में किया है। इस कविता के माध्यम से कवि गुरु रविंद्र टैगोर मानते हैं कि ईश्वर ने सब कुछ संभव कर देने की सामर्थ होती है, फिर भी ईश्वर नहीं चाहते कि वह वही सब कुछ करें। क्योंकि ईश्वर चाहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में आपदा विपदा, कष्ट से आदि की स्थिति में स्वयं संघर्ष करना सीखें । कविता में कवि ने कहा है कि तैरना चाहने वालों को पानी में कोई उतार तो सकता है, लेकिन तैरना सीखने के लिए तैरने वाले को ही स्वयं हाथ पैर चलाने पड़ते हैं। तभी वह तैराक बनाता है।

परीक्षा देने जाने वाला छात्र अपने बड़ों से और गुरुजनों से आशीर्वाद लेता है और उसके बड़े उसे सफल होने का आशीर्वाद तो देते हैं, लेकिन आशीर्वाद देने से ही सफल नही हुआ जा सकता है, उसे स्वयं परीक्षा देनी होगी, तभी आशीर्वाद फलीभूत होगा। कविता में कवि के कहने का मूलभाव यही है कि मनुष्य को जीवन में स्वयं संघर्ष करना सीखना चाहिए तो ईश्वर उसके संघर्ष को आसान बना सकते हैं। हाथ-पर हाथ रखरकर बैठने वाले की ईश्वर सहायता नहीं करतेष ईश्वर केवल कर्मशील मनुष्य की सहायता करते हैं।

रचनाकार के बारे में…

रवींद्रनाथ ठाकुर बंगाली भाषा के महान कवि एवं लेखक थे। उनका जन्म 6 मई 1818 को कोलकाता के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। वह साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय भी हैं। उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार उनकी काव्य कृति ‘गीतांजलि’ के लिए मिला था। उनके उनके द्वारा रची गई अन्य काव्य कृतियों के नाम इस प्रकार हैं, पूरबी, काबुलीवाला,  नैवेद्य, बलाका, क्षणिका, चित्र और सांध्यगीत। इनके अलावा उन्होंने अनेकों कहानियां लिखी थीं। उनका निधन 1941 में हुआ था।



हल प्रश्नोत्तर

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

प्रश्न-1 : कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है?

उत्तर : कवि ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है। कवि ईश्वर से यह प्रार्थना कर रहा है कि ईश्वर उसे हर विपत्ति से सामना करने की सामर्थ्य प्रदान करें। ईश्वर उसे निर्भय होने का वरदान प्राप्त करें ताकि वह जीवन के संघर्षों से भयमुक्त होकर सामना कर सके। कवि ईश्वर से प्रार्थना कर के स्वंय के लिए आत्मबल और पुरुषार्थ पाने की कामना कर रहा है। कवि स्वयं को मजबूत बनाना चाहता है ताकि वह किसी भी तरह की आपदा, विपदा, निराशा, दुख, कष्ट, संकट आदि से सामना करने के लिए आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो सके ।

प्रश्न-2 : ‘विपदाओं से मुझे बचाओं, यह मेरी प्रार्थना नहीं’ − कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है?

उत्तर : विपदाओं से मुझे बचाओ यह प्रार्थना नहीं’ इस पंक्ति के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि ईश्वर उन्हें जीवन में आने वाले दुख, कष्ट, आपदा, विपदा, संकट आदि से सीधे तौर पर नहीं बचाया बल्कि वह इन सबको सहने और इनसे संघर्ष करने का साहस और बल प्रदान करें। कवि के कहने का भाव यह है कि वह खुद कर्म करना चाहता है और आपदा-विपाद से घबराकर हार मानकर नहीं बैठना चाहता। वह ईश्वर से यह कामना नहीं करता कि ईश्वर उसकी हर विपदा को चुटकियों  में सुलझा दे। इससे तो वह कर्महीन हो जाएगा और उसके अंदर संघर्ष करने की सामर्थ्य खत्म हो जाएगी । कवि केवल यह चाहता है कि ईश्वर उसे आत्मबल और शक्ति प्रदान करें ताकि वह संघर्ष करके अपने ऊपर आने वाली आपदाओं और विपदाओं पर विजय पा सके।

प्रश्न-3 : कवि सहायक के न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है?

उत्तर : कवि सहायक के न मिलने पर यह प्रार्थना करता है कि भले ही उसे जीवन में कोई सहायक ना मिले, भले ही पूरा संसार उसके विरुद्ध हो जाए, लेकिन आपदा-विपदा की स्थिति में उसका साहस और आत्मबल कभी कम ना हो। विपत्ति में उसका आत्मबल और उसका पौरुष कभी न डिगे। किसी भी तरह की आपदा-विपदा में भले ही संसार उसका सहयोग ना करें, उसे कोई भी सहायक ना मिले लेकिन उसका आत्मविश्वास, उसका आत्मबल, उसका साहस, उसक पौरुष कभी कम न हो, क्योंकि ये ही उसके सबसे बड़े सहायक है। कवि ईश्वर से यही प्रार्थना कर रहा है कि उसके ये गुण उसके साथ बने रहें।

प्रश्न-4 : अंत में कवि क्या अनुनय करता है?

उत्तर : अंत में कवि यहीं अनुनय करता है कि चाहें उसके जीवन में सुख के पल हों अथवा उसके जीवन में दुख के पल हों, वह हर समय ईश्वर को निरंतर याद करता रहे। उसके मन से ईश्वर के प्रति आस्था-विश्वास कभी भी कम ना हो। चाहे पूरे संसार के लोगों उसे धोखा दे दें, चाहे चारों तरफ उसे दुख घेर लें, लेकिन ईश्वर के प्रति उसकी आस्था उसका विश्वास कभी कम ना हो। ईश्वर के प्रति उसकी आस्था विश्वास ही उसे हर संकट से सामना करने की सामर्थ्य प्रदान करेगा और सुख के पलों में ईश्वर के प्रति उसकी आस्था उसका विश्वास से वह कोई भी गलत कार्य करने से बचेगा।

प्रश्न-5 : ‘आत्मत्राण’ शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : ‘आत्मत्राण’ कविता का शीर्षक कविता के मूल भाव को स्पष्ट करता है, इसीलिए कविता का शीर्षक पूरी तरह सार्थक शीर्षक है। ‘आत्मत्राण’ का अर्थ है आत्मा का त्राण अर्थात स्वयं के मन के भय का निवारण करना और भय से मुक्ति पाना। कवि स्वयं यही चाहता है कि उसके मन में व्याप्त उसका भय पूरी तरह दूर हो जाए और वह निर्भय होकर अपना जीवन जिए।

‘आत्मत्राण’ शीर्षक में ‘आत्म’ शब्द का प्रयोग कवि ने स्वयं के लिए तथा प्राण शब्द का प्रयोग बचाव के लिए किया है, अर्थात कवि स्वयं के बचाव की प्रार्थना ईश्वर से कर रहा है। कवि ईश्वर से यह नहीं चाहता कि उसे जीवन में कोई दुख तकलीफ ना हो, उस पर कोई आपदा विपदा ना आए। यह जीवन के अहम चरण हैं, जो आने ही हैं। कवि ईश्वर से यह भी नहीं चाहता कि ईश्वर उसकी हर आपदा-विपदा, परेशानी को चुटकियों में हल कर दें। बल्कि कवि ईश्वर से यह चाहता है कि उसके जीवन में जो भी आपदा आये, ईश्वर उसे इन सब से संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करें। ईश्वर उसे आत्मविश्वास, आत्मबल, साहस प्रदान करें ताकि वह इन सभी  से संघर्ष कर इन पर विजय पा सके और भय मुक्त होकर रह सके।

प्रश्न-6 : अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं? लिखिए।

उत्तर : अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम ईश्वर की प्रार्थना करने के अलावा कई अन्य प्रयास भी करते हैं। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम सबसे पहले कर्म को महत्व देते हैं। ईश्वर की प्रार्थना हमेशा साहस और बल प्रदान करती है, लेकिन आखिर में कर्म तो हमें ही करना है, यह बात हम हमें पता है। इसीलिए हमारे लिए पहले कर्म करना महत्वपूर्ण है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम एक लक्ष्य बनाकर और उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक योजना बनाते हैं और उसी योजना के अनुसार कार्य करने के लिए कठोर परिश्रम करते हैं।

हमें अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए धैर्य और परिश्रम के समन्वय की आवश्यकता होती है। धैर्य धारण करते हुए निरंतर परिश्रम करते रहेंगे तो हमारी कोई भी इच्छा पूरी हो सकती है। ईश्वर से प्रार्थना करने से हमारे जो संघर्ष है, हमारा जो परिश्रम है, वह आसान हो जाता है। इसलिये ईश्वर से प्रार्थन के अतिरिक्त हमें परिश्रम, धैर्य, आत्मविश्वास, आत्मबल की भी आवश्यकता होती है।

प्रश्न-7 क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है? यदि हाँ, तो कैसे?

उत्तर : कवि की यह प्रार्थना हमें अन्य प्रार्थना से अलग लगती है, क्योंकि अन्य प्रार्थना में लोग स्वयं के लिए धन-वैभव, सुख-संपत्ति, संतान, समृद्धि, भौतिक वस्तुएं आदि यह सभी मांगते हैं। वह अपने जीवन को सुख वैभव सुख से परिपूर्ण करने के लिए ही प्रार्थना करते हैं। जबकि इस प्रार्थना में कवि ऐसा कुछ नहीं मांग रहा। वह ईश्वर से सीधे तौर पर धन-वैभव, संपत्ति, सुख आदि की कामना नहीं कर रहा।

कवि इस प्रार्थना के माध्यम से स्वयं के लिए संघर्ष करने की शक्ति मांग रहा है, आत्मबल मांग रहा है, वह आत्मविश्वास मांग रहा है और इस प्रार्थना में वह केवल स्वयं के लिए ही नही बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए ही इन गुणों की मांग रहा है। कवि इस प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर से सीधे तौर पर सुख-वैभव नहीं मांग कर अपने लिए जीवन में संघर्ष करने की सामर्थ्य मांग रहा है। इस तरह इस प्रार्थना में कर्महीन न बनकर कर्मशील बनने की प्रार्थना कर रहा है, इसलिए ये प्रार्थना उसे दूसरी प्रार्थनाओं से अलग करती है।



(ख) निम्नलिखित अंशो का भाव स्पष्ट कीजिए।

1. नत शिर होकर सुख के दिन में तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।

भाव : कवि इन पंक्तियों के माध्यम से यह कहना चाहता है कि हमें ईश्वर को हर पल, हर क्षण, हर घड़ी याद करते रहना चाहिए। अक्सर ऐसा होता है कि हम मनुष्य लोग ईश्वर को दुख की घड़ी में तो खूब याद करते हैं, लेकिन जब हम सुख के पलों में होते हैं तो ईश्वर तो भूल जाते हैं। तब हमें स्वयं पर अहंकार हो जाता है कि हमने जो भी सुख अर्जित किया है वह अपने कर्मों से अर्जित किया है और उसमें ईश्वर का कोई योगदान नहीं। इसलिए हम ईश्वर को याद करना भूल जाते हैं। लेकिन जब दुख की घड़ी आती है तो हमें ऐसा लगता है कि हमें जो दुख मिले हैं वह हमें ईश्वर ने दिए हैं और फिर हम ईश्वर से उन दुखों से मुक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। तब हमें ईश्वर ही याद आते हैं।

कवि कहना चाहता है कि भले ही हमारे कर्म उत्तरदायी होते हैं, लेकिन सब हमें ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद के फलस्वरुप ही मिलता है, इसीलिए हमें सुख-दुख दोनों घड़ियों में ईश्वर को समान भाव से स्मरण करते रहना चाहिए और सुख की घड़ी में कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए।

2. हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही तो भी मन में ना मानूँ क्षय।

भाव : इन पंक्तियों के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है जीवन में ऐसे अनेक पल आएंगे, जब हमें दूसरों के कारण हानि उठानी पड़ सकती है, हमें संसार के लोगों से छल कपट का सामना करना पड़ सकता है। हमें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, जब हमारा कोई साथ ना दे रहा हो और सब हमारे विरुद्ध हो गए हों। लेकिन इन सब बातों के लिए हमें कभी भी ईश्वर को दोष नहीं देना चाहिए और ईश्वर के प्रति आस्था एवं विश्वास बनाए रखना चाहिए।

हमें अपने मन में निराशा और दुख हो का भाव कभी भी उत्पन्न नहीं होने देना है। हमारा आत्मबल, हमारा मनोबल सदैव बना रहे, चाहे कैसी भी स्थिति क्यों ना हो। कवि के कहने का भाव यह है कि चाहे कितनी भी दुख की स्थिति क्यों न हो, कितनी भी हानि क्यों ना हो, लेकिन ईश्वर के प्रति हमारा विश्वास कभी भी डगमगाना नहीं चाहिए और हमारा आत्मबल कमजोर नहीं पड़ना चाहिए।

3. तरने की हो शक्ति अनामय मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।

भाव : कवि यह कहना चाहता है कि जीवन में किसी भी तरह की विपरीत परिस्थितियों से घिरा होने पर भी यदि उसे ईश्वर से अन्य किसी से कोई सांत्वना, सहायता आदि ना मिले तो भी कोई बात नहीं। जीवन की विपरीत परिस्थितियों में उसे लोगों से सहयोग ना मिले तो भी कोई बात नहीं। वह ये नही चाहता कि ईश्वर उसके दुखों का भार एकदम से कम कर दे बल्कि वह यह चाहता है कि उसे इन दुखों से लड़ने की सामर्थ्य, शक्ति ईश्वर से सदैव मिलती रहे ताकि वह अपनी साहस और आत्मबल से इन सभी दुखों पर विजय पा सके।

कवि सांत्वना अथवा सहायता की अपेक्षा की जगह जीवन के संघर्षों से सामना करने की सामर्थ्य चाहता है, ताकि वह निर्भय होकर और विपरीत परिस्थिति से लड़ सके और उन पर विजय पा सके।



योग्यता विस्तार

1. रविंद्र नाथ ठाकुर ने अनेक गीतों की रचना की है। उनके गीत संग्रह में से दो गीत छांटे और कक्षा में कविता पाठ कीजिए।

उत्तर : रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने जीवनकाल में कई अद्भुत गीतों की रचना की है। यहाँ उनके गीत संग्रह में से दो प्रसिद्ध गीत दिए जा रहे हैं जिन्हें विद्यार्थी अपनी कक्षा में कविता पाठ के लिए चुन सकते हैं। विद्यार्थिोयों की सहायता के लिए दो गीत यहाँ पर दिए जा रहे हैं।

गीत 1: एकला चलो रे

यह गीत आत्मविश्वास और साहस का प्रतीक है। इसमें संदेश दिया गया है कि अगर कोई आपका साथ नहीं देता है, तो भी अपने रास्ते पर अकेले चलना चाहिए।

गीत

जोदि तोर डाक शुने केउ ना आशे
तोबे एकला चलो रे।
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे।

जोदि केउ काथा ना कोए,
ओ रे ओ रे ओ अबाक ओरे,
तोबे पोथेर काँटा डुराए मोंथा,
एकला चलो रे।
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे।

जोदि आलो ना धोरे,
ओ रे ओ रे ओ अबाक ओरे,
तोबे जोलाए निजेर पाँजर लाल,
एकला चलो रे।
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे।

गीत 2 : आमार शोनार बांग्ला

यह गीत रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित और बांग्लादेश का राष्ट्रगान है। इस गीत में बांग्ला भूमि की सुंदरता और उसकी महानता का वर्णन किया गया है।

गीत

आमार शोनार बांग्ला, आमी तोमाय भालोबाशी।
चिर दिन तोमार आकाश, तोमार बाताश, आमा प्राणे बाजाए बाशी।
आमार शोनार बांग्ला, आमी तोमाय भालोबाशी।

ओ माँ, फागुनेर आमेर बने, घेरो आछे तुमि,
ओ माँ, ओ माँ, हेमन्ते फुलो भरे, ओ माँ, तुमारो दलारी छुमि।
ओ माँ, ओ माँ।
आमार शोनार बांग्ला, आमी तोमाय भालोबाशी।“`

इन दोनों गीतों का पाठ कक्षा में करने से विद्यार्थियों को रवींद्रनाथ ठाकुर की काव्य प्रतिभा और उनके गीतों में छिपे संदेश को समझने का अवसर मिलेगा।

2. अनेक अन्य कवियों ने भी प्रार्थना गीत लिखे हैं, उन्हें पढ़ने का प्रयास कीजिए जैसे…
(क) महादेवी वर्मा – ‘क्या पूजा क्या अर्चना रे’
(ख) सूर्यकांत त्रिपाठी निराला – दलित जन पर करो करुणा
(ग) इतनी शक्ति हमें देना दाता
मन का विश्वास कमजोर हो न
हम चले नेक रस्ते पर हमसे
भूलकर भी कोई भूल हो ना
इस प्रार्थना को ढूंढ कर पूरा पढ़िए और समझिए कि दोनों प्रार्थनाओं में क्या समानता है। क्या आपको दोनों प्रार्थनाओं में कोई भी अंतर प्रतीत होता है? इस पर आपस में चर्चा कीजिए।

उत्तर : हमने महादेवी वर्मा द्वारा लिखित प्रार्थना ‘क्या पूजा क्या अर्चना रे’ पढ़ी। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा रचित प्रार्थना ‘दलित जन पर करो करुणा’ पढ़ी और उसके अतिरिक्त ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ जैसी प्रसिद्ध प्रार्थना भी पढ़ी। इन तीनों प्रार्थनाओं की तुलना जब रविंद्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित ‘आत्मत्राण’ नामक कविता से की तो सभी में हमें यही समानता दिखाई थी कि सब में मानवता की बात की गई है। हर प्रार्थना में ईश्वर से प्रार्थना करते हुए मानव के हित के लिए प्रार्थना की गई है और सभी प्रार्थनाओं में करुणा और संवेदना प्रकट होती है, जो समाज के असहाय और निर्बल वर्गों के लिए ही हैं।



परियोजना कार्य

1. रवींद्र नाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय होने का गौरव प्राप्त है। उनके विषय में और जानकारी एकत्र कर परियोजना पुस्तिका में लिखिए।

उत्तर : रवींद्रनाथ ठाकुर के बारे मे जानकारी

परिचय
रवींद्रनाथ ठाकुर, जिन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है, एक महान भारतीय कवि, संगीतकार, और दार्शनिक थे। उनका जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। ठाकुर भारतीय साहित्य, कला और संगीत में अद्वितीय योगदान के लिए जाने जाते हैं। वे पहले भारतीय थे जिन्होंने 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार जीता।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म एक समृद्ध और सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ ठाकुर और माता का नाम शारदा देवी था। ठाकुर ने औपचारिक शिक्षा की अपेक्षा घर पर ही शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने विदेशों में भी शिक्षा ग्रहण की, लेकिन उनकी रुचि भारतीय साहित्य और संगीत में अधिक थी।

साहित्यिक योगदान
रवींद्रनाथ ठाकुर ने विभिन्न साहित्यिक रचनाओं की रचना की, जिनमें कविताएं, कहानियां, उपन्यास, नाटक और निबंध शामिल हैं। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं हैं:
1. गीतांजलि – यह कविताओं का संग्रह है जिसके लिए उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार मिला।
2. गोरा – यह एक सामाजिक उपन्यास है जो भारतीय समाज की जटिलताओं को उजागर करता है।
3. घरे-बाइरे (घर और बाहर) – यह उपन्यास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
4. चित्रांगदा – यह एक नाटक है जो महाभारत की एक कहानी पर आधारित है।

संगीत और कला
रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘रवींद्र संगीत’ नामक एक अनूठी संगीत शैली की रचना की, जो आज भी बंगाल और पूरे भारत में लोकप्रिय है। उन्होंने कई प्रसिद्ध गीतों की रचना की जिनमें ‘एकला चलो रे’ और ‘आमार शोनार बांग्ला’ शामिल हैं। ‘आमार शोनार बांग्ला’ बांग्लादेश का राष्ट्रगान है।

नोबेल पुरस्कार 
रवींद्रनाथ ठाकुर को 1913 में उनके कविता संग्रह “गीतांजलि” के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। यह पुरस्कार पाने वाले वे पहले गैर-यूरोपीय और पहले भारतीय थे। उनके इस सम्मान ने भारतीय साहित्य को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।

शांति निकेतन
रवींद्रनाथ ठाकुर ने 1901 में शांति निकेतन की स्थापना की, जो एक अद्वितीय शिक्षण संस्थान है। इसका उद्देश्य था भारतीय और पश्चिमी शिक्षा का समन्वय करना और एक ऐसी शिक्षा प्रणाली प्रदान करना जो प्रकृति के करीब हो। शांति निकेतन आज भी एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है, जिसे विश्वभारती विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है।

निधन
रवींद्रनाथ ठाकुर का निधन 7 अगस्त 1941 को कोलकाता में हुआ। उनकी मृत्यु भारतीय साहित्य और कला के लिए एक बड़ी क्षति थी, लेकिन उनकी रचनाएं और विचार आज भी जीवित हैं और लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं।

निष्कर्ष
रवींद्रनाथ ठाकुर भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रतीक थे। उनके अद्वितीय योगदान ने न केवल भारतीय साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति और विचारधारा का प्रचार-प्रसार भी किया। नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय होने के नाते, उन्होंने भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर गौरवान्वित किया। उनकी रचनाएं और उनके द्वारा स्थापित संस्थान शांति निकेतन उनकी विरासत को हमेशा जीवित रखेंगे।

सन्दर्भ
1. रवींद्रनाथ ठाकुर की जीवनी और रचनाएं।
2. गीतांजलि और अन्य प्रमुख रचनाएं।
3. शांति निकेतन और उसके उद्देश्य।
4. नोबेल पुरस्कार और उसकी महत्ता।

इस प्रकार की परियोजना पुस्तिका के माध्यम से रवींद्रनाथ ठाकुर के जीवन और उनके महान कार्यों को समझा और प्रस्तुत किया जा सकता है।

2. रविंद्र नाथ ठाकुर की गीतांजलि को पुस्तकालय से लेकर पढ़िए।

उत्तर :  विद्यार्थी अपने गाँव-शहर के नजदीक पुस्तकालय जाएं और वहाँ से रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘गीतांजलि’ पुस्तक को लेकर पढ़ें। यदि पुस्तक उपलब्ध नहीं हो तो पुस्तकालय के संचालकों से पुस्तक मंगाने का अनुरोध करें।

3. रविंद्र नाथ ठाकुर ने कलकत्ता (कोलकाता) के निकट एक शिक्षण संस्थान की स्थापना की थी। पुस्तकालय की मदद से उसके विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए।

उत्तर : रवींद्रनाथ ठाकुर ने 1901 में पश्चिम बंगाल के बोलपुर, बीरभूम जिले के पास एक छोटे से गांव में ‘शांति निकेतन’ की स्थापना की थी। इस संस्थान का उद्देश्य भारतीय और पश्चिमी शिक्षा का समन्वय करना और एक ऐसी शिक्षा प्रणाली प्रदान करना था जो प्रकृति के करीब हो और सृजनात्मकता को बढ़ावा दे। बाद में, 1921 में शांति निकेतन को ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ का दर्जा प्राप्त हुआ।

रवींद्रनाथ ठाकुर का मानना था कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने शिक्षा को जीवन का एक अभिन्न हिस्सा मानते हुए उसे व्यापक दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने विद्यार्थियों में स्वतंत्र सोच और नवाचार को बढ़ावा देने पर बल दिया।

1921 में शांति निकेतन को ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ का दर्जा प्राप्त हुआ। यह विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा का केंद्र बना। विश्वविद्यालय का उद्देश्य था ‘यत्र विश्वम भवत्येक नीडम’ अर्थात ‘जहां पूरी दुनिया एक परिवार बन जाती है’।

शांति निकेतन और विश्वभारती विश्वविद्यालय भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। रवींद्रनाथ ठाकुर के दृष्टिकोण और उनके प्रयासों ने इस संस्थान को विशिष्ट और अद्वितीय बनाया है। यहां की शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों में स्वतंत्रता, सृजनात्मकता और नवाचार को बढ़ावा देती है। शांति निकेतन और विश्वभारती विश्वविद्यालय आज भी ठाकुर की शिक्षाओं और विचारधाराओं को जीवित रखे हुए हैं, और विश्वभर में शिक्षा के एक अनूठे मॉडल के रूप में जाने जाते हैं।

4. रविंद्र नाथ ठाकुर ने अनेक गीत लिखे, जिन्हें आज भी गया जाता है और उसे रवींद्र संगीत कहा जाता है। यदि संभव हो तो रवींद्र संगीत संबंधी कैसेट व सीडी लेकर सुनिए।

उत्तर : आजकल कैसेट और सीडी का प्रचलन खत्म हो गया है। विद्यार्थी चाहें तो रवींद्र संगीत के गीत किसी पेनड्राइव में भरवा कर अपने कम्प्यूटर के माध्यम से सुन सकते हैं। अथवा इंटरनेट से रवींद्र संगीत डाउनलोड कर सकते हैं।


आत्मत्राण : रवींद्रनाथ ठाकुर (कक्षा-10 पाठ-7 हिंदी स्पर्श 2) (NCERT Solutions)


कक्षा-10 हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ

साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पद : मीरा (कक्षा-10 पाठ-2 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

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मान लीजिए आपकी मुलाकात किसी दूसरे ग्रह के निवासी से हो जाती है। दूसरे ग्रह के निवासी के साथ हुई बातचीत को संवाद के रूप में लिखिए।

संवाद

दूसरे ग्रह के निवासी के साथ हुई बातचीत

 

(पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर स्थित एक ग्रह एक एलियन पृथ्वी पर आता है, जहाँ वो मुझसे टकरा जाता है। हमारी बातचील का सिलसिला शुरु होता है। उसके साथ हुई बातचीत  इस प्रकार है।)

एलियन ⦂ डोको डोको, मित्र।

मैं ⦂ ये आप क्या कह रहे हो? ये डोको डोको क्या है? यह डोको डोको क्या है मित्र और आपकी शक्ल भी मुझे अजीब सी दिखाई दे रही है। आपके कान बेहद लंबे हैं। आपकी नाक भी बेहद नुकीली और तीखी है जो आगे की तरफ मुड़ी हुई है। आपकी आँखें भी बड़ी-बड़ी हैं और आपके बाल बेहद छोटे-छोटे हैं। मुझे लगता है, आप किसी नाटक कंपनी में काम करते हो या किसी फिल्म में काम करने के लिए आपने यह मेकअप किया हुआ है।

एलियन ⦂ नहीं, मित्र मैंने मेकअप नहीं किया है। मैं सचमुच में एलियन हूँ और आपकी पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर स्थित ‘बोकोरा’ नामक ग्रह से आया हूँ। ‘डोको डोको’ हमारे यहाँ किसी भी अजनबी या मित्र आदि से अभिवादन करने की शैली है, जैसे आपके यहाँ भारत में ‘नमस्ते’ कहकर अभिवादन किया जाता है।

मैं ⦂ वाह! आप सचमुच में एलियन हो। फिर तो बहुत अच्छा है। मेरी तरफ से आपको भी डोको डोको मित्र। मुझे आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई। यह तो बहुत रोमांचित करने वाली बात है कि मैं अपनी आँखों से किसी एलियन को देख रहा हूँ। मैंने अभी तक एलियन के बारे में केवल किताबों और टीवी में पढ़ा-देखा-सुना था। आज मैं सचमुच किसी एलियन को देख रहा हूँ। मेरे लिए कितना रोमांचक पल है।

एलियन ⦂ हाँ, मित्र मैं सचमुच में एलियन हूँ। मुझे भी आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई।

मैं ⦂ आपको हमारे भारत देश का नाम भी पता है। हमारी सुंदर पृथ्वी और हमारे प्यारे देश भारत मे आपका स्वागत है।  मित्र, क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ।

एलियन ⦂ मित्र मेरा नाम ‘डोंगो’ है। जैसा कि मैंने आपको पहले बताया कि मैं ‘बोकोरा’ नामक ग्रह से आया हूँ। मित्र, आपका नाम क्या है?

मैं ⦂ डोंगो जी, मेरा नाम शिवम है। आपका हमारी पृथ्वी पर आना कैसे हुआ?

एलियन ⦂ मित्र शिवम, हमारे ग्रह पर अलग-अलग ब्रह्मांड के उन ग्रहों को खोजने का कार्य चल रहा है, जिन पर जीवन है। इसी क्रम में हमें आपकी पृथ्वी के बारे में जानकारी मिली और फिर हमारे ग्रह के वैज्ञानिकों ने मुझे आपकी पृथ्वी पर भेजा था कि मैं यहां से जानकारी प्राप्त कर सकूं। आपकी पृथ्वी के जीवन को समझ सकूं।

मैं ⦂ लेकिन मित्र, आप आप इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोल पा रहे हो? आपको हमारी भाषा कैसे आती है?

एलियन ⦂ मित्र, हमारे ग्रह की तकनीक बेहद एडवांस है। हमारे मस्तिष्क में एक ऐसा यंत्र चिप के रूप में फिट है, जिसके माध्यम से हम किसी भी भाषा को समझ सकते हैं और उसे आसानी से बोल सकते हैं।

मैं ⦂ मित्र, आपके ग्रह की ये तकनीक तो अद्भुत है। आपको हमारी पृथ्वी कैसी लगी?

एलियन ⦂ आपकी पृथ्वी बहुत सुंदर है, मित्र। आपकी पृथ्वी पर बहुत हरियाली है। आपकी पृथ्वी प्राकृतिक सुंदरता से समृद्ध है। हमारे ग्रह पर इतनी अधिक प्राकृतिक सुंदरता नहीं है। मैं कई ग्रहों पर गया लेकिन आपकी पृथ्वी जितना सुंदर ग्रह और कोई नहीं है।

मैं  ये बात तो है मित्र। हमारी पृथ्वी सुंदर तो है। हमारी पृथ्वी के बारे में इतनी प्रशंसा के लिए आपका शुक्रिया है। आपको हमारा भारत देश कैसा लगा?

एलियन ⦂ मुझे आपका भारत देश भी अच्छा लगा। हमारे अंतरिक्ष यान ने सबसे पहले आपके भारत देश मे ही लैंड किया। उसके बाद मैं अलग-अलग देशों मे गया, लेकिन मुझे आपका भारत देश सबसे अधिक सुंदर और प्यारा लगा, इसलिए पूरी पृथ्वी पर घूमने के बाद मैं आपके देश में वापस आया और अब यहीं से अपने ग्रह वापस जाऊंगा।

मैं ⦂ मित्र! आप मेरे घर चलो, मैं आपको स्वादिष्ट भारतीय भोजन कराता हूँ।

एलियन ⦂ बहुत-बहुत शुक्रिया मित्र, लेकिन अभी मेरे पास समय नहीं है। मेरा अंतरिक्ष मुझे वापस ले जाने के लिए थोड़ी ही देर में वापस आने वाला है। मेरे पास उसके सिग्नल आ रहे है। मुझे आपकी पृथ्वी और आपका देश बहुत अच्छा लगा। मैं यहाँ पर फिर आऊंगा और इस बार अपने मित्र और बेटे को साथ लेकर आऊंगा। मुझे उनको आपकी सुंदर पृथ्वी दिखानी है। तब मैं आपके घर भोजन जरूर करूंगा।

मैं ⦂ ठीक है मित्र। मैं आपका इंतजार करूंगा। आप इसी पार्क में आ जाना। मैं आपको शाम के समय यहीं मिलूंगा।

एलियन ⦂ ठीक है मित्र, आपको मेरी तरफ से नमस्ते और डोको डोको।

मैं ⦂ नमस्ते, डोको डोको जी।


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जब मैं बारिश में भीगा…

 

बारिश का मौसम हमेशा से मुझे बहुत प्रिय रहा है। जब भी बादल गरजते हैं और बारिश की बूंदें धरती पर गिरती हैं, तो मेरा मन खुशी से झूम उठता है। एक दिन, जब मैं स्कूल से घर लौट रहा था, अचानक बारिश शुरू हो गई। मेरे पास छाता नहीं था, लेकिन मैंने सोचा कि क्यों न इस बारिश का आनंद लिया जाए। मैंने अपने बैग को एक दुकान में सुरक्षित रखा और खुले आसमान के नीचे आ गया। बादलों से झमाझम बारिश हो रही थी, और मैं बारिश में भीगने का आनंद लेने लगा।

बारिश की ठंडी बूंदें जब मेरे चेहरे और हाथों पर गिरने लगीं, तो एक अलग ही सुकून का अनुभव हुआ। मेरी सारी थकान और तनाव पल भर में गायब हो गए। हर बूंद जैसे मेरे मन को शांति और ताजगी का एहसास कराती रही। मैंने भीगते-भीगते रास्ते में बने छोटे-छोटे पानी के गड्ढों में कूदना शुरू कर दिया, जिससे मेरे कपड़े और भीग गए। बच्चों की तरह मस्ती करते हुआ बहुत देर तक यूँ ही बारिश में मस्ती करता रहा।

रास्ते में मुझे बहुत सारे लोग दिखे जो बारिश से बचने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, लेकिन मैंने उनकी परवाह नहीं की। मेरे लिए वह पल सबसे खास था। जब मैं घर पहुंचा, तो माँ ने मुझे भीगा देखकर पहले गुस्सा जताया फिर मेरे चेहरे की खुशी देखकर वह भी मुस्कुरा दीं।

उस दिन मैंने महसूस किया कि कभी-कभी हमें अपने रोजमर्रा के जीवन से थोड़ा हटकर ऐसे पलों का आनंद लेना चाहिए। बारिश में भीगने का वह अनुभव मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत पलों में से एक बन गया।


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मेरा प्रिय मित्र

 

मेरा प्रिय मित्र का नाम अनिकेत है। वह न केवल मेरा सहपाठी है, बल्कि मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा भी हैं। अनिकेत मेरे सभी मित्रों में मुझे सबसे अधिक प्रिय है। अनिकेत का स्वभाव बहुत ही सरल और सौम्य है। वह हमेशा मेरी मदद करने के लिए तत्पर रहता है। चाहे पढ़ाई हो या कोई व्यक्तिगत समस्या वह हर समय मेरे लिए उपलब्ध रहता है। उसकी सबसे खास बात यह है कि वह कभी भी किसी को निराश नहीं करता और हमेशा सकारात्मक सोचता है। हम दोनों के बीच मित्रा का संबंध बहुत अधिक मजबूत है और हमारे बीच गहरी समझ है। अनिकेत एक कुशल खिलाड़ी भी है और वह हमारे विद्यालय की क्रिकेट टीम का कप्तान भी है। मैं उसके नेतृत्व में खेलकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ। उसकी मेहनत और लगन मुझे प्रेरित करती है। उसके साथ बिताए हुए सभी पल मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। अनिकेत की दोस्ती मेरे लिए इस जीवन में अनमोल उपहार से कम नहीं है। मेरे प्रिय मित्र अनिकेत की दोस्ती ने मेरे जीवन को खुशियों और आनंद से भर दिया है। मुझे अपने प्रिय मित्र अनिकेत पर बहुत गर्व है।


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यदि मैं हवाई जहाज़ होता

 

यदि मैं हवाई जहाज होता, तो आसमान में ऊँची उड़ान भरता और दुनिया के हर कोने को देखने का मौका पाता। मैं बादलों के बीच से गुजरते हुए विभिन्न देशों और उनकी संस्कृतियों का अनुभव करता। हर दिन नई-नई जगहों पर उतरता और लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाता।

यदि मैं हवाई जहाज होता तो मेरा जीवन रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होता क्योंकि मैं अलग-अलग देशों में जाता, जहाँ पर अलग-अलग भौगोलिक परिस्थातियां होती है। हवाई जहाज होने पर मैं ऊंचाईयों को छूता और हवा से बातें करता हुआ बादलों के बीच से गुजरता। मैं बादलों से बातें करता और उनसे कहता कि तुम समय पर बरस जाया करो। अलग-अलग देशों के हवाई अड्डों पर रुकते समय, मुझे विभिन्न भाषाओं को जानने का मौका मिलता और तरह-तरह के लोगों से मुलाकात होती।

यदि मैं हवाई जहाज होता तो लोग मेरी वजह से अपने प्रियजनों से मिलते, नए स्थानों की खोज करते और अपने सपनों को पूरा करते। इस तरह लोगों को उनके प्रियजनों से मिलाकर, उनके गंतव्य तक पहुँचाकर मुझे अपार आनंद आता। यदि मैं हवाई जहाज होता मैं देशों की सीमाओं के बंधन से परे आसमान की उँचाईयों को छूता और विभिन्न देशों की दूरियों को नापता।


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अनुवांशिक लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चरणबद्ध संचरण क्या कहलाता है?

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आनुवंशिक लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चरणबद्ध संचरण ‘वंशागति’ कहलाता है।

जब किसी परिवार में किसी संतान का जन्म होता है तो संतान के आँख, नैन-नक्श, रंग-रूप, बाल के रंग आदि माता-पिता अथवा उसके भाई-बहनों अथवा दादा-दादी, नाना-नानी आदि से मिलते हैं। यह सभी लक्षण संतान अपने पूर्वजों विशेषकर माता-पिता से प्राप्त करती है। पीढ़ी दर पीढ़ी अनुवांशिकता के इन लक्षणों का संचरण वंशागति कहलाता है। कहने का अर्थ यह है कि अभिलक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अर्थात माता-पिता से संतति में संचरण वंशागति कहलाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी ये क्रम चलता रहता है। हालाँकि माता-पिता के सभी लक्षण संतार में समान नही होते कुछ लक्षण संतति में भिन्न भी होते है।


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रेडियो नाटक में पात्रों की संख्या निर्धारण कैसे किया जाता है ?

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रेडियो नाटक में पात्रों की संख्या का निर्धारण करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि पात्रों की संख्या बहुत अधिक नहीं हो। किसी भी रेडियो नाटक में पात्रों की संख्या अधिकतम लगभग 5 या 6 ही रखी जाती है। पात्रों की संख्या 5 या 6 रखे जाने का मुख्य कारण यह होता है कि अधिक संख्या में प्राप्त होने पर श्रोता भ्रमित हो सकते हैं। रेडियो नाटक केवल सुना जाता है और रेडियो नाटक को सुनने वाला श्रोता अपनी क्षमता के आधार पर ही पात्रों को याद रख पाता है।

यदि रेडियो नाटक में बहुत अधिक संख्या में पात्र होंगे तो श्रोता सभी पात्रों को याद नहीं रख पाएगा। कम पात्रों के होने पर श्रोता पात्रों को ठीक-ठाक से याद रख पाता है और उसे नाटक में भी आनंद आता है। जब तक श्रोता पात्र को सही से समझ नहीं पाएगा उसे पात्रों के नाम याद नहीं होंगे, उसे नाटक में भी आनंद नहीं आएगा और ना ही नाटक की कथावस्तु से समझ में आएगी। इसलिए रेडियो नाटक में पात्रों की संख्या तथा इसकी अवधि दोनों सीमित रखे जाते हैं ताकि श्रोता पात्रों को अच्छे से याद कर नाटक का भरपूर आनंद ले सके बल्कि सही समय पर नाटक समाप्त हो जाए और श्रोता बोर नहीं हो।


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‘भवनम’ का संधि विच्छेद करो।

भवनम का संधि विच्छेद :

भवनम : भो + अनम
संधि भेद : अयादि स्वर संधि

स्पष्टीकरण

‘भवनम’ में अयादि स्वर संधि है, क्योकि अयादि स्वर संधि के नियम के अनुसार जब ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’, ‘औ’ के साथ अन्य कोई भी स्वर हो तो ‘ए’ का ‘अय’ बन जाता है, ‘ऐ’ का ‘आय’ बन जाता है, ‘ओ’ का ‘अव’ तथा ‘औ’ का ‘आव’ बन जाता है।
‘भवनम’ में ‘ओ’ और ‘अ’ का मेल होकर ‘अव’ बन रहा है, इसलिए ‘भवनम’ में ‘अयादि स्वर संधि’ है।

अयादि संधि, स्वर संधि के पाँच उपभेदों में एक भेद होती है।
स्वर संधि के पाँच भेद होते है।

  1. दीर्घ स्वर संधि
  2. गुण स्वर संधि
  3. वृद्धि स्वर संधि
  4. यण स्वर संधि
  5. अयादि स्वर संधि

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आदि + अंत की संधि और संधि का नाम लिखिए।

‘निः + आकार’ में संधि बताइए।

बंधक भंडारगृह के तीन लाभों की गणना कीजिए।

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बंधक भंडारगृह के तीन लाभ इस प्रकार हैं…

  • बंधक भंडार गृह के निर्माण का मुख्य उद्देश्य आयातित वस्तुओं के भंडार के लिए ही किया जाता है।
  • बंधक भंडार गृह में उन आयातित वस्तुओं का भंडारण किया जाता है, जिन पर आयात कर नहीं चुकाया गया है। बिना आयातकर चुकाये ये आयातित माल आयातक बंदरगाह से बाहर नहीं ले जा सकता और उसे तब तक बंधक भंडार गृह में रखा जाता है, जब तक आयातक उस पर लागू आयात कर सरकार को चुका ना दें।
  • बंधक भंडार गृह वे भंडार गृह होते हैं जो सामान्यतः किसी बंदरगाह अथवा गोदी के पास स्थित होते हैं और बंदरगाह या गोदी प्राधिकरण द्वारा समुद्र तट के आसपास संचालित किए जाते हैं।
  • बंधक भंडार ग्रह का स्वामित्व सरकार अथवा निजी संस्थानों के पास होता है। निजी संस्थानों को बंधक भंडार गृह संचालन करने के लिए सरकार द्वारा लाइसेंस लेना आवश्यक होता है।
वस्तुओं के भंडार के आधार पर भंडारगृह पाँच प्रकार के होते हैं, जो कि निम्नलिखित हैं…
  • निजी भंडारगृह
  • सार्वजनिक भंडारगृह
  • सरकारी भंडारगृह
  • बंधक भंडारगृह
  • सहकारी भंडारगृह

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थल थल में बसता है शिव ही, भेद न कर क्या – हिन्दू मुसलमाँ। ज्ञानी है तो स्वयं को जान, वहीं है साहिब की पहचान।। (भावार्थ बताएं)

पंखि उड़ानी गगन कौं, पिण्ड रहा परदेस । पानी पीया चंचु बिनु, भूलि या यहु देस ।। व्याख्या कीजिए।

जीवन रूपी पथ पर निरंतर गतिशील रहने की प्रेरणा देते हुए अपने मित्र को पत्र लिखें​।

अनौपचारिक पत्र

जीवन रूपी पथ पर निरंतर गतिशील रहने की प्रेरणा देते हुए मित्र को प्रेरणादायी पत्र

 

दिनांक : 21 जून 2024

प्रिय मित्र दीपांशु,
तुम्हें मेरा स्नेह रूपी अभिवादन,

तुम्हारी कुशलता की कामना करते हुए आज तुम्हे कुछ प्रेरणादायी बाते कहना चाहता हूँ। मुझे पता चला है कि तुम आजकल कुछ निराशा के दौर से गुजर रहे हो। तुम जिस काम में संलग्न हो उसमें सफलता नहीं मिलने के कारण तुम्हारे मन में निराशा के भाव उत्पन्न हो रहे हैं।
मित्र, मैं तुम्हें समझाना चाहूंगा कि यह जीवन है। इसमें हमें सुख-दुख सभी का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें जीवन रूपी पथ पर निरंतर गतिशील रहना पड़ता है। यह जीवन एक यात्रा के समान है। इस जीवन रूपी पथ पर जब तक हम निरंतर चलते रहेंगे तब ही हम अपने लक्ष्य को पा सकते हैं। जीवन रूपी इस पथ में हमारे रास्ते में कई तरह की बाधाएं भी आ सकती हैं, लेकिन हमें उन बाधाओं से घबराना नहीं है और निरंतर इस पथ पर चलते ही जाना है तो एक न एक दिन हमारा लक्ष्य हमें अवश्य प्राप्त होगा।

इसलिए मैं तुमको कहना चाहूंगा कि तुम अपने कार्य में आने वाली किसी भी तरह की बाधाओं से निराश मत हो बल्कि यह समझ लो यह तुम्हारी परीक्षा की घड़ी है। तुम्हें इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना है और निरंतर आगे बढ़ते रहना है। एक ना एक दिन तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होगी। आशा है मेरी बातें तुम्हारी मन की निराशा को दूर करने मैं सहायक सिद्ध होंगी।

तुम्हारा अभिन्न मित्र,
निरंजन ।


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अपनी छोटी बहन को पढ़ाई के साथ-साथ व्यायाम का महत्व बताते हुए पत्र लिखिए​।

आपका एक जरूरी पार्सल जो आपको इसी हफ्ते मिलना था, नही मिला। छानबीन हेतु आपके क्षेत्र के डाकघर के डाकपाल को पत्र लिखिए।

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विचार/अभिमत

माँ के बिना बच्चे का उचित विकास नहीं हो पाता है, क्योंकि बिना माँ के बच्चे अपना जीवन व्यतीत तो कर लेते है लेकिन वह माँ को हर बात पर महसूस करते है। वह बिना माँ के अपने जीवन में बहुत कुछ सीखते तो हैं, पर हर पल वह अपनी माँ के आंचल का अभाव महसूस करते है। माँ के बिना बच्चे को वह प्रेम और स्नेह नहीं मिल पाता जिसकी उन्हें बचपन में जरूरत होती है। इसलिए ऐसे बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं।

माँ तो भगवान के समान होती है, जो हमेशा अपने से पहले अपने बच्चों के बारे में सोचती है । माँ हमेशा अपने बच्चे को पहले से दिन से बहुत कुछ सिखाती है । बिना के बच्चे के विकास एक कमी हमेशा कमी रह जाती है। बिना माँ के बच्चे को अपने जीवन अपने आप खुद ही संभालना पड़ता है। उसे स्वयं ही अपने जीवन में अपने आप को मजबूत बनाना पड़ता है । यह एक कटु सत्य है कि माँ के बिना बच्चे का उचित विकास नहीं हो पाता है। उसके जीवन में कुछ न कुछ कमी जरूर रह जाती है। बिना माँ का बच्चा पूरी जिंदगी अपने जीवन में माँ के अभाव को महसूस करता है।


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किसी वैज्ञानिक यात्रा का वर्णन करते हुए अपने मित्र के नाम पत्र लिखिए।

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वैज्ञानिक यात्रा का वर्णन करते हुए अपने मित्र के नाम पत्र

 

दिनांक : 20 जून 2024

 

प्रिय मित्र सुधीर,
तुम कैसे हो?

मैं तुम्हें अपने कल की वैज्ञानिक यात्रा के बारे में बताता हूँ। कल संडे की छुट्टी होने के कारण मैं अपने पड़ोस के कुछ दोस्तों के साथ नेहरू साइंस सेंटर गया था, जोकि मुंबई के वर्ली क्षेत्र में स्थित है। ये एक विज्ञान केंद्र है, जहाँ पर विज्ञान से संबंधित अनेक वस्तुएं रखी है। यहाँ पर वैज्ञानिक सिद्धांतों की व्याख्या करने वाली अनेक जानकारियां प्राप्त होती हैं।

इस साइंस सेंटर में विज्ञान संबंधी अनेक प्रदर्शियां लगती है। यहां पर एक तारामंडल भी है, जिसे नेहरू तारामंडल कहते हैं। हमने नेहरू तारामंडल में जाकर अपने सौरमंडल के बारे में जाना। इसके अलावा हमने साइंस सेंटर में अनेक तरह के वैज्ञानिक प्रयोगों को जाना और समझा तथा वैज्ञानिक उपकरणों को देखा। कल की वैज्ञानिक यात्रा अविस्मरणीय रही। जब भी तुम्हें आओगे तो मैं तुम्हें नेहरू तारामंडल लेकर जाऊंगा तुम्हें वहां जाकर बहुत मजा आएगा।

तुम्हारा मित्र,
धीरज ।


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विद्युत कटौती से होने वली असुविधा की सूचना देते हुए अवर अभियंता को पत्र लिखिये।

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अवर विद्युत अभियंता को विद्युत कटौती के संबंध में पत्र

 

दिनांक : 19 जून 2024

सेवा में,
श्रीमान अवर विद्युत अभियंता,
जालंधर विद्युत निगम,
जालंधर (पंजाब)

विषय : विद्युत कटौती के संबंध में पत्र

माननीय महोदय,

मैं मोंगा नगर का निवासी दिनेश जुनेजा, हमारे मोंगानगर में लगातार हो रही विद्युत कटौती के संबंध में यह पत्र लिख रहा हूँ। पिछले 15 दिनों से हमारे मोंगानगर में लगातार विद्युत विभाग द्वारा लगातार बिजली की कटौती की जा रही है। इस कारण हमारी कॉलोनी के निवासियों को बड़ी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। इस समय बच्चों की परीक्षायें चल रही है और विद्युत विभाग द्वारा की जा रही कटौती के कारण उनकी पढ़ाई बाधित हो रही है।

हम सब कामकाजी पुरुष भी जब शाम को अपने ऑफिस से घर आते हैं तो घर में अंधेरा पाते हैं, तब हमें बेहद निराशा का सामना करना पड़ता है। बिजली विद्युत कटौती का कोई निश्चित समय नहीं है और कभी भी बिजली चली जाती है। आपसे अनुरोध है कि विद्युत विभाग द्वारा लगातार की जा रही विद्युत कटौती के संबंध में उचित कार्रवाई करें और अनियमित विद्युत कटौती को रोकें। अनियमित विद्युत कटौती के अलावा विद्युत कटौती यदि आवश्यक हो तो एक समय निश्चित कर दें, ताकि हम सभी नागरिक उसके अनुसार अपने कार्यक्रम को बना सकें।

आशा है, आप इस संबंध में तुरंत ही उचित कार्रवाई करेंगे और हम नागरिकों को राहत प्रदान करेगे।

भवदीय,
दिनेश जुनेजा,
मोंगा नगर, जालंधर


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अपने विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस मनाने हेतु विद्यालय के प्रधानाचार्य को पत्र लिखें।

‘आटे-दाल’ इस समस्त पद का समास विग्रह और समास भेद क्या होगा?

आटे-दाल इस शब्द का समास विग्रह और समास भेद

आटे-दाल : आटा और दाल
समास भेद : द्वंद्व समास

स्पष्टीकरण :

‘आटे-दाल’ में द्वंद्व समास इसलिए है क्योंकि ‘आटे-दाल’ इस समस्त पद में दोनो पद प्रधान हैं। द्विगु समास में दोनो पद प्रधान होते हैं।
समास के संक्षिप्तीकरण की क्रिया समासीकरण कहलाती है। समासीकरण के पश्चात जो नया शब्द बनता है, उसे समस्त पद कहते हैं। समस्त पद को पुनः मूल शब्दों में लाने की प्रक्रिया ‘समास विग्रह’ कहलाती है।


‘हमारे राष्ट्रीय पर्व’ पर निबंध लिखो।

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निबंध

हमारे राष्ट्रीय पर्व

 

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है, यहां कई धार्मिक त्योहारों के साथ 3 मुख्य राष्ट्रीय त्योहार बड़े धूम-धाम से मनाए जाते हैं ।

स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयंती और गणतंत्र दिवस यह तीनों राष्ट्रीय त्योहार भारत की स्वतंत्रता से सम्बंधित हैं । भारत सरकार ने देश के राष्ट्रीय पर्वों पर राष्ट्रीय अवकाश घोषित कर दिया है । देश भर में सभी स्कूल, कॉलेज, कार्यालय और बाजार इन पर्वों पर बंद होते हैं । भारतीय समाज के सभी धर्म, जाति और वर्ग के लोग अमीर, गरीब, बच्चे, बूढ़े तथा जवान इन राष्ट्रीय त्योहारों को बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं । यह सभी के अंतर्मन को गर्व से भर देता है । ये त्योहार हमारे अध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करता है और हमें शहीदों की याद दिलाता है ।

26 जनवरी, गणतंत्र दिवस भारत का एक राष्ट्रीय पर्व है जो प्रति वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाता है । इसी दिन सन् 1950 को भारत सरकार अधिनियम (1935) को हटाकर भारत का संविधान लागू किया गया था । यह भारत के तीन राष्ट्रीय अवकाशों में से एक है, अन्य दो स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती हैं । एक स्वतंत्र गणराज्य बनने और देश में कानून का राज स्थापित करने के लिए 2 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा इसे अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था । इसे लागू करने के लिये 26 जनवरी की तिथि को इसलिए चुना गया था क्योंकि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था ।

स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को मनाया जाता है, यह भारत का राष्ट्रीय त्यौहार है । सन् 1947 में इसी दिन भारत के निवासियों ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की थी । प्रतिवर्ष इस दिन भारत के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हैं । 15 अगस्त 1947 के दिन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने, दिल्ली में लाल किले के लाहौरी गेट के ऊपर, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया था । महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में लोगों ने काफी हद तक अहिंसक प्रतिरोध और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में हिस्सा लिया ।

2 अक्तूबर, यह भारत का राष्ट्रीय त्यौहार है । राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी थी । उन्होंने सत्य और अहिंसा के आदर्शों पर चलकर भारत को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराया था । गांधी जयंती के रूप में उनके जन्मदिन मनाकर देश राष्ट्रपिता को श्रद्धासुमन अर्पित करते है । इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है ।


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अपने नगर के चिड़ियाघर को देखने पर वहाँ की अव्यवस्था से आपको बहुत दुःख हुआ। इस अव्यवस्था के प्रति चिड़ियाघर के निदेशक का ध्यान आकृष्ट करते हुए एक पत्र लिखें।

औपचारिक पत्र

चिड़ियाघर के निदेशक को पत्र

 

दिनांक : 29 जून 2024

सेवा में,
मुख्य निदेशक,
कुफरी चिड़ियाघर, शिमला ।

विषय : चिड़ियाघर में व्याप्त अव्यवस्था के संबंध में

महोदय,
निवेदन इस प्रकार है, मेरा नाम विनय कुमार, मैं चंडीगढ़ शहर का रहने वाला हूँ। महोदय मैं चंडीगढ़ से शिमला घूमने आया था। एक दिन मैं जब कुफरी में स्थित चिड़ियाघर घूमने गया तो वहाँ पर मैने चिड़ियाघर में चारों तरफ अव्यवस्था ही देखी। मैं आपसे चिड़ियाघर की अव्यवस्था की अवस्था के बारे में ध्यान आकृष्ट चाहता हूँ । यहाँ पर चिड़ियाघर की हालत बहुत खराब है । पशु-पक्षियों का अच्छे ध्यान नहीं रखा जाता है । आस-पास कोई सफाई नहीं थी। जानवर के बाड़े में बहुत गंदगी थी। पर्यटक जानवरों को तंग कर रहे थे, उन्हें टोकने के लिए कोई भी कर्मचारी नहीं था । सभी जानवरों को देख कर ऐसा लग रहा था, उन पर कोई ध्यान नहीं देता है। चिड़ियाघर में जानवरों की देखभाल और रखरखाव का  मुझे उचित प्रबंध नहीं दिखाई नहीं दिया ।
मुझे यह देखकर बहुत दुःख हुआ कि चिड़ियाघर में जहाँ सभी जानवर रहते है, जिनके कारण ही चिड़ियाघर चलता है, उन्हीं का उचित ध्यान नहीं रखा जा रहा है । ये पशुओ के प्रति असंवदेनात्मक व्यवहार है।
मैं आपसे प्रार्थना करना चाहता हूँ कि आप चिड़ियाघर की अव्यवस्था की और ध्यान दें। सारी अव्यवस्था को दूर करने के लिए उचित कदम उठाएं।
धन्यवाद,

भवदीय,
विनय कुमार


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अपनी सहेली के जन्मदिन पर जाने को लेकर माँ-बेटी के बीच संवाद लिखें।

संवाद लेखन

सहेली के जन्मदिन पर जाने को लेकर माँ-बेटी के बीच संवाद

 

माँ ⦂ आ गई बेटी, तुम स्कूल से ?

बेटी ⦂ हाँ, माँ मैं आ गई। माँ मैं आज बहुत खुश हूँ।

माँ ⦂ बताओ क्या बात है।

बेटी ⦂ माँ, कल मेरी सहेली का जन्मदिन है, उसने मुझे अपने जन्मदिन पर घर बुलाया है। माँ मुझे जाना है। क्या आप मुझे जाने की अनुमति दोगे?

माँ ⦂ यह तो बहुत अच्छी बात है, कब जाना है?

बेटी ⦂ माँ वह अपना जन्मदिन दिन में ही मनाएगी, कल छुट्टी है, कल जाना है।

माँ ⦂ ठीक है चली जाना, पर समय पर वापिस आ जाना।

बेटी ⦂ माँ, मुझे समझ नहीं आ रहा, मैं अपनी सहेली को क्या उपहार दूँ।

माँ ⦂ तुम उसकी पसंद का कुछ अच्छा सा उपहार दे दो, जो उसे पसंद आए।

बेटी ⦂ ठीक है माँ, मैं सोचती हूँ।

माँ ⦂ ऐसा उपहार देना जो उसके काम आए।

बेटी ⦂ हाँ माँ, मैंने उसके लिए एक सुंदर की घड़ी खरीदी है। धन्यवाद माँ।


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अपनी छोटी बहन को पढ़ाई के साथ-साथ व्यायाम का महत्व बताते हुए पत्र लिखिए​।

अनौपचारिक पत्र

व्यायाम का महत्व बताते हुए छोटी बहन को पत्र

 

दिनांक : 18/11/2024

34/3, आशीर्वाद भवन,
सुंदरनगर, मंडी (हि. प्र.)

प्रिय बहन रागिनी,
सदैव खुश रहो !

मैं यहाँ कुशलता से हूँ और ईश्वर से तुम्हारी कुशलता की मंगल कामना करता हूँ। आज मुझे तुम्हारे प्रधानाचार्य का पत्र मिला जिससे पता चला कि तुमने परीक्षा में अच्छे अंक लाकर अपने माता-पिता का ही नहीं अपितु अपने गुरुजनों व अपने विद्यालय के नाम को भी गौरवान्वित किया है।

तुम्हारा परीक्षा परिणाम सुनकर माता जी फूली नहीं समा रही हैं। उन्होंने पत्र में ये भी लिखा था कि आजकल तुम्हारी तबीयत कुछ नाजुक रहती है। शरीर के अलग-अलग हिस्सों में दर्द होता है। पढ़ाई के साथ–साथ तुम्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी ज़रूरी है । तुम्हें यह याद रखना चाहिए कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। अतः तुम्हें रोज व्यायाम करना चाहिए और सुबह-सुबह टहलना चाहिए। खान-पान का समुचित ध्यान रखना चाहिए। व्यायाम और खान-पान में भी उसी मनोयोग से ध्यान दो जिस मनोयोग से पढ़ाई में ध्यान देती हो। यदि हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है तो जीवन सुख पूर्वक व्यतीत होता है ।

व्यायाम के माध्यम से हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सकते है । अगर व्यायाम नियमित रूप से किया जाए तो शरीर में होने वाले दर्द से निजात पाई जा सकती है। मैंने हाल ही में व्यायाम करना शुरू किया है और मुझे इससे बहुत ही आराम है। मैं व्यायाम की वजह से तरोताजा महसूस करता हूँ और ये शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। तुम्हारे लिए व्यायाम एक अच्छा उपचार सिद्ध होगा। आशा करता हूँ कि तुम मेरी सलाह को मानोगी और व्यायाम को अपने जीवन में स्थान दोगी। इस बार तुम जब गर्मियों की छुट्टियों में घर आओगी तो हम साथ में मिलकर व्यायाम करेंगे। अपना ख्याल रखना। शेष मिलने पर ।

तुम्हारा भाई,
अजय


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बाढ़ पीड़ितों की मदद के दौरान हुए अपने अनुभवों को साझा करते हुए अपने मित्र को पत्र लिखिए​।

अपने देश को स्वच्छ व सुंदर बनाने के लिए हमारे क्या प्रयत्न होने चाहिए?

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किसी देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि अपने देश को स्वच्छ व सुंदर बनाए रखने में अहम योगदान दे। अपने देश को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए जा सकते हैं…

स्वच्छता अभियान 

    • अपने देश को स्वच्छ और सुंदर बनाए रखने के लिए हमें लगातार स्वच्छता अभियान चलाते रहने की आवश्यकता है। यह स्वच्छता अभियान में हमें बढ़-चढ़कर भाग लेना होगा ताकि हमारे देश का हर कोना-कोना स्वच्छ रहे।

कचरा प्रबंधन

    • उचित कचरा प्रबंधन अपने देश को स्वच्छ बनाने के लिए हमें अपने देश में सही कचरा प्रबंधन करना होगा और कचरे के निपटान के लिए सही उपाय करने होंगे।  जैविक और अजैविक कचरा को अलग-अलग करके हमें उनके निपटान का सही प्रबंधन करना होगा। कचरे के पुनर चक्रीकरण यानी रीसाइकलिंग को भी बढ़ावा देना होगा ताकि कचरे को उपयोगी बनाया जा सके।

पेड़-पौधे लगाना

    • देश को सुंदर बनाने के लिए पेड़-पौधे लगाने की प्रवृत्ति को विकसित करना होगा और अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना होगा। जब देश में जगह-जगह हरियाली होगी तो हमारा देश सुंदर लगेगा। पेड़ पौधे न केवल देश की सुंदरता को बढ़ाएंगे बल्कि पर्यावरण को भी मजबूत करेंगे।

जल स्रोतों की सफाई

    • देश को स्वच्छ रखने के लिए उपलब्ध जितने भी जल स्रोत हैं। उनकी हमें सफाई करनी होगी। हमारी नदियां प्रदूषित हो चुकी है। उन सभी नदियों को स्वच्छ और साफ करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में उनमें कोई भी गंदगी नहीं डाली जाए। इससे न केवल जलप्रदूषण में कमी आएगी बल्कि नदिया स्वच्छ और सुंदर होंगी।

प्लास्टिक का कम उपयोग

    • अपने देश को स्वच्छ एवं सुंदर बनाने के लिए प्लास्टिक के कम उपयोग को बढ़ावा देना होगा। प्लास्टिक पर्यावरण के दुश्मन के समान है यह आसानी से नष्ट नहीं होता। प्लास्टिक का कचरा इधर-उधर जमा होकर सुंदरता देश की सुंदरता को खराब करता है। इसलिए हमें प्लास्टिक के कम उपयोग की प्रवृत्ति को विकसित करके ऐसे वैकल्पिक उपायों को खोजना होगा जो प्लास्टिक की जगह पर प्रयोग किया जा सकें।

सार्वजनिक स्थानों की देखभाल

    • सार्वजनिक स्थानों की देखभाल हमें अपने देश को स्वच्छ एवं सुंदर बनाए रखने के लिए जो भी स्वच्छ सार्वजनिक स्थान हैं, जैसे शहर, नगर, गाँव की सड़क, पार्क, सरकारी इमारते आदि इन सबकी स्वच्छता का ध्यान रखना होगा। हमें  इधर-उधर कूड़ा फेंकने की प्रवृत्ति से बचना होगा।

जागरूकता

    • लोगों में स्वच्छता से रहने के प्रति जागरूकता की प्रवृत्ति विकसित करना। अपने देश को स्वच्छ एवं सुंदर बनाने के लिए हमें लोगों में सफाई एवं सुंदरता की प्रवृत्ति को विकसित करना होगा। उन्हें जागरूक करना होगा तो वह ताकि वह स्वच्छता के प्रति सचेत हो सकें और स्वत ही स्वच्छता की आदत को अपने जीवन की नियमित दिनचर्या बना लें।

प्रशासन के साथ सहयोग और नियमों का पालन

    • हमें यह ध्यान रखना होगा कि हम अपने देश में बनाए गए स्वच्छता संबंधी सभी कानून का उचित पालन करें। इस तरह अपने देश को स्वच्छ एवं सुंदर बनाने में हम एक जिम्मेदार नागरिक की दृष्टि से एक अपना अहम योगदान दे सकते हैं।

इन प्रयासों के माध्यम से हम अपने देश को स्वच्छ, सुंदर और हरियाली से भरपूर बना सकते हैं।


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यूरोपीय संघ स्वयं काफी हद तक एक विशाल राष्ट्र राज्य की तरह काम कर रहा है।” इस कथन का औचित्य सिद्ध कीजिए।

यूरोपीय संघ एक काफी हद तक एक विशाल राष्ट्र-राज्य की तरह काम कर रहा है, क्योंकि यूरोपीय संघ यूरोप के अधिकतर देशों का एक विशाल संघ है। यूरोपीय संघ स्थापना यूरोप के देशों को एक मंच पर लाने के लिए की गई थी। यूरोपीय संघ का अपना साझा झंडा, साझा गान और साझी मुद्रा है, जिसे यूरो कहते हैं। हालांकि यूरोपीय संघ का एक साझा संविधान बनाने की का प्रयास तो असफल हो गया, लेकिन फिर भी यूरोपीय संघ के अधिकतर देश समान साझा कार्यक्रम के तहत कार्य करते हैं।

यूरोपीय संघ के देशों ने विश्व के अन्य देशों के साथ एक साझी विदेश और सुरक्षा नीति बना ली है। यूरोपीय संघ के देशों में एक दूसरे देश में जाना और अधिक कठिन नहीं रह गया है। ये बिल्कुल उसी तरह जैसे किसी देश के एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं।

यूरोपीय संघ में अधिकतर देश यूरोपीय संघ से जुड़ते जा रहे हैं। कुछेक देशों को छोड़कर लगभग सभी देश यूरोपीय संघ में शामिल हो गए हैं। यूरोपीय संघ के कार्यक्रम और सभी तरह के सहयोग को देखते हुए ऐसा लगता है कि यह अलग-अलग देशों का महाद्वीप नहीं बल्कि एक विशाल राष्ट्र हो।

आगे भविष्य में हो सकता है कि यूरोपीय संघ एक अलग-अलग देशों का एक विशाल राष्ट्र बन जाए। जैसा अमेरिका में है। अमेरिका 50 स्वतंत्र राज्यों का एक संघ है, जो एक राष्ट्र कहलाता है। भविष्य में संभव है कि यूरोप के देश भी ऐसा ही कोई संघ बनाकर एक विशाल देश का निर्माण करें।  इसीलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि यूरोपीय संघ काफी हद तक एक विशाल राष्ट्र राज्य की तरह काम करने लगा है।


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कर चले हम फिदा : कैफ़ी आज़मी

पाठ के बारे में…

इस पाठ में ‘कर चले हम कविता’ को प्रस्तुत किया गया है। ‘कर चले हम फिदा’ ‘कैफी आज़मी’ द्वारा लिखी गई कविता है, जो उनके जो उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखी थी। इस कविता के माध्यम से उन्होंने भारतीय सैनिकों की वीरता और उनके बलिदान का वर्णन किया है। यह कविता हिंदी फिल्म ‘हकीकत’ में गीत के रूप में फिल्माई गई थी।


रचनाकार के बारे में…

कैफ़ी आज़मी हिंदी उर्दू साहित्य के जाने-माने कवि और गीतकार तथा गज़लकार रहे हैं। उन्होंने उर्दू अदब की दुनिया में काफी नाम कमाया। उनकी गिनती उर्दू कवियों की पहली पंक्ति में की जाती है।उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता का कार्य किया है। उनका जन्म 19 जनवरी 1919 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मजमां गाँव में हुआ था।

उनके कुल 5 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें झंकार, आखिर-ए-शब, अवारा सज़दे, सरमाया का नाम प्रमुख है। इसके अलावा उनका फिल्मी गीतों का संग्रह ‘मेरी आवाज सुनो’ प्रकाशित हुआ। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई जाने-माने पुरस्कार मिल चुके हैं। 10 मई 2002 को उनका निधन हुआ।



प्रश्न-1 : क्या इस गीत की कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है?

उत्तर : इस गीत की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। यह गीत सन 1962 में हुए भारत एवं चीन के बीच हुए युद्ध पर आधारित था। सन 1962 में भारत ने चीन पर आक्रमण कर दिया था। तब भारतीय सैनिकों ने वीरता से लड़ते-लड़ते अपने देश की रक्षा के लिए अपना बलिदान कर दिया था।

यह गीत युद्ध को आधार बनाकर रखा गया है। इस गीत को इसी युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी, हिंदी फिल्म ‘हकीकत’ में भी फिल्माया गया है। यह गीत भारत और चीन के बीच युद्ध की वास्तविकता और सैनिकों की भावना को प्रदर्शित करता है और यह गीत विशेष रूप से इसी दिन के लिए कवि ‘कैफ़ी आज़मी’ द्वारा लिखा गया था।

प्रश्न-2 : ‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया’, इस पंक्ति में हिमालय किस बात का प्रतीक है?

उत्तर : सर हिमालय का हमने ना झुकने दिया’ , इस पंक्ति में हिमालय इस बात का भारत के मान और सम्मान का प्रतीक है। भारत चीन के बीच हुए युद्ध में भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान तो कर दिया, लेकिन उन्होंने भारत के सम्मान पर आँच ना आने दी। उन्होंने हिमालय का न झुकने दिया। 1962 में भारत और चीन के बीच हिमालय की घाटियों में ही युद्ध हुआ था।

उस समय भारत के अनेक सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान कर देश की सीमाओं की रक्षा की थी। भारतीय सैनिकों के उस बहादुरी एवं अद्भुत बलिदान कारण ही हिमालय का सर नहीं झुका था, यानी भारत का मान सम्मान कायम रहा। इन भारत के इन वीर सैनिकों ने अपने प्राणों की बलिदान करके भारत की मान-सम्मान की रक्षा की।

 

प्रश्न-3 : इस गीत में धरती को दुलहन क्यों कहा गया है?

उत्तर : इस गीत में कवि ने धरती को दुल्हन इसलिए कहा है, क्योंकि कवि ने यहाँ पर प्रतीक के रूप में धरती दुल्हन और सैनिकों को दूल्हे का रूप बनाया है। भारतीय सैनिकों के शौर्य और बहादुरी के कारण बलिदान के कारण उनके खून से धरती लाल रंग से रंग गई थी।

दुल्हन भी लाल लिबास पहनती है। लाल रंग से रंगने के कारण ऐसा लग रहा था की धरती दुल्हन बन गई है और भारतीय सैनिक अपने प्राणों का बलिदान करके अपने खून से रंगकर को दुल्हन का लिबास प्रदान किया है, इसीलिए कवि ने लड़की को दुल्हन कहा है।

 

प्रश्न-4 : गीत में ऐसी क्या खास बात होती है कि वे जीवन भर याद रह जाते हैं?

उत्तर : गीत में जीवन भर याद रहने वाली अनेक खास बातें होती हैं। गीत भावना से भरे होते हैं। उनमें मधुरता होती है, संगीत की लय होती है, गेयता का गुण होता है। गीत सच्चाई से भरे होते हैं,जो मन के भावों को व्यक्त करते हैं, मर्मस्पर्शी होते हैं, जो ह्रदय के तारों को छेड़ देते हैं।

इसी कारण यह जीवन भर याद रह जाते हैं। ‘कर चले हम फिदा’ गीत के माध्यम से भी सैनिकों की भावना और उनके बलिदान उदात्ता प्रकट हो रही है जो सीधे-सीधे दिल को छू ले रही है, इसीलिए यह गीत अमर बन गया। यह केवल किसी एक व्यक्ति का गीत नहीं सैनिकों की तरफ से सभी भारतीयों का गीत है। गीत के इन्हीं गुणों के कारण ही गीत जीवनभर याद रह जाते हैं।

 

प्रश्न-5 : कवि ने ‘साथियो’ संबोधन का प्रयोग किसके लिए किया है?

उत्तर : कवि ने इस कविता में ‘साथियों’ संबोधन का प्रयोग समस्त भारत वासियों के लिए किया है। इस कविता में सैनिकों के मन की भावना व्यक्त हो रही है। उन्होंने वह बलिदान की राह पर चल रहे हैं। वह अपने प्राणों का बलिदान करने जा रहे हैं, लेकिन बलिदान करने से पूर्व या बलिदान करते समय व समस्त भारतवासियों को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि हम ने तो अपना कर्तव्य निभा दिया, अब आगे का कर्तव्य निभाना तुम्हारा काम है। अब तुम्हें ही इस देश को संभालना है और इसकी रक्षा करनी है। इस तरह कवि ने साथियों संबोधन का प्रयोग समस्त भारत वासियों के लिए किया है।

 

प्रश्न-6 : कवि ने इस कविता में किस काफ़िले को आगे बढ़ाते रहने की बात कही है?

उत्तर : कवि ने इस कविता में अपने देश पर मर मिटने वाले बलिदानी सैनिकों के काफ़िले को आगे बढ़ते रहने की बात कही है। कवि ने कहा है कि बलिदान का यह कार्य रुकना नहीं चाहिए और जब-जब देश को आवश्यकता पड़े सैनिकों को अपने प्राणों का बलिदान करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

देश की सीमाएं तभी सुरक्षित रह सकती है जब देश के वासी और सैनिक अपने देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने के लिए सदैव तत्पर रहें। कवि का कहना है कुछ सैनिकों ने अपने देश की सीमा की रक्षा के लिए बलिदान तो कर दिया है लेकिन यह क्रम आगे भी चलता रहना चाहिए क्योंकि अभी और रास्ता तय करना है। अभी शत्रुओं को पूरी तरह परास्त कर पूरी तरह विजय प्राप्त करना है। तभी सैनिकों का बलिदान सार्थक होगा।

 

प्रश्न-7 : इस गीत में ‘सर पर कफ़न बाँधना’ किस ओर संकेत करता है?

उत्तर : इस गीत में सर पर कफन बांधना सैनिकों के उस भावों की ओर संकेत करता है, जिसमें वह अपने देश की रक्षा के लिए अपने जीवन को बलिदान करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। सर पर कफन बांधना का अर्थ है, बिना किसी संकोच के हर पल अपने देश की रक्षा करना और आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राणों के बलिदान करने से भी संकोच ना करना।

सर पर कफन बांधना अर्थात यह जानते हुए भी कि मेरे जीवन को खतरा है, हँसते-हँसते युद्ध करना ही सर पर कफन बाँधना होता है। सर पर कफन बाँधना निडरता का सूचक होता है। देश की रक्षा करने वाला सैनिक मौत से नहीं डरता और हमेशा मौत का खतरा होते हुए भी देश की रक्षा करने के लिए तैयार रहता है।

प्रश्न-8 : इस कविता का प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर : ‘कर चले हम कविता’ का प्रतिपाद्य इस प्रकार होगा। ‘कर चले हम फिदा’ कविता उर्दू के प्रसिद्ध कवि कैफी आज़मी द्वारा रचित एक कविता है।

यह कविता उन्होंने फिल्मी गीत के रूप में एक हिंदी फिल्म ‘हकीकत’ के लिए लिखी थी। यह कविता हकीकत फिल्म में गीत के रूप में फिल्माई गई थी। यह फिल्म भारत चीन 1962 में हुए भारत चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी थी। यह कविता भी उसी युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसके माध्यम से सैनिकों ने अपने देश की रक्षा में अपने प्राणों का बलिदान करने वाले सैनिकों ने जाते-जाते अपने हृदय के भावों को व्यक्त किया है।

कवि ने अपने शब्दों के माध्यम से कवि के हृदय की आवाज को कविता में उतारा है।  इस कविता में सैनिक अपने देशवासियों को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि उन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया है यानी उन्होंने अपना कर्तव्य निभा दिया है। अब दूसरे सैनिकों और देश के सभी वासियों के हाथ में यह देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। अब उन्हें अपना कर्तव्य निभाना है और देश को ना केवल देश की रक्षा करनी है बल्कि देश के मान सम्मान को भी बढ़ाना है।

अपने देश की रक्षा करने के लिए देश की आन, बान और शान पर आँत नहीं आने देने के लिए समय आने पर अपना बलिदान करने से नहीं चूकते और वह हमेशा यह कार्य करते रहेंगे। यही इस कविता का प्रतिपाद्य है।


(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए-

प्रश्न 1.
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया

भाव : कवि कहता है कि देश की रक्षा के लिए जाने वाले सैनिक अपने वचन का पालन करने के लिए कृत संकल्प थे। इसी कारण वह अपने जीवन का अंतिम युद्ध लड़ते गए। जब तक उन सैनिकों ने अपने जीवन का बलिदान नहीं कर दिया उन्होंने हार नहीं मानी।

उनके प्राण निकलते जा रहे थे लेकिन वह लड़ते जा रहे थे। उनका भले ही उनका जीवन संकट में आ गया था लेकिन वह लड़ने से पीछे नहीं हटे और उनके आगे बढ़ते कदमों को शत्रु रोक नहीं पाया। किसी भी तरह की परिस्थिति में उनके कदम डगमगाए नहीं। देश की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगा दी लेकिन देश के सम्मान पर आँच न आने दी।

प्रश्न 2.
खींच दो अपने खू से जमीं पर लकीर
इस तरफ़ आने पाए न रावन कोई

भाव : कवि कहता है कि युद्ध के मैदान में देश की रक्षा में लगे सैनिक अपनी अंतिम सांस तक देश की रक्षा करते है। वह सैनिकों से रावण रूपी शत्रु के लिए लक्ष्मणरेखा खींचने की बात कह रहा है। कवि का भाव यह है कि देश की धरती पवित्र है। यह धरती सीता के समान है और सैनिक लक्ष्मण के समान। सीता रूप भूमि पर शत्रु रूपी रावण यदि सीता का हरण करने आएगा तो अपने खून से लक्ष्मण रेखा खींचकर सैनिक इस देश की रक्षा करेंगे ताकि रावण रूपी शत्रु न आने पाये।

प्रश्न 3.
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

भाव : यह भारत भूमि सीता के समान है। सीता की तरह पवित्र है और इस देश के निवासी-सैनिक सभी राम-लक्ष्मण की तरह है। इसलिए इस सितारों की धरती पर यदि शत्रु रूपी रावण आँख उठाकर बुरी नजर से देखने की जुर्रत करेगा तो राम-लक्ष्मण रूपी भारत के सैनिक और जनता शत्रु की ईंट से ईंट बजा देगी और अपने देश के मान सम्मान की रक्षा करने के पीछे नहीं हटेगी। ऐसे कम ही लोग होते हैं जो देश की रक्षा करने में अपने प्राणों का बलिदान करने में संकोच करते हो लेकिन भारत के वीर जवानों की रक्षा करते हुए ऐसा ही किया है।


भाषा अध्ययन

1. इस गीत में कुछ विशिष्ट प्रयोग हुए हैं। गीत संदर्भ में उनका आशय स्पष्ट करते हुए अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए। कट गए सर, नब्ज़ जमती गई, जान देने की रुत, हाथ उठने लगे

उत्तर : गीत में प्रयुक्त विशिष्ट प्रयोग के अंतर्गत इन शब्दों का आशय और उनका वाक्य में प्रयोग इस प्रकार होगा :

कट गए सर
आशय : बलिदान होना, अपने प्राणों का बलिदान कर देना।
वाक्य प्रयोग : भारत-चीन युद्ध के मैदान में सैनिक बहादुरी से लड़ते रहे उनके सर कटते गए लेकिन वह निरंतर आगे बढ़ते रहे।

नब्ज़ जमती गई 
आशय : ठंड के कारण नसों में खून का जमना।
वाक्य प्रयोग : जब भारत-चीन युद्ध चल रहा था तब बर्फीली चोटियों पर हिमालय की वादियों में युद्ध लड़ा जा रहा था। जहाँ पर हिमालय की वादियों में लेह लद्दाख की कड़ी सर्दी में वीर जांबाज सैनिकों की नब्ज़ जमती गई लेकिन फिर भी वह युद्ध करते गए।

जान देने की रुत
आशय :
अपनी मातृभूमि के लिए अपने जीवन का बलिदान कर का अवसल मिलना।
वाक्य प्रयोग : भारत-चीन युद्ध में सैनिक बहादुरी से लड़े और जब उन्हें लगा कि अबउनकी जान देने की रुत आ गई है, तो उन्होंने संकोच नहीं किया।

हाथ उठने लगे
आशय :
आक्रमणकारियों का आक्रमण करना।
वाक्य प्रयोग : जब चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और आक्रमणकारियों के हाथ उठने लगे तो भारत के सैनिकों ने मुंह तोड़ जवाब दिया।

2. ध्यान दीजिए संबोधन में बहुवचन शब्द रूप पर अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता, जैसे भाइयों, बहनों, देवियों, सज्जनों आदि

उत्तर : विद्यार्थी ऐसे समझें…
भाइयो : सफ़ाई कर्मचारियों के नेता ने कहा, भाइयो! कहीं भी गंदगी न रहने पाए।
बहिनो- समाज सेविका ने कहा, बहिनो! कल पोलियो ड्राप पिलवाने ज़रूर आना।
देवियो- पुजारी ने कहा, देवियो! देवियो! कलश पूजन में जरूर शामिल होना।
सज्जनो- सज्जनो! यहाँ सफ़ाई बनाए रखने की कृपा करें।


योग्यता विस्तार

प्रश्न 1: कैफ़ी आज़मी उर्दू भाषा के एक प्रसिद्ध कवि और शायर थे। ये पहले गज़ल लिखते थे। बाद में फ़िल्मों में गीतकार और कहानीकार के रूप में लिखने लगे। निर्माता चेतन आनंद की फ़िल्म ‘हकीकत’ के लिए इन्होंने यह गीत लिखा था, जिसे बहुत प्रसिद्धि मिली। यदि संभव हो सके तो यह फ़िल्म देखिए।

उत्तर : सिनेमा हॉल में जाकर ये फिल्म देखना संभव नहीं है। विद्यार्थी ये फिल्म टीवी अथवा यूट्यूब पर देख सकते हैं। इंटरनेट पर ये फिल्म सर्च करने पर मिल सकती है। ये एक श्वेत-श्याम (ब्लैक एंड व्हाइट) फिल्म है। इस फिल्म में धर्मेंद ने मुख्य भूमिका निभाई थी। ये फिल्म देशभक्ति की भावना से भरी फिल्म है। फिल्म को देखें, समझें और फिल्म के भाव को महसूस करें।

प्रश्न 2. ‘फ़िल्म का समाज पर प्रभाव’ विषय पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।

उत्तर : फ़िल्म का समाज पर प्रभाव पर परिचर्चा इस प्रकार हो सकती है…

अध्यापक : बच्चों, आज हम ‘फ़िल्म का समाज पर प्रभाव’ विषय पर चर्चा करेंगे। फ़िल्में हमारे जीवन का अहम हिस्सा हैं और समाज पर गहरा प्रभाव डालती हैं। क्या कोई बता सकता है कि फ़िल्में समाज को कैसे प्रभावित करती हैं?
राजेश : सर, फ़िल्में समाज में जागरूकता फैलाने का काम करती हैं। उदाहरण के लिए, ‘पिंक’ जैसी फ़िल्म ने महिलाओं के अधिकारों और सहमति के महत्व पर रोशनी डाली।
अध्यापक : बहुत अच्छा, राजेश। और कोई?
रोशनी : सर, फ़िल्में हमें मनोरंजन तो देती ही हैं, साथ ही सामाजिक मुद्दों पर भी ध्यान आकर्षित करती हैं। ‘तारे ज़मीन पर’ ने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाई।
अध्यापक : सही कहा, रोशनी तुमने। फ़िल्में मनोरंजन का माध्यम होने के साथ-साथ सामाजिक संदेश भी देती हैं। और किसी का कोई विचार?
सोनम : सर, कुछ फ़िल्में समाज में नकारात्मक प्रभाव भी डाल सकती हैं। हिंसा और नशे को बढ़ावा देने वाली फ़िल्में युवाओं पर बुरा असर डालती हैं।
अध्यापक : बिल्कुल सही, सोनम। फ़िल्में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव डाल सकती हैं। इसलिए हमें फ़िल्में चयनित और सोच-समझकर देखनी चाहिए।
आशुतोष : सर, फ़िल्में समाज में बदलाव लाने का भी जरिया बन सकती हैं। ‘लगान’ जैसी फ़िल्में हमें एकजुटता और संघर्ष की प्रेरणा देती हैं।
अध्यापक : बहुत अच्छा, अजय। फ़िल्में समाज में जागरूकता, प्रेरणा, और मनोरंजन का माध्यम हैं। लेकिन हमें हमेशा उनकी सामग्री और संदेश के प्रति सजग रहना चाहिए।
अध्यापक : धन्यवाद बच्चों, आज की परिचर्चा यहीं समाप्त होती है। मुझे खुशी है कि आप सबने अपने विचार साझा किए।

 

प्रश्न 3. कैफ़ी आज़मी की अन्य रचनाओं को पुस्तकालय से प्राप्त कर पढ़िए और कक्षा में सुनाइए। इसके साथ ही उर्दू भाषा के अन्य कवियों की रचनाओं को भी पढ़िए।
उत्तर : विद्यार्थी अपने गाँव, कस्बे या शहर के नजदीकी पुस्तकालय जाएं। वहाँ पर कैफी आज़मी से संबंधित साहित्य को ढूंढे। उनकी पुस्तकें प्राप्त करें। उन रचनाओं कों पढ़ें। उर्दू भाषा के कई अन्य कवि साहित्यकार जैसे मिर्जा ग़ालिब, मीर आदि को पढ़ें।

 

प्रश्न 4. एन० सी० ई० आर० टी० द्वारा कैफ़ी आज़मी पर बनाई गई फ़िल्म देखने का प्रयास कीजिए।
उत्तर : विद्यार्थी एन. सी. ई. आर. टी. की वेबसाइट पर जाएं वहाँ पर फिल्म को तलाशें। या इंटरनेट पर अन्य माध्यमों जैसे हिंदी और ऊर्दू कवियों-शायरों-गीतकारों से संबंधित वेबसाइट पर फिल्म को तलाशें। फिल्म मिलने के बाद उसे देखें और कैफी आज़मी के जीवन को समझने का प्रयास करें।

 

परियोजना कार्य

प्रश्न 1. सैनिक जीवन की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए एक निबंध लिखिए।

उत्तर : विद्यार्थी इस विषय पर स्वयं निबंध लिखने का प्रयास करें। उनकी सहायता के लिए एक निबंध का लिंक दिया जा रहा है। इस लिंक पर जाकर संबंधित विषय पर लिखे निबंध को देख सकते हैं।

‘सैनिक जीवन की चुनौतियाँ’ इस विषय पर एक निबंध लिखें।

प्रश्न 2. आज़ाद होने के बाद सबसे मुश्किल काम है ‘आज़ादी बनाए रखना’। इस विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

उत्तर : ये एक प्रायोगिक कार्य है। विद्यार्थी अपनी कक्षा में विषय पर आपस में चर्चा करें। सहायता हेतु इस लिंक पर जाएं कि कैसे चर्चा हो सकती है।

आज़ाद होने के बाद सबसे मुश्किल काम है ‘आज़ादी बनाए रखना’। इस विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

प्रश्न 3 : अपने स्कूल के किसी समारोह पर यह गीत या अन्य कोई देशभक्तिपूर्ण गीत गाकर सुनाइए।

उत्तर : ‘कर चले हम फिदा’ ये गीत विद्यार्थी अपने विद्यालय के समारोह में सुना सकते हैं। या अपनी पसंद का कोई भी देशभक्ति भरा गीत चुन सकते हैं…

जैसे..
मेरे देश की धरती सोना (फिल्म – उपकार)
ये प्रीत जहाँ की रीत सदा (फिल्म – पूरब और पश्चिम)
होठों पर सच्चाई रहती है (जिस देश में गंगा बहती है)
ये देश है मेरा स्वदेश है मेरा (स्वदेस)


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आज़ाद होने के बाद सबसे मुश्किल काम है ‘आज़ादी बनाए रखना’। इस विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

परिचर्चा

आज़ाद होने के बाद सबसे मुश्किल काम है ‘आज़ादी बनाए रखना’

 

अध्यापक ⦂ बच्चों, आज हम एक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करेंगे कि ‘आज़ाद होने के बाद सबसे मुश्किल काम है, ‘आज़ादी बनाए रखना’।” स्वतंत्रता प्राप्त करना एक बड़ी उपलब्धि होती है, लेकिन उसे बनाए रखना उससे भी बड़ी चुनौती होती है। क्या कोई बता सकता है कि क्यों?

अंशुल ⦂ सर, मुझे लगता है कि आज़ादी प्राप्त करने के बाद देश को स्थिर और संगठित रखना कठिन होता है। विभिन्न विचारधाराओं और समूहों के बीच तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती होती है।

अध्यापक ⦂ सही कहा तुमने अंशुल। देश की विविधता को एकता में बांधना और सभी को साथ लेकर चलना बहुत महत्वपूर्ण है। और कोई?

महिमा ⦂ सर, आर्थिक विकास भी एक बड़ी चुनौती होती है। आज़ादी के बाद देश को आत्मनिर्भर बनाने और आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए ठोस नीतियों और योजनाओं की आवश्यकता होती है।

अध्यापक ⦂ बिल्कुल सही, अध्यापक। आर्थिक स्थिरता के बिना स्वतंत्रता का पूर्ण लाभ नहीं उठाया जा सकता। और किसी का कोई विचार?

वरुण ⦂ सर, बाहरी खतरों से भी देश को सुरक्षित रखना बहुत महत्वपूर्ण है। हमारी आज़ादी को बनाए रखने के लिए सेना और सुरक्षा बलों का मजबूत होना आवश्यक है।

अध्यापक ⦂ बिल्कुल सही, वरुण। राष्ट्रीय सुरक्षा का ध्यान रखना एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा?

वैदेही ⦂ सर, सामाजिक न्याय और समानता भी आवश्यक हैं। आज़ादी का सही अर्थ तभी है जब हर नागरिक को समान अधिकार और अवसर मिलें।

अध्यापक ⦂ हाँ, वैदेही। सामाजिक न्याय और समानता के बिना स्वतंत्रता अधूरी है। हमें हर व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।

सार्थक ⦂ सर, शिक्षा भी महत्वपूर्ण है। शिक्षित नागरिक ही स्वतंत्रता का सही अर्थ समझ सकते हैं और उसे बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

अध्यापक ⦂ हाँ, सार्थक। शिक्षा समाज के विकास का आधार है। शिक्षित नागरिक ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों को भली-भांति समझ सकते हैं।

अध्यापक ⦂ बच्चों, आज़ादी बनाए रखना एक सतत प्रक्रिया है। इसके लिए हमें सतर्क, संगठित और प्रतिबद्ध रहना होगा। हमें अपने देश की प्रगति के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। इसी से हमारी आज़ादी सुरक्षित और सुदृढ़ रहेगी।

सभी छात्र ⦂ हाँ, सर हम आपकी बात अच्छी तरह समझ गए।

अध्यापक ⦂ धन्यवाद बच्चों, आपने बहुत अच्छे विचार साझा किए। हमें मिलकर अपनी आज़ादी को बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहना होगा।


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निबंध

सैनिक जीवन की चुनौतियाँ

 

सैनिक जीवन एक ऐसा मार्ग है जो कर्तव्य, समर्पण और बलिदान से परिपूर्ण है। यह जीवन जितना सम्माननीय है, उतना ही चुनौतियों से भरा हुआ भी है। एक सैनिक का कर्तव्य केवल देश की सीमाओं की रक्षा तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि वह अपने परिवार और निजी जीवन की कुर्बानी देकर राष्ट्र की सेवा में समर्पित होता है।

प्रथम चुनौती होती है कठिन प्रशिक्षण। एक सैनिक को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाने के लिए कठोर प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। यह प्रशिक्षण न केवल शारीरिक सहनशक्ति बढ़ाता है, बल्कि मानसिक दृढ़ता भी प्रदान करता है, जो युद्धक्षेत्र में अत्यंत आवश्यक होती है।

दूसरी चुनौती होती है परिवार से दूर रहना। सैनिकों को लंबे समय तक अपने परिवार से दूर रहना पड़ता है, जिससे वे अपने जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों से वंचित रह जाते हैं। यह दूरी उनके मनोबल पर प्रभाव डाल सकती है, लेकिन देश के प्रति कर्तव्य उन्हें इस कठिनाई का सामना करने की शक्ति देता है।

तीसरी चुनौती होती है अनिश्चितता का सामना करना। युद्धक्षेत्र में हर क्षण जीवन और मृत्यु के बीच का होता है। किसी भी समय दुश्मन का हमला हो सकता है, और सैनिक को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना पड़ता है। यह अनिश्चितता मानसिक तनाव का कारण बनती है, लेकिन सैनिक अपने देशप्रेम और साहस से इसे पार कर लेते हैं।

चौथी चुनौती होती है मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों का सामना करना। बर्फीले पहाड़ों से लेकर तपते रेगिस्तान तक, सैनिक हर परिस्थिति में अपनी ड्यूटी निभाते हैं। यह परिस्थितियाँ उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं।

अंत में, सैनिक जीवन की चुनौतियों का सामना करना आसान नहीं है, लेकिन देश के प्रति उनका अटूट प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा उन्हें इन सभी कठिनाइयों को सहन करने की शक्ति देती है। सैनिकों का यह जीवन हमें न केवल प्रेरित करता है, बल्कि हमें उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान का भाव भी सिखाता है।


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मधुर मधुर मेरे दीपक जल : महादेवी वर्मा (कक्षा-10 पाठ-6 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर) (पुराना पाठ्य क्रम)

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NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

मधुर मधुर मेरे दीपक जल : महादेवी वर्मा (कक्षा-10 पाठ-6 हिंदी स्पर्श 2)

Mahur Madhur Mere Deepak Jal : Mahadevi Verma (Class 10 Chapter 6 Hindi Sparsh 2)



मधुर मधुर मेरे दीपक जल : महादेवी वर्मा

पाठ के बारे में…

इस पाठ में हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा की कविता ‘मधुर-मधुर मेरे दीपक जल’ को प्रस्तुत किया गया है। इस कविता के माध्यम से कवयित्री अपने आप से जो अपेक्षाएं करती है, यदि वह पूरी हो जाए तो ना केवल उसका अपना भला होगा बल्कि हर आमजन का कितना भला हो सकता है, यह बताने का प्रयास कवयित्री ने किया है। कवयित्री के अनुसार हम सब भले ही अलग-अलग शरीर धारी हों, लेकिन हैं हम एक ही, जो हमें मनुष्य नाम की जाति के रूप में पहचान प्रदान करता है।

कवयित्री के अनुसार औरों से बतियाना, औरों को समझाना, औरों को राह सुझाना तो सभी कर ही लेते हैं लेकिन उससे ज्यादा कहीं कठिन और श्रम साध्य कार्य यह है, अपने आप को समझाना। अपने आप से बतियाना और अपने आप को सही राह पर बनाए रखने के लिए तैयार करना।



कवयित्री के बारे में…

महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य जगत की छायावाद युग की एक प्रमुख कवयित्री रही हैं। वह छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक प्रमुख स्तंभ रही हैं। महादेवी वर्मा का जन्म 1907 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में हुआ था। वह एक प्रसिद्ध कवयित्री और बेजोड़ लेखिका रही है। उन्होंने अनेक मर्मस्पर्शी कविताएं एवं संवेदनशील कहानियों की रचना की है। उनकी अधिकतर कहानियां उनके जीवन के संस्मरणों से संबंधित रही हैं।

महादेवी वर्मा की प्रमुख रचनाओं में रश्मि, नीहार, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा, प्रथम आयाम, अग्नि आदि के नाम प्रमुख है। इसके अलावा उन्होंने अतीत के चलचित्र, श्रंखला की कड़ियां, स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी, मेरा परिवार और चिंतन के क्षण जैसी गद्य कृतियों की भी रचना की। उनका निधन 11 सितंबर 1987 को हुआ।



हल प्रश्नोत्तर

(क) निम्नलिखिथ प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

प्रश्न 1 : प्रस्तुत कविता में ‘दीपक’ और ‘प्रियतम’ किसके प्रतीक हैं?

उत्तर : प्रस्तुत कविता में ‘दीपक’ ईश्वर के प्रति कवियत्री की आस्था तथा आत्मा का प्रतीक है और ‘प्रियतम’ ईश्वर का प्रतीक है। कवयित्री ने दीपक के माध्यम से ईश्वर के प्रति आस्था और आत्मा को आधार बनाया है। जबकि प्रियतम के माध्यम से वह अपने आराध्य ईश्वर को प्रतीक बनाती हैं।

कवयित्री दीपक से प्रार्थना कर रही हैं कि जीवन की प्रत्येक विषम परिस्थिति से जूझकर भी प्रसन्नतापूर्वक ज्योति फैलाए हैं, जिससे उसके प्रियतम को पाने का पथ आलोकित हो और वह उस पथ पर सहज भाव से चल सके। कवयित्री अपनी आत्मारूपी दीपक को जलाकर अपने प्रियतम यानी परमात्मा को पाने के पथ को आलोकित करना चाहती हैं।

प्रश्न 2 दीपक से किस बात का आग्रह किया जा रहा है और क्यों?

उत्तर : दीपक से इस बात का आग्रह किया जा रहा है कि वह कैसी भी परिस्थिति क्यों ना हो, कितनी भी विषम परिस्थिति क्यों ना हो, हर तरह की परिस्थिति में निरंतर जलता रहे।

कवयित्री दीपक से ऐसा आग्रह इसलिए कर रही हैं, क्योंकि दीपक के प्रकाश से उनके अपने प्रियतम को पाने का पथ आलोकित होता रहे और वह अपने प्रियतम यानि अपने आराध्य ईश्वर को पाने के मार्ग पर सहज रूप से चल सकें।

यहाँ पर कवयित्री ने दीपक को आत्मा का प्रतीक बनाया है। वह अपनी आत्मा के प्रकाश से अपने प्रियतम यानी कि ईश्वर को पाने का पथ आलोकित करना चाहती हैं। उनके अनुसार प्रियतम से उनका मिलन अर्थात ईश्वर को पाना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है।

प्रश्न 3 : विश्व-शलभ’ दीपक के साथ क्यों जल जाना चाहता है?

उत्तर : इन पंक्तियों में विश्व-शलभ से तात्पर्य पूरे संसार से है। विश्व-शलभ यानी पूरा संसार दीपक के साथ इसलिए जल जाना चाहता है, ताकि वह अपने अंदर के अहंकार, लोभ तथा विषय विकारों आदि को मिटा सके और ईश्वर में लीन हो जाए। विश्वशलभ दीपक के साथ जलकर अपने अस्तित्व को मिटा देना चाहता है ताकि उसके अंदर ज्ञान का प्रकाश प्रज्जवलित हो और वह ईश्वर को पा सके।

कवयित्री कहती है कि जिस तरह पतंगा दीपक की लौ के प्रति समर्पित होकर उसकी आग में जलकर अपने जीवन को मिटा देता है। उसी प्रकार यह सारा संसार भी प्रभु की भक्ति में लीन होकर अपने अंदर के अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह-माया आदि आदि को मिटा देता है ताकि उसके अंदर ज्ञान का प्रकाश जले और वह अपने प्रियतम ईश्वर को पा सके। सरल शब्दों में कहें तो संसार के लोग अपने अंदर के अहंकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश प्रज्जवलित करके ईश्वर को पाना चाहते हैं, इसीलिए विश्व-शलभ दीपक के साथ जल जाता है।

 

प्रश्न 4 : आपकी दृष्टि में ‘मधुर मधुर मेरे दीपक जल’ कविता का सौंदर्य इनमें से किस पर निर्भर है −
(
क) शब्दों की आवृति पर।
(
ख) सफल बिंब अंकन पर।

उत्तर : हमारी दृष्टि में ‘मधुर-मधुर मेरे दीपक जल’ कविता का सौंदर्य शब्दों की आवृत्ति और सफल बिंब अंकन दोनों पर निर्भर है। जहाँ कवियत्री ने कविता में शब्दों की आवृत्ति से अद्भुत सौंदर्य बोध कराया है और कविता में जगह-जगह पर शब्दों की आवृत्ति कविता को विशिष्टता प्रदान कर रही है, वहीं कविता का सफल बिंबाकन भी कविता को एक अलग विशिष्टता प्रदान कर रहा है।

कवयित्री ने मधुर-मधुर, युग-युग, सिहर-सिहर, बिहँस-बिहँस जैसे शब्द युग्म के माध्यम से ‘पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार’ की छटा बिखेरी है।

कवयित्री ने इन पंक्तियों के माध्यम से बिंबों का सफल अंकन किया है। ‘मधुर मधुर मेरे दीपक जल सौरभ फैला विपुल धूप बन विश्व-शलभ सिर धुनता कह मैं, जलते नभ में देख असंख्य स्नेहनीत नित कितने दीपक विद्युत बन ले घिरता है बादल।

प्रश्न 5 : कवयित्री किसका पथ आलोकित करना चाह रही हैं?

उत्तर : कवयित्री अपने प्रियतम को पाने वाला पथ आलोकित करना चाह रही हैं ताकि उसके प्रियतम यानि परमात्मा तक पहुंचने का उनका रास्ता सरल हो जाए। कवयित्री अपनी आस्था एवं आत्मा रूपी दीपक को जलाकर अपने परमात्मा यानी प्रियतम का पथ आलोकित करना चाह रही हैं।

अपने प्रियतम यानी परमात्मा को ही पाना उनका अंतिम लक्ष्य है और वह इस पथ को आलोकित करके निरंतर उस पथ पर चलते रहना चाहती है, ताकि वह अपने प्रियतम को पा सकें। कवयित्री के कहने का भाव यह है कि उनके मन की अज्ञानता ही उनका मन का अंधकार है और वह इस अंधकार को मिटाकर देना चाहती हैं ताकि उनके अंदर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हो। यह ज्ञान का प्रकाश ही ईश्वर को पाने का पथ है।

प्रश्न 6 : कवयित्री को आकाश के तारे स्नेहहीन से क्यों प्रतीत हो रहे हैं?

उत्तर : कवयित्री को आकाश के तारे स्नेहहीन से इसलिए प्रतीत हो रहे हैं क्योंकि कवयित्री को लगता है कि इन तारों में तेल समाप्त हो गया है, जिस कारण उनमें प्रकाश नहीं उत्पन्न हो रहा और यह तारे दया, प्रेम, करुणा, प्रेम जैसे भावों से रहित हैं, इसी कारण वे स्नेहहीन हो गए हैं।

कवयित्री  ने आकाश के तारे संसार के मनुष्यों के प्रतीक बनाकर प्रयोग किए हैं। कवियत्री के अनुसार संसार के मनुष्यों में दया, प्रेम, करुणा, विनम्रता, सहानुभूति जैसे गुणों का अभाव हो गया है। इसी कारण उनमें स्नेह नही दिखता। इन तारों को यानि संसार के मनुष्यों को तेल मिल जाए यानी संसार के सभी मनुष्य प्रेम एवं सौहार्द की भावना से रहे तो उनके अंदर स्वतः ही स्नेह फूट पड़ेगा।

 

प्रश्न 7 : पतंगा अपने क्षोभ को किस प्रकार व्यक्त कर रहा है?

उत्तर : पतंगा अपने सिर को धुनकर अपना क्षोभ व्यक्त कर रहा है। पतंगा दीपक की लौ में जलकर अपने अस्तित्व को मिटा देना चाहता है, क्योंकि वह दीपक से परम स्नेह करता है और उसके प्रति पूरी तरह समर्पित होकर स्वयं के अस्तित्व को उसमें ही विलीन कर देना चाहता है। जब वह अपने इस प्रयास में सफल नहीं हो पाता तो वह अपना सिर धुन-धुन कर अपना क्षोभ व्यक्त कर रहा है। इसी तरह की स्थिति मनुष्य के साथ भी है।

मनुष्य अपने अहंकार को त्याग कर परमात्मा में स्वयं को विलीन कर देना चाहता है। लेकिन अनेक कारणों से वह अपने अहंकार का त्याग नहीं कर पाता और ईश्वर को पाने में विफल रहता है। इस तरह वह भी जब ईश्वर को पाने मे विफल रहता है, तो ईश्वर को शिकायत करके अपना क्षोब व्यक्त करता है जबकि वास्तव में गलती उसी की होती है, क्योंकि उसने अपने अंदर के अहंकार तो मिटाया ही नही है।

प्रश्न 8 : मधुर-मधुर, पुलक-पुलक, सिहर-सिहर और विहँस-विहँस, कवयित्री ने दीपक को हर बार अलग-अलग तरह से जलने को क्यों कहा है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : कवयित्री ने मधुर-मधुर, पुलक-पुलक, सिहर-सिहर और विहँस-विहँस इन अलग-अलग तरीकों से दीपक को बार-बार जलने के लिए इसलिए कहा है क्योंकि कवयित्री यह चाहती है कि ये दीपक हर परिस्थिति में निरंतर अपनी लो जलाए रखें। कवयित्री चाहती है कि किसी भी तरह की परिस्थिति में भी दीपक की लौ बुझने ना पाए। वह प्रभु के प्रति अपनी आस्था और अपनी आत्मा का दीपक निरंतर जलाए रखना चाहती है, चाहे कैसी भी परिस्थिति क्यों ना हो। यदि कवयित्री की आस्था और आत्मा का ये दीपक हर परिस्थिति में जलता रहेगा तो कवयित्री को परमात्मा को पाने का पथ हमेशा आलोकित रहेगा और वह निरंतर इस पथ पर आगे बढ़ती रहेगी। इसीलिए कवयित्री ने दीपक को हर बार बार अलग-अलग रूप में जलने को कहा है।

प्रश्न 9 : नीचे दी गई काव्य-पंक्तियों को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए −

जलते नभ में देख असंख्यक, स्नेहहीन नित कितने दीपक; जलमय सागर का उर जलता, विद्युत ले घिरता है बादल! विहँस विहँस मेरे दीपक जल!
(क) ‘स्नेहहीन दीपक’ से क्या तात्पर्य है?
(ख) सागर को ‘जलमय’ कहने का क्या अभिप्राय है और उसका हृदय क्यों जलता है?
(ग) बादलों की क्या विशेषता बताई गई है?
(
घ) कवयित्री दीपक को ‘विहँस विहँस’ जलने के लिए क्यों कह रही हैं?
उत्तर : (क) ‘स्नेहहीन दीपक’ से क्या तात्पर्य है?

उत्तर :  स्नेहहीन दीपक से तात्पर्य कांतिहीन दीपक से है अर्थात बिना तेल का दीपक। कवयित्री कहती हैं कि ऐसा दीपक जिसमें स्नेह रूपी तेल नही है, जिसके अंदर प्रभु के प्रति भक्ति नहीं है। ऐसा दीपक स्नेहहीन दीपक है।  यह बात कवयित्री ने उस व्यक्ति के लिए कही है, जिसके मन में स्नेह, करुणा, दया, प्रभु-भक्ति  आदि भाव नहीं होते।

(ख) सागर को ‘जलमय’ कहने का क्या अभिप्राय है और उसका हृदय क्यों जलता है?

उत्तर : सागर को जलमय कहने का अभिप्राय यह है कि यह लोग सांसारिक सुख-वैभव से तो भरपूर है परंतु सुख समृद्धि में भी यह लोग आपसी ईर्ष्या, द्वेष और घृणा के भाव के कारण जल रहे हैं। ऐसे व्यक्ति सांसारिक विषय-वासनाओं के कारण जल रहे हैं और उन्हीं के बीच में फंसे हुए हैं, इससे उनके अंदर आध्यात्मिक ज्योति नही जल नहीं पा रही और उनका हृदय तो केवल सांसारिक विकारों के कारण ही जल रहा है।

(ग) बादलों की क्या विशेषता बताई गई है?

उत्तर : बादलों की विशेषता कवयित्री ने ये बताई है, कि जिस तरह बादल अपने जल के द्वारा धरती को शीतल और हरा-भरा कर देते हैं और उनमें पैदा होने वाली बिजली पलभर के लिए चमक कर चारों तरफ प्रकाश फैला देती है, उसी तरह इस संसार में कुछ महा प्रतिभाशाली लोग कुछ समय के लिए अपने प्रतिभा का प्रकाश संसार में बिखेकर संसार को कुछ समय के लिए आलोकित कर देते हैं और फिर विलीन हो जाते हैं।

(घ) कवयित्री दीपक को ‘विहँस विहँस’ जलने के लिए क्यों कह रही हैं?

उत्तर : कवयित्री ने विहँस-विहँस कर जलने की बात इसलिए है क्योंकि वह चाहती है की यह दीपक निरंतर चलता रहे और किसी भी तरह की विषम परिस्थिति क्यों ना हों यानी उसे किसी भी विषम परिस्थिति में बुझना नहीं है, बल्कि दूसरों को प्रकाश पहुँचा कर उसे राह दिखाना है।

 

प्रश्न 10 : क्या मीराबाई और आधुनिक मीरा ‘महादेवी वर्मा’ इन दोनों ने अपने-अपने आराध्य देव से मिलने कि लिए जो युक्तियाँ अपनाई हैं, उनमें आपको कुछ समानता या अतंर प्रतीत होता है? अपने विचार प्रकट कीजिए?

उत्तर : मीराबाई और आधुनिक मीरा महादेवी वर्मा इन दोनों ने अपने-अपने आराध्य देव से मिलने के लिए जो युक्तियां अपना ही है उनमें कुछ तो समानता है लेकिन अधिकतर में असमानता ही है। इसका मुख्य कारण यह है कि जहाँ मीराबाई ने अपने आराध्य के  सगुण रूप की आराधना की है, वही महादेवी वर्मा ने अपने आराध्य के निर्गुण रूप की आराधना की है। मीराबाई ने कृष्ण भगवान के सुंदर रूप को अपनाकर उनकी आराधना उपासना । वहश्री कृष्ण के रूप सौंदर्य पर मोहित है। वह श्री कृष्ण से मिलने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है वह उनके घर में बाग-बगीचे लगाने के लिए तैयार हैं। वह श्रीकृष्ण के घर में चाकरी करने तक के लिए तैयार है। ताकि रोज श्रीकृष्ण के सुंदर मनोहारी रूप का दर्शन कर सकें। इसके विपरीत महादेवी वर्मा ने निराकार ब्रह्मा को उपासना का आधार बनाया है।दोनों में समानता यह है कि दोनों अपने अपने आराध्य की अन्यतम भक्त हैं और अपने आराध्य को पाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार है। वह ऐसा कुछ भी करने के लिए तैयार हैं जो उनको उनके आराध्य तक पहुंचाने में मदद करें।

(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए।

प्रश्न 1 : दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल गल!

भाव : तेरे जीवन का अणु गल गल!इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री ने  दीपक को निरंतर जलते रहने का संदेश दिया है और कहा है कि वह अपने कण-कण को जला दे, गला दे और इस संसार को अपने प्रकाश से आलोकित कर दे। वह सागर की भांति स्वयं को विस्तृत रूप से फैला दें ताकि उसके प्रकाश के आलोक से संसार के सभी लोग उसका लाभ उठा सकें।

प्रश्न 2 : युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल, प्रियतम का पथ आलोकित कर!

भाव : इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री ने दीपक को निरंतर हर-पल, हर-समय जलते रहने के लिए कहा है। कवयित्री के कहने का भाव यह है कि उसके अंदर आस्था रूपी ज्ञान का दीपक हर-पल, हर-क्षण, हर-दिन निरंतर जलता रहे और युगों-युगों तक अपने प्रकाश से आलोकित करता रहे। कवयित्री चाहती है कि जब तक उसका हृदय रूपी दीपक निरंतर जलता रहेगा तभी उसके मन में व्याप्त अंधकार नष्ट होगा और वह अपने प्रियतम रूपी ईश्वर को पाने के आलोकित पथ पर चल सकेगी।

प्रश्न 3 : मृदुल मोम सा घुल रे मृदु तन!

भाव : इस पंक्ति के माध्यम से कवयित्री ने अपने समर्पण भाव को प्रदर्शित किया है। कवयित्री का कहना है कि इस कोमल तन को मोम की तरह एकदम भूल जाना होगा, तभी वो अपने प्रियतम यानि ईश्वर को पा सकेगी। कवयित्री के कहने का भाव है कि ईश्वर को पाना आसान नहीं है। ईश्वर को पाने के लिए कठोर तपस्या, कठोर साधना करनी पड़ेगी। ईश्वर के चरणों में अपना सब कुछ अर्पित कर देना होगा यानी स्वयं को मिटा देना होगा, मोम की तरह गला देना होगा, तब ही हम ईश्वर को पा सकते हैं।

भाषा अध्ययन

प्रश्न 1 : कविता में जब एक शब्द बार-बार आता है, और वह योजक चिन्ह द्वारा जुड़ा होता है, तो वहाँ ‘पुनरुक्ति प्रकाश’ अलंकार होता है; जैसे ‘पुलक-पुलक’इसी प्रकार के और शब्द खोजिए और जिनमें यह अलंकार हो।

उत्तर : कविता में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार वाले अनेक शब्द आए हैं, जो कि इस प्रकार हैं…

  • मधुर मधुर
  • सिहर सिहर
  • विहँस विहँस
  • युग युग
  • गल गल
  • पुलक पुलक

यह शब्द पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार को प्रकट कर रहे हैं। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार वहाँ पर प्रकट होता है, जहाँ पर एक ही शब्द की लगातार दो बार पुनरावृत्ति हो।

योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 इस कविता में जो भाव आए हैं, उन्हीं भावों पर आधारित कवयित्री द्वारा रचित कुछ अन्य कविताओं का अध्ययन करें। जैसे, (क) मैं नीर भरी दुख की बदली (ख) जो तुम जाते एक बार (यह सभी कविताएं ‘सन्धिनी’ में संकलित हैं। )

उत्तर : विद्यार्थी इन कविताओं का अध्ययन करें जो कि महादेवी वर्मा द्वारा ही रचित की गई हैं। विद्यार्थियों के सुविधा के लिए दोनों कविताएं दी जा रही हैं।

(क) मैं नीर भरी दुख की बदली

मैं नीर भरी दुख की बदली!
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा क्रन्दन में
आहत विश्व हँसा नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल छाया में
मलय-बयार पली।
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर
धूमिल चिन्ता का भार बनी
अविरल रज-कण पर
जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में सुख की
सिहरन हो अन्त खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!

(ख) जो तुम जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार।
कितनी करुणा कितने संदेश।
पथ में बिछ जाते बन पराग,
गाता प्राणों का तार-तार।
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पद पखार।
हँस उठते पल में आर्द्र नयन,
धुल जाता ओठों से विषाद।
छा जाता जीवन में वसंत,
लुट जाता चिर संचित विराग
आँखें देती सर्वस्व वार,
जो तुम आ जाते एक बार।

 

प्रश्न 2 : इस कविता को कंठस्थ करें तथा कक्षा में संगीतमय प्रस्तुति करें।

उत्तर : ये एक प्रायोगिक कार्य है। विद्यार्थी पाठ मे दी गई कविता को याद करें और अपनी कक्षा में संगीतमय प्रस्तुति करें।

प्रश्न 3 : महादेवी वर्मा को आधुनिक मीरा कहा जाता है। इस विषय पर जानकारी प्राप्त कीजिए।

उत्तर : जीहाँ, महादेवी वर्मा को आधुनिक मीरा कहा जाता है। महादेवी वर्मा ने अपनी कविताओं के माध्यम से अपने प्रियतम के ना मिल पाने की जो पीड़ा व्यक्त की है, वही पीड़ा मीरा ने अपने पदों के माध्यम से श्रीकृष्ण से ना मिल पाने की पीड़ा व्यक्त की थी।

जहाँ मीरा ने अपने पदों के माध्यम से श्रीकृष्ण के प्रति आपने अनन्य प्रेम को प्रकट किया, उसी प्रकार महादेवी वर्मा ने भी अपनी कविताओं के माध्यम से अपने प्रियतम के प्रति अनन्य प्रेम को प्रकट किया है। मीराबाई अपने आराध्य श्रीकृष्ण से मिलने के लिए निरंतर उनकी भक्ति करती रहती हैं और उनके प्रति आस्थावान रहती है। उसी प्रकार महादेवी वर्मा भी अपने आराध्य प्रभु से मिलने के लिए निरंतर उनकी भक्ति साधना करती हैं और अपनी आशा एवं आस्था का दीप जलाए रखती हैं।

इस तरह मीराबाई के पदों और महादेवी वर्मा की कविता तथा मीराबाई के पदों में भावों के समानता के कारण महादेवी वर्मा को आधुनिक मीरा कहा जाता है।

 

मधुर मधुर मेरे दीपक जल : महादेवी वर्मा (कक्षा-10 पाठ-6 हिंदी स्पर्श 2) (NCERT Solutions)

 


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‘भाग मिल्खा भाग’ फिल्म के बारे में बातचीत करते हुए दो दोस्तों के बीच हुए संवाद को लिखें।

संवाद लेखन

‘भाग मिल्खा भाग’ फिल्म पर संवाद

 

रवि ⦂ रोहित, क्या तुमने ‘भाग मिल्खा भाग’ फिल्म देखी है? जो पूर्व ओलंपियन ‘मिल्खा सिंह’ के जीवन पर बनी बायोपिक है।

रोहित ⦂ हाँ रवि, मैंने वो फिल्म टी.वी. पर देखी थी। फिल्म 2013 में रिलीज हुई थी। मैंने फिल्म को 2022 में टी.वी. पर देखा था। क्या शानदार फिल्म है! ‘उड़न सिख’ के नाम से मशहूर पूर्व भारतीय खिलाड़ी मिल्खा सिंह की कहानी को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है।

रवि ⦂ बिल्कुल सही कहा। फरहान अख्तर ने मिल्खा सिंह का किरदार इतनी बेहतरीन तरीके से निभाया है कि ऐसा लगता है जैसे हम असली मिल्खा सिंह को ही देख रहे हैं।

रोहित ⦂ हाँ, फरहान ने अपनी बॉडी और रनिंग स्टाइल पर काफी मेहनत की है। उनका अपने रोल के प्रति समर्पण साफ नजर आता था। उन्होंने अपने जीवंत अभिनय से इस रोल में जान डाल दी।

रवि ⦂ और फिल्म के गाने! ‘जिंदा’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसे गाने तो प्रेरणा देने वाले हैं।

रोहित ⦂ सच में, संगीत ने फिल्म में जान डाल दी। शंकर-एहसान-लॉय ने कमाल का काम किया है। ‘हवन करेंगे, हवन करेंगे’ गाना भी बहुत लोकप्रिय हुआ है।

रवि ⦂ फिल्म का निर्देशन भी बहुत बढ़िया है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने मिल्खा सिंह की जिंदगी के हर पहलू को बारीकी से दिखाया है।

रोहित ⦂ हाँ, खासकर वह दृश्य जब मिल्खा सिंह अपने बचपन की यादों से जूझते हैं। वह सीन बहुत इमोशनल था।

रवि ⦂ और जब मिल्खा सिंह ओलंपिक में दौड़ते हैं, वह सीन देखकर तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

रोहित ⦂ हाँ, वह सीन बहुत ही प्रेरणादायक है। फिल्म ने हमें सिखाया कि मेहनत और लगन से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।

रवि ⦂ सही कहा। मिल्खा सिंह की कहानी हमें यह बताती है कि कितनी भी मुश्किलें आएं, हार नहीं माननी चाहिए।

रोहित ⦂ हाँ, और यही वजह है कि ‘भाग मिल्खा भाग’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक कहानी है जिसे हर किसी को देखनी चाहिए।

रवि ⦂ बिलकुल सही कहा। मेरे विचार में ऐसी प्रेरणादायक फिल्में और अधिक बननी चाहिए ताकि लोग इनसे प्रेरणा लें।

रोहित ⦂ मैं तुम्हारी बात से बिल्कुल सहमत हूँ।


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संवाद

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वायु ⦂ जल भाई, तुम कैसे हो?

जल ⦂ ठीक हूँ, बहन। तुम सुनाओ कहाँ घूम रही हो?

वायु ⦂ मैं बहुत दूर एक गाँव में जा रही हूँ, वहाँ पर बहुत गर्मी पड़ रही है। मैं वहाँ के लोगों को राहत देने के लिए जा रही हूँ।

जल ⦂ अच्छा, तुम्हारे मजे हैं। तुम तो हवा में तैरती रहती हो और जगह-जगह घूमती रहती हो।

जल ⦂ तो तुम भी कहाँ एक जगह पर घूमते रहते हो। तुम भी तो सब जाते हो।

जल ⦂ मेरे और तुम्हारे घूमने में फर्क है। तुम किसी भी दिशा में कहीं पर भी घूम लेती हो। जिधर तुम्हारा मन होता है, उधर तुम्हारा रुख हो जाता है। मैं नदी तालाबों के ऊपर निर्भर हूँ। मैं केवल नदी के रूप में ही घूम पाता हूँ। तालाब के रूप में एक जगह रह जाता हूँ। नदी में भी मेरी एक निश्चित दिशा होती है। मैं हर जगह नहीं जा सकता।

वायु ⦂ वह तो है। हर किसी का अपना अपना कर्म निर्धारित है। प्रकृति ने हमारा जो कर्म हमें निर्धारित किया है, हमें वैसा ही करना पड़ेगा।

जल ⦂ सही कह रही हो। हम इस प्राणी जगत के काम आते हैं, यही हमारे लिए सबसे अच्छा खुशी का अवसर है।

वायु ⦂ लेकिन कभी-कभी हमें गुस्से में भी आना पड़ता है और फिर मैं आंधी के रूप में और तुम बाढ़ के रूप में अपना विकराल रूप धारण कर लेते हो। तब लोगों को हमसे बड़ी असुविधा होती है।

जल क्या करें, यह मानव प्राणी ऐसा है, कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ करता है तो हमें भी अपने गुस्सा दिखाकर इसे समझाना पड़ता है कि ये प्रकृति के साथ खिलवाड़ ना करे।

जल ⦂ यह सही बात है, लेकिन जो भी है हम दोनों मानव और सभी प्राणियों के लिए बेहद आवश्यक हैं और हमारे बिना इनका जीवन संभव नहीं। हमें अपने कर्म में लगे रहना है।

वायु  ⦂ बिल्कुल सही।


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पामीर के पठार को संसार की छत कहा जाता है।

पामीर के पठार को संसार की छत इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह पठार संसार के सबसे ऊंचे स्थानों में से एक पठार है। पामीर का पठार पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान, कजाकिस्तान और चीन तक फैला हुआ है।

पामीर के पठार का निर्माण हिमालय, कराकोरम, कुंजोल, हिंदू कुश और तियन शाम जैसी पर्वत श्रृंखलाओं के संयोग से हुआ है। पामीर का पठार लगभग 5 देशों में विस्तृत रूप से फैला हुआ है । यहाँ की जलवायु परिस्थिति अत्याधिक विषम है। यह पठार तिब्बत से भी जुड़ा हुआ है।

वर्तमान समय में कुछ लोगों के मतानुसार तिब्बत को भी दुनिया की छत कहा जाता है, लेकिन तिब्बत का दायरा बेहद छोटा है जो कि केवल एक देश तक सीमित है। जबकि पामीर का पठार लगभग 5 देशों के बीच फैला हुआ है।

इसलिए वैश्विक दृष्टि से और सही मायनों में पामीर के पठार को ही ‘दुनिया की छत’ कहा जाता है।


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तोप : वीरेन डंगवाल

पाठ के बारे में…

‘तोप’ नामक कविता के माध्यम से कवि वीरेन डंगवाल ने ऐतिहासिक विरासत वाली वस्तुओं की महत्ता की ओर संकेत किया है। कवि ने कविता के माध्यम से यह बताने का प्रयत्न किया है कि प्रतीक और धरोहर दो तरह की हुआ करती हैं। एक धरोहर जिसे देखकर या जिसके बारे में जानकर हमें अपने देश और समाज की प्राचीन उपलब्धियों का ज्ञान मिलता है। वहीं दूसरी धरोहर वे धरोहरें होती हैं, जो हमें बताती हैं कि हमारे पूर्वजों से कब, क्या और कहाँ चूक हुई, जिसके कारण हमारे देश की कई पीढ़ियों को  दुख और दमन चलना पड़ा था।

‘तोप’ कविता के माध्यम से ऐसे ही दो प्रतीकों के बारे में बताया है। कवि ने कविता में कंपनी बाग में रखी एक ऐतिहासिक तोप के माध्यम से यही बात बताने का प्रश्न किया है। यह तोप ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बनाई गई थी जो देश के स्वाधीनता संग्राम  सेनानियों के विरुद्ध दमन के लिए प्रयोग में लाई गई थी। आज कंपनी बाग में रखी गई तोप हमें उसकी याद आती है।


कवि के बारे में…

वीरेंद्र डंगवाल हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध कवि रहे हैं, जिनका जन्म 5 अगस्त 1947 को उत्तराखंड राज्य के टिहरी गढ़वाल जिले के कीर्ति नगर में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा दीक्षा पहले नैनीताल में और उच्च शिक्षा इलाहाबाद में हुई। वह पेशे से अध्यापक थे। इसके बाद पत्रकारिता से भी जुड़े रहे।

वीरेंद्र डंगवाल की कविताओं की विशेषता समाज के साधारण जन और हाशिए पर स्थित जीवन के लक्षण को प्रस्तुत करने की रही है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से ऐसी बहुत सी चीजों और जीव-जंतुओं आदि को अपनी कविता का आधार बनाया है, जिनकी प्रायः अनदेखी की जाती रही है।

उनके दो कविता संग्रह ‘इसी दुनिया में’ और ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ नाम से प्रकाशित हो चुके हैं। अपने पहले कविता संग्रह ‘इसी दुनिया में’ के लिए उन्हें ‘श्रीकांत वर्मा पुरस्कार’ भी मिला था तथा दूसरे कविता संग्रह ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ के लिए उन्हें ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ मिला इसके अलावा उन्हें अन्य कई छोटे-बड़े पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने अन्य भाषाओं के कई महत्वपूर्ण कवियों की कृतियों का हिंदी में अनुवाद भी किया है।

28 सितंबर सन 2015 को उनका निधन हो गया



हल प्रश्नोत्तर

(क) निम्नलिखिथ प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

प्रश्न 1 : विरासत में मिली चीजों की बड़ी संभाल क्यों होती है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : विरासत में मिली चीजों की बड़ी संभाल इसलिए होती है, क्योंकि विरासत में मिली वस्तुएं हमें चीजें हमें हमारे प्राचीन इतिहास का अनुभव कराती है। यह हमें हमारे पूर्वजों और परंपरा तथा भूतकाल की याद दिलाती हैं। यह हमारे पूर्वजों की धरोहर होती हैं। जिनके माध्यम से हम अपने बीते हुए समय चाहे वह समृद्ध रहा हो या नहीं रहा हो, उसको महसूस करते हैं।

इन चीजों के माध्यम से हमें तत्कालीन समय के परिवेश और इतिहास की जानकारी भी प्राप्त होती है और उससे फिर हम वर्तमान का संदर्भ जोड़कर भविष्य की संरचना करते हैं। यह चीजें हमें अपनी पुरानी पीढ़ी से जुड़े रहने के लिए कड़ी का काम करती है। और हमें अपने पिछले अतीत से कुछ सीख लेने के का काम करती हैं।

प्रश्न 2 : इस कविता से तोप के विषय में क्या जानकारी मिलती है?

उत्तर : इस कविता से तोप के विषय में हमें यह जानकारी मिलती है कि यह तो 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध शक्तिशाली हथियार के रूप में प्रयोग की गई थी। यह वह तो है, जिसने भारत के अनेक शूरवीर स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन की लीला मिटा दी थी।

अंग्रेजों ने इस तोप का उपयोग स्वाधीनता सेनानियों के दमन के लिए किया था। आज कंपनी बाग में रखी है तो केवल खिलौना है, क्योंकि अब इसका प्रयोग कोई नहीं करता। अब यह तोप दर्शनीय वस्तु है, जिस पर पक्षियों ने अपना घोंसला बना रखा है और बच्चे इससे खेलते हैं। यह तोप हमें बताती है कि किसी का भी समय सदैव एक समान नही रहता, चाहे कोई कितना भी ताकतवर क्यों ना हो।

प्रश्न 3 : कंपनी बाग में रखी तोप क्या सीख देती है?

उत्तर : कंपनी बाग में रखी तोप हमें यह सीख देती है कि कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो एक ना एक दिन उसे समय के फेर में आकर झुकना ही पड़ता है। समय हमेशा एक समान नहीं रहता। बड़े से बड़े शक्तिशाली सूरमा भी एक दिन दयनीय बन चुके हैं। समय परिवर्तनशील है और यह अच्छे-अच्छे ताकतवर के अहंकार को चूर कर चुका है।

कभी एक समय ये तोप बेहद ताकतवर हुआ करती थी और जिसने कई स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के जीवन का बलिदान लिया था। आज इस तोप की दशा दयनीय बन चुकी है, अब तोप कोई नहीं पूछता बच्चों के खेलने का खिलौना मात्र बन कर रही हो। एक समय में ये तोप भले ही स्वाधीनता सेनानियों पर गरजती हो लेकिन आज उसकी वह गर्जन शांत हो चुकी है।

प्रश्न 4 : कविता में तोप को दो बार चमकाने की बात की गई है। ये दो अवसर कौन-से होंगे?

उत्तर : कविता में तोप  को दो बार चमकाने की बात की गई है। यह दो दिवस  15 अगस्त और 26 जनवरी होते हैं। 15 अगस्त को देश की स्वतंत्रता का दिवस होता है, जबकि 26 जनवरी देश का गणतंत्र दिवस होता है। यह दोनों दिवस राष्ट्रीय पर्व से संबंधित हैं और राष्ट्रीय गौरव एवं स्वाभिमान से जुड़े हुए हैं।

इसी कारण 15 अगस्त और 26 जनवरी को तोप को चमका कर कंपनी बाग में सजा कर रखा जाता है। इस तोप के माध्यम आजादी से पहले के उन दिनों को याद किया जाता है ताकि आने वाली नई पीढ़ी उनसे कुछ प्रेरणा ले सकें।


(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए।

प्रश्न 1 : अब तो बहरहाल छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फ़ारिग हो तो उसके ऊपर बैठकर चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप।

भाव : ‘तोप’ कविता की इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने यह बताया है कि समय बड़ा बलवान होता है। कवि ने कंपनी बाद में रखी एक ऐतिहासिक तोप की वर्तमान स्थिति का वर्णन करते हुए कहा है कि यह तोप एक समय में बेहद शक्तिशाली हुआ करती थी और जोर-जोर से गरजा करती थी।

सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में इस तोप कोहराम मचा रखा था और अनेक स्वाधीनता सेनानियों की जान ली थी। उस समय यह तो आतंक का पर्याय थी। लेकिन अब यह तो शांत है, बेबस है और खिलौना मात्र बनकर रह गई है। अब तो छोटे बच्चे इस पर सवारी करते हैं, खेलते-कूदते हैं। जब बच्चे नहीं होते तब तोप पर चिड़ियों का झुंड इकट्ठा होकर अपनी चहचहाट से परेशान करता है।

किसी समय में बड़े-बड़े सूरमाओं के हौसले पस्त कर देने वाली यह तोप आज  बच्चों की खिलखिलाहट और चिड़ियों की चहचहाट और गपशप सुनने के लिए विवश है। कवि ने  इन पंक्तियों के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयत्न किया है कि समय अच्छे से अच्छे बलवान को धरातल पर पटकता है।

प्रश्न 2 : वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप एक दिन तो होना ही है उसका मुँह बंद।

भाव : ‘तोप’ कविता की इन पंक्तियों के माध्यम से कवि वीरेन डंगवाल ने यह बताया है की भले ही एक ऐसा समय था, जब तोप बड़ा गरजा करती थी और अपने आतंक से अच्छे-अच्छों का मुँह बंद कर देती थी, लेकिन आज यह समय भी है जब स्वयं उसका मुँह बंद है और वह गरजने की जगह शांत पड़ी है, क्योंकि एक ना एक दिन ऐसा होना ही था।

कवि समय की परिवर्तनशीलता को बताते हुए कहता है कि बड़े से बड़ा शक्तिशाली व्यक्ति क्यों ना हो कितना भी कोई अत्याचारी क्यों ना हो, उसके अत्याचार का अंत एक ना एक दिन अवश्य होना है। तोप ने अपने-अपने समय में भले ही अनेक स्वाधीनता सेनानियों के जीवन को समाप्त किया था, उनका मुँह बंद किया था, लेकिन आज वह स्वयं दयनीय अवस्था में पड़ी हुई है।

आज कोई उसको पूछने वाला नहीं है। आज उसका स्वयं का मुँह बंद है। कोई भी कितना शक्तिशाली और अत्याचारी हो उसका अंत ऐसा ही होता है।

प्रश्न 3 : उड़ा दिए थे मैंने अच्छे-अच्छे सूरमाओं के धज्जे।

भाव : ‘तोप’ कविता की इन पंक्तियों के माध्यम से कवि वीरेन डंगवाल ने यह बताया है कि तोप अपनी पुरानी गाथा का वर्णन करते हुए कहती है कि एक समय उसका भी था जब उसने किसी की भी नहीं सुनी। इतने बड़े बड़े सूरमाओं को अपने आगे उड़ा दिया। उस तोप का उसका इतना आतंक था कि सब लोग उससे घबराते थे। बड़े से बड़ा वीर भी उसके सामने टिक नहीं पाता था। तोप अपने उन दिनों को याद करती है, जब वह बेहद ताकतवर थी और आज वह बेहद कमजोर हो गई है। जिस तोप की एक समय धाक थी, आज उसकी बच्चे कर रहे है।


भाषा अध्ययन

प्रश्न 1 : कवि ने इस कविता में शब्दों का सटीक और बेहतरीन प्रयोग किया है। इसकी एक पंक्ति देखिए, ‘धर रखी गई है, यह 1857 की तोप’। ‘धर’ शब्द देशज है और कवि ने इसका कई अर्थों में प्रयोग किया है। ‘रखना’, ‘धरोहर’ और ‘संचय’ के रूप में। कविता रचना करते समय उपयुक्त शब्दों का चयन और उनका सही स्थान पर प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उत्तर : कवि ने इस कविता में जिस तरह एक ही शब्द को अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त किया है, वैसे ही कुछ और उदाहरण इस प्रकार हैं…

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गए ऊबरै, मोती मानुष चून।

इस पद में पानी शब्द का तीन बार अलग-अलग अर्थों में प्रयोग किया है। पानी शब्द का मनुष्य की प्रतिष्ठा, मोती की चमक और आटे के लिए जरूरी द्रव के संबंध में प्रयुक्त किया है।

कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाए,
वा खाये बौराए, जा पाय बौराए

इस दोहे में कनक शब्द को दो बार धतूरे और सोने के संदर्भ में प्रयुक्त किया है।

प्रश्न 2 : तोप’ शीर्षक कविता का भाव समझते हुए इसका गद्य में रूपांतरण कीजिए।

उत्तर : ‘तोप’ शीर्षक कविता का गद्य रूपांतरण इस प्रकार होगा :

एक समय था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से आई। भारत ने अपनी अतिथि परंपरा का पालन करते हुए उसको हाथों-हाथ लिया और उसको अपने यहाँ जगह दी। लेकिन उस कंपनी का उद्देश्य कुछ दूसरा ही था, वह धीरे-धीरे हमारे साधनों पर कब्जा करते हुए हमारे ऊपर ही शासन करने लगी। धीरे-धीरे हमारी शासक बन बैठी। उसने अनेक बाग-बगीचों, हथियारों, तोपों आदि का निर्माण किया।

हमारे साधनों से ही बनाए गए इन सभी यंत्रों का उसने शक्तिशाली हथियार के रूप में हम पर ही प्रयोग किया। 1857 के स्वाधीनता संग्राम में इस तोप ने कहर मचा रखा था और भारत के अनेक स्वाधीनता संग्राम सेनानियों की जान ली थी। तब यह तोप बेहद शक्तिशाली थी और आतंक का पर्याय बन चुकी थी। आज हालत यह है कि यह तोप खिलौना मात्र बनकर रह गई है।

आज इस तोप पर बच्चे सवारी करते हैं, पक्षी अपना घोंसला बनाकर रहते हैं। जो तोप कभी  बेहद शक्तिशाली थी वह आज बेहद दयनीय अवस्था में उपेक्षा की शिकार पड़ी है, जिसे केवल साल में दो बार 15 अगस्त और 26 जनवरी को याद किया जाता है। बाकी पूरे साल वह उपेक्षा का शिकार रहती है।

कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो, अत्याचारी क्यों ना हो। उसके अत्याचार का एक ना एक दिन तो अंत होना ही है। शक्तिशाली से शक्तिशाली व्यक्ति को एक न एक दिन धरातल पर आना ही है।


योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 : कविता लिखने का प्रयास कीजिए और उसे समझिए। 

उत्तर : विद्यार्थी स्वयं के प्रयास और अनुभव से कोई कविता लिखें। विषय अपनी इच्छानुसार चुन सकते हैं। एक स्वरचित कविता प्रस्तुत है…

यह है मेरा भारत देश अनेक भाषा,
अनेक वेश एक सूत्र में बंधे सारे प्रदेश
नही होता कोई कलेश ये है
यह है मेरा भारत देश
जग में सबसे रहे महान 
ऊँची सदा इसकी रहे शान
मेरा भारत मेरी पहचान
मेरा भारत महान

प्रश्न 2 : तेजी से बढ़ती जनसंख्या और घनी आबादी वाले वाली जगहों के आसपास पार्कों का होना क्यों जरूरी है? कक्षा में परिचर्चा कीजिए।

उत्तर : तेजी से बढ़ती जनसंख्या और घनी आबादी वाली जगहों के आसपास पार्कों का होना इसलिए जरूरी है क्योंकि लोग चंद पलों के लिए खुली हवा में सांस ले सकें। स्वच्छ वायु हर किसी के स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो रही है और लोगों के रहने की जगह कम होती होती जा रही है। उन्हें खुला वातावरण मिलना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।

ऐसे में घनी आबादी के बीच पार्कों के होने से लोग कुछ समय के लिए खुली हवा में चैन की सांस ले सकते हैं और प्रकृति के दृश्यों को का आनंद भी ले सकते हैं। यह मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। इसलिए तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या के आसपास का पार्कों का होना जरूरी है।


परियोजना कार्य

प्रश्न 1 : परियोजना कार्य स्वतंत्रता सेनानियों की गाथा संबंधी पुस्तकों पुस्तकालय से प्राप्त कीजिए और पढ़कर कक्षा में सुनाइए।

उत्तर : विद्यार्थी स्वतंत्रता सेनानियों की गाथा संबंधी पुस्तकों को पुस्तकालय से लेकर आएं और उन्हें पढ़कर अपनी कक्षा में अपने साथी छात्रों को सुनाएं। विद्यार्थियों की सुविधा के लिए कुछ महान स्वतंत्रता सेनानियों के नाम प्रस्तुत हैं। विद्यार्थी इन स्वतंत्रता सेनानियों की जीवन गाथा संबंधी पुस्तकों को खोजें और लाएं..

  • सुभाषचंद्र बोस
  • महात्मा गाँधी
  • भगतसिंह
  • चंद्रशेखर आजाद
  • लाला लाजपत राय
  • राम प्रसाद बिस्मिल
  • राजगुरु
  • सुखदेव
  • अशफाकउल्ला खाँ
  • ऊधम सिंह
  • रासबिहारी बोस
  • बिपिनचंद्र पाल
  • बाल गंगाधर तिलक

तोप : वीरेन डंगवाल (कक्षा-10 पाठ-5 हिंदी स्पर्श 2) (NCERT Solutions)

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पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

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NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2)

Parvat Pradesh Me Pavas : Sumitranandan Pant (Class 10 Chapter 4 Hindi Sparsh 2)


पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत

पाठ के बारे में…

इस पाठ में कवि सुमित्रानंदन द्वारा रचित ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ नामक कविता प्रस्तुत की गई है, जो प्रकृति के रोमांच और प्राकृतिक सौंदर्य को अपनी आँखों से निरखने की अनुमति देती है। सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं और उनकी अधिकांश कविताओं में प्रकृति की ऐसी ही सुखद अनुभूति होती है। उनकी कविताएं पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि हम स्वयं उस प्राकृतिक वातावरण में विचरण कर रहे हो और ऐसे ही किसी प्राकृतिक मनोहर स्थल पर आ गए हो।

प्रस्तुत कविता में भी कवि सुमित्रानंदन पंत ने पर्वत प्रदेश में वर्षा ऋतु के समय के सौंदर्य का वर्णन किया है। कविता के माध्यम से कवि ने पहाड़ों के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करके उसकी अनुभूति कराने का अवसर दिया है। कविता पढ़कर ऐसा लगता है कि अभी-अभी पर्वतीय स्थल का विचरण करके वापस लौटे हों।



रचनाकार के बारे में…

सुमित्रानंदन पंत जोकि छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक थे, वह प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य का जितना सुंदर चित्रण उन्होंने किया है, उतना अन्य किसी ने नहीं किया।

सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 उत्तराखंड के कौसानी (अल्मोड़ा) में हुआ था। वह बचपन से ही काव्य प्रतिभा के धनी थे और मात्र 7 साल की आयु में ही उन्हें अपने विद्यालय में काव्य पाठ के लिए पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उन्होंने मात्र 15 वर्ष की आयु से ही स्थाई रूप से साहित्य का कार्य आरंभ कर दिया था।

उनकी कविता में प्रकृति प्रेम और राष्ट्रवाद की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। उनकी कविता में महात्मा गांधी तथा अरविंद दर्शन का प्रभाव भी नजर आता है।

सुमित्रानंदन पंत की प्रमुख कृतियों में वीणा, पल्लव, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, लोकायतन, कला और बूढ़ा चाँद, चिदंबरा आदि के नाम प्रमुख हैं। उन्हें 1961 में भारत सरकार के तृतीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें साहित्य का ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिल चुका। उन्हें 1960 में उनके ‘कला और बूढ़ा चाँद’ नामक कविता संग्रह के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला।

सुमित्रानंदन पंत का निधन सन 28 दिसंबर 1977 को हुआ।



हल प्रश्नोत्तर

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

प्रश्न 1: पावस ऋतु में प्रकृति में कौन-कौन से परिवर्तन आते हैं? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए?

उत्तर : पावस ऋतु में प्रकृति में अनेक परिवर्तन आते हैं। पावस ऋतु यानि वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेशों में प्रकृति में निरंतर परिवर्तनशील रहती है। वर्षा ऋतु में मौसम हर पल बदलता रहता है। कभी अचानक से तेज वर्षा होने लगती है और वर्षा का जल पहाड़ों के नीचे जमा हो जाता है । इस जल को देखकर दर्पण के जैसा आभास होता है, जिसमें पर्वतमाला पर खिले हुए फूलों का प्रतिबिंब दिखाएं देता है। तब ऐसा लगता है कि पर्वत अनेक नेत्र खोलकर प्रकृति के मनोरम दृश्य को देख रहा हो और उसका प्रतिबिंब दर्पण रूपी तालाब में नजर आ रहा हो।

पर्वत से गिरते हुए झरने ऐसे प्रतीत होते हैं, जैसे वह पर्वत की गौरव गाथा का गान कर रहे हों। ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर एकटक निहारते हुए चिंतामग्न से दिखाई देते हैं। इस परिवर्तनशील मौसम में अचानक काले-काले बादल घिरने लगते हैं और तब ऐसा लगता है कि मानो बादल के रूप में पंख लगाकर पर्वत स्वयं कहीं उड़ जाना चाहते हों।

चारों तरफ फैला हुआ कोहरा धुएँ के समान दिखाई देता है। तालाबों से उठते कोहरे के देखकर ऐसा लगता है कि तालाब में चारों तरफ आग लग गई हो। आकाश में मंडराते हुए बादलों के देखकर ऐसा लगता है कि मानों स्वयं इंद्र देवता बादलों की सवारी कर रहे हों।


प्रश्न 2 ‘मेखलाकार’ शब्द का क्या अर्थ है? कवि ने इस शब्द का प्रयोग यहाँ क्यों किया है?

उत्तर : मेखलाकार शब्द का अर्थ है मेखला अर्थात करधनी नाम का एक आभूषण, जो स्त्रियों द्वारा कमर में पहना जाता है। मेखलाकार मेखला और आकार इन दो शब्दों से मिलकर बना है। मेखला मतलब करधनी, जो स्त्रियों का आभूषण होता है, जिसे वह कमर में पहनती हैं।

कवि ने प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहा है कि पर्वतों का ढलान देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे प्रकृति ने मेखला आभूषण से आवृत कर रखा हो।

कविता यहां पर कहने का तात्पर्य यह है कि विशाल पहाड़ जो पृथ्वी को चारों तरफ से घेरे हुए हैं, वे पर्वत चारों तरफ गोल-गोल आकृति में फैले हुए हैं, जो करधनी का आभास देते हैं। इसीलिए कवि ने मेखलाकार शब्द का प्रयोग किया है।


प्रश्न 3 : सहस्र दृग-सुमन’ से क्या तात्पर्य है? कवि ने इस पद का प्रयोग किसके लिए किया होगा?

उत्तर : ‘सहस्र दृग सुमन’ से कवि का तात्पर्य है कि हजारों पुष्प की आँखें। कवि ने इस पद का प्रयोग उन अंसख्य फूलों के लिए किया है, जो पर्वत पर चारों तरफ फैले हुए हैं।

पावस ऋतु में पर्वत पर असंख्य फूल खिल जाते हैं और वह वे असंख्य  फूल ऐसे दिखाई देते हैं, जैसे पर्वत की हजारों आँखे हों। पर्वत उन आँखों से तालाब में अपना प्रतिबिंद को देखकर अपने अनुपम सौंदर्य को निहार रहा हो। इसीलिए कवि ने दृग सुमन का प्रयोग पर्वत पर खिले फूल के लिए किया है और और उन्हें पर्वत की आँखों की उपमा दी है।


प्रश्न 4 : कवि ने तालाब की समानता किसके साथ दिखाई है और क्यों?

उत्तर : कवि ने तालाब की समानता दर्पण के साथ की है। कवि ने तालाब की समानता दर्पण के साथ करते हुए इसका कारण बताया है। कवि के अनुसार जब घनघोर वर्षा के कारण पर्वत प्रदेशों में पानी एक जगह जमा हो जाता है तो वह तालाब का रूप ले लेता है। उस तालाब में पर्वत पर खिले असंख्य फूल सहित पर्वत का प्रतिबिंब दिखाई देता है।

तालाब के स्वच्छ एवं निर्मल जल में जब पर्वत का प्रतिबिंब दिखाई देता है तो ऐसा लगता है कि तालाब नहीं हो कोई दर्पण हो, जिसमें पर्वत अपना प्रतिबिंब देखकर अपने सौंदर्य को निहार रहा हो।


प्रश्न 5 : पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की और क्यों देख रहे थे और वे किस बात को प्रतिबिंबित करते हैं?

उत्तर : पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर इसलिए देख रहे थे जैसे उन्हें कोई चिंता हो रही थी। ऐसा लगता था कि वे आकाश की ऊँचाइयों को छूना चाहते थे। वे अपनी किसी उच्च आकांक्षा को पाने के लिए आकाश की ओर देख रहे थे। वह इस बात का प्रतिबिंबित करते हैं कि बिल्कुल मौन रहकर भी कोई संदेश दिया जा सकता है। अर्थात अपने उद्देश्य को पाने के लिए केवल अपने मन और दृष्टि को ही स्थिर रखना आवश्यक है अर्थात जीवन में अपने लक्ष्य को पाने के लिए मौन रहकर चुपचाप अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होते रहना चाहिए। वृक्ष इसी बात को प्रतिबिंबित करते हैं।


प्रश्न 6 : शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में क्यों धँस गए?

उत्तर : शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में इसलिए धँस गए क्योंकि पर्वतीय प्रदेशों में घनघोर वर्षा होने के कारण बादल काफी नीचे तक आ जाते हैं। अचानक बड़े-बड़े बादलों के आ जाने से और मूसलाधार वर्षा होने से घनघोर वर्षा के कारण बादल और कोहरा चारों तरफ इतना अधिक छा जाता है कि चारों तरफ का दृश्य देखना तक बंद हो जाता है। ऐसे में शाल के वृक्ष भी बादलों के बीच ढंक जाते हैं तो ऐसा लगता है कि मूसलाधार वर्षा के कारण शाल के भयभीत होकर धरती में धँस गए हैं।


प्रश्न 7 : झरने किसके गौरव का गान कर रहे हैं? बहते हुए झरने की तुलना किससे की गई है?

उत्तर : झरने पर्वत के गौरव का गान कर रहे हैं। कवि ने बहते हुए झरने की तुलना ऐसे की है, जैसे पर्वत की छाती पर मोतियों की कोई लड़ी सजी हो। ऊँचे-ऊँचे पर्वत के शिखरों से गिरने वाले झरने गिरते हुए ऐसा प्रतीत हो रहे हैं, जैसे वे झर-झर करते ध्वनि करते हुए पर्वत के गौरव का गुणगान कर रहे हों। गिरते हुए झरने बेहद मनोरम दिखाई पड़ रहे हैं, जो जीवन में उत्साह और उमंग भर रहे हैं।


प्रश्न 8 : (ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए

1. है टूट पड़ा भू पर अंबर।
2. यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल।
3. गिरिवर के उर से उठ-उठ कर
उच्चाकांक्षाओं से तरुवर
हैं झांक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।

उत्तर : भाव इस प्रकार होंगे…

1. है टूट पड़ा भू पर अंबर।

भाव : इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने वर्षा के मूसलाधार स्वरूप का वर्णन किया है। पर्वत प्रदेश में पावस ऋतु में जब चारों तरफ काले-काले धने घनघोर बादल छा जाते हैं तो वह ऐसी घनघोर वर्षा करने लगते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि आकाश धरती पर टूट पड़ा है।वर्षा इतनी मूसलाधार होती है कि ऐसा लगता है कि आकाश धरती तक आ गया है।

2. −यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल।

भाव : इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने पावस ऋतु में पर्वत प्रदेश में प्रकृति के बदलते रूप का वर्णन किया है। वर्षा ऋतु में पर्वतीय प्रदेशों में बादल कितने घने हो जाते हैं और चारों तरफ ऐसा कहा जाता है कि पेड़-पौधे, पर्वत, झरने, तालाब आदि सब कोहरे से आच्छादित होकर अदृश्य हो जाते हैं और दिखाई नहीं देते। तालाबों से कोहरे के रूप में उठता हुआ ऐसे लगता है कि तालाबों में आग लग गई हो।

शाल के वृक्ष भी भयभीत होकर धरती में से हुए घँसे हुए नजर आते हैं। बादल और वर्षा के कारण और कोहरे के कारण शाल के वृक्ष बादलों के बीच ढंक जाते हैं और ऐसा लगता है कि वह धरती में धँस गए हो। बादल आकाश से उतरकर इतने नीचे आ जाते हैं कि वह पहाड़ के ऊपर उड़ते होते हुए प्रतीत होते हैं। इससे ऐसा आभास होता है कि पहाड़ भी बादलों के साथ उड़े रहे हैं। उड़ते हुए बादलों को देखकर ऐसा लगता है कि इन बादल रूपी वाहन में स्वयं इंद्र अपनी लीला को देखने निकले हैं।

3. गिरिवर के उर से उठ-उठ कर
उच्चाकांक्षाओं से तरुवर
हैं झांक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।

भाव : इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने पर्वतीय प्रदेशों में वर्षा ऋतु के समय सौंदर्य का वर्णन करते हुए वृक्षों की क्रियाओं का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि वर्षा ऋतु में वृक्ष पर्वत के हृदय से ऊपर उठकर आकाश की ओर देखते हुए ऐसे प्रतीत हो रहे हैं कि जैसे उनके मन में भी कोई उच्च आकांक्षा रही हो। वे आकाश की ओर स्थिर दृष्टि से देखते हैं। यह स्पष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं कि वह भी आकाश की ऊँचाइयों को छूना चाहते हैं।

वृक्ष आकाश की ऊँचाइयों को छू तो लेना चाहते हैं पर उनके मन में कुछ चिंता भी दिखाई दे रही है। कवि ने यह स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है कि मनुष्य को अपने लक्ष्य की ओर स्थिर भाव ध्यान मग्न होकर उसी ओर निरंतर अग्रसर होना चाहिए।


कविता का सौंदर्य

प्रश्न 1 : इस कविता में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग किया गया है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : इस कविता में कवि ने अनेक पंक्तियों में मानवी करण अलंकार का प्रयोग किया है। मानवीकरण अलंकार वहाँ पर प्रयोग किया जाता है, जहाँ पर प्रकृति के तत्वों को मानव रूप में क्रिया संपन्न करते हुए दर्शाया जाता है। कवि ने ‘पर्वत प्रदेश में पावस ऋतु’ कविता में प्रकृति के अनेक तत्वों को मानवीय रूप में क्रियाएं संपन्न करते हुए दर्शाया है।

उदाहरण के लिए…

पर्वत द्वारा अपने फूल रूपी नेत्रों के माध्यम से अपना प्रतिबिंब निहारते हुए गौरव गान का अनुभव करना,
झरनों द्वारा पर्वत का यशोगान करना,
पेड़ों का आकाश की ओर देखना और उच्च आकांक्षा प्रकट करना,
बादलों का पंख फड़फड़ाना,
इंद्र द्वारा बादल पर बैठकर सवारी करना और अपना जादुई खेल दिखाना

यह सब क्रियाओं में प्रकृति के तत्व मानव के रूप में संपन्न करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसलिए इन सब में मानवीकरण अलंकार है।


प्रश्न 2 : आपकी दृष्टि में इस कविता का सौंदर्य इनमें से किस पर निर्भर करता है −
(क) अनेक शब्दों की आवृति पर
(ख) शब्दों की चित्रमयी भाषा पर
(ग) कविता की संगीतात्मकता पर

उत्तर : हमारी दृष्टि में इस कविता का सौंदर्य नीचे दिए गए तीनों विकल्पों पर निर्भर करता है अर्थात कविता का सौंदर्य किसी भी एक कारक पर निर्भर नहीं है। तीनों ही कारक कविता को सुंदर बनाते हैं।

(क) अनेक शब्दों की आवृत्ति पर : पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश गिरी का गौरव गाकर झर-झर मद में नस-नस उत्तेजित कर गिरवर के उर से उठ-उठ करइन शब्दों की आवृत्ति कविता में हुई है, जो कविता को बेहद सुंदर बना रही है और कविता की गति को एक लय प्रदान कर रही है।

(ख) शब्दों की चित्रमयी भाषा पर : कवि ने कविता में शब्दों को चित्रमयी भाषा के रूप में प्रस्तुत किया है। जैसे मेखलाकार पर्वत, अपार उड़ गया, अचानक लो भूधर फड़का अपार पारद के पर है टूट पड़ा भू पर अंबर इन सभी उन के माध्यम से कवि ने कविता की चित्रमयी भाषा प्रकट की है, जो कविता के सौंदर्य को बढ़ाती है।

(ग) कविता की संगीतात्मकता पर : कवि ने कविता में संगीतात्मकता और लय को भी ध्यान रखा है। कविता सुनने और पढ़ने में सरस और बेहद मधुर लगती है। कविता को कविता का पठन और श्रवण मधुरता उत्पन्न करता है, जो कविता की सार्थकता को प्रकट कर रहा है।


प्रश्न 3 : कवि ने चित्रात्मक शैली का प्रयोग करते हुए पावस ऋतु का सजीव चित्र अंकित किया है। ऐसे स्थलों को छाँटकर लिखिए।

उत्तर : कवि ने चित्रात्मक शैली का प्रयोग करते हुए पावस ऋतु का सजीव चित्र अंकित किया है। ये पंक्तियां इस प्रकार हैं…
1. मेखलाकार पर्वत अपार अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़, अवलोक रहा है बार-बार नीचे जल में निज महाकार जिसके चरणों में पला ताल दर्पण फैला है विशाल!
2. गिरिवर के उर से उठ-उठ कर उच्चाकांक्षाओं से तरुवर हैं झाँक रहे नीरव नभ पर अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।


योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 : इस कविता में वर्षा ऋतु में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों की बात कही गई है। आप अपने यहाँ वर्षा ऋतु से में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।

उत्तर : इस पाठ में वर्षा ऋतु में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों की बात कही गई है। हमारे यहां भी वर्षा ऋतु में अनेक तरह के प्राकृतिक परिवर्तन होते हैं। हमारा क्षेत्र समुद्र तटीय क्षेत्र है, जहाँ पर अत्यधिक वर्षा होती है। वर्षा के आगमन से ही गर्मी का नामोनिशान मिट जाता है और मौसम बेहद सुहावना हो जाता है।

हमारे क्षेत्र में जो पानी की झीले सूख रही होती हैं, वह पानी से लबालब भर जाती हैं। पेड़ पौधे भी हरे हो जाते हैं। प्राकृतिक वातावरण बेहद मनमोहक हो जाता है और चारों तरफ पक्षियों आदि की चहचहाहट सुनाई देने लगती है। वर्षा के कारण चारों तरफ पानी और कीचड़ दिखाई देने लगता जिससे फिसलन हो जाती है। घर से बाहर निकलते समय हमेशा छाता लेकर निकलना पड़ता है ताकि अचानक हुई वर्षा से बचा जा सके।


परियोजना कार्य

प्रश्न 1 : वर्षा ऋतु पर लिखी गई उन कवियों की कविताओं का संग्रह कीजिए और कक्षा में सुनाइए।

उत्तर : विद्यार्थी विभिन्न और पत्र-पत्रिकाओं आदि में वर्षा ऋतु पर कविताओं का संग्रह करके उन्हें अपनी कक्षा में सुनाएं।


प्रश्न 2 : बारिश, झरने, इंद्रधनुष, बादल, कोयल, पानी, पक्षी, सूरज, हरियाली और प्रकृति विषयक शब्द का प्रयोग करते हुए एक कविता लिखने का प्रयास कीजिए।

उत्तर : दिए गए शब्दों का प्रयोग करते हुए एक कविता इस प्रकार है…

वर्षा रानी-वर्षा रानी,
लायी है बारिश का पानी,
चारों तरफ बह रहे हैं झरने,
इंद्रधनुष के क्या हैं कहने,
पक्षी लगे हैं चहकने,
फूल भी लगे हैं महकने,
बादल की गूंजी गड़गड़ाहट,
पक्षियों की चहचहाहट,
सूरज बाबा कहाँ गुम हो गए,
बादलों के पीछे ही छुप गए
चारों तरफ फैली हरियाली
मन को मोहित करने वाली


पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (NCERT Solutions हिंदी)

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ग्रीष्म अवकाश पर निबंध लिखें।

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निबंध

ग्रीष्म अवकाश

ग्रीष्म अवकाश का हर छात्र के जीवन में एक विशेष महत्व होता है। यह वह समय होता है जब स्कूल बंद होते हैं और छात्रों को पढ़ाई के तनाव से राहत मिलती है। ग्रीष्म ऋतु की भीषण गर्मी के बावजूद, यह अवकाश हमेशा से बच्चों के लिए खुशियों और उत्साह का समय होता है।

ग्रीष्म अवकाश की शुरुआत होते ही सभी छात्र अपने-अपने ढंग से इसका आनंद लेने की योजना बनाने लगते हैं। कोई अपने नानी-नाना के घर जाने की तैयारी करता है तो कोई अपने दोस्तों के साथ खेलकूद में समय बिताने की सोचता है। परिवार के साथ समय बिताना, नये स्थानों की यात्रा करना, और विभिन्न प्रकार के खेल खेलना, यह सब ग्रीष्म अवकाश को और भी मजेदार बना देते हैं।

मुझे भी ग्रीष्म अवकाश का बेसब्री से इंतजार रहता है। इस बार ग्रीष्म अवकाश के दौरान मैंने अपने परिवार के साथ पहाड़ों की यात्रा करने की योजना बनाई थी। हम सब ने मिलकर शिमला की यात्रा की। शिमला की खूबसूरत वादियाँ और ठंडी हवा ने हमें भीषण गर्मी से राहत दिलाई। वहां के हरे-भरे पेड़ और शांत वातावरण ने हमें शांति और सुकून का अनुभव कराया। हम ने वहां कई दर्शनीय स्थलों की सैर की, जैसे माल रोड, कुफरी, और जाखू मंदिर। इन स्थलों की सुंदरता ने हमें मंत्रमुग्ध कर दिया।

ग्रीष्म अवकाश का एक और महत्वपूर्ण पहलू है कि यह हमें हमारे शौक और रुचियों को आगे बढ़ाने का समय देता है। मैंने इस अवकाश के दौरान चित्रकारी और पुस्तकें पढ़ने में भी समय बिताया। यह गतिविधियाँ मुझे रचनात्मकता और ज्ञान के नए आयामों से परिचित कराती हैं। इसके अलावा, मैंने अपने छोटे भाई-बहनों के साथ विभिन्न खेल खेले, जो हमारे आपसी संबंधों को और भी मजबूत बनाते हैं।

ग्रीष्म अवकाश के दौरान मैंने कुछ नई चीजें भी सीखी। मैंने अपने दादी-नानी से उनके बचपन की कहानियाँ सुनीं और उनसे कई जीवन के महत्वपूर्ण सबक सीखे। मैंने अपने माता-पिता की मदद से खाना बनाना भी सीखा, जो एक नया और रोचक अनुभव था।

अंत में…

ग्रीष्म अवकाश न केवल हमें आराम और मनोरंजन का अवसर देता है, बल्कि यह हमें अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने का भी मौका प्रदान करता है। यह हमें नई चीजें सीखने और अपनी रचनात्मकता को विकसित करने का समय भी देता है। इसलिए, ग्रीष्म अवकाश हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जो हमारी पढ़ाई के आने वाले सालों के लिए हमें ऊर्जा और उत्साह से भर देता है। ग्रीष्म अवकाश के बाद जब हम नई कक्षा में जाते है, एकदम तरोताजा होते हैं, जिससे पढ़ाई में आनंद आता है। इसलिए ग्रीष्म अवकाश का हम सभी के विशेषकर हम विद्यार्थिोयों के जीवन में विशेष महत्व है।


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अपने विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस मनाने हेतु विद्यालय के प्रधानाचार्य को पत्र लिखें।

औपचारिक पत्र

स्वतंत्रता दिवस हेतु विद्यालय के प्रधानाचार्य को पत्र

 

दिनाँक : 7 अगस्त 2024

 

सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,
दयानंद विद्यालय,
निर्माण विहार, दिल्ली

विषय : विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस मनाने हेतु कार्यक्रम के आयोजन संबंध में

आदरणीय प्रधानाचार्य सर

हम सभी कक्षा 9 व 10 के छात्र हैं। हम आपको यह पत्र आने वाले स्वतंत्रता दिवस के मनाने के संबंध में लिख रहे हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आगामी 15 अगस्त को हमारे भारत का स्वतंत्रता दिवस है। यह एक राष्ट्रीय पर्व है और इस पर्व पर अनेक आयोजन किए जाते हैं। हमारे विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस लंबे समय से मनाया जाता रहा है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस पर कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन का अभाव रहता है।

सर, हम सभी छात्रों का आपसे अनुरोध है कि इस बार स्वतंत्रता दिवस पर विद्यालय में देशभक्ति संबंधी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाए। हम सभी विद्यार्थियों ने इस संबंध में मंचन के लिए कुछ कार्यक्रम भी तैयार किए हैं, जिमनें देशभक्ति के गीत, कविताएं, लघु नाटक और नृत्य नाटिका शामिल है। आशा है आप हम सभी विद्यार्थियों का अनुरोध ध्यान में रखते हुए इस स्वतंत्रत दिवस पर विद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन की भी अनुमति देंगे और इसके संबंध में शीघ्र ही व्यवस्था करेंगे।
धन्यवाद

प्रार्थी,
कक्षा-9 व 10 के सभी छात्र,
दयानंद विद्यालय,
निर्माण विहार,
दिल्ली


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अनुच्छेद

कर्तव्य एवं अधिकार

 

कर्तव्य और अधिकार मनुष्य के जीवन के दो महत्वपूर्ण विषय है। कर्तव्य और अधिकार दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए भी है, लेकिन अक्सर लोग दोनों में अंतर नहीं कर पाते। लोगों को अपने अधिकार की तो बहुत अधिक चिंता रहती है, लेकिन अपने कर्तव्यों को निभाने में आलस करते हैं। जबकि किसी भी लोकतंत्र में कर्तव्य और अधिकार दोनों का अपना महत्व है। हम अपने अधिकारों की मांग तभी कर सकते हैं जब हमने अपने कर्तव्यों का निर्वहन भी पूरी ईमानदारी से किया हो।

जिस तरह भारतीय नागरिक के 6 मूल अधिकार हैं। उसी तरह भारत के संविधान में भारत के नागरिक के मौलिक कर्तव्य भी निर्धारित किए गए हैं, लेकिन हम सभी को अक्सर अपने अधिकारों का ही अधिक ध्यान रहता है। अधिकारों की सभी बातें करते हैं लेकिन मौलिक कर्तव्यों की कोई बात नहीं करता जबकि दोनों का अपना-अपना महत्व है।

अधिकार और कर्तव्य दोनों एक दूसरे से संबंध रखते हैं। जब तक हम अपने कर्तव्य का निर्वहन सही ढंग से नहीं करेंगे। हमें अपने अधिकारों के बारे में भी बात करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। भारत के संविधान में भारत के नागरिकों के लिए 6 मौलिक अधिकार इस प्रकार हैं..

  • समता का अधिकार
  • स्वतंत्रता का अधिकार
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार
  • धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार
  • संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार

यह सभी 6 मौलिक अधिकार हर भारतीय नागरिक को प्राप्त हैं लेकिन इसके अलावा भारत के संविधान में भारतीय नागरिक के लिए कुछ कर्तव्य भी निर्धारित किए गए हैं। यह कर्तव्य इस प्रकार हैं..

  • अपने संविधान का नियम अनुसार सत्य और निष्ठा से पालन करना।
  • भारत की संप्रभुता एकता और अखंडता को बनाए रखने तथा उसकी रक्षा करना।
  • देश की रक्षा करना और आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र के लिए अपनी सेवा अर्पित करना।
  • देश में धार्मिक आधार पर और भाषाई आधार पर और क्षेत्रीय आधार पर भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और सामान भाईचारे की भावना से रहना।
  • देश की समग्र संस्कृति की समृद्ध विरासत को महत्व देखना देना और उन्हें संरक्षित करना।
  • देश की प्राकृतिक और वन संपदा तथा पर्यावरण की रक्षा करना।
  • देश की सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना। किसी भी तरह की हिंसा न करना जिससे जन-धन की हानि होती हो।

यह सभी देश के नागरिकों के मौलिक कर्तव्य हैं लेकिन इन कर्तव्यों की ओर कोई ध्यान नहीं देता सब अपने अधिकार को पाने की जुगाड़ में लगे रहते हैं और कर्तव्य को कर्तव्यों को निभाने से बचना चाहते हैं हमें दोनों को समान महत्व देखना देना चाहिए तभी भारत के सचिन आगे कहलाएंगे


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फौजी की माँ पर अनुच्छेद लिखें।

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क) कवि को किस प्रकार सताया गया है? ख) ‘सताए हुए को सताना’ क्यों बुरा है? ग) कवि ने दान और भीख की बात क्यों की है? घ) कवि को किसका नियन्त्रण स्वीकार नहीं है? ङ) प्रकृति के पटल पर कवि को किस प्रकार अधूरा बनाकर मिटाया गया है? च) कवि ने अपने मिलन के बारे में क्या कहा है? ​

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ये सभी प्रश्न कवि ‘बलबीर सिंह रंग’ द्वारा रचित कविता ‘न छेड़ो मुझे, मैं सताया गया हूँ’ नामक कविता से संबंधित हैं। सभी प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार है..

क) कवि को किस प्रकार सताया गया है?

उत्तर : कवि को इस तरह सताया गया है कि उसे हसाँते हुए रुलाया गया है। कवि के मन पर भावनात्मक चोट पहुँचाई गई है, उसकी खुशियों पर कुठाराघात किया है। उसे पीड़ा पहुँचाई गई है।

ख) ‘सताए हुए को सताना’ क्यों बुरा है?

उत्तर : ‘सताए हुए को सताना’ इसलिए बुरा है क्योंकि इससे उसके मन को पीड़ा पहुँचती है। जो पहले से ही दुखी है, उसको और दुखी करने से निकृष्ट कर्म कोई नही है। सताए हुए यानि पीड़ित व्यक्ति को और अधिक पीड़ा पहुँचाना पीड़ित व्यक्ति दुख के अथाह सागर धकेल देता है। इसलिए सताए हुए को सताना बुरा है।

ग) कवि ने दान और भीख की बात क्यों की है?

उत्तर :  कवि ने दान और भीख की बात इसलिए की है क्योंकि कवि ने अपने जीवन में कुछ भी अर्जित नहीं किया। कवि के पास जो कुछ भी था वह उसने सबको दे दिया या लोगों ने उससे छल-कपट से ले लिया। कवि दान का बात इसलिए करता है क्योंकि उसके पास ऐसा कुछ है नही जो वह दान दे सके। वह भीख की बात इसलिए करता है क्योंकि भीख मांगना उसके लिए असम्मानजनक है।

घ) कवि को किसका नियन्त्रण स्वीकार नहीं है?

उत्तर : कवि को इस दुनिया को लोगों का स्वयं पर नियंत्रण स्वीकार नहीं है। वह अपने जीवन में स्वतंत्र रहना चाहता है। उसे किसी के बंधन में नहीं बंधना है।

ङ) प्रकृति के पटल पर कवि को किस प्रकार अधूरा बनाकर मिटाया गया है?

उत्तर : प्रकृति के पटल पर कवि को इस प्रकार अधूरा बनाकर मिटाया गया है कि जीवन में उसे अपने कार्यों को पूरा नहीं करने दिया है। वो जीवन में जो कुछ करना चाहता था, उन कार्यों को करने की राह में उसकी किस्मत, दुनिया के लोग और अन्य कई तरह की बाधाएं उत्पन्न हुईं। इसी कारण वह अधूरा रह गया और उसका अस्तित्व भी समाप्त हो गया।

च) कवि ने अपने मिलन के बारे में क्या कहा है? ​

उत्तर : कवि अपने मिलन के बारे में बताता हुआ कहता है कि उस पर हँसों नहीं। वह यहाँ पर आया नही बल्कि बुलाया गया है। वह अपनी मर्जी से यहाँ पर नहीं आया है, उसे किसी ने बुलाया है, इसलिए उसके मिलन पर मत हँसो।

पूरी कविता इस प्रकार है…

न छेड़ो मुझे, मैं सताया गया हूँ।
हंसाते-हंसाते रुलाया गया हूँ।

सताए हुए को सताना बुरा है,
तृषित को तृषा का बढ़ाना बुरा है,
विफल याचना की अकर्मण्यता पर-
अभय-दान का मुस्कराना बुरा है।

करूँ बात क्या दान या भीख की मैं,
संजोया नहीं हूँ, लुटाया गया हूँ।
न छेड़ो मुझे…

न स्वीकार मुझको नियंत्रण किसी का,
अस्वीकार कब है निमंत्रण किसी का,
मुखर प्यार के मौन वातावरण में-
अखरता अनोखा समर्पण किसी का।

प्रकृति के पटल पर नियति तूलिका से,
अधूरा बना कर, मिटाया गया हूँ।
न छेड़ो मुझे…

क्षितिज पर धरा व्योम से नित्य मिलती,
सदा चांदनी में चकोरी निकलती,
तिमिर यदि न आह्वान करता प्रभा का-
कभी रात भर दीप की लौ न जलती।

करो व्यंग मत व्यर्थ मेरे मिलन पर,
मैं आया नहीं हूँ, बुलाया गया हूँ।
न छेड़ो मुझे…


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वाणी मनुष्य के लिए परमात्मा का एक अनुपम वरदान है। इस वरदान के कारण ही मनुष्य सचमुच मनुष्य है । यह वरदान एक अभिशाप भी बन सकता है, यदि इसका उपयोग समझ कर नही किया जाय तो । बिना सोच-विचार के मुह से निकले शब्द अनर्थ कर सकते हैं। इसीलिए यह परामर्श दिया गया है कि देखो और सुनों अथिक और बोलो कम । प्रश्नः 1. वाणी का वरदान किसे प्राप्त हुआ ? प्रश्नः 2. वरदान अभिशाप कब बन सकता है ? प्रश्नः 8. शब्द अनर्थ कैसे होते हैं ? प्रश्नः 9. गद्यांश में युग्म शब्द पहचान कर लिखिए । प्रश्नः 10. उपयुक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए ।

आपके विद्यालय की कैंटीन काफी दिनों से बंद है। अपने विद्यालय के प्रिंसिपल को कैंटीन दोबारा खोलने के लिए पत्र लिखें।

औपचारिक पत्र

विद्यालय की कैंटीन दुबारा खोलने के लिए प्रधानाचार्य को पत्र

 

दिनांक – 25/11/2023

 

सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य,
डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल,
न्यू शिमला 171009 ।

विषय – कैंटीन दोबारा खुलवाने के लिए प्रार्थना पत्र ।

आदरणीय सर,

सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय का छठी कक्षा का छात्र हूँ। मैं हम सभी विद्यार्थियों की तरफ से आपको विद्यार्थियों के हित से संबंधित एक सुझाव देना चाहता हूँ। कुछ माह पूर्व हमारे विद्यालय की कैंटीन खानपान की गुणवत्ता के विवाद पर बंद हो गई थी। उसके बाद से हमारे विद्यालय की कैंटीन बंद पड़ी है। हमारे विद्यालय में बच्चों को जलपान के लिए एक कैंटीन होना बहुत जरूरी है। कभी-कभी बच्चे अपना खाने का डिब्बा (लंच बॉक्स) लाना भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में कैंटीन न होने से उन्हें भूखे रहना पड़ता है। अतः आपसे निवेदन है कि आप विद्यालय में कैंटीन दोबारा खोलने की व्यवस्था करें। कैंटीन की सुविधा उपलब्ध होने से हम सभी छात्रों को अनावश्यक भूखा नहीं रहना पड़ेगा। आपके इस सहयोग के लिए हम सभी छात्र आपके सदा आभारी रहेंगे।
धन्यवाद,

आपका आज्ञाकारी शिष्य,
अजय,
कक्षा – 6-ब,
अनुक्रमांक 04
डीएवी विद्यालय,
न्यू शिमला ।


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आपकी कक्षा के कुछ बच्चे अंग्रेज़ी के पीरियड में अंग्रेजी नहीं बोलते बल्कि गलत शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। कक्षा मॉनिटर होने के नाते उनकी शिकायत करते हुए प्रधानाचार्य को पत्र लिखिए।

विद्यालय के प्रधानाचार्य को चरित्र प्रमाण पत्र देने का अनुरोध करते हुए एक प्रार्थना पत्र लिखिए ।

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औपचारिक पत्र

कक्षा के छात्रों की शिकायत करते हुए प्रधानाचार्य को पत्र

 

दिनांक –  22 जुलाई 2024

 

सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य,
डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल,
न्यू शिमला 171009,

विषय : छात्रों के अनुचित व्यवहार के संबंध में

आदरणीय सर,
अत्यंत विनम्रता पूर्वक मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि मैं डी.ए.वी. विद्यालय का दसवीं कक्षा का छात्र हूँ। मैं कक्षा का मॉनीटर भी हूँ। इस पत्र के द्वारा मैं आपसे कुछ छात्रों के संबंध में शिकायत करना चाहता हूँ । कल अंग्रेज़ी के पीरियड अध्यापिका जी के कहे अनुसार मुझे इस बात का ध्यान रखना था कि सभी छात्र अंग्रेज़ी में बात करें परंतु मेरे दो सहपाठी सोहन और मोहन अंग्रेजी में बात नहीं करते है। वे कुछ गलत शब्दों का इस्तेमाल करते है।

उनसे मैंने कई बार आग्रह किया कि वह अंग्रेज़ी में बात करें , उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी बल्कि मेरे साथ बुरा व्यवहार किया। अध्यापिका जी ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन उनकी परवाह न करते हुए उन्होंने गलत शब्दों का प्रयोग किया और छुट्टी के बाद देख लेने की धमकी दी। मैं अत्यंत विनम्रता के साथ यह कहना चाहता हूँ कि ऐसे छात्रों के कारण हमारे विद्यालय की गरिमा को चोट लगेगी। यदि इनके ऊपर सख्त कार्रवाई न की गई तो इनका हौसला और बढ़ेगा और ये स्कूल के अन्य छात्रों के साथ भी यही व्यवहार अपनाएंगे।

अतः आपसे निवेदन है कि आप इन छात्रों के विरुद्ध ठोस कार्यवाई करें जिससे अन्य छात्रों को भी इससे सीख मिले ।
आपके इस सहयोग के लिए मैं आपका सदा आभारी रहूँगा।

आपका आज्ञाकारी शिष्य,
रोहन,
कक्षा– दसवीं,
अनुक्रमान 24
डीएवी विद्यालय,
न्यू शिमला ।


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सब्जी मंडी का कोई भी सब्जी वाले बाबू हनुमान प्रसाद जी को अपनी दुकान पर बुलाना क्यों नहीं चाहते थे?

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सब्जी मंडी का कोई भी सब्जी वाले बाबू हनुमान प्रसाद को अपनी दुकान पर इसलिए नहीं बुलाना चाहते थे, क्योंकि बाबू हनुमान प्रसाद की बेहद खराब आदत थी। वह सब्जी खरीदते समय सब्जी वाले से हरे धनिये की गड्डी मुफ्त में मांगते थे। शलजम के पत्ते तुड़वाकर तोलने का आग्रह करते थे। आलू भी छांट-छांटकर चुनते। अरबी को धुलावकर, मिट्टी हटवाकर ही लेते थे। इसके अलावा वह सब्जी खरीदते समय मोलभाव बहुत अधिक करते थे। सब्जी वाले उनकी आदतों से बहुत परेशान हो जाते थे। इसी कारण सब्जीवाले हनुमान प्रसाद को अपने पास सब्जी के लिये नही बुलाना चाहते थे।

(संदर्भ पाठ : गोभी का फूल, लेखक – केशवचंद्र वर्मा, कक्षा-10, पाठ-5, हिंदी, दिशा)


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विद्यालय के प्रधानाचार्य को चरित्र प्रमाण पत्र देने का अनुरोध करते हुए पत्र का प्रारूप

 

दिनांक : 24 जून 2024

 

सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,
डीएवी विद्यालय,
चंडीगढ़ ।

विषय : चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने के लिए का अनुरोध।

आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय,
निवेदन इस प्रकार है कि मेरा नाम आशीष कुमार मौर्य है। मैं कक्षा 9-ब में पढ़ता हूँ। मेरे पिता श्री अवधेश कुमार मौर्य सरकारी सेवा में कार्यरत हैं और वह आयकर विभाग में अधिकारी हैं। उनके विभाग में उनका स्थानांतरण चंडीगढ़ से फरीदाबाद हो गया है, इस कारण हमें यह शहर छोड़कर दूसरे शहर में स्थानांतरित होना पड़ेगा। मैंने विद्यालय त्याग प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिया है। मुझे चरित्र प्रमाण पत्र की आवश्यकता है। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मुझे चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने की कृपा करें ताकि नए शहर में नए विद्यालय में प्रवेश लेते समय, मैं वहाँ पर चरित्र प्रमाण पत्र पेश कर सकूं। आपकी अति कृपा होगी।

आपका आज्ञाकारी शिष्य,
आशीष कुमार मौर्य,

कक्षा – 9-ब
जवाहर नवोदय विद्यालय,
दिल्ली


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वह उछली और छलाँगें लगाती निकल गई। in present tense (वर्तमान काल) में बदलिए।

वह उछली और छलाँगें लगाती निकल गई। ये वाक्य भूतकाल में है, जो वर्तमान काल में परिवर्तन करना है, तो हम इस वाक्य को वर्तमान के अलग-अलग उपभेद में परिवर्तित करते हैं।

मूल वाक्य : वह उछली और छलाँगें लगाती निकल गई।

वह उछली और छलाँगें लगाती निकलती है। (सामान्य वर्तमान काल)
वह उछल रही है और छलाँगे लगा रही है। (अपूर्ण वर्तमान काल)
वह उछली है और छलाँगे लगाती निकल गई है। (पूर्ण वर्तमान काल)
क्या वह उछली है और छलांगे लगाती निकल गई है। (संदिग्ध वर्तमान काल)
वह अभी उछली है, छलांगे लगाती निकली है। (तात्कालिक वर्तमान काल)
शायद वह उछली है और छलांगे लगाते निकली है। (संभाव्य वर्तमान काल)

वर्तमान काल क्या है?

काल के जिस रुप से क्रिया के वर्तमान समय में होने का बोध प्रकट होता है, वह वर्तमान काल कहलाता है। वर्तमान काल के 6 उपभेद होते हैं।

  • सामान्य वर्तमान काल
  • पूर्ण वर्तमान काल
  • अपूर्ण वर्तमान काल
  • संदिग्ध वर्तमान काल
  • तत्कालिक वर्तमान काल
  • संभाव्य वर्तमान काल

काल क्या है?

काल से तात्पर्य किसी क्रिया के संपन्न होने के समय से होता है। कोई भी क्रिया जिस समय में संपन्न हुई होती है, उसे काल कहते हैं। काल के तीन भेद होते हैं।
• भूतकाल
• वर्तमान काल
• भविष्य काल


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निम्नलिखित वाक्यों से संज्ञा छाँटिए और उसके भेद लिखिए- वाक्य 1. अध्यापिका पढ़ाती हैं। 2. सच्चाई एक अच्छा गुण है। 3. हिमालय विशाल पर्वत है। 4. हीरा बहुमूल्य रत्न है। 5. भारतीय सेना बेहद कुशल सेना है। 6. जल ही जीवन है।

‘वे सुंदर मकानों में रहते हैं।’ इस वाक्य को ‘अपूर्ण वर्तमानकाल’ में बदले।

वर्षा के बाद निकले इंद्रधनुष को देख कर बच्चों का संवाद लिखिए।

संवाद लेखन

वर्षा  के बाद निकले इंद्रधनुष को देखकर बच्चों के बीच संवाद

 

राजू ⦂ सोनू,  वो देखो, आसमान में। कितना रंग बिरंगा आसमान लग रहा है!

सोनू ⦂ वह इंद्रधनुष है, जो बरसात के बाद आसमान में दिखता है।

गोलू ⦂ इंद्रधनुष कैसे बनता है? क्या तुम्हें पता है?

सोनू ⦂ इंद्रधनुष प्रकाश की किरणों के कारण बनता है। सूरज की किरणों में ही अनेक रंग छुपे होते हैं, जो वर्षा के बाद परावर्तन के कारण हमें इंद्रधनुष के रूप में दिखाई देने लगते हैं।

गोलू ⦂ अच्छा। इंद्रधनुष कितना सुंदर दिखता है!

राजू ⦂ हाँ, पहले के जमाने में जब इंद्रधनुष बनने का वैज्ञानिक कारण लोगों को नहीं पता था तो वह इसे जादू समझते थे।

राजू ⦂ अच्छा ऐसी बात है। लेकिन  इंद्रधनुष केवल वर्षा के बाद ही क्यों दिखाई देता है? हमेशा क्यों नहीं दिखाई देता?

सोनू ⦂ वह इसलिए,  इंद्रधनुष पानी की बूंदों पर सूरज की किरणों के परावर्तन के कारण ही दिखता  है। वर्षा के मौसम में आसमान में नमी रहती है और पानी के कण के आसमान में रह जाते हैं और इन्हीं बूंदों पर जब सूरज की किरणें पड़ती है तो वह एक प्रिज़्म बन जाती हैं। फिर सूरज की किरणें सात रंगों में बंट जाती हैं, जिससे इंद्रधनुष दिखाई देता है।

सभी बच्चे (एक साथ) ⦂ सोनू, तुमने बहुत अच्छी जानकारी दी।


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आप जिस कंपनी में काम करते है या जिस कंपनी के मालिक है और यदि आप अपनी कंपनी को काम करने के लिए एक बेहतर स्थान बनाने के लिए कोई एक बदलाव लाना चाहें तो वह क्या होगा?

यदि मुझे अपनी कंपनी को एक बेहतर स्थान बनाना है तो मैं सबसे पहला नियम बनाऊँगा कि कभी भी आलोचनाओं को व्यक्तिगत न लें । अपनी आलोचनाओं को सकारात्मक रूप में लें और दूसरों को आपके बारे में उनकी राय बताने का मौका दें । उनकी इस राय को आलोचना के बजाय फीडबैक के रूप में लें और खुद में सुधार करने की कोशिश करें। हो सकता है कि आपकी आलोचना के दौरान आपको किसी ऐसे पॉइंट का पता चले, जिस पर आपका ध्यान न गया हो लेकिन आपको वाकई उस पर काम करने की जरूरत हो ताकि आप अपने कंपनी के बिजनस को आगे बढ़ा सकें।

बिजनेस को सफलता दिलाने और खुद को एक कामयाब एंटरप्रेन्योर के रूप में स्थापित करने के लिए आपको अपने व्यक्तित्व में कुछ बदलाव लाने होंगे । इन बदलावों के साथ ही आप अपने बिजनेस को नई ऊंचाइयाँ दिलवा सकेंगे और खुद भी ऊंची उड़ान भर सकेंगे । इनके साथ अपनी टीम, कस्टमर्स और बिजनेस की बेहतरी के लिए भी काम कर पाएंगे। बिजनेस को बेहतर बनाने के लिए आपको खुद को भी बेहतर बनाना होगा ।


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बूँद टपकी एक नभ से;
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बड़ा भाई किस कारण लेखक पर निगरानी का अधिकार समझता था?

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बड़ा भाई बड़े होने के नाते लेखक पर निगरानी का अधिकार समझता था। वह लेखक से 5 वर्ष बड़ा था। इसी कारण अपने छोटे भाई की सारी जिम्मेदारी उसी पर थी। वह छोटे भाई के लिए एक अभिभावक की तरह था। एक अभिभावक की भूमिका निभाने के कारण वह अपने छोटे भाई पर निगरानी का अधिकार रखता था।

बड़ा भाई अपने छोटे भाई के साथ एक हॉस्टल में रहता था। अपने परिवार से दूर हॉस्टल में रहने के कारण बड़े भाई को अपने छोटे भाई की चिंता लगी रहती थी और उसे यह चिंता रहती थी कि यदि छोटा भाई किसी गलत संगत में पड़ गया तो उसकी पढ़ाई प्रभावित होगी। इसीलिए वह अपने छोटे भाई की निगरानी करता रहता था और इसे अपना अधिकार समझता था।

संदर्भ पाठ :
बड़े भाई साहब, लेखक – मुंशी प्रेमचंद (कक्षा-10, पाठ-10, हिंदी, स्पर्श)


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पंखि उड़ानी गगन कौं, पिण्ड रहा परदेस । पानी पीया चंचु बिनु, भूलि या यहु देस ।। व्याख्या कीजिए।

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दिनांक – 24 जून 2024

सेवा में,
डाकपाल महोदय,
डाक केंद्र कार्यालय,
नई दिल्ली, दरियागंज,

विषय – पार्सल ना मिलने के संबंध में

महोदय,
निवेदन है कि मैं नई दिल्ली के दरियागंज क्षेत्र का निवासी हूँ। मैं आपको ये पत्र मेरे एक पार्सल के संंबंध में लिख रहा हूँ। मेरे भाई ने 15 दिनों पहले एक पार्सल भोपाल से दिल्ली मेरे पास भेजा था। आमतौर पर मुझे वह पार्सल 3 से 5 दिनों के बीच मिल जाना चाहिए था, मुझे वो पार्सल 15 दिन बीत जाने  तक नहीं मिला है। मेरा यह पार्सल बहुत ही जरूरी है क्योंकि इसमें मेरे कार्यालय के कुछ आवश्यक दस्तावेज़ हैं।

मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि आप कृपा करके इस मामले की छानबीन करवाएं। ताकि मुझे मेरा पार्सल मिल सके। पत्र के साथ मैं पार्सल भेजे जाने की रसीद का फोटो भेज रहा हूँ, जो मेरे भाई ने मुझे आनलाइन भेजी है। कृपया इस मामले को प्राथमिकता के आधार पर देखें।
धन्यवाद,

भवदीय,
मोहनलाल,
C-1586, अंसारी रोड,
दरियागंज ।


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अपने इलाके में पीने का पानी अशुद्ध आता है, इसकी शिकायत करते हुए तथा शुद्ध जल का वितरण करवाने हेतु नगराध्यक्ष को पत्र लिखिए |

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इन पंक्तियों का आशय यह है कि इस बाग में जो फूल बिखरे पड़े हैं, वह सुगंधहीन हैं, क्योंकि उनकी सुगंध को नष्ट कर दिया गया है। यहाँ पर फूल से तात्पर्य जलियांवाला बाग में मारे गए उन तमाम भारतीयों के शवों से हैं, जिन पर जनरल डायर ने गोलियां चलवाकर मार दिया था। अब उनमें प्राण शेष नहीं रह गए हैं, इसलिए अब यह उनके शव सुगंध रहित फूल के समान है, जो बाग में जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हैं। यह पंक्तियां कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित ‘जलियांवाले बाग में बसंत’ नामक कविता से ली गई हैं।

पूरी पंक्तियां इस प्रकार है…

परिमल-हीन पराग दाग़-सा बना पड़ा है।
हा! यह प्यारा बाग़ ख़ून से सना पड़ा है।
आओ प्रिय ऋतुराज! किंतु धीरे से आना।
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना॥

व्याख्या : कवयित्री ऋतुराज बसंत का आह्वान करते हुए कहती है कि इस बाग में चारों तरफ जो फूल बिखरे पड़े हैं, उनमें सुगंध समाप्त हो चुकी है अर्थात जलियांवाला बाग में हजारों भारतीयों की हत्या कर उनके प्राणों को का हरण कर लिया गया है। अब यह प्यारा बाग उनके खून से सना पड़ा है। चारों तरफ खून ही खून बिखरा पड़ा है। इसलिए बसंत ऋतु यदि तुम आना तो यहाँ आते समय शांति से आना। तुम अगर कोई उपहार लाओ तो उपहारों को लाते समय उपहार का भाव प्रदर्शित ना करना बल्कि पूजा का भाव प्रदर्शित करना, क्योंकि यहाँ पर अब उन लोगों के शव हैं और उनके प्रति अब श्रद्धांजलि अर्पित करने का समय है। अपने साथ जो पुष्प लेकर आओगे भड़कीले और गहरे रंग के ना हो बल्कि उन्हें हल्की सी खुशबू हो और ओस उसे भीगे हुए हों।


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‘काई सा फटे नहीं’ पंक्तियों का आशय स्पष्ट करो।

आशय स्पष्ट कीजिये- भाई-भाई मिल रहें सदा ही टूटे कभी न नाता, जय-जय भारत माता।

पंखि उड़ानी गगन कौं, पिण्ड रहा परदेस । पानी पीया चंचु बिनु, भूलि या यहु देस ।। व्याख्या कीजिए।

पंखि उड़ानी गगन कौं, पिण्ड रहा परदेस । पानी पीया चंचु बिनु, भूलि या यहु देस ।।
व्याख्या : कबीर दास कहते हैं कि जब जीवात्मा ने परम तत्व का ज्ञान कर लिया तो वह सहस्रार अर्थात ब्रह्मलोक उड़ गया और उसका यह भौतिक शरीर उसी जगह पर पड़ा रहा। इसलिए अब यह शरीर उसके लिए परदेश हो गया है तथा परमतत्व स्वदेश हो गया है। जब तक उसे परमतत्व का ज्ञान नहीं था, तब तक यह शरीर जीवात्मा के लिए स्वदेश था और परमतत्व रूपी परमात्मा परदेश के समान था।
अब जीवात्मा को परम तत्व का ज्ञान हो गया है। अब वह परमतत्व समाहित हो गया है और अब तक उसके लिए परमतत्व रूपी परमात्मा स्वदेश हो गया है और उसका यह स्थूल शरीर उसके लिए परदेश के समान हो गया है। उसने बिना चोंच अर्थात बिना इंद्रियों के ही आनंद रस का पान किया है, इसलिए अब सारे बंधन को भूल गया है और सांसारिक मोहमाया के प्रति उसकी आसक्ति खत्म हो गई है।
कबीर ये कहना चाहते हैं कि जब जीवात्मा परमात्मा को समझ लेता है तो वह परमात्मा में ही विलीन हो जाता है और जब तक वो परमात्मा से अलग रहता है तो जीवात्मा बनकर इस संसार में भटकता रहता है। जब परमात्मा को जान लेता है तो परमात्मा के परम तत्व रहस्य को जानकर उसमें ही एकाकार हो जाता है और आनंद से भर उठता है। तब उसे अपने शरीर की इंद्रियों द्वारा सुख अच्छे नही लगते। वह तो परमतत्व को जानने के सुख में ही आनंद अनुभव करता है।

 

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‘कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी।’ इस उक्ति का अर्थ बताकर इसकी व्याख्या करें।

थल थल में बसता है शिव ही, भेद न कर क्या – हिन्दू मुसलमाँ। ज्ञानी है तो स्वयं को जान, वहीं है साहिब की पहचान।। (भावार्थ बताएं)

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए – महात्मा निराले भगत की किस बात से खुश हुए? भगत को पारस देते समय महात्मा ने उससे क्या कहा? बनिए और भगत के बीच हुई बातचीत से भगत के स्वभाव के विषय में क्या पता चलता है? गाड़ियों के समय पर न पहुँचने पर बनिए ने भगत को क्या समझाया? इस कहानी से कैसे पता चलता है कि समय अनमोल है?

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सभी प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार होंगे…

महात्मा निराले भगत की किस बात से खुश हुए?

उत्तर : महात्मा निराले भगत ही इस बात से खुश हुए थे कि निराला भगत जब महात्मा के दर्शन करने आया तो एक पखवाड़े तक एक टांग पर बुत बनकर खड़ा रहा था। उसकी यह तपस्या देखकर महात्मा बेहद खुश हुए और उसे वरदान मांगने के लिए कहा।

भगत को पारस देते समय महात्मा ने उससे क्या कहा?

उत्तर : भगत को पारस देते समय महात्मा ने उससे कहा कि यह पारस लोहे को सोना बना देता है।लेकिन तुम इसे कि केवल एक बार ही प्रयोग में ला सकते हो। तुम जितना लोहा इकट्ठा कर सकते हो कर लो और उसे इस पारस की सहायता से सोने में बदल देना। एक बार तुमने लोहे से सोना बना लिया तो दोबारा इस पारस को तुम प्रयोग नहीं कर पाओगे। एक पखवाड़े बाद मैं यह पारस लेने वापस लेने आ जाऊंगा।

बनिए और भगत के बीच हुई बातचीत से भगत के स्वभाव के विषय में क्या पता चलता है?

उत्तर : बनिए और भगत के बीच हुई बातचीत से भगत के अत्याधिक लालची स्वभाव का पता चलता है। उसके मन में संतोष नही था। वो बेहद लालची किस्म का व्यक्ति था और ना ही उसे समय का महत्व पता था।

गाड़ियों के समय पर न पहुँचने पर बनिए ने भगत को क्या समझाया?

उत्तर : गाड़ियों के समय पर न पहुंचने पर बनिए भगत को समझाया कि समय बेहद महत्वपूर्ण है। पखवाड़ा बीतने का समय निकला जा रहा है, महात्मा पखवाड़ा बीतते ही महात्मा जी पारस को वापस लेने आ जाएंगे। जो गाड़ियां लोहा लाने को भेजी हैं, वह शायद किसी अनहोनी के कारण फंस गई है और शायद समय से नही आ पाएं। इसलिए हमारे सामने जो भी लोहा इस समय मौजूद है, उसी को सोना बना लेते हैं। नहीं तो समय निकल जाने पर वह भी सोना नहीं बन पाएगा।

इस कहानी से कैसे पता चलता है कि समय अनमोल है?

उत्तर : इस कहानी से यह पता चलता है कि समय बड़ा महत्वपूर्ण है। यदि भगत समय के मूल को समझते हुए लालच में नहीं पड़ता और सही समय बीतने से पहले ही जितना लोहा उसके पास था, उसी को पारस की सहायता से सोना बना लेता तो उसके हाथ कुछ ना कुछ तो लगता। लेकिन वह अपने अत्याधिक लालच और समय को महत्वपूर्ण न समझ पाने के कारण उसने हाथ आए अवसर को भी गंवा दिया।

संदर्भ पाठ : स्वर्ण मरीचिका, लेखक-विजयदान देथा (कक्षा-7, पाठ-8, हिंदी संचयन)


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निम्नलिखित वाक्यों को एकवचन रूप में परिवर्तित कर दोबारा लिखिए (क) कल मेरी सहेलियाँ आई थीं। (ख) नेतागण पधार रहे हैं। (ग) तुम मुझे दोहे सुनाओ। (घ) रास्ते में गहरे गड्ढे हैं। (ङ) ये वस्तुएँ ले आइए। (च) बच्चों ने प्रश्नों के उत्तर लिखे। (छ) बिल्लियाँ, कुत्तों से डर कर भाग गईं। (ज) थालियाँ यहाँ पर मत रखो। (झ) बच्चे खेल रहे हैं। (ञ) घोड़े तेज़ी से दौड़ रहे हैं।

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थल थल में बसता है शिव ही, भेद न कर क्या – हिन्दू मुसलमाँ। ज्ञानी है तो स्वयं को जान, वहीं है साहिब की पहचान।। (भावार्थ बताएं)

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कवयित्री ‘ललद्यद’ द्वारा रचित ‘वाख’ की इन पंक्तियों का भावार्थ इस प्रकार है..

भावार्थ : कवयित्री कहती हैं कि ईश्वर तो इस पूरे संसार के कण-कण में वास करता है। शिव यानी ईश्वर इस संसार में सर्वरूप से व्याप्त है। वह जड़ में है, चेतन में है, कण-कण में व्याप्त है। इसलिए है, मनुष्य तू जाति और धर्म के आधार पर स्वयं को मत बांट। हिंदू-मुसलमान के नाम पर आपस में मत लड़। क्योंकि ईश्वर सबके अंदर निवास करता है। अगर तुझे ईश्वर को ही जानना है तो तू पहले खुद को पहचान जब तू खुद को पहचान लेगा तो तू परम ज्ञानी बन जाएगा और जब तू आत्मज्ञान करके उस परमात्मा के स्वरूप को जान लेगा, तुझे यह ज्ञान हो जाएगा कि तेरे अंदर जो आत्मा है, उसमें ही परमात्मा का निवास है। तब तू परमज्ञानी बन जायेगा।


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जिसमें सुगंध वाले, सुंदर प्रसून प्यारे, दिन-रात हँस रहे हैं, वह देश कौन सा है? मैदान, गिरि, वनों में हरियालियाँ लहकतीं, आनंद पथ जहांँ है, वह देश कौन सा है? जिसके अनंत धन से, धरती भरी पड़ी है, संसार का शिरोमणि, वह देश कौन-सा है? भावार्थ बताएं।

लाए कौन संदेश नए घन! दिशि का चंचल, परिमल-अंचल, छिन्न हार से बिखर पड़े सखि! जुगनू के लघु हीरक के कण! लाए कौन संदेश नए घन! सुख दुख से भर, आया लघु उर, मोती से उजले जलकण से छाए मेरे विस्मित लोचन! लाए कौन संदेश नए घन! भावार्थ बताएं।

“तेज गति से उफनते समुद्र” ने अपनी ही लहरों में चलते जहाज़ों को उठा फेंका। (i) संज्ञा पदबंध (iii) विशेषण पदबंध (ii) सर्वनाम पदबंध (iv) क्रिया पदबंध

इसका सही विकल्प होगा..
(i) संज्ञा पदबंध

स्पष्टीकरण :

“तेज गति से उफनते समुद्र” ने अपनी ही लहरों में चलते जहाज़ों को उठा फेंका। में ‘संज्ञा पदबंध’ है, क्योंकि पदबंध ‘तेज गति से उपस्थित समुद्र’ ये पूरा पद एक संज्ञा पद के रूप में कार्य कर रहा है।

संज्ञा पदबंध वो पदबंध  होता है, जिसमें पूरा शब्द समूह संंज्ञा का बोध कराता है और उसमें किसी न किसी संज्ञा शब्द का प्रयोग अवश्य किया गया हो।

“तेज गति से उफनते समुद्र” इस पदसमूह  में ‘समुद्र’ संज्ञा शब्द का प्रयोग किया गया है । यदि इस पद में से समुद्र शब्द को हटा दिया जाए तो यह एक पद एक विशेषण पदबंध बन जाएगा, क्योंकि फिर यह पदसमूह एक विशेषण की तरह कार्य करेगा।

इसलिए ‘तेज गति से उठता समुद्र’ एक संज्ञा पदबंध है।

पदबंध से तात्पर्य शब्दों के उस समूह से होता है, जो मिलकर संज्ञा अथवा सर्वनाम अथवा विशेषण अथवा क्रिया विशेषण अथवा क्रिया का बोध कराते हैं।

पदबंध पाँच प्रकार के होते हैं।

  • संज्ञा पदबंध
  • सर्वनाम पदबंध
  • विशेषण पदबंध
  • क्रिया पदबंध
  • क्रिया विशेषण पदबंध

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‘वे सुंदर मकानों में रहते हैं।’ इस वाक्य को ‘अपूर्ण वर्तमानकाल’ में बदले।

‘मीठे अंगूर खाकर मन खुश हो गया।’ इस वाक्य में से विशेषण और विशेष्य छांटकर लिखें।

कैदी को जेल में किन-किन यातनाओं को सहना पड़ा? (कैदी और कोकिला)

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‘कैदी और कोकिला’ पाठ मैं कैदी के रूप में कवि को अनेक तरह की यातनाओं का सामना करना पड़ता था।

जैसे…

  • कैदी को अंधेरी कोठरी में जंजीर से बांधकर रखा जाता था। कोठरी बहुत छोटी होती थी, जहाँ पर
  • कैदी आराम से अपने हाथ पैर तक नहीं फैला पाता था।
  • उस कोठरी में अनेक कैदियों को एक साथ भर दिया जाता था।
  • कैदी और अन्य साथी कैदी यदि रोते भी थे तो उनका रोना भी गुनाह माना जाता था। कैदी के रोने पर उसकी पिटाई की जाती थी।
  • कैदी को कोल्हू में बैल की तरह चलाया जाता था और उससे अथक परिश्रम करवाया जाता था। कैदी को काम करने की स्थिति में कोड़ों से भी मारा जाता था।
  • कैदी को भरपेट भोजन भी नही दिया जाता था।
  • इस तरह अंग्रेज सरकार द्वारा कैदी (कवि) को अनेक तरह की भीषण यातनाओं का सामना करना पड़ा था।
संदर्भ पाठ : कैदी और कोकिला’ कवि- माखनलाल चतुर्वेदी (कक्षा – 9 पाठ – 12, हिंदी, क्षितिज)

क्या आपको नहीं लगता कि यदि हम बहुत सुख-सुविधाओं में रहेंगे तो हमारी काम करने की तथा कष्ट सहने की शक्ति भी कम होती जाएगी, जैसे पिंजरे के पक्षी की हो जाती है?

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बिल्कुल, हमें यही लगता है कि हम यदि बहुत अधिक सुख सुविधाओं में रहेंगे तो हमारी काम करने की तथा कष्ट सहने की शक्ति भी कम हो जाएगी। जिंदगी में आने वाले तरह-तरह के कष्ट, आपत्ति-विपत्ति हमारे अंदर जूझने की शक्ति पर पैदा करते हैं। इन सब विषमताओं का जब हम सामना करते हैं, तो हमारे अंदर एक मारक क्षमता विकसित होती है, जिसके कारण हमारा इच्छा शक्ति मजबूत होती है, हमारे संकल्प बल में बढ़ोत्तरी होती है।

यदि हम जीवन में आने वाले कष्टों का से संघर्ष करते हुए उनका सामना करते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं, तो फिर आगे जीवन में हमें जो भी कष्ट आते हैं, उनका सामना आसानी से कर लेते हैं और उन कष्टों पर, उन संकटों पर विजय पा लेते हैं। लेकिन यदि हम बहुत अधिक सुख सुविधा में रहेंगे तो हमारी इच्छा शक्ति कमजोर पड़ जाती है। जब हमें कष्ट सहने को नही मिलेंगे तो उसका सामना करना कैसे सीखेंगे। अधिक सुख-सुविधाओं का जीवन जीते हुए यदि कोई संकट आ जाए तो मनुष्य सहन नहीं कर पाता और उन संकटों के आगे हार मान लेता है।

पिंजरे में बंद पक्षी की हालत भी ऐसी ही हो जाती है। पिंजरे में बंद रहकर वह उड़ना तक भूल जाता है, क्योंकि उसका मूल स्वभाव उड़ना है। जब उसे पिंजरे में बंद कर दिया जाता है तो उसे स्वच्छ एवं मुक्त भाव से उड़ने को नहीं मिलता और धीरे-धीरे वह अपने मूल स्वभाव को भूल जाता है। इसीलिए मनुष्य हो या पशु पक्षी किसी को भी उसके मूल स्वभाव से वंचित नहीं रहना चाहिए। बहुत अधिक सुख-सुविधा वाला जीवन जीना भी सही नहीं है। जीवन में संघर्षों से सामना करने की प्रवृत्ति भी बनी रहनी चाहिए तभी जीवन का आनंद है।


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किसी भी देश के विकास के लिए उसके नागरिक को स्वस्थ रहना आवश्यक है। जीवन में स्वस्थ रहने का क्या महत्व है? आप अपने स्वास्थ्य के लिए क्या-क्या उपाय करते हैं? अपने विचारों को प्रस्तुत के रूप में लिखिए।

आप वेणु राजगोपाल हैं। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ दिल्ली के संपादक के नाम एक पत्र लिखकर सामाजिक जीवन में बढ़ रही हिंसा पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

किसी भी देश के विकास के लिए उसके नागरिक को स्वस्थ रहना आवश्यक है। जीवन में स्वस्थ रहने का क्या महत्व है? आप अपने स्वास्थ्य के लिए क्या-क्या उपाय करते हैं? अपने विचारों को प्रस्तुत के रूप में लिखिए।

किसी भी देश के विकास के लिए उसके नागरिक को स्वस्थ रहना बेहद आवश्यक होता है। जीवन में स्वस्थ रहने का अपना ही अलग महत्व होता है।

किसी भी देश के विकास के लिए उसके नागरिक को स्वस्थ रहना क्यों आवश्यक है, तो इसका जवाब यह है कि मान लीजिए आप बीमार हैं, आपको आराम की आवश्यकता है, आप बिस्तर पर आराम कर रहे हैं। बीमारी के कारण आपका शरीर कमजोर हो गया है और आप अपना कोई भी सामान्य कार्य आसानी से नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आप अपने सामान्य कार्य को नहीं कर पाएंगे तो देश के विकास में अपना योगदान कैसे दे सकते हैं।

उसी प्रकार देश के नागरिकों की स्थिति होती है। जिस देश के नागरिक अस्वस्थ होंगे वे अपने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते रहेंगे और उनका अधिकतर समय अपनी बीमारी के उपचार आदि में ही व्यतीत होगा। ऐसी स्थिति में वह सामान्य कार्य करने में असमर्थ महसूस करेंगे जब अपने सामान्य कार्य नहीं कर पाएंगे तो उनकी उत्पादकता कम होगी।

कोई भी देश देश के नागरिकों द्वारा किए जाने वाले कार्यों से ही चलता है। किसी देश के नागरिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से अस्वस्थ रहेंगे तो उनके कार्य करने की क्षमता भी प्रभावित होगी, जो देश की प्रगति में बाधक होगी। इसी कारण किसी देश के नागरिक का स्वस्थ होना बेहद महत्वपूर्ण होता है। तब ही देश की गति तेज विकास के तेज होती है। एक अस्वस्थ व्यक्ति उतनी तत्परता, सजगता एवं लगन से वह कार्य नहीं कर सकता जो कि एक स्वस्थ व्यक्ति कर सकता है।

अपने स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने के लिए हम अनेक तरह के उपाय आजमाते हैं।

जैसे..

  • सुबह 5 बजे से 6 बचे के बीच में उठ जाना। एक से डेढ़ घंटे तक टहलना, व्यायाम करना, योग आसन आदि करना।
  • सुबह हल्का-फुल्का पौष्टिक नाश्ता करना, जिसमें अधिक से अधिक फल और फाइबर की मात्रा हो।
  • विद्यालय अथवा कार्यालय जाते समय सीढ़ियां चढ़ना, पैदल चलना ।
  • उसके अलावा दोपहर का भोजन मध्यम स्तर का करना तथा शाम का भोजन हल्का-फुल्का करना।
  • रात को जल्दी सो जाना ।
  • जंक फूड से बिल्कुल भी दूर रहना।
  • तेल-मसाले जैसे पदार्थों का कम प्रयोग करना।
  • चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक जैसे पदार्थों से भी दूर रहना।
  • यह सारे उपाय हैं जो हम अपने जीवन को स्वच्छ बनाए रखने के लिए करते हैं।

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भारत का एक प्रसिद्ध खेल है, कबड्डी। ये भारतीय खेल है, और भारत अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों के जाना जाता है।

कबड्डी खेलने का तरीका

कबड्डी मैच की शुरुआत एक टीम द्वारा दूसरी टीम के हाफ में रेड करने से होती है । रेड का मतलब जब एक टीम का खिलाड़ी दूसरे खेमे में कबड्डी बोलने यानी हमला करने जाता है, उसे रेडर कहा जाता है । रेडर कबड्डी शब्द बोलते हुए दूसरी टीम के हाफ में प्रवेश करता है, जिसे कैंटिंग भी कहा जाता है ।

रेडर का उद्देश्य जितना संभव हो उतने विपक्षी खिलाड़ियों को टैग करना या छूना होता है, जिन्हें एंटी या डिफेंडर कहा जाता है और एक सांस में अपने कैंट को जारी रखते हुए मध्य रेखा को पार करके रेडर अपने हिस्से में लौट आते हैं । इस बीच डिफेंडर रेडर को कोर्ट से टैकल करके या धक्का देकर अपने ही हाफ में लौटने से रोकने की कोशिश करते हैं ।

टीमें बारी-बारी से एक-दूसरे के खिलाफ रेड करती हैं और जिस टीम को सबसे अधिक अंक मिलते हैं वह मैच की विजेता बनती है। कबड्डी मैच में प्रत्येक टीम में सात खिलाड़ी होते हैं ।टीमों में बेंच पर तीन से पांच सब्स्टीट्यूट खिलाड़ी के तौर पर होते हैं।

कबड्डी टीम में मौजूद सभी सात खिलाड़ी डिफेंस भी करते हैं । इन खिलाड़ियों में रेडर और डिफेंडर खिलाड़ी शामिल होते हैं। इसके अलावा इसमें से कुछ खिलाड़ी ऑलराउंडर भी होते हैं, जो रेडर और डिफेंडर दोनों की भूमिका निभाते हैं। एक कबड्डी मैच आमतौर पर 40 मिनट (प्रत्येक 20 मिनट के दो भाग) तक चलता है। मैच की शुरुआत दो टीमों के बीच सिक्के के टॉस से होती है और विजेता यह तय कर सकता है कि पहले रेड करना है या डिफेंड करना है। प्रत्येक टीम को प्रत्येक हाफ में दो टाइम-आउट की अनुमति होती है ।


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‘काई सा फटे नहीं’ पंक्तियों का आशय स्पष्ट करो।

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यह पंक्तियां भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित ‘असाधारण’ नामक कविता से ली गई हैं। ‘काई सा फटे नहीं’ पंक्तियों का आशय इस प्रकार है…

मनुष्य को किसी भी तरह के संकट से आने पर काई की तरह फटे नही अर्थात संकटों से घबरा कर बिखर नही जाये। मनुष्य को संकटों के आगे हार नहीं मान लेनी चाहिए।

इस कविता की ये पंक्तियां इस प्रकार है…

लहरों के आने पर,
 काई सा फटे नहीं,
रोटी के लालच में, तोते सा रटे नही,

अर्थात प्राणी वही प्राणी है।अर्थात मनुष्य सच्चा मनुष्य वही है जो लहरों के आने पर यानी किसी भी तरह के संकट के आने पर काई की तरह फट नही जाये यानी संकट के आने पर घबरा नहीं जाए। संकटों के आगे हार नहीं माने बल्कि संकटों का डटकर मुकाबला करे। रोटी के लालच में तोते सा रटे नही यानी वो किसी भी तरह के लोभ लालच के कारण अपने आचरण को नहीं भूल जाए और केवल अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करने को तैयार ना हो बल्कि अपने चरित्र को उज्जवल बनाकर रखें। सच्चा मनुष्य वही मनुष्य है जिसमें यह सब गुण हों।


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जल संरक्षण-हमारा कर्तव्य। इस विषय पर अध्यापक और छात्रों के मध्य संवाद लेखन लिखिए।

संवाद

जल संरक्षण-हमारा कर्तव्य (अध्यापक एवं छात्रों के बीच संवाद)

 

अध्यापक ⦂ बच्चों, क्या तुम जानते हो, कि जल का हमारे जीवन में क्या महत्व है?

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अध्यापक ⦂ बिल्कुल, सही कहा तुमने। आशीष, तुम बताओ कि इस पृथ्वी पर कितना जल पीने योग्य है?

आशीष ⦂ सर, यूँ तो पृथ्वी पर बहुत अधिक जल है, लेकिन पीने योग्य जल सिर्फ 3% है। शेष जल खारे पानी के रूप में समुद्र में जमा है, जो हमारे किसी काम का नहीं है।

अध्यापक ⦂ तुमने भी सही बात कही। मोहन, तुम बताओ कि जल संरक्षण हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

मोहन ⦂ सर, जल संरक्षण हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि जो भी पीने योग्य उपलब्ध है, वह बेहद कम मात्रा में है। जल के संसाधन धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं। पृथ्वी जल की मात्रा कम होती जा रही है और उसके अनुपात में जनसंख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए जल का संरक्षण आवश्यक है।

अध्यापक : बिल्कुल सही कहा तुमने। राजेश, तुम बताओ जल संरक्षण के लिए क्या-क्या उपाय करने चाहिए।

राजेश ⦂ जल संरक्षण के लिए हमें जल को सोच-समझकर प्रयोग में लाना चाहिए। दाढ़ी बनाते समय, टूथब्रश करते समय, हाथ धोते समय टोंटी को व्यर्थ में खुला नहीं रखना चाहिए। एक दो बाल्टी पानी से भी नहाया जा सकता है। फव्वारा के नीचे आधा घंटे तक बैठ कर नहाने में दस बाल्टी बानी खर्च होता है, इससे पानी की बर्बादी होती है। इस तरह हम अनके उपाय करके जल को बचा सकते हैं।

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सभी छात्र ⦂ हाँ, सर, हम बिल्कुल ऐसा ही करेंगे। आज से हम प्रण लेते हैं कि हम जल को बचाने का अधिक से अधिक प्रयत्न करेंगे।

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हमारे समाज में शिक्षा व स्वास्थ्य की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का माध्यम होती है। यह न केवल ज्ञान और कौशल प्रदान करती है, बल्कि सोचने और समझने की क्षमता को भी विकसित करती है। शिक्षा व्यक्ति आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होती है। एक शिक्षित व्यक्ति समाज में अपना सकारात्मक योगदान देता है। शिक्षा के माध्यम से ही सामाजिक समानता और न्याय को बढ़ावा मिलता है। यह समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों को दूर करने का सशक्त माध्यम है। इसके अलावा, शिक्षा रोजगार के अवसर बढ़ाती है, जिससे आर्थिक विकास को भी प्रोत्साहन मिलता है।

स्वास्थ्य समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए महत्वपूर्ण है। एक स्वस्थ व्यक्ति ही अपने कर्तव्यों का सही ढंग से निर्वहन कर सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और उनकी गुणवत्ता से जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है। स्वस्थ समाज ही सशक्त समाज बन सकता है। जो व्यक्ति स्वस्थ होगा वह अपने अपने कार्य को कुशलता से कर सकता है। एक कुशल व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य में सफलता और गुणवत्ता की संभवना अधिक होती है जो एक सफल समाज की नींव रखता है।

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नानीजी, आप कैसी हो? मैं आशा करता हूँ कि आप स्वस्थ होंगी। यहाँ पर सब घर में कुशलता से हैं। नानीजी पिछले सप्ताह आपका पत्र मिला था। आपने मुझे छुट्टियो का सदुपयोग करने की सलाह

आपने समय का सदुपयोग करने की मुझे जो सलाह दी थी, उसको मैंने तभी से पालन करना शुरू कर दिया था। अपने पत्र में मुझे मेरी विशेष रुचियां के बारे में भी पूछा था और कहा था कि अपनी विशेष रुचि के अनुसार अपनी छुट्टियों का सदुपयोग करो। इससे तुम छुट्टियों का रचनात्मक सदुपयोग कर सकोगे। मैंने तभी से आपके सुझाव का पालन शुरु कर दिया है।

नानीजी, मैं आपको अपनी विशेष रुचियां के बारे में बता रहा हूँ। नानी जी, मैं मुझे तरह-तरह की ज्ञानवर्धक पुस्तक पढ़ने का बहुत अधिक शौक है। पुस्तक मेरा प्रिय शौक रहा है। इसलिए मैं लाइब्रेरी जाकर पुस्तके पढ़ता हूँ। मैंने अपने मोबाइल में भी कई पुस्तकों की ई-बुक कॉपी डाउनलोड कर रखी है। मैंने पिताजी से ई-बुक रीडर दिलाने के लिए भी कहा है। उन्होंने मुझे ई-बुक रीडर जल्दी ही दिलाने का वचन दिया है।

नानी जी, इसके अलावा मेरी खेल में भी बहुत रूचि है। मुझे क्रिकेट का खेल बहुत पसंद है और मैं क्रिकेट के सभी मैच देखना पसंद करता हूं। इसी कारण मैं अपने विद्यालय की क्रिकेट टीम का कप्तान भी हूँ। पुस्तक पढ़ने और क्रिकेट खेलने और देखने के अलावा मेरी ग्राफिक डिजाइनिंग में बहुत अधिक रुचि है। मुझे तरह-तरह की रचनात्मक डिजाइन बनाने का बहुत अच्छा लगता है। इसी कारण में इन छुट्टियों में ग्राफिक डिजाइनिंग का कोर्स कर रहा हूं ताकि मैं अपनी इस प्रतिभा को और अधिक निखार सकूं। आगे संभव हुआ तो मैं ग्राफिक डिजाइनिंग के क्षेत्र में ही अपना करियर बनाऊंगा अथवा एक क्रिकेट खिलाड़ी बनूंगा।

नानी मैं आपकी सलाह पर अपनी रुचि के अनुसार ही छुट्टियों का सदुपयोग करना शुरू कर दिया है। मैं ग्राफिक डिजायनिंग जाने का कोर्स कर रहा हूँ और अपनी क्रिकेट प्रैक्टिस भी करता हूँ।

आशा है, मेरी रुचियां को जानकर आपके मन मेरे लिये कोई सुझाव आया होगा। आपका मेरी रुचियों के बारे में क्या सुझाव है। मैं मुझे अगले पत्र में बताना ताकि मैं आपकी सुझाव से लाभ ले सकूं।

शेष बातें अगले पत्र में। आपके पत्र का इंतजार रहेगा।

आपका नाती,
शुभम

 


Other questions…

अपनी नानी माँ या दादी माँ को पत्र लिखकर सूचित करें कि इन गर्मी की छुट्टियों में आप उनके पास आ रहे हैं​।

नाना की अचानक तबीयत खराब होने पर मामा को पत्र लिखिए​।

अपने दादा-दादी, नाना-नानी, वृद्ध परिजन या किसी पड़ोसी का साक्षात्कार करते हुए उनके विद्यालय की शिक्षा नीति तथा आज की शिक्षा नीति के अंतर को लिखिए​।

दूरदर्शन से समाचार मिला है कि पटना के गांधी मैदान में बम विस्फोट हुआ है। वहाँ आपका ननिहाल है। अपने नाना जी और उनके के परिवार का कुशल-क्षेम पूछते हुए उन्हें पत्र लिखिए।।​

महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध को रोकने के लिए हर क्षेत्र में महिला थाना स्थापित किए जाने हेतु महिला आयोग की अध्यक्षा की ओर से राज्य के मुख्यमंत्री को ई-मेल लिखिए।

ई-मेल लेखन

महिला थाना की स्थापना हेतु राज्य के मुख्यमंत्री को ई-मेल

 

To: smavad.cmoffice@up.gov.in
From: chairperson.upstatewc@gov.in
Subject: हर क्षेत्र में महिला थाना की स्थापना हेतु अनुरोध

माननीय मुख्यमंत्री महोदय,
सादर नमस्कार,

मैं, मिथिलेश कुमारी, उत्तम प्रदेश राज्य महिला आयोग की तरफ से आपका ध्यान हमारे राज्य में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों की ओर आकर्षित करना चाहती हूं। यह एक गंभीर चिंता का विषय है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

इस समस्या से निपटने के लिए, मैं प्रस्ताव करती हूं कि राज्य के प्रत्येक जिले में कम से कम एक महिला थाना स्थापित किया जाए। ये विशेष थाने महिलाओं से संबंधित मामलों को संभालने के लिए समर्पित होंगे और निम्नलिखित लाभ प्रदान करेंगे:

1. महिला पीड़ितों के लिए सुरक्षित और संवेदनशील वातावरण
2. महिला अधिकारियों द्वारा मामलों की जांच, जो पीड़ितों को अधिक खुलकर बोलने में सहायता करेगा
3. महिला-केंद्रित अपराधों पर विशेष ध्यान और तेज कार्रवाई
4. महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा

मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करें और इसे लागू करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। महिला थानों की स्थापना से न केवल महिलाओं की सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि यह समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और समानता को भी बढ़ावा देगा।

इस विषय पर चर्चा करने के लिए मैं आपसे मिलने का समय चाहूंगी। कृपया अपनी सुविधानुसार एक बैठक की तिथि और समय सुझाएं।

धन्यवाद।

सादर,
मिथिलेश कुमारी,
अध्यक्षा – उत्तम प्रदेश राज्य महिला आयोग,
राजनगर, उत्तम प्रदेश


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आपने ऑनलाइन कुछ खिलौने आर्डर किए थे, जो 5 दिन से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आपको प्राप्त नहीं हुए हैं। कंपनी को अपना ऑर्डर रद्द करने के लिए लगभग 80 शब्दों में ईमेल लिखें ।

आपके क्षेत्र में नकली दूध बेचने का धंधा खूब फल-फूल रहा है। इसकी रोकथाम हेतु स्वास्थ्य निरीक्षक को ई-मेल लिखिए।

आप पिकनिक पर गए। दोस्त को ई-मेल करें। ई-मेल में उसे पिकनिक के बारे में बताते हुए लिखें।

मान लीजिए कि आप बहुत दिनों से स्कूल नहीं गए हैं। अपने किसी मित्र से इन दिनों विज्ञान विषय में करवाए गए कार्य की कॉपी स्कैन करके ई-मेल से भेजने का अनुरोध कीजिए।

आपके सामने ऐसा कुछ हुआ हो कि किसी जानवर ने किसी मनुष्य को चोट पहुंचाई हो। ऐसी किसी घटना का वर्णन कीजिए।

प्रसंग लेखन

 

जानवर द्वारा किसी मनुष्य को चोट पहुंचाने की अनेक घटनाएं घटती रहती हैं और हम समाचारों के माध्यम से ऐसी अनके घटनाओं को देखते-सुनते रहते हैं, जिसमें बताया जाता है कि अमुक क्षेत्र में तेंदुए अथवा बाघ आदि का आतंक या आवारा कुत्तों द्वारा निवासियों को काट लेने की घटनाएं आदि। मैं ऐसी ही दो प्रत्यक्ष घटनाओं का उदाहरण हूँ।

ऐसी ही एक घटना ध्यान में आती है, जब हमारे कॉलोनी के एक बच्चे को एक आवारा कुत्ते ने बुरी तरह काट लिया और उसे बच्चों को आवारा कुत्तों ने नोच-नोच कर इतना अधिक काटा कि बाद में उस बच्चे की मौत हो गई। ये हृदयविदारक घटना उस समय की है जब हमारी कॉलोनी में कुछ दिनों से आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ गई थी। वह आते जाते कॉलोनी निवासियों पर भौंकते थे। इस संबंध में हमने नगर पालिका को शिकायत की थी, लेकिन कोई भी उचित कार्रवाई नहीं की गई थी।

एक दिन हमारे कॉलोनी के एक निवासी सुरेद्र गुप्ताजी का 8 वर्षीय बेटा अपनी हमारी गली के बाहर स्थित किराने की दुकान से कुछ खाने का सामान लेने गया। जब वह सामान लेकर लौट रहा था तो उसके हाथ में पैकेट देखकर आवारा कुत्ते उसके पीछे पड़ गए और उसके हाथ का पैकेट झपटने का प्रयास करने लगे। यह देखकर वह बच्चा भागने लगा तो आवारा कुत्ते उसके पीछे पड़ गए और न केवल उस पैकेट को छीन कर उसका सामान खा गए बल्कि बच्चे को भी बुरी तरह काट लिया। जब तक चीख-पुकार सुनकर कॉलोनी के निवासी आते तब तक बच्चा बहुत अधिक लहू-लुहान हो गया था। आनन-फानन में सब लोग उसे अस्पताल लेकर गए। जहाँ एक दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना से हमारी कॉलोनी में शोक की लहर दौड़ गई। गुस्से में हम सभी कॉलोनी के निवासियों ने नगर पालिका दफ्तर के सामने प्रदर्शन किया, तब जाकर नगर पालिका हरकत में आई और उन आवारा कुत्तों को पकड़ा गया।

ऐसी ही एक दूसरी घटना हमारे पुश्तैनी गाँव में घटी, जब हम लोग अपने गाँव में छुट्टियां बिताने दादी-दादी के घर गए थे। कुछ दिनों से हमारे गाँव में तेंदुए के आतंक के बारे में खबरें सुन रहे थे कि एक तेंदुआ जंगल से भटक कर गाँव में रोज आ जाता है और गाँव के किसी पालतू जानवर को उठाकर ले जाता है। वह अक्सर मनुष्यों पर भी आक्रमण कर देता है। गाँव के सभी लोग आतंकित थे और सावधान रहते थे।

एक दिन मैं अपने दादा के घर के ऊपर वाले बालकोनी में बैठा बाहर का नजारा देख रहा था तो मैंनें एक तेंदुए को आते देखा तभी दूसरी तरफ से एक ग्रामीण किसान अपने खेतों की ओर जा रहा था। तेंदुआ उस ग्रामीण किसान को देखकर उस पर झपटा और किसान भागा लेकिन तेंदुए ने किसान के हाथ में अपने दाँत गड़ा दिए। वह जोर से चीखा। उसकी आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण अपने घरों से हाथ में लाठी-डंडा लेकर बाहर निकले।

यह देखकर तेंदुआ भाग गया लेकिन वो किसान को पूरी तरह घायल कर गया था। उसके हाथ से खून बह रहा था। शुक्र था कि तेंदुए के आक्रमण से किसी की जान को कोई हानि नहीं हुई, लेकिन किसान के हाथ में बहुत चोट आई और वह बहुत दिनों तक अपना काम नहीं कर पाया।

इस तरह जानवरों द्वारा मनुष्य को चोट पहुंचाने के लिए घटनाएं घटती रहती हैं। मैं इन दो प्रत्यक्ष घटनाओं का साक्षी हूँ।


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पशु-प्रेम मानवता का प्रतीक (लघु निबंध)

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दुःख की घड़ी में भी जब कुछ लोग संवेदनहीनों जैसा आचरण करते हैं तो उसका परिणाम क्या होता है? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। पाठ ‘इस जल प्रलय में’

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‘इस जल प्रलय में’ पाठ के आधार पर कहें तो दुख की घड़ी में भी जब कुछ लोग संवेदनहीनों जैसा आचरण करते हैं तो उसका परिणाम यह होता है कि ऐसे लोगों के जीवन में जब दुख की घड़ी आती है, तब उनका साथ देने वाला कोई नहीं होता। दुख की घड़ी में यह आवश्यक है कि दूसरों के दुख को अपना दुख समझते हुए उसे हर संभव सहयोग प्रदान किया जाए। जो लोग ऐसा नहीं करते और दूसरों के दुखों में अपना दुख ना समझकर संवेदनहीन जैसा आचरण करते हैं तो जब भी उनके जीवन में दुख आता है तो उनका साथ देने वाला भी कोई नहीं होता।

दुख एक ऐसा चरण है जो हर किसी के जीवन में कभी ना कभी आता ही है। दुख से कोई नहीं बच पाया है, ऐसा लोगों को हमेशा ये बात सोचनी चाहिए। यदि वह ऐसा सोचेंगे तो उनके जीवन में दुख की घड़ी में साथ देने वाले अनेक लोग होंगे।

‘इस जल प्रलय में’ पाठ में लेखक फणीश्वरनाथ नाथ रेणु ने पटना शहर में आई भीषण बाढ़ के विषय में वर्णन किया है, जिसके कारण पूरा पटना शहर लगभग डूब गया था और पूरा जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया था। लेखक ने बाढ़ के पानी को ‘प्रलय दूत’ की संज्ञा दी है।


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वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए :- “उनके वंशज अपनी भयावह लपटों से अब भी उनका मुख उज्जवल किए हुए हैं |” (पाठ – पानी की कहानी)

आशय स्पष्ट कीजिये- भाई-भाई मिल रहें सदा ही टूटे कभी न नाता, जय-जय भारत माता।

मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी ‘कफन’ में घीसू का चरित्र-चित्रण कीजिए।

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मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित ‘कफन’ नामक कहानी के मुख्य पात्र घीसू का चरित्र चित्रण इस प्रकार होगा…
  • घीसू बेहद गरीब और अनपढ़ व्यक्ति है, जो दरिद्रता में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है।
  • घीसू एक कमजोर तथा अकर्मण्य व्यक्ति भी है, जो मेहनत का कोई कार्य नहीं करना चाहता। इस कारण वह अपने कुनबे और गाँव में वह अपने आलस्य के लिए कुख्यात था।
  • घीसू स्वार्थी प्रवृत्ति का व्यक्ति भी है, जब उसके बेटे की पत्नी प्रसव पीड़ा से छटपटा रही थी, तब वह आलू खाने में मगन था। उसने अपने बेटे माधव को सहायता के लिए भेजा तो लेकिन खुद उसकी सहायता के लिए नहीं गया।
  • घीसू एक निर्दयी व्यक्ति है, जिसके मन में ना तो दया, ना सहानुभूति और ना ही संवेदनशीलता है। उसके बेटे की पत्नी बुधिया रात दिन दूसरों के घरों में काम करके किसी तरह सबका पेट पालती थी फिर भी उसके मन में कोई दया नहीं आती थी। जब वह प्रसव पीड़ा से मौत के मुंह में जा रही थी तब भी घीसू का मन नहीं पिघला।
  • घीसू एक नशाखोर व्यक्ति था जो तरह-तरह के नशा करने के लिए कुख्यात थाय़ उसे शराब पीने और पकवान खाने का बेहद शौक था।

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‘गबन’ उपन्यास का नायक कौन है? उपन्यास के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिये।

‘बड़े घर की बेटी’ कहानी के पात्र ‘बेनी माधव’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।

केंद्रीय विद्यालय में स्वच्छता अभियान जुलूस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। स्कूल में नोटिस बोर्ड के लिए सूचना।

केंद्रीय विद्यालय, पुष्प विहार, दिल्ली

सूचना

दिनांक : 10 जनवरी 2024

विद्यालय के सभी छात्र-छात्राओं को सूचित किया जाता है कि दिनांक 12 जनवरी 2024 को हमारे विद्यालय की तरफ से स्वच्छता अभियान जुलूस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस जुलूस का मुख्य उद्देश्य शहर के नागरिकों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करना है। जुलूस का आरंभ विद्यालय से दोपहर 11 बजे होगा और शहर के विभिन्न हिस्सों से गुजरता हुआ जुलूस श्याम 3 वापस विद्यालय पर आकर समाप्त होगा।

जुलूस में शामिल होने वाले छात्र-छात्राएं जगह-जगह रुककर स्वास्थ्य के प्रति स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करेंगे और विद्यालय प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई गई स्वच्छता अभियान संबंधी सामग्री जैसे टैम्पलेट, पोस्टर, पुस्तिकाएं, ब्रोशर आदि को बाटेंगे। छात्र-छात्राओं से अनुरोध है कि अधिक से अधिक संख्या में इस जुलूस में शामिल होकर स्वच्छता अभियान में सहभागी बनें।

आज्ञा से,
विद्यालय प्रशासन,
केंद्रीय विद्यालय,
पुष्प विहार, दिल्ली ।


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अधिसूचना किसे कहते हैं? एक अधिसूचना का उचित प्रारूप भी बनाइए।

आपका मोबाइल विद्यालय परिसर में कहीं खो गया है। इस संबंध में विद्यालय के सूचना पट्ट पर मोबाइल की विस्तृत जानकारी देते हुए एक सूचना तैयार कीजिए।

वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए :- “उनके वंशज अपनी भयावह लपटों से अब भी उनका मुख उज्जवल किए हुए हैं |” (पाठ – पानी की कहानी)

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उनके वंशज अपनी भयावह लपटों से अब भी उनका मुख उज्जवल किए हुए हैं |

​’रामचंद्र तिवारी’ द्वारा लिखे गये ‘पानी की कहानी’ नामक पाठ की इन पंक्तियों का आशय इस प्रकार है :

आशय : लेखक से वार्तालाप करते हुए ओस की बूंद जो कि पानी का स्वरूप है, लेखक से कहती है कि उसका निर्माण हाइड्रोजन और ऑक्सीजन नामक दो गैसों के संयोग से हुआ है। इस तरह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों गैसें उसके वंशज हैं, जो सूर्य मंडल में अभी भी सूर्य के घेरे में लपटों के रूप में मौजूद हैं। यानी सृष्टि के निर्माण के समय जब पानी नहीं था तब हाइड्रोजन और ऑक्सीजन नामक दो गैसों से ही पानी का निर्माण हुआ और धरातल यानी पृथ्वी पर जीवन का विकास आरंभ हुआ।

पानी की बूंद कहती है कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों उसके वंशज है, जो अभी भी सूर्यमंडल में अपनी धधकती गैसों के रूप में मौजूद हैं, और सूर्य के मुख्य को आभा प्रदान कर रहे हैं।


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विष भरे कनक घटों की संसार में कमी नहीं है। आशय स्पष्ट कीजिए।

कक्षा में देरी से पहुँचने पर हुए अपने अनुभव को डायरी लेखन के रूप में लिखिए।

डायरी लेखन

12 मार्च 2024 (मंगलवार)

प्रिय डायरी,
आज मैं कक्षा में देरी से पहुंचा। मैं घर से सही समय में निकल गया था। लेकिन जो ऑटो रिक्शा मुझे लेने आता है, वो रास्ते में खराब हो गया। रिक्शे में जो खराबी थी उसे ठीक करने में आधा घंटा लग गया। जब रिक्शा सही हुआ और मैं स्कूल पहुँचा तो आधा घंटे से भी अधिक की देरी हो गई थी। मेरा एक पीरियड निकल चुका था। पहले स्कूल के गेट पर प्यून ने मुझे अंदर एंट्री ही नहीं दी। किसी तरह प्रार्थना करने पर जब उसने मुझे एंट्री दी तो मुझे बहुत डर लग ही रहा था कि आज कक्षा में बहुत डांट पड़ेगी। जैसे ही मैं कक्षा में पहुँचा तो मेरे दूसरे पीरियड के अध्यापक ने ने मुझसे देरी से आने के लिए डांटा और सीधे बाहर निकाल दिया । मुझे बहुत बुरा लगा, एक बार भी अध्यापक ने मुझसे देरी से आने का कारण नहीं पूछा । सारे छात्र मुझे देख रहे थे । मुझे बहुत बुरा लगा। मजबूरन में वापस घर आना पड़ा। मैं पहली बार कक्षा में देरी से गया था । कक्षा में देरी से जाने का अनुभव मेरा बहुत खराब रहा। आज के बाद मैं कभी देरी से नहीं जाऊंगा ।

मंयक,
दिल्ली,
12 मार्च ।


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वृजलाल गोयनका कैसे गिरफ्तार हुआ? (डायरी का एक पन्ना)

चंडीगढ़ के रॉक गार्डन का अनुभव डायरी में लिखिए।

आप राकेश गर्ग है। आपके भैया भाभी को पुत्र प्राप्त हुआ है। इस अवसर पर उनके लिए एक बधाई संदेश लिखिए।

बधाई संदेश

भैया-भाभी को बधाई संदेश

 

प्रणाम भैया और भाभी,
प्रणाम,

भैया भाभी आशा करता हूँ, कि आप सब ठीक होंगे। सबसे पहले आपको पुत्र रत्न प्राप्त होने की मेरे तरफ से बहुत-बहुत बधाई। आप दोनों के लिए ये जीवन का बेहद महत्वपूर्ण और खुशी का पल है। ये केवल आप दोनों के लिए ही नहीं बल्कि हमारे पूरे परिवार की खुशी का पल है। इस ने मेहमान के आने से हमारा परिवार पूरा हो गया। मैं भी चाचा बनकर बहुत खुश हूँ। आपको मेरी तरफ़ से एक बार फिर नए सदस्य के आने की बहुत-बहुत बधाई।

आपका छोटा भाई,
राकेश गर्ग ।


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आपका मित्र आई.आई.टी की परीक्षा में चयनित हो गया है उसे बधाई पत्र लिखिए।

अपने मित्र के क्रिकेट टीम में चुने जाने पर मित्र को बधाई देते हुए पत्र लिखें।

आज के संदर्भ में ‘अपना-पराया’ पाठ की प्रासंगिकता पर टिप्पणी लिखिए ।

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आज के संदर्भ में अपना-पराया पाठ की बेहद अधिक प्रासंगिकता है। इस पाठ के माध्यम से शरीर की ज्ञानेंद्रियों के बारे में बताया गया है तथा स्वच्छता से रहने के नियम भी सुझाए गए हैं। आज अक्सर कोरोना महामारी का संकट मंडराने लगता है तथा अन्य कई तरह की बीमारियां फैलती रहती है। ऐसे समय में अपनी स्वच्छता एवं सफाई के विषय में बेहद अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

‘अपना पराया’ पाठ में यही सब बातें बताई गई हैं कि हमें खाने पीने से पहले हाथों को क्यों अच्छी तरह धोना चाहिए तथा अपनी सभी ज्ञानेंद्रियों का उपयोग किस तरह कुशलतापूर्वक करना चाहिए ताकि हमारे शरीर में किसी भी तरह का कोई विकार न उत्पन्न होने पाए। आज महामारी आदि की आशंका में जी रहे मनुष्य के लिए ‘अपना पराया’ पाठ प्रासंगिक है क्योंकि इसके माध्यम से वह अपने स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता को समझ सकता है।


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”कारतूस’ पाठ के संदर्भ में लेफ्टिनेंट को कैसे पता चला कि हिंदुस्तान में सभी अंग्रेजी शासन को नष्ट करने का निश्चय कर चुके हैं​?

कवि और कोयल के वार्तालाप का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

अस्पताल से घर आकर लेखक कहाँ रहा और उसने क्या महसूस किया? ऐसा करना उनके किस भाव को दर्शाता है? (मेरा छोटा निजी पुस्तकालय)

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अस्पताल से घर आने के बाद लेखक अपने बेडरूम में नहीं बल्कि अपने पुस्तकालय में रहा, क्योंकि लेखक को पुस्तकों से बेहद प्रेम था।

‘मेरा छोटा निजी पुस्तकालय’ में लेखक धर्मवीर भारती का सन 1989 में जबरदस्त हार्ट अटैक के बाद ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टरों ने जैसे तैसे उनके हृदय का ऑपरेशन किया था लेकिन उनका इस प्रक्रिया में उनका 60% ह्रदय सदा के लिए नष्ट हो गया था और केवल 40% हृदय ही बचा था। उन्हें सख्त बेड रेस्ट की हिदायत थी। ऐसी स्थिति में ऑपरेशन के बाद घर को आए और उन्होंने अपने बेडरूम में ना रहकर अपने में रहने की जिद की और फिर वह वहीं पर अपने पुस्तकालय में रहते और पुस्तकों को देखते रहते थे। बायीं ओर की खिड़की से हवा आती रहती थी और हजारों पुस्तकों में उन्होंने अपने जीवन को समेट लिया था।


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अनुच्छेद जब मैंने पिज़्ज़ा बनाया

पहेली बताइए – ‘हाथ से निकला रस, तो शहर गया बस।’

अपने इलाके में पीने का पानी अशुद्ध आता है, इसकी शिकायत करते हुए तथा शुद्ध जल का वितरण करवाने हेतु नगराध्यक्ष को पत्र लिखिए |

औपचारिक पत्र

अशुद्ध पानी की शिकायत करते हुए नगराध्यक्ष को पत्र

 

दिनांक – 22 जून 2024

सेवा में,
श्रीमान नगर अध्यक्ष,
फरीदाबाद नगर निगम,
फरीदाबाद ।

विषय : निर्मल नगर इलाके में पीने के अशुद्ध पानी आने के संबंध में शिकायत एवं शुद्ध पानी के वितरण का अनुरोध

माननीय नगराध्यक्ष महोदय,
निवेदन इस प्रकार है कि हमारे निर्मल नगर इलाके में कई दिनों से पीने का अशुद्ध पानी आ रहा है। पानी का रंग बेहद मटमैला होता है और कभी-कभी उसमें छोटे-छोटे कीड़े भी होते हैं। इस कारण हमें या तो पीने के लिए बाहर से पानी शुद्ध पानी मंगाना पड़ता है अथवा इसी पानी को शुद्ध करने की प्रक्रिया करनी पड़ती है जो कि बेहद लंबी होती है और इसमें हमारा काफी खर्चा होता है।

इस अशुद्ध पानी को पीने के कारण हमारे इलाके के अनेक लोग बीमार भी पड़ गए हैं। पीने की पानी की घोर किल्लत होने के कारण हमारे निर्मल नगर कॉलोनी के सभी निवासियों का जीवन बेहद अस्त-व्यस्त हो गया है। हम इस संबंध में नगर निगम विभाग को कई बार पत्र लिख चुके हैं लेकिन अभी तक कोई भी कार्यवाही नहीं हुई है।

मेरा अपने सभी कॉलोनी निवासियों की तरफ से आपसे अनुरोध है कि हमारे निर्मल नगर इलाके में पीने का शुद्ध पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने की कार्रवाई शीघ्र से शीघ्र करें ताकि हम सभी निवासियों का जीवन सामान्य हो सके।
आशा है कि आप जनता की इस तकलीफ को आप समझेंगे और शीघ्र से शीघ्र कार्रवाई करेंगे।
धन्यवाद।

भवदीय,
मनोज कुमार एवं निर्मल नगर इलाके के समस्त कॉलोनी निवासी ।


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आपके विद्यालय में पीने का पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। इसकी शिकायत करते हुए सुधार के लिए प्रार्थना करते हुए प्रधानाचार्य को पत्र लिखिए।

सुमित बजाज, सिद्धार्थ नगर गोरे गाँव (पश्चिम) से बरसात के दिनों में सड़कों की दुर्दशा के बारे में शिकायत करते हुए महानगरपालिका के अध्यक्ष को शिकायती पत्र लिखता है।

अनुच्छेद जब मैंने पिज़्ज़ा बनाया

अनुच्छेद

जब मैंने पिज़्ज़ा बनाया

जब मैंने पिज़्जा बनायाजब मैंने पहली बार पिज़्ज़ा बनाया उसका अनुभव मेरे लिए बहुत खास था । मुझे पिज़्ज़ा बनाना नहीं आता था और जब मैं यू ट्यूब की सहायता से पिज़्ज़ा बनाने का सोचा । मैंने पिज़्ज़ा बनाने वाला एक वीडियो देखा। मैं बाज़ार से पिज़्ज़ा बनाने का सामान लेकर आई, जैसे पिज़्ज़ा बेस, पिज़्ज़ा चीज़, सब्जियां, सोस आदि सब कुछ।

पिज़्ज़ा बनाने के लिए ओवन मेरे घर पहले से ही था। मैंने रसोई में जाकर एक मोबाइल स्टैंड पर अपना मोबाइल रखकर मोबाइल में यूट्यूब चला दिया और मैं वीडियो में पिज़्जा बनाने की विधि देखती गई और साथ-साथ पिज़्जा भी बनाती गई । सच्च में पिज़्ज़ा बहुत स्वाद बना था । मैं और मेरे परिवार ने मिलकर बहुत खुशी से खाया। मुझे खुद पर यकीन नहीं आ रहा था कि मैं इतना अच्छा पिज़्ज़ा बना लेती हूँ। मेरे बनाए पिज़्जा की सबने बहुत तारीख की। इस तरह मैंने पहली बार घर पिज़्ज़ा बनाया।


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अनुच्छेद लिखिए ‘बातें कम, काम ज्यादा’

फौजी की माँ पर अनुच्छेद लिखें।

निम्नलिखित वाक्यों से संज्ञा छाँटिए और उसके भेद लिखिए- वाक्य 1. अध्यापिका पढ़ाती हैं। 2. सच्चाई एक अच्छा गुण है। 3. हिमालय विशाल पर्वत है। 4. हीरा बहुमूल्य रत्न है। 5. भारतीय सेना बेहद कुशल सेना है। 6. जल ही जीवन है।

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दिए गए वाक्यों में संज्ञा शब्द और उनके भेद इस प्रकार होंगे…

1. अध्यापिका पढ़ाती हैं।
संज्ञा : अध्यापिका
संज्ञा के भेद : जातिवाचक संज्ञा

2. सच्चाई एक अच्छा गुण है।
संज्ञा : सच्चाई
संज्ञा के भेद : भाववाचक संज्ञा

3. हिमालय विशाल पर्वत है।
संज्ञा : हिमालय
संज्ञा के भेद : व्यक्तिवाचक संज्ञा

4. हीरा बहुमूल्य रत्न है।
संज्ञा : हीरा
संज्ञा के भेद : द्रव्यवाचक संज्ञा

5. भारतीय सेना बेहद कुशल सेना है।
संज्ञा : सेना
संज्ञा के भेद : समूहवाचक संज्ञा

6. जल ही जीवन है।
संज्ञा : जल
संज्ञा के भेद : द्रव्यवाचक संज्ञा

संज्ञा क्या है?

हिंदी व्याकरण में संज्ञा वह शब्द होते है जो किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, भाव या समूह के नाम को दर्शाते हैं।

संज्ञा के प्रमुख भेद पाँच होते हैं।

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा
किसी विशेष व्यक्ति, स्थान या वस्तु का नाम।
उदाहरण: राम, दिल्ली, ताजमहल।

2. जातिवाचक संज्ञा
किसी जाति या वर्ग का सामान्य नाम।
उदाहरण: लड़का, पेड़, कुर्सी।

3. भाववाचक संज्ञा
किसी गुण, अवस्था या भाव का नाम।
उदाहरण: सुंदरता, बचपन, क्रोध।

4. समूहवाचक संज्ञा
किसी समूह या समुदाय का नाम।
उदाहरण: सेना, कक्षा, झुंड।

5. द्रव्यवाचक संज्ञा
किसी पदार्थ या द्रव्य का नाम।
उदाहरण: पानी, दूध, तेल।


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दिए गए वाक्यों में से संज्ञा शब्दों को अलग करके उनके भेद लिखिए। (1) पत्रकार मित्र ने साहसिक किस्से सुनाए। (2) वहाँ पंडित नेहरू उपस्थित थे (3) वीरता पुरस्कार दिए गए। (4) एक पटाखा शामियाने पर गिरा। (5) सिलेंडर से रेगुलेटर बंद किया।

‘मीठे अंगूर खाकर मन खुश हो गया।’ इस वाक्य में से विशेषण और विशेष्य छांटकर लिखें।

नगाँव सिटी की सुंदरता के विषय में बताते हुए राजस्थान में बसे अपने मित्र को पत्र लिखिए।

अनौपचारिक पत्र

नगाँव सिटी की सुंदरता बताते हुए मित्र को पत्र

दिनाँक – 22 जून 2024

मोहन गुप्ता,
ए-31, राजा गार्डन,
दिल्ली

शेखर सिंह,
जी-123, सौरभ विहार,
जयपुर (राजस्थान)

प्रिय मित्र शेखर
तुम कैसे हो?

आशा करता हूँ कि तुम स्वस्थ और प्रसन्न होगे। दोस्त, मैं कुछ दिनों पहले अपने चाचा के साथ नगाँव सिटी घूमने गया था। मेरे चाचा नगाँव सिटी में ही एक कंपनी में जॉब करते हैं। इस बार वह हम लोगों से मिलने आए तो उनके वापस जाते समय मैं उनके साथ नगाँव घूमने चला गया। मै नगाँव में पाँच दिन रहा और असम के इस खूबसूरत शहर नगाँव जीभकर कर घूमा। इस शहर की सुंदरता ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया। आओ मैं तुम्हें नगाँव शहर के बारे में बताता हूँ।

नगाँव असम का एक महत्वपूर्ण शहर है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहाँ का मौसम बहुत सुहावना है, जो इस शहर को और भी आकर्षक बनाता है। चारों ओर हरियाली का नजारा देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है।

शहर के बीचों-बीच बहती कोलोंग नदी इसकी शोभा को और बढ़ा देती है। शाम के समय नदी के किनारे टहलना एक अद्भुत अनुभव है। सूर्यास्त के समय नदी में पड़ने वाला सूरज का प्रतिबिंब एक अविस्मरणीय दृश्य प्रस्तुत करता है।

यहाँ के लोग बहुत मिलनसार और स्वागतशील हैं। उनकी संस्कृति और परंपराएँ बहुत समृद्ध हैं। मैंने यहाँ के कई त्योहारों में भाग लिया है, जिनमें बिहू सबसे प्रमुख है। इन त्योहारों में लोगों का उत्साह देखते ही बनता है।

नगाँव की एक और खूबसूरती है यहाँ का व्यंजन। यहाँ के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद अद्वितीय है। मछली के व्यंजन और चाय के बागानों से आने वाली ताजी चाय का मजा कुछ और ही है।

शहर में कई ऐतिहासिक स्थल भी हैं जो इसकी समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं। प्राचीन मंदिर और पुरातन इमारतें शहर की ऐतिहासिक महत्ता को बयान करती हैं।

मुझे लगता है कि तुम्हे भी एक बार नगाँव आकर इसकी सुंदरता का अनुभव करना चाहिए। मुझे विश्वास है कि तुम भी इस शहर के सौंदर्य और संस्कृति से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे। अगली बार जब मेरे चाचा बुलाएंगे तो हम दोनों उनके साथ नगाँव घूमने चलेंगे। आशा है कि जल्द ही हम दोनों यहाँ आएँगे और हम साथ में इस खूबसूरत शहर का आनंद लेंगे।

तुम्हारा मित्र,
मोहन


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आपने नए घर में शिफ्ट किया है। अपने नए घर के विषय में बताते हुए अपने मित्र को पत्र लिखिए।

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पहेली बताइए – ‘हाथ से निकला रस, तो शहर गया बस।’

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इस पहेली का सही जवाब है…

हाथरस

आइए समझते हैं कैसे?

इस पहेली में बताया गया है कि ‘हाथ से निकला एक रस और शहर बन गया बस।’

पहेली से पता चलता है कि इसमें किसी शहर का नाम पूछा जा रहा है। पहेली में हाथ का उल्लेख है और रस का उल्लेख है। साथ ही यह बताया गया है कि हाथ से निकला रस। इससे स्पष्ट होता है कि उस शहर का नाम हाथ से निकले रस से संबंधित है।

पहेली के आधार पर जिस शहर का नाम पता चलता है, उस शहर का नाम है, हाथरस

हाथरस भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में बसा हुआ एक शहर है। यह शहर हींग की भूमि के नाम से भी मशहूर है क्योंकि यहां पर हींग का व्यापार बड़ी मात्रा में होता है। हाथरस भारत में हींग के व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र हैय़ इसके अलावा यह शहर कवियों की भूमि भी रहा है।

हिंदी के प्रसिद्ध हास्य कवि काका हाथरसी इसी शहर से संबंध रखते थे। उनके अलावा भी इस शहर से कई कवि निकले हैं।

हाथरस शहर में हिंदी और स्थानीय बोली के रूप में ब्रजभाषा बोली जाती है। यह उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर है।


और पहेलियां…

सब्जियों का राजा आलू को कहा जाता है, तो सब्जियों की रानी किसे कहा जाता है?

दिए गए शब्दों में उपसर्ग लगाकर नए शब्द बनाइए। (क) नाम (ख) देश (ग) पका (घ) हत्था (ङ) गिनत (च) कूल (छ) मरण (ज) दृष्टि

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दिए गए शब्दों में उपसर्ग लगाकर नए शब्द इस प्रकार होंगे…

(क) नाम
बे + नाम = बेनाम
अ + नाम = अनाम
गुम + नाम = गुमनाम
बद + नाम = बदनाम

(ख) देश
पर + देश = परदेश
स्व + देश = स्वदेश
वि + देश = विदेश

(ग) पका
अध + पका = अधपका

(घ) हत्था
नि + हत्था = निहत्था

(ङ) गिनत
अन + गिनत = अनगिनत

(च) कूल
अनु + कूल = अनुकूल
प्रति + कूल = प्रतिकूल

(छ) मरण
आ + मरण = आमरण

(ज) दृष्टि
कु + दृष्टि = कुदृष्टि

उपसर्ग क्या हैं?

उपसर्ग एक या एक से अधिक अक्षरों के वे शब्दांश होते हैं, दो किसी शब्द के आरंभ में लगते है।

उपसर्ग शब्दांश उस शब्द के लिए एक विशेषण का कार्य करते हैं और उस शब्द को विशेषण से युक्त शब्द बना देते है। उपसर्ग लगाने से वह शब्द किसी गुण या दोष से युक्त शब्द होता है।


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उपसर्ग और प्रत्यय की परिभाषाएं। (हिंदी व्याकरण)

दिए गए उपसर्ग से दो-दो शब्द बनाइए- (क) पुनर् (ख) हर (ग) सम् (घ) कु (च) अ (छ) बिन (ज) प (ङ) स्व

‘प्रत्युत्तर’ शब्द में से मूल शब्द व उपसर्ग अलग-अलग करें।

किसी ‘ऐतिहासिक स्थल’ के बारे में दो छात्रों के बीच संवाद लिखिए।

संवाद लेखन

ऐतिहासिक स्थल के बारे दो छात्रों अमन और जतिन के बीच संवाद

अमन ⦂ जतिन, जानते हो कल मैं दिल्ली के लाल किला घूमने गया था।

जतिन ⦂ वह लाल किला! वह तो बहुत प्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारत है। तुम्हें घूम कर बहुत मजा आ गया होगा।

अमन ⦂ हाँ सच में, मुझे लाल किला घूम कर बहुत मजा आया। लाल किला बहुत बड़ा है। पूरा दिन घूमते रहे।

जतिन ⦂ तुम्हें पता है कि लाल किला किसने बनवाया।

अमन ⦂ हाँ पता है, लाल किला मुगल बादशाह शाहजहां ने बनवाया था, जिसने आगरा का ताजमहल भी बनवाया था।

जतिन ⦂ सही कह रहे हो तुम। लाल किला बलुआ पत्थरों द्वारा लाल रंग के बलुआ पत्थरों द्वारा निर्मित है इसी कारण इसे लाल किला कहा जाता है क्योंकि यह लाल पत्थरों द्वारा बना हुआ है।

अमन ⦂ ये हमारे देश की ऐतिहासिक इमारत है। हर साल 15 अगस्त को हमारे देश के प्रधानमंत्री किसी लाल किले की प्राचीर से पूरे देश को संबोधित करते हैं। लाल किला दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारत है और और जो दिल्ली घूमने आता है वह लाल किला अवश्य घूमने जाता है।

जतिन ⦂ बिल्कुल सही कह रहे हो। लाल किला बेहद महत्वपूर्ण इमारत है। लाल किला के मैदान में कई तरह के कार्यक्रम होते रहते हैं। दशहरा के दिन यहाँ पर बड़े विशाल स्तर पर रामलीला का मंचन किया जाता है।

अमन ⦂ क्या तुम कभी लाल किला घूमने गए हो?

जतिन ⦂ हाँ मैं लाल किला घूमने जा चुका हूँ। मैं लाल किला के अलावा लाल किला के सामने स्थित चांदनी चौक, शीशगंज गुरुद्वारा, रघुनाथ मंदिर, जैन मंदिर, मोती मस्जिद जैसे अन्य धार्मिक स्थल पर भी घूमने जा चुका हूँ। क्या तुम भी इन सभी जगहों पर घूमे थे?

अमन ⦂ हाँ, मैं यह सभी जगह पर गया था।

जतिन ⦂ फिर तो अच्छी बात है। हम दोनों घूमने जाएंगे और पूरा दिन वहाँ पिकनिक मनाएंगे।

अमन ⦂ ठीक है।


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परीक्षा में आए कठिन प्रश्न-पत्र के बारे में दो मित्रों के बीच संवाद लिखिए।

कठिन रास्ते की बात सुनकर भी जवाहरलाल सफ़र के लिए तैयार क्यों हो गए?

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कठिन रास्ते होने की बात सुनकर भी जवाहरलाल सफर के लिए तैयार इसलिए हो गए, क्योंकि वह अमरनाथ की गुफा के को देखने के लिए उत्सुक थे। जोजिला पास से आगे निकल कर जब जवाहरलाल मातायन पहुंचे तो उनके साथ चल रहे नवयुवक कुली ने उन्हें बताया कि आगे अमरनाथ की गुफा है, लेकिन रास्ता बहुत ही कठिन है। तब जवाहरलाल ने अपने चचेरे भाई यो दृष्टि डाली जो कि उनके साथ कश्मीर घूमने के लिए आये थे। वह अमरनाथ की गुफा देखना चाहते थे। उन्हें रास्ते की मुश्किलों के बारे में पता था लेकिन फिर भी वह आगे जाने के लिए तैयार हो गए क्योंकि वे कठिनता से नही घबराते थे। उन्हें अमरनाथ गुफा का दर्शन भी करना था।

‘चुनौती हिमालय की’ नामक पाठ जो कि सुरेखा पणंदीकर द्वारा लिखा गया है, उसमें जवाहरलाल नेहरू की कश्मीर यात्रा के बारे में वर्णन किया गया है, जिसमें वह अपने चचेरे भाई के साथ कश्मीर घूमने निकले थे और अमरनाथ गुफा जाते समय रास्ते में खाई में गिरते गिरते बचे। आगे का रास्ता बेहद कठिन होने के कारण वह अमरनाथ की गुफा नहीं पहुंच पाए और उन्हें आधे रास्ते से ही वापस आना पड़ा।


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जीवन में अंधविश्वास मनुष्य को हानि ही पहुँचाता है। ईश्वर पर विश्वास करना सही है क्योंकि वह मनुष्य को धर्म के प्रति जागरूक करता है तथा सही और गलत की पहचान करने की क्षमता प्रदान करता है। धर्म के ठेकेदार अंधविश्वास का सहारा लेकर मनुष्य की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर अपनी स्वार्थ सिद्धि करते हैं। गाँव में ठाकुरबारी के विकास का कारण बताते हुए ठाकुरबारी की आड़ में महंत के इरादों का पर्दाफाश कीजिए​।

आशय स्पष्ट कीजिये- भाई-भाई मिल रहें सदा ही टूटे कभी न नाता, जय-जय भारत माता।

गुड़हल के पुष्प को अम्लीय विलयन में रखने पर विलयन किस रंग में बदल जाएगा (a) हरा (b) गुलाबी (d) पीला (c) रंगहीन?

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सही विकल्प :

(b) गुलाबी

स्पष्टीकरण :

गुड़हल के पुष्प को अम्लीय विलयन में रखने पर विलयन का रंग गहरे गुलाबी रंग का हो जाएगा यानी जब गुड़हल के फूल को किसी अम्लीय विलयन में डालते हैं तो उस विलयन का रंग गुलाबी रंग में बदल जाएगा।

गुड़हल का पुष्प एक प्राकृतिक सूचक होता है जो अम्लीय विलयन का रंग गहरे गुलाबी रंग में कर देता है। यदि गुड़हल के पुष्प को किसी क्षारीय विलयन में डाला जाएगा तो उस विलयन का रंग हरा हो जाएगा। गुड़हल का पुष्प लाल रंग का होता है लेकिन यह अम्लीय विलयन को गहरा गुलाबी तथा क्षारीय विलयन को हरे रंग का कर देता है।

गुड़हल के फूल में प्राकृतिक सूचक (natural indicator) होता है जिसे एंथोसायनिन कहते हैं। एंथोसायनिन एक रंगद्रव्य है जो अम्ल-क्षार सूचक का काम करता है। जब इसे अम्लीय माध्यम में रखा जाता है, तो यह गुलाबी रंग में बदल जाता है।

क्षारीय माध्यम में यह हरे रंग में बदल जाता है। न्यूट्रल यानि उदासीन माध्यम में यह बैंगनी रंग का होता है।

अतः गुड़हल के पुष्प को अम्लीय विलयन में रखने पर विलयन का रंग गुलाबी हो जाएगा।


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जी हाँ, यह बिल्कुल सही है। ईश्वर के प्रति विश्वास करना उचित है, क्योंकि ईश्वर के प्रति विश्वास ही मनुष्य को धर्म के प्रति जागरूक करता है और सही तथा गलत की पहचान करना सिखाता है। लेकिन ईश्वर के प्रति विश्वास अंधविश्वास बन जाए और हम बेकार के आडंबर और पाखंड को अपनाने लगते हैं तथा धर्म के ठेकेदारों के जाल में फंस जाते हैं तब उचित नहीं होता।

धर्म के कुछ स्वार्थी ठेकेदार हमारी आस्था का गलत फायदा उठा अपने स्वार्थ की सिद्धि करते हैं। इसीलिए हमें अंधविश्वास एवं ईश्वर के प्रति विश्वास में भेद करना सीखना होगा। था। ‘हरिहर काका’ कहानी में ठाकुरबारी के महंत भी इसी प्रकार के धर्म के ठेकेदार थे। जो वास्तव में धर्म का पालन करना नहीं जानते थे। ठाकुरबारी के महंत जरूर बन गए थे, लेकिन वह वास्तव में धर्म के रक्षक नहीं थे बल्कि वह धर्म के भक्षक थे, जो धर्म के नाम पर भोले वाले ग्रामीणों का शोषण कर रहे थे और अपने स्वार्थ की सिद्धि कर रहे थे।

ठाकुरबारी का महंत यदि वास्तव में धर्म का सही पालन करने वाला होता तो वह हरिहर काका की जमीन को हथियाने का सोचता ही नहीं। लेकिन वो वास्तव में धर्म का सही पालन करने वाला व्यक्ति नहीं थी बल्कि धर्म की आड़ में एक सामान्य लालची एवं बेईमान व्यक्ति था जो दूसरों की संपत्ति अधिक से अधिक संपत्ति हथियाने के प्रयास में रहता था। हरिहर काका उसके आचरण को पहचान गए थे, इसीलिए उसके बहकावे में नहीं आए। हमें धर्म के ठेकेदारों से सावधान रहने की आवश्यकता है।


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आशय स्पष्ट कीजिये- भाई-भाई मिल रहें सदा ही टूटे कभी न नाता, जय-जय भारत माता।

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भाई-भाई मिल रहें सदा ही टूटे कभी न नाता, जय-जय भारत माता

इन पंक्तियों का आशय इस प्रकार हैं…

आशय : कवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता ‘जय-जय भारत माता’ की पंक्तियों का आशय यह है कि भारत के सभी नागरिक भाईचारे की भावना से रहे। यहाँ पर जो भी अलग-अलग धर्मों जातियों से संबंधित लोग हैं, वह भाई-भाई भाई बनकर रहें। भाईचारे की भावना से रहें और भारत की प्रगति में अपना योगदान दें। भाईचारे का ये नाता कभी ना टूटे। कविता की पूरी पंक्तियां इस प्रकार हैं..

कमल खिले तेरे पानी में धरती पर हैं आम फले,
इस धानी आँचल में देखो कितने सुंदर भाव पले,
भाई-भाई मिल रहें सदा ही टूटे कभी न नाता,
जय-जय भारत माता। जय-जय भारत माता।

भावार्थ : कवि कहते हैं, हे भारत माता! तुम्हारे भूभाग रूप सरोवर जो कमल खेले हैं, अर्थात भारत में रहने वाले जो निवासी सभी कमल के समान है। वे सब मिलजुल कर भाईचारे की भावना से रहें। भारत माता के धानी आंचल में पलने वाले निवासी भाईचारे की भावना से रहें ये भाईचारा कभी न टूटे।


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आप के गाँव मे ग्रामपंचायत द्वारा ‘स्वच्छ ग्राम सुंदर ग्राम’ यह अभियान सफलतापूर्वक पूरा किया गया, इसलिए आप के गाँव के सरपंच जी को धन्यवाद देते हुए पत्र लिखिए।

औपचारिक पत्र

सरपंच जी को धन्यवाद पत्र

मुकेश कुमार एवम् समस्त गांववासी
ग्राम – गुग्लेहड़,
ऊना, हिमाचल प्रदेश,

दिनांक : 12 जून 2024

सेवा में,
ग्राम प्रधान,
गाँव एवं डाक घर गुग्लेहड़,
जिला ऊना, हिमाचल प्रदेश ।

विषय: सरपंच जी को धन्यवाद पत्र

आदरणीय सरपंच जी,
मैं आपके गाँव गुग्लेहड़ का स्थानीय निवासी हूँ और गाँव के विकास के लिए हो रही विभिन्न गतिविधियों पर मेरी सदा नज़र रहती है और मैं इस पत्र के माध्यम से आपके द्वारा पिछले तीन साल में किए गए विकास के कार्यों के लिए आपकी भूरी-भूरी प्रशंसा करता हूँ और आपकी कर्तव्य निष्ठा का सम्मान करता हूँ।

पिछले सप्ताह केंद्र सरकार के “स्वच्छ ग्राम सुंदर ग्राम” स्कीम के तहत आपने सफाई अभियान चलाया था और मुझे खुशी है कि हमारे गाँव सभी युवाओं और अन्य नागरिकों ने इस अभियान को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और इस कारण गाँव में हर जगह अब साफ सूत्र हो गया है ।
मुझे यह देखकर भी खुशी हुई कि इस अभियान के तहत गाँव की गउशालाओं में भी सफाई की गयी जोकि सच में एक सराहनीय कदम है । हमारे गाँव का पानी का कुआँ भी सालों से घास और कूड़े से भरा था लेकिन आज वह कुआँ भी बिलकुल साफ हो गया है ।

आज तक गाँव में कई सरपंच बनाए गए लेकिन किसी ने भी ऐसी किसी योजना का लाभ गाँव तक नहीं पहुंचाया लेकिन आप के इस कदम ने हमारे गाँव को अलग श्रेणी में ला कर खड़ा कर दिया है । मैं इस पत्र के माध्यम से एक बार फिर सारे गाँव वासियों की तरफ से आपका धन्यवाद करता हूँ और आशा करता हूँ आप अपना कार्य इसी निष्ठा से करते रहेंगे और आगे भी ऐसे कार्यक्रम हमारे गाँव में चलते रहेंगे ।

धन्यवाद सहित !

भवदीय,
मुकेश कुमार एवम् समस्त गांववासी
ग्राम – गुग्लेहड़,
ऊना, हिमाचल प्रदेश ।

 

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विष भरे कनक घटों की संसार में कमी नहीं है। आशय स्पष्ट कीजिए।

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विष भरे कनक घटों की संसार में कमी नहीं है।

आशय : इस पंक्ति का आशय यह है कि विषभरे कनक घट अर्थात जहर से भरे सोने के घड़े इस संसार में हर जगह मिल जाएंगे। यहाँ पर कहने का तात्पर्य यह है कि संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो रंग रूप की दृष्टि से तो बेहद सुंदर दिखाई देते हैं लेकिन उनके विचार बेहद मलिन होते हैं।

उनकी सोच बहुत गंदी होती है। वह विचारों से दूषित होते हैं। बाहरी रूप से तो वह देखने में बेहद सुंदर और आकर्षक दिखाई देंगे, लेकिन उनका मन इतना सुंदर नहीं होगा। उनका मन गंदे विचारों से दूषित होगा, उनके मन में छल कपट होगा, ईर्ष्या होगी, बेईमानी होगी, लालच होगा। इसीलिए इस तरह के मनुष्यों की संसार में कमी नहीं है, जो ईश्वर के एक कनक घट के समान है अर्थात ऐसे सोने के घड़े के समान है, जिसके अंदर जहर भरा हुआ है।


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आशय कीजिए- यह वह समय है जब बच्चा मनाता होगा कि काश! उसके पिता अनपढ़ होते ।

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अभिराम और अविराम में अंतर कीजिए।

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अभिराम और अविराम शब्द में अंतर इस प्रकार है…

अभिराम का अर्थ होता है, सुंदर, दर्शनीय, देखने योग्य जबकि अविराम का अर्थ होता है, बिना रुके चलने वाला, अनवरत, लगातार।

अविराम के पर्यायवाची शब्द इस प्रकार हैं…

अविराम : अविराम, निरंतर, लगातार अनवरत अविश्रांत, बिना रुके।

अभिराम के पर्यायवाची शब्द इस प्रकार हैं…

अभिराम : सुंदर, सुखद, प्रिय, मनोहर, आनंददायक, दर्शनीय, नयनाभिराम आदि।

अविराम और अभिराम श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्दों के अंतर्गत आते हैं।

श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द वे शब्द होते हैं, जो उच्चारण की दृष्टि से समान प्रतीत होते हैं। और यदि उनके उच्चारण पर अधिक गौर नहीं किया जाए तो वह शब्द सुनने में एक से लगते हैं।

उच्चारण की दृष्टि से लगभग समान ध्वनि देने वाले इन शब्दों का अलग-अलग अर्थ होता है। श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द के सभी अक्षर एक समान नहीं होते। यदि गौर से सुना जाए तो इन शब्दों के उच्चारण में थोड़ी भिन्नता होती है।


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‘वे सुंदर मकानों में रहते हैं।’ इस वाक्य को ‘अपूर्ण वर्तमानकाल’ में बदले।

वह उसकी ओर देखती है। इस वाक्य को ‘अपूर्ण भूतकाल’ में बदलें।

अपने दादा-दादी, नाना-नानी, वृद्ध परिजन या किसी पड़ोसी का साक्षात्कार करते हुए उनके विद्यालय की शिक्षा नीति तथा आज की शिक्षा नीति के अंतर को लिखिए​।

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अपने दादा-दादी, नाना-नानी, वृद्ध परिजन तथा पड़ोसी के साथ साक्षात्कार करके हमने उनके समय की शिक्षा नीति तथा आज के समय की शिक्षा नीति के बारे में जाना और हमें निम्नलिखित अंतर प्राप्त हुए…

पुराने समय की शिक्षा

हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, पड़ोसी आदि बताते हैं कि उनके समय में शिक्षा-नीति बिल्कुल सामान्य थी। उनके समय में शिक्षा प्राप्त करने कि इतनी अनिवार्यता नहीं थी और ना ही शिक्षा के प्रति इतनी अधिक जागरूकता थी।

लड़कियों के लिए तो शिक्षा प्राप्त करना आसान नही था।

दादा-दादी, नाना-नानी बताते हैं कि उनके समय में अधिकतर लड़के ही शिक्षा प्राप्त करते थे। लड़कियां केवल कुछ कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त करती थीं। फिर उन्हें घर बैठा दिया जाता था और उनकी शादी कर दी जाती थी।

शिक्षा के संबंध में इतनी अधिक सुविधाएं नहीं प्राप्त थीं। और ना ही शिक्षा के इतने अधिक विकल्प थे। जो माँ-बाप अपने बच्चों को पढ़ाते थे वह केवल अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनाने की ही आकांक्षा पालते थे।

वर्तमान शिक्षा

वर्तमान समय में समाज की शिक्षा नीति देखते हैं तो हम पाते हैं कि आज बालक हो या बालिका दोनों के लिए शिक्षा अनिवार्य है और लड़कों के समान लड़कियां भी भरपूर शिक्षा प्राप्त कर रही हैं।

यह सब नई शिक्षा नीति के परिणाम स्वरूप हुआ है, जिसमें शिक्षा का समावेशी स्वरूप विकसित किया गया है और सभी के लिए शिक्षा अनिवार्य कर दी गई है।

समाज के सभी वर्ग आसानी से शिक्षा प्राप्त कर सकें ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं, इसी कारण समाज के वंचित, शोषित व कमजोर वर्ग के छात्र-छात्राएँ भी शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं, जबकि पुरानी शिक्षा नीति में ऐसा नहीं हो पा रहा था।


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किसी एक राजकीय नेता का साक्षात्कार लेने के लिए एक प्रश्नावली तैयार कीजिए?

किसी खिलाड़ी का साक्षात्कार लिखें।

अनुच्छेद लिखिए ‘बातें कम, काम ज्यादा’

अनुच्छेद

बातें कम काम ज्यादा

 

जीवन में हमें बाते कम करनी चाहिए और काम ज्यादा करना चाहिए । जो मनुष्य जीवन में बड़ी-बड़ी बाते करता है, और काम कुछ भी नहीं करता वह जीवन में कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है। जो मनुष्य बाते कम करता और अपनी सफलता पाने के लिए चुपचाप मेहनत करता है वह हमेशा जीवन में सफलता प्राप्त करता है।  मनुष्य को सफलता प्राप्त करने के लिए बात कम करनी चाहिए और काम ज्यादा करना चाहिए।

बातें कम करने से हम अपने काम को ज्यादा समय दे पाते है, इसलिए हमें हमेशा काम पर ध्यान देना चाहिए। ऐसा अक्सर देखने में  आया है, को जो लोग अपने जीवन में कुछ नहीं कर पाते वह अक्सर बातें बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन उन बातों को वास्तविक कर्म के रूप में नहीं बदल बाते। इसके विपरीत जो वास्तव में कुछ करना चाहते है, वे बोलकर नहीं बल्कि कुछ करके दिखातें है। उनका मुँह नहीं उनका काम बोलता है।


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फौजी की माँ पर अनुच्छेद लिखें।

अपने माता-पिता के साथ बिताए सुखद पलों के अनुभवों को अनुच्छेद के रूप में लिखिए।

अधिसूचना किसे कहते हैं? एक अधिसूचना का उचित प्रारूप भी बनाइए।

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अधिसूचना : अधिसूचना से तात्पर्य उन सरकारी राजपत्रित अधिकारी की नियुक्ति संबंधी अथवा पदोन्नति संबंधित. अवकाश प्राप्ति संबंधित. अधिकारियों के त्यागपत्र संबंधित अथवा किसी भी नए सरकारी नियम से संबंधित या नियम परिवर्तन से संबंधित सरकारी आदेशों व आज्ञा से संबंधित घोषणाओं से होता है, जो विभिन्न सरकारी विभागों को सरकार की तरफ से या किसी बड़े सरकारी संस्थान या मंत्रालय की तरफ से जारी की जाती है।

अधिसूचनाएं किसी भी व्यक्ति विशेष या विषय विशेष से संबंधित हो सकती हैं, लेकिन यह सामान्य जनता को सारकारी कार्यकलापों की जानकारी प्रदान करने के लिए जारी की जाती हैं। अधिसूचना को सरकारी राजपत्र में प्रकाशित करना अनिवार्य होता है, ताकि सामान्य जनता को इसके बारे में जानकारी मिल सके। अधिसूचना अन्य पुरुष शैली में लिखी जाती हैं।

एक अधिसूचना का प्रारूप

खेल मंत्रालय भारत सरकार
क्रमांक : 1293/06/2024

दिनांक : 21 जून 2024

सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि वर्तमान समय में अनेक पहलवान खिलाड़ियों द्वारा जारी धरना व अनशन से संबंधित विवाद के कारण खेल मंत्रालय ने त्वरित कदम उठाने का निर्णय लिया है। खिलाड़ियों की मांग को ध्यान में रखते हुए कुश्ती महासंघ के समस्त मुख्य पदाधिकारियों को जांच पूरी होने तक निलंबित रखने का निर्णय लिया है।

जांच पूरी होने के बाद भी महासंघ के पदों के संबंध में आगे की कार्यवाही की जाएगी। खिलाड़ियों ने इस संबंध में आश्वासन मिलने के बाद अपना धरना समाप्त करने का निर्णय लिया है।

खेल मंत्री के आदेशानुसार,
सचिव, खेल मंत्रालय,
भारत सरकार

प्रतिलिपि प्रेषित : 1. अध्यक्ष, कुश्ती महासंघ. दिल्ली। 2. भारतीय ओलंपिक समिति, दिल्ली।


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आपका मोबाइल विद्यालय परिसर में कहीं खो गया है। इस संबंध में विद्यालय के सूचना पट्ट पर मोबाइल की विस्तृत जानकारी देते हुए एक सूचना तैयार कीजिए।

विद्यालय द्वारा आयोजित स्काउट/गाइड कैंप हेतु विद्यार्थियों को प्रधानाचार्य की ओर से निमंत्रित करते हुए सूचना लिखिए l

1. नई नारी निर्भीक क्यों है?​ 2. नई नारी को क्या स्वीकार नहीं है?​ 3. नई नारी किसका अध्ययन करेंगी ?​ 4. नई नारी किसको देवतुल्य बनाना चाहती हैं? 5. कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने नई नारी में किन-किन गुणों की कल्पना की है?

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1. नई नारी निर्भीक क्यों है?​

उत्तर : नई नारी निर्भीक इसलिये है क्योंकि उसने विद्या और ज्ञान का अर्जन किया है। विद्या और ज्ञान के अर्जन अर्थात विद्या और ज्ञान को प्राप्त करने के कारण नई नारी निर्भीक है।

2. नई नारी को क्या स्वीकार नहीं है?​

उत्तर : नारी को यह स्वीकार नहीं है कि यह समाज अज्ञानता के अंधकार में भटके और पतन की ओर जाए।

3. नई नारी किसका ध्यान रखेगी?

उत्तर : नई नारी हर उस मानवीय गतिविधि का ध्यान रखेगी जो समाज के हित में हो।

4. नई नारी किसका अध्ययन करेंगी ?​

उत्तर : नई नारी विविध प्रकार के शास्त्रों का अध्ययन करेगी ताकि वह शिक्षित और ज्ञानी बनकर समाज को एक नई दिशा दे सके।

5. नई नारी किसको देवतुल्य बनाना चाहती हैं?

उत्तर : नई नारी समाज के सभी मनुष्यों को देवतुल्य बनाना चाहती है ताकि एक आदर्श समाज का निर्माण हो सके।

6. कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने नई नारी में किन-किन गुणों की कल्पना की है?

उत्तर : ‘नई नारी’ कविता में सुब्रह्मण्यम भारती ने नई नारी के अनेक गुणों की कल्पना की है। उन्होंने नई नारी को ज्ञान संपदा से परिपूर्म, सुसंस्कृत, सहनशील और सुसभ्य और जड़वत् परंपराओं का विरोधी बताया है।

कवि कहते हैं कि नई नारी शिक्षित है, वह ज्ञानी है। वह विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन करती है और अपने ज्ञान की शक्ति पर पुराने अंधविश्वासों और मिथकों तथा रुढ़ियों को तोड़ती है। वह सभ्य व सुसंस्कृत है। आदर्श समाज का निर्माण करना चाहती है। इसी कारण वह प्रशंसा की पात्र है।


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यदि आज हमारे पास मुद्रा का वर्तमान स्वरूप न होता तो हमें किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता?

फौजी की माँ पर अनुच्छेद लिखें।

अनुच्छेद

फौजी की माँ

 

फौजी की माँ दुनिया की सबसे शक्तिशाली माँ होती है । वह अपने बच्चे को बचपन से मजबूत बनाती है। फौजी की माँ का दिल बहुत हिम्मत वाला होता है। वह दुनिया में किसी से नहीं डरती है । वह सब को हिम्मत देती है । उसका दिल बहुत बड़ा होता है, वह अपने पति और अपने बच्चों के बिना अकेली रह लेती है । वह इतनी हिम्मत वाली होती है कि वह अपने देश के प्रति कर्तव्य को समझती है । वह उस हर पल की खबर के लिए हमेशा तैयार रहती है कि उसे कब क्या खबर सुनने मिलेगी।

फौजी की माँ जानती है कि उसका बेटा देश की सेवा के लिए देश की सीमा पर गया है। फौजी माँ देश की रक्षा के लिए अपने बेटे को समर्पित कर देती है, और अपने बेटे के बलिदान के लिए भी तैयार होती है। कोई भी माँ अपने संतान को अपने से दूर नहीं करना चाहती। कोई भी माँ हमेशा चाहती है कि उसकी संतान उसके पास और सुरक्षित रहे। वह देश की सीमा पर देश की रक्षा करते हुए दुश्मनों से जूझते समय उसके बेटे की जान भी जा सकती है, ये सब जानते हुए भी फौजी की माँ हमेशा इन सारी स्थितियों के लिए तैयार रहती है, वह कभी निराश नहीं होती है । उसे पता होता है, कि उसका बेटा देश के प्रति अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाएगा।

फौजी की माँ सबसे हिम्मत वाली और बड़े दिल वाली होती है। अपने बेटे को देश की सेवा के लिए न्योछावर कर देने के लिए बड़ा कलेजा चाहिए होता है, जो एक फौजी की माँ के पास होता है।


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‘पराक्रम’ में कौन सा समास हैं? ‘पराक्रम’ का समास विग्रह कीजिए।

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पराक्रम का समास विग्रह इस प्रकार होगा…

पराक्रम : परम है जो कर्म
समास भेद : कर्मधारण्य समास होता है ।

स्पष्टीकरण

‘पराक्रम’ मे ‘कर्मधारण्य समास’ इसलिए होगा क्योंकि इस समास में पहला पद एक विशेषण की तरह कार्य कर रहा है तथा दूसरा पद पहले पद का विशेष्य है। पहला पद ‘परम’ है जो ‘कर्म’ पद के लिए एक विशेषण का कार्य कर रहा है।

पराक्रम का अर्थ

पराक्रम शब्द वीरता से संबंधित शब्द है। ये शब्द वीरता का गुणगान करने के लिए किया जाता है। केवल वीरता ही नहीं बल्कि जब कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र में अपना विशिष्टता सिद्ध करता है, और अपने कार्य को करने में अभूतपूर्व प्रदर्शन करता है तो उसे पराक्रमी कहा जाता है। अपने कार्य में अपनी सर्वश्रेष्ठता देना ही पराक्रम है।

जैसे
भारतीय सैनिक चीन के सैनिकों के साथ युद्ध में बेहद पराक्रम से लड़े।
महाराणा प्रताप बेहद पराक्रमी राजा थे।

कर्मधारण्य समास

कर्मधारय समास की परिभाषा के अनुसार कर्मधारय समास में पहला पद एक विशेषण का कार्य करता है तथा दूसरा पद उसका विशेष्य होता है। कर्मधारय समास में पहला पद उपमान तथा दूसरा पर विशेष्य का कार्य करता है।

जैसे

  • विश्वव्यापी : विश्व में व्याप्त है जो
  • नीलांबर : नीला है जो अंबर

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खराब जीवन शैली से आपके मित्र का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।संयमित और स्वस्थ जीवनशैली का महत्व बताते हुए मित्र को पत्र लिखिए।​

अनौपचारिक पत्र

संयमित और स्वस्थ जीवनशैली का महत्व बताते हुए मित्र को पत्र

दिनाँक : 21 जून 2024

 

प्रिय मित्र मुकेश,
कैसे ?

मुझे पता चला है कि पिछले कुछ दिनों से तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इस कारण मैं बेहद चिंतित हूँ। मैं ईश्वर से तुम्हारे शीघ्र ही स्वस्थ हो जाने की प्रार्थना करता हूँ। तुम्हारे अस्वस्थ होने का कारण मुझे समझ में आ गया है। मैंने अक्सर तुम्हारी जीवन शैली पर गौर किया है। तुम्हारी जीवन शैली और खानपान अनियमित और असंयमित गए हैं, जिस कारण तुम्हारा स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।

मैं जब भी तुमसे मिलने आता हूँ, तुम अपने कमरे में बंद मोबाइल पर ही बिजी रहते हो और या फिर कंप्यूटर के आगे गेम आदि खेलते हुए पाए जाते हो। तुम लगातार जंक फूड खाते रहती हो। तुम्हारी माँ बता रहीं थीं कि तुम घर के खाने को इग्नोर करने लगे हो। तुम आजकल बाहर का फास्ट फूड बहुत खाने लगे हो। तुम कम्प्यूटर या मोबाइल पर काम करते समय चिप्स जैसी चीज बहुत अधिक खाने लगे हो, यह सारे अपौष्टिक आहार तुम्हारी स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं।

दिनभर कंप्यूटर के आगे बैठे रहने अपना मोबाइल से चिपके रहने से तुम्हारी शारीरिक गतिविधि बेहद कम हो गई है, इस कारण तुम अस्वस्थ रहने लगे हो। तुम्हारी ये असयंमित और अव्यवस्थित जीवन शैली तुम्हारे स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।

आज योग दिवस है और मैं चाहता हूँ। तुम योग दिवस पर अपने बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर जीवनशैली को अपनाने का प्रण लो और आज से ही इसमें जुट जाओ। अपने स्वास्थ्य को अच्छा करने के लिए आवश्यक है तुम अपने जीवन शैली को सुधारो अपनी खान-पान की आदतों को सुधारो। तुम बाहर का खाना और फास्ट फूड खाना बिल्कुल ही बंद कर दो और घर पर बने खाने पर ही ध्यान दो। तुम अपने खाने में पौष्टिक आहार को अधिक सम्मिलित करो तथा तेल मसाले जैसे पदार्थों से परहेज करो।

इसके अलावा योग-व्यायाम को अपने जीवन की नियमित दिनचर्या बना लो। यदि तुम रोजसुबह उठकर योग और व्यायाम करोगे तो धीरे-धीरे ये सब प्रयास करने से तुम्हारे स्वास्थ्य में सुधार आता रहेगा। तुम अपने जीवन शैली को व्यवस्थित करके तथा संयम का पालन करके अपने जीवन को संवार सकते हो और अपने स्वास्थ्य को एक नई दिशा दे सकते हो।

आशा है कि स्वास्थ्य संबंधी मेरे सुझावों पर तुम अमल करते हुए इसका लाभ उठाने का प्रयत्न करोगे

तुम्हारा मित्र
शैलेश


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सौर ऊर्जा क्या है? सौर ऊर्जा के क्या-क्या उपयोग है? बिजली की तुलना में सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाए तो उसके क्या लाभ हैं?

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सौर ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है। यह एक नवीकरणीय और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है। सूर्य के प्रकाश से जो ऊर्जा प्राप्त होती है, वही सौर ऊर्जा कहलाती है।

सौर ऊर्जा से वास्तविक रूप में ऊर्जा सीधे सूर्य किरणो से नही प्राप्त होती बल्कि सौर ऊर्जा को विशेष प्रकार के सौर पैनलों द्वारा ऊर्जा के रूप में संग्रहित किया जाता है।

सौर ऊर्जा के प्रमुख उपयोग

  • बिजली उत्पादन : सौर ऊर्जा बिजली उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर प्रयोग में लाई जाती है।
  • घरेलू कार्य करना : सौर ऊर्जा की सहायता से अनेक घरेलू कार्य सम्पन्न किए जाते हैं, जैसे गर्म पानी तैयार करना, घरों और भवनों को गर्म रखना आदि।
  • कृषि में सिंचाई : सौर ऊर्जा की सहायता से कृषि सिंचाई की जा सकती है। इसकी सहायता से पंपों को चलाया जाता है जो पानी को जमीन अथवा नदी,  तालाब आदि से खींचते हैं।
  • भोजन तैयार करना : आजकल सौर ऊर्जा द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले की बर्तन प्रचलित है, जैसे सौर कुकर आदि जिनके माध्यम से खाना पकाया जा सकता है। सौर चूल्हा का भी उपयोग भी भोजन पकाने में चूल्हे की तरह किया जाता है।
  • ईधन के रूप में : सौर ऊर्जा से चलने वाले कई वाहन बन चुके है। ऐसे वाहनों में सौर ऊर्जा ईधन के रूप में कार्य करती है।

सौर ऊर्जा कार्य प्रणाली

  • सौर पैनल सूर्य के प्रकाश को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं।
  • यह प्रक्रिया फोटोवोल्टिक प्रभाव पर आधारित है।
  • सिलिकॉन सेल्स सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करके इलेक्ट्रॉन्स को मुक्त करते हैं, जिससे विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है।

सौर ऊर्जा प्रणालियों के प्रकार

  • ऑन-ग्रिड : घर या व्यवसाय को मुख्य बिजली ग्रिड से जोड़ा जाता है।
  • ऑफ-ग्रिड : बैटरी स्टोरेज के साथ स्वतंत्र प्रणाली।
  • हाइब्रिड : ग्रिड कनेक्शन और बैटरी स्टोरेज दोनों का उपयोग।

पारंपरिक बिजली की तुलना में सौर ऊर्जा का उपयोग करने के लाभ

  • पर्यावरण अनुकूल : सौर ऊर्जा का उपयोग पारंपरिक बिजली की तुलना में कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करता है। सबसे पहले, यह पर्यावरण के लिए बेहद अनुकूल है। सौर ऊर्जा का उत्पादन कार्बन उत्सर्जन, वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण को काफी कम करता है, जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करता है।
  • नवीकरणीय स्रोत : सौर ऊर्जा एक नवीकरणीय स्रोत है, जो कभी समाप्त नहीं होता। यह जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करता है, जो सीमित हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। लंबे समय में, सौर ऊर्जा आर्थिक रूप से भी लाभदायक है। हालांकि प्रारंभिक निवेश अधिक हो सकता है, लेकिन समय के साथ बिजली के बिल कम हो जाते हैं, और कुछ मामलों में, अतिरिक्त बिजली बेचकर आय भी अर्जित की जा सकती है।
  • आर्थिक लाभ : यदि दीर्घकालिक अवधि में सौर ऊर्जा के प्लांट लगाकर उनका उपयोग किया जाए तो यह बेहद कम लागत लेती है। इसी कारण आर्थिक रूप से सौर ऊर्जा कम लागत वाली ऊर्जा है, जिससे पैसे की काफी बचत होती है।
  • ऊर्जा स्वतंत्रता : सौर ऊर्जा ऊर्जा स्वतंत्रता प्रदान करती है, जो विदेशी तेल पर निर्भरता को कम करती है और स्थानीय ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देती है।
  • कम रखरखाव : सौर ऊर्जा के उपयोग करने के लिए सौर प्रणाली जिन उपकरणों का उपयोग किया जाता है, उनके रखरखाव की आवश्यकता कम होती है, क्योंकि इनमें चलते पुर्जों की संख्या कम होती है और उपकरणों की आयु लंबी होती है।
  • ग्रामीण विद्युतीकरण : ग्रामीण क्षेत्रों में, सौर ऊर्जा विद्युतीकरण का एक प्रभावी साधन है। यह दूरदराज के क्षेत्रों में बिजली पहुंचाने का एक किफायती तरीका प्रदान करता है, जहां पारंपरिक ग्रिड का विस्तार करना मुश्किल या महंगा हो सकता है।
  • रोजगार सृजन : सौर उद्योग नए रोजगार के अवसर पैदा करता है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा : सौर ऊर्जा ऊर्जा सुरक्षा में भी योगदान देती है। यह बिजली की कमी से बचाव करती है और मुख्य ग्रिड पर दबाव कम करती है।
    मूल्य स्थिरता: सौर ऊर्जा की कीमतें अधिक स्थिर होती हैं, क्योंकि ये ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होतीं।
  • ध्वनि प्रदूषण में कमी : सौर ऊर्जा संयंत्र शांति से काम करते हैं, जो शोर प्रदूषण को कम करता है। वे पानी का भी संरक्षण करते हैं, क्योंकि पारंपरिक बिजली संयंत्रों की तुलना में उन्हें बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है।

ये सभी कारक मिलकर सौर ऊर्जा को एक आकर्षक और टिकाऊ विकल्प बनाते हैं।


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श्वेत कोयला किसे कहा जाता है? भूरा कोयला किसे कहा जाता है?

आपका मोबाइल विद्यालय परिसर में कहीं खो गया है। इस संबंध में विद्यालय के सूचना पट्ट पर मोबाइल की विस्तृत जानकारी देते हुए एक सूचना तैयार कीजिए।

डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल, चंडीगढ़

सूचना

 मोबाइल खो जाने के संबंध में

06 फरवरी 2024

विद्यालय के सभी छात्रों को सूचित किया जाता है कि मैं (रोहित कश्यप) कक्षा बारहवीं (ब) का छात्र हूँ । मेरा मोबाइल फोन आज सुबह विद्यालय परिसर में कहीं खो गया है । यदि आप में से किसी को भी यह फोन मिले तो कृपया इसे विद्यालय कार्यालय में जमा करवाने की कृपा करें। मेरे फोन की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है।

ब्रांड – सैमसंग
मॉडल का नाम – A53
रंग – Electric Black (6GB RAM)

धन्यवाद,

नाम : रोहित कश्यप,
कक्षा : 12-ब
डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल,
चंडीगढ़


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विद्यालय द्वारा आयोजित स्काउट/गाइड कैंप हेतु विद्यार्थियों को प्रधानाचार्य की ओर से निमंत्रित करते हुए सूचना लिखिए l

आप अपने मोहल्ले के अध्यक्ष हैं। अपने मोहल्ले की सफाई सुचारू रूप से करवाने व उसे गंदा न होने देने हेतु मोहल्ले वालों के लिए एक सूचना-पत्र तैयार कीजिए।

आपके जन्मदिन पर आपके मामाजी ने आपको एक सुन्दर उपहार भेजा है। इस उपहार के लिए धन्यवाद देते हुए मामाजी को धन्यवाद पत्र लिखिए।

अनौपचारिक पत्र

मामाजी को धन्यवाद पत्र

 

दिनाँक – 20 जून 2024

प्रणाम मामा जी,
आशा करता हूँ आप ठीक होगे। मामा जी माफ़ी चाहता हूँ कि आपको पत्र लिखने में थोड़ा लेट हो गया। मामाजी, सबसे पहले मैं आपको इतने सुन्दर उपहार के लिए धन्यवाद कहना चाहता हूँ। आपके द्वारा उपहार के रूप में भेजा गया बैग बहुत सुन्दर है। मुझे बहुत पसंद आया। मैं इसे अब स्कूल लेकर जाऊंगा। आप इस बार जन्मदिन में नहीं आ पाए मुझे उस बार दुःख हुआ। आपने पत्र में बताया है कि आपके ऑफिस को आपको छुट्टी नहीं मिल पाई इस कारण आप नहीं आ पाए। चलिए इस बार आप नहीं आ पाए तो कोई बात नहीं लेकिन अगली बार आपको ऐसे उपहार नहीं भेजना है, आपको खुद आना है। आप अपने ऑफिस में पहले से छुट्टी ले लेना।

एक बार फिर आपको हृदय से उपहार के लिए धन्यवाद। आप से जल्दी मिलने आऊंगा। अपना ध्यान रखना। आपको और मामीजी को प्रणाम। छोटी बहन वंशिका को प्यार।

आपका भांजा,
अंकुर


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अपने मामाजी को पत्र लिखकर पिताजी के स्वास्थ्य में सुधार की सूचना दीजिए l

आप पावनी है। आप छुट्टियों में गुजरात घूमने का कार्यक्रम बना रही हैं। सरदार पटेल की प्रतिमा भी देखना चाहती है। आपने जो कार्यक्रम बनाया है, उसमें क्या सुधार हो सकता है। अपने चचेरे भाई को लगभग 100 शब्दो में पत्र लिखिए।

मई महीने में आपके विद्यालय में हुई परीक्षा, इस बात को बताते हुए अपनी बुआजी को पत्र लिखिए।

आप वेणु राजगोपाल हैं। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ दिल्ली के संपादक के नाम एक पत्र लिखकर सामाजिक जीवन में बढ़ रही हिंसा पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

औपचारिक पत्र

सामाजिक जीवन में बढ़ रही हिंसा पर हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक को पत्र

 

दिनाँक – 20 जून 2024

 

सेवा में,
श्रीमान संपादक,
हिंदुस्तान टाइम्स,
नई दिल्ली

संपादक महोदय,

मैं आपके प्रतिष्ठित समाचार पत्र का एक सुधि पाठक हूँ। जब से मैं देश समाज के प्रति जागरूक हुआ हूँ, तब से हिन्दुस्तान की पत्रकारिता से प्रभावित होता रहा हूँ। मैं सामाजिक जीवन में निरंतर बढ़ रही हिंसा पर अपने विचार आपके समाचार पत्र के माध्यम से जनता के समक्ष लाना चाहता हूँ।

दरअसल सामाजिक हिंसा के कई रूप हैं, जिनमें से कुछ घरेलू हिंसा, नस्लवादी और होमोफोबिक हमले, आतंकवादी हमले, अपहरण, हत्याएं या हत्याएं, यौन हमले, बर्बरता, स्कूल या काम उत्पीड़न या किसी अन्य प्रकार की हिंसा हैं। दुनिया हिंसा की लपटों से झुलस रही है। कई तरह की लैंगिक हिंसा भी हमारे आस-पास घटित होती है । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक महिला अपने जन्म से लेकर उम्र के हर पड़ाव में अलग-अलग प्रकार से लैंगिक हिंसा का सामना करती है । जैसे कन्या भ्रूण हत्या, यौन शोषण, एसिड अटैक आदि ।

महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा में किसी महिला को शारीरिक पीड़ा देना जैसे- मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, किसी वस्तु से मारना या किसी अन्य तरीके से महिला को शारीरिक पीड़ा देना, महिला को अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिये विवश करना, बलात्कार करना, दुर्व्यवहार करना आदि । बच्चों के विरुद्ध घरेलू हिंसा । हिंसा का बढ़ता प्रभाव मानवीय चेतना से खिलवाड़ करता है और व्यक्ति स्वयं को निरीह अनुभव करता है । इन स्थितियों में संवेदन हीनता बढ़ जाती है और जिन्दगी सिसकती हुई प्रतीत होती है। विभिन्न तरह की ये सामाजिक हिंसायें हमारे समाज में बढ़ती ही जा रही है।

आपके समाचार पत्र के माध्यम से सामाजिक हिंसा के बारे में विचार पाठकों तो पहुँचेंगे तो अवश्य वह इसका चिंतन करेंगे। आशा है हम सभी जागरूक नागरिक इस विषय में कुछ सोचेंगे।

धन्यवाद सहित

एक पाठक
वेणु राजगोपाल


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प्लास्टिक की चीजों से हो रही हानि के बारे में किसी समाचार-पत्र के संपादक को पत्र लिखकर अपने सुझाव दीजिए।

नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन की जाँच मशीन पर एक यात्री के भूलवश छूटे एक लाख रुपए के बैग को पुलिस ने उसे लौटा दिया। इस समाचार को पढ़ कर जो विचार आपके मन में आते हैं, उन्हें किसी समाचार पत्र के संपादक को पत्र के रूप में लिखिए।

सरकारी कार्यालयों में राजभाषा हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग हो, इस अनुरोध के साथ हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक को पत्र लिखें कि वे इस विषय पर संपादकीय लेख प्रकाशित करें।

“कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गये। हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गये पंकज नये।।”- इस पंक्ति में अलंकार है?

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इस पंक्ति में अलंकार का भेद इस प्रकार है :

काव्य पंक्ति – कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गये। हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गये पंकज नये।।

अलंकार : उत्प्रेक्षा अलंकार

जानें क्यों ?

इस काव्य पंक्ति में उत्प्रेक्षा अलंकार इसलिए है क्योंकि यहां पर ‘उत्तरा के अश्रुपूर्ण नेत्रों’ जोकि उपमेय हैं, में  ‘हिम जल कण युक्त पंकज’ उपमान की संभावना व्यक्त की गई है और ‘मानो’ वाचक शब्द के रूप में प्रयोग किया गया है।

उत्प्रेक्षा अलंकार उस काव्य में प्रकट होता है, जहाँ पर उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त कर दी जाती है।

उत्प्रेक्षा अलंकार क्या है?

‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ की परिभाषा के अनुसार जहाँ पर उपमान के ना होने पर उपमेय में ही उपमान की संभावना मान ली जाए और अर्थात जहाँ पर उपमेय को ही उपमान बनाकर प्रस्तुत कर दिया जाए वहां पर ‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ होता है।

उत्प्रेक्षा अलंकार दो प्रकार का होता है, फलोत्प्रेक्षा अलंकार हेतुप्रेक्षा अलंकार

उत्प्रेक्षा अलंकार का उदाहरण…

ले चला साथ में तुझको कनक, ज्यों भिक्षुक लेकर स्वर्ण।

यहाँ पर कनक उपमेय है, जोकि धतूरे के अर्थ के संदर्भ में प्रयोग किया गया है। ‘ज्यों’ वाचक शब्द के द्वारा कनक (धतूरा) उपमेय को स्वर्ण उपमान रूप में संभावना बनाकर प्रस्तुत कर दिया गया है, इसीलिए यहाँ पर ‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ है।


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मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2) (हल प्रश्नोत्तर)

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मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2)

Manushyata : Maithilisharan Gupta (Class-10 Chapter-3 Hindi Sparsh 2)


मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त

पाठ के बारे में…

इस पाठ में मैथिलीशरण गुप्त की ‘मनुष्यता’ कविता को प्रस्तुत किया गया है। ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि ने मनुष्य को अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित किया है। कवि मनुष्य को मनुष्यता का भाव अपनाने की प्रेरणा देते हैं और चाहते हैं कि मनुष्य ऐसा जीवन जिए, ऐसे अच्छे कार्य करके जाए कि लोग मरने के बाद भी उसे याद रखें। अपने लिए तो सभी जीते हैं, जो लोग दूसरों के लिए जीते हैं वही महान कहलाते हैं। उन्हें ही लोग याद रखते हैं।

कवि का मानना है कि अपने लिए जीने-मरने वाले मनुष्य तो हैं, लेकिन उनमें मनुष्यता के पूरे लक्षण नहीं है। सही अर्थों में मनुष्यता के पूरे लक्षण उन लोगों में होते हैं, जो केवल अपने हित के लिए ही नहीं जीते बल्कि जो दूसरों के हित के लिए भी जीते हैं। जिनका चिंतन स्वयं हित चिंतन से अधिक परहित चिंतन होता है। ऐसे लोगों की मृत्यु ही सुमृत्यु हो जाती है। मनुष्य की यही विशेषता ही उसे संसार के प्राणियों से अलग करती है।



रचनाकार के बारे में…

मैथिलीशरण गुप्त’ हिंदी के बेहद विख्यात साहित्यकार रहे हैं। उन्हें राष्ट्रकवि’ की उपाधि से भी जाना जाता है। उनका जन्म झांसी के निकट चिरगांव नामक स्थान पर सन 1886 ईस्वी में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा दीक्षा उनके घर पर ही हुई थी। उन्हें हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं का पूर्ण ज्ञान था। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी कवियों वाली रही है और उनके पिता सेठ रामचरण दास भी प्रसिद्ध कवि थे तथा उनके छोटे भाई सियाशरण गुप्त भी प्रसिद्ध कवि रहे।

मैथिलीशरण गुप्त जी को राम भक्त कवि के तौर पर जाना जाता है और भगवान श्रीराम की कीर्ति का बखान उन्होंने अपनी कई रचनाओं में किया है। उनकी रचनाओं की भाषा मुख्य रूप से खड़ी बोली रही है। इस पर संस्कृत का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।

मैथिली शरण जी की प्रसिद्ध कृतियों में साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध आदि के नाम प्रमुख हैं। मैथिलीशरण गुप्त का निधन सन 1964 में हुआ था



हल प्रश्नोत्तर

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1 : कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है?

उत्तर : कवि ने ऐसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है, जिस मृत्यु के बाद भी लोग उस व्यक्ति को याद रखें। कवि के अनुसार दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो कुछ ऐसा अच्छा कार्य कर जाते हैं कि लोग उसकी मृत्यु के बाद भी उसे हमेशा याद करते हैं।

अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन जो लोग दूसरों के लिए जीते हैं, जो इस अपने स्वार्थ को त्याग करके परमार्थ के लिए अपना जीवन अर्पण कर देते हैं, ऐसे लोगों की मृत्यु के बाद भी लोग उनको हमेशा याद रखते हैं। ऐसे लोगों की मृत्यु ही सुमृत्यु है। इसलिए जीवन में सदैव अच्छे कार्य करो, जिससे मरने के बाद भी लोग याद रखें।


 

प्रश्न 2 : उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?

उत्तर : उदार व्यक्ति की पहचान ऐसे होती है कि वह व्यक्ति हर किसी के प्रति आत्मीयता का भाव रखता है, वह हर किसी से प्रेम करता है, जिसका पूरा जीवन दूसरों की सहायता करने और परोपकार के कार्य करने में व्यतीत हो जाता है।

जो व्यक्ति हर किसी से प्रेम, स्नेह भावना रखता हो, जो स्वभाव से विनम्र हो, जिसके अंदर मनुष्यता हो, जो स्वार्थ की जगह परमार्थ में यकीन रखता हो, जो दूसरों के हित के लिए अपना जीवन बिता देता हो, जो किसी से भेदभाव नहीं करता हो, सबके साथ आत्मीयता से पेश आता हो वही उदार व्यक्ति होता है।


 

प्रश्न 3 : कवि ने दधीचि कर्ण, आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर मनुष्यता के लिए क्या संदेश दिया है?

उत्तर : कवि ने दधीचि, कर्ण आदि जैसे महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर मनुष्यता के लिए यह संदेश दिया है कि मनुष्यता को अपनाने के लिए मनुष्य को उदार तथा परोपकारी होना आवश्यक होता है। जो मनुष्य परोपकार के लिए सदैव तत्पर रहता है, जो दूसरों के हित के लिए कुछ भी करने से संकोच नहीं करता, जो अपने स्वार्थ को त्याग कर परमार्थ को अपनाता है, वह व्यक्ति ही मनुष्यता का सही अधिकारी होता है।

जिस प्रकार दधीचि ने मानवता की रक्षा के लिए अपने अस्थियों का दान कर दिया, कर्ण ने परोपकार के लिए अपने खाल तक दान कर दी। इनके माध्यम से कवि ने यही संदेश दिया कि यह शरीर नश्वर है अतः इसका मोह त्यागकर मानवता के कल्याण के लिए मनुष्य को कभी भी पीछे नहीं हटना चाहिए।

यदि कभी मानवता के कल्याण के लिए शरीर का बलिदान करने की आवश्यकता पड़े तो संकोच नही करना चाहिए। कवि ने दधीचि और कर्ण जैसे महान व्यक्तियों के माध्यम से मनुष्यता के लिए यही संदेश देने का प्रयत्न किया है।


 

प्रश्न 4 : कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व-रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?

उत्तर : कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए :
रहो भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो गर्व चित्त में।

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने मनुष्य को गर्व रहित यानी अभिमान रहित जीवन व्यतीत करने की सीख दी है। कवि के अनुसार मनुष्य के पास कितनी भी धन-संपत्ति क्यों ना आ जाए, उसे अपने आप पर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए। धन-संपत्ति केवल आपने ही अर्जित नहीं की। आप जैसे इस संसार में हजारों-लाखों हैं, जिनके पास धन संपत्ति है।

इसलिए हमें ऐसी किसी वस्तु के पास पर गर्व करने की क्या आवश्यकता जो हमारे जैसे ही अन्य लोगों के पास भी है। जिस धन-संपत्ति पर हमें गर्व अभिमान हो जाता है। वह ईश्वर द्वारा अन्य लोगों को भी दी गई है। ईश्वर की कृपा दृष्टि आप पर ही नहीं उन पर भी पड़ती है, इसलिए हमें कभी भी धन-संपत्ति पर नहीं करना चाहिए और अभिमान रहित जीवन जीना चाहिए।


 

प्रश्न 5 : मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं।

उत्तर : ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ इन पंक्तियों के माध्यम से हम यह जान पाते हैं कि इस संसार में सभी मनुष्य आपस में भाई है, क्योंकि सभी एक ही परमपिता ईश्वर की संतान है। कवि ने मनुष्य को भाईचारे की भावना से रहें। संसार के सभी मनुष्यों को प्रेम एवं भाईचारे की भावना से रहने के लिए प्रेरित किया है।

इस संसार में कोई पराया नहीं है, सभी एक दूसरे के भाई हैं। मनुष्य का स्वभाव ही बंधुत्व वाला है, इसलिए मनुष्य मात्र बंधु है। कवि ने यह कहा है सभी मनुष्य एक दूसरे के काम आए एवं प्रेम सद्भाव और भाईचारे से रहे यही कवि का संदेश है।


 

प्रश्न 6 : कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है?

उत्तर : कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा इसलिए भी है, क्योंकि कवि के अनुसार सभी मनुष्य एक ही परमपिता परमेश्वर की संतान है और मिल-जुलकर करने से कोई भी कठिन कार्य बेहद सरलता से संपन्न हो जाता है।

यदि सभी मनुष्य एक होकर चलेंगे, सद्भाव से रहेंगे तथा मिलजुल कर एक दूसरे की सहायता करते हुए अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर आगे बढ़ेंगे तो ना केवल अपना लक्ष्य आसानी से प्राप्त कर लेंगे, बल्कि वह मनुष्यता का सर्वश्रेष्ठ गुण भी प्रदर्शित करेंगे, क्योंकि एक-दूसरे से मिलजुल कर रहना ही सच्ची मनुष्यता है, इसी में प्रत्येक मनुष्य की उन्नति निहित है।


 

प्रश्न 7 : व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए।

उत्तर : कविता के आधार पर अगर हम कहे तो कवि मनुष्य को ऐसा जीवन व्यतीत करने के लिए कह रहे हैं, जो परोपकार से परिपूर्ण जीवन हो यानी मनुष्य को ऐसा जीवन व्यतीत करना चाहिए, जिसमें वो हमेशा दूसरों के काम आए। उसे दूसरों की मदद करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

वह सबसे मिल-जुल कर रहे प्रेम एवं भाईचारे से रहे तथा सबके साथ मिलजुल कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने वाले मार्ग पर चले। वह अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को त्याग कर सभी के हित का चिंतन करें। उसे अपनी धन संपत्ति आदि पर कभी अहंकार ना हो। संकट की घड़ी में वह सदैव दूसरों के काम आए। इस तरह व्यक्ति को मनुष्यता से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए।


 

प्रश्न 8 : मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है?

उत्तर : ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि यह संदेश देना चाहता है कि व्यक्ति को मनुष्यता से भरा हुआ जीवन जीना चाहिए यानी उसे अपना जीवन पूरा जीवन परोपकार के कार्य करते हुए बिताना चाहिए। मनुष्य को मनुष्यता वाले वे सभी गुण अपनाना चाहिए जो उसे मनुष्यता की कसौटी पर खरा बनाएं यानी उसके अंदर प्रेम, दया, करुणा, सद्भाव, संवेदना, उदारता के सभी गुण होना चाहिए।

मनुष्य को निस्वार्थ भाव से अपना जीवन जीना चाहिए और उसे अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ के विषय में सोचना चाहिए। वो सदैव दूसरों की मदद करने के लिए तत्पर रहे। मनुष्य और मनुष्य के बीच कोई अंतर ना समझे। उसका ह्रदय उदार हो।

उसे अपनी धन-संपत्ति या अन्य किसी उपलब्धि पर घमंड ना हो, ऐसा मनुष्य बनना चाहिए मृत्यु तो हर मनुष्य की निश्चित है, लेकिन उसे अपने जीवन में ऐसे अच्छे कार्य करना चाहिए कि उसके मरने के बाद भी लोग उसे याद रखें तभी उसकी मृत्यु सुमृत्यु में बदल जाएगी।

कवि ने दधीचि, कर्ण, रंतिदेव, उशीनर, क्षितिश जैसे अनेक महान व्यक्तियों के उदाहरण देकर दूसरों के हित के लिए अपना बलिदान करने की प्रेरणा दी है, और मनुष्यता का यही संदेश दिया है।



(ख) निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।

  1. सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही; वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही। विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा, विनीत लोकवर्ग क्या सामने झुका रहा?
  2. रहो भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में, सनाथ जान आपको करो गर्व चित्त में। अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं, दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
  3. चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए, विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए। घटे हेलमेल हाँ, बढ़े भिन्नता कभी, अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।

उत्तर :

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही; वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा, विनीत लोकवर्ग क्या सामने झुका रहा?

भाव : मैथिलीशरण गुप्त की ‘मनुष्यता’ नामक कविता की इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने मनुष्य को एक दूसरे के प्रति सहानुभूति की भावना रखने के लिए कहा है।

कवि के अनुसार सहानुभूति, दया एवं करुणा से बढ़कर कोई भी धन नहीं होता। कवि मनुष्य के अंदर दूसरों के प्रति प्रेम है, सहानुभूति है, करुणा है, दया है, तो वह इस पूरे संसार को अपने वश में कर सकता है। जो व्यक्ति उदार होता है, विनम्र होता है, दया, प्रेम एवं करुणा से भरा होता है, वह इस संसार में सबके सम्मान का पात्र बनता है। इस संसार में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने इन सभी गुणों को अपनाया और महान बने, जिन्हें आज भी संसार याद करता है।

महात्मा बुद्ध के विचारों का आरंभ में बेहद विरोध हुआ था, लेकिन महात्मा बुद्ध ने अपनी प्रेम दया एवं करुणा से सबके हृदय को बदल दिया और सब उनके आगे झुक गए। उसी प्रकार अन्य महापुरुषों ने भी अपने अपने सामाजिक कार्यों से इस संसार में सबके हृदय को जीता और नए-नए आदर्श स्थापित किए।

कवि कहते हैं कि मनुष्य मनुष्यता से भरा हुआ रहेगा, वह विनम्र रहेगा, सबके प्रति उधार रहेगा तो सारा संसार उसके सामने झुकेगा। सदैव दूसरों का हित सोचने वाले परोपकारी मनुष्य को सब सम्मान करते हैं।

रहो भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में, सनाथ जान आपको करो गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं, दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।

भाव : मैथिली शरण गुप्त द्वारा रची गई ‘मनुष्यता’ नामक कविता की इन पंक्तियों का भाव यह है कि कवि कहते हैं कि मनुष्य को भूल कर भी अपनी धन-संपत्ति पर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो धन-संपत्ति उसके पास है, वही धन-संपत्ति उसके जैसे लाखों अन्य लोगों के पास भी है।

ईश्वर सभी पर अपनी कृपा बरसाता है। इसलिए मनुष्य को ऐसी किसी भी वस्तु पर अहंकार नहीं करना चाहिए। जो केवल उसके पास ही नहीं अन्य लोगों के पास भी है। इस संसार का स्वामी ईश्वर सबके लिए दयालु है। वह सब को एक साथ समान व्यवहार करता है। वह केवल आप पर ही कृपा नहीं करता। वह सब पर कृपा करता है।

कवि के अनुसार सच्चा मनुष्य तो वही है, जो अपनी संपत्ति पर अहंकार ना करते हुए केवल मनुष्यता के साथ अपना जीवन व्यतीत करता है और दूसरों के हित के लिए अपने जीवन को समर्पित कर देता है।

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए, विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे हेलमेल हाँ, बढ़े भिन्नता कभी, अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।

भाव : मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘मनुष्यता’ नामक कविता इन पंक्तियों का भाव यह है कि कवि कहते हैं कि अपने जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति के जिस मार्ग पर चलो, उस मार्ग पर प्रसन्नतापूर्वक हँसते-खेलते हुए सबके साथ मिलजुल कर चलो, ताकि यदि रास्ते में अगर कोई कठिनाई आए तो मिल-जुल कर उस कठिनाई को दूर कर लिया जाए।

अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते समय मिलजुल पर चलते समय हमें यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि हमारा भाईचारा सद्भाव कभी भी कम ना होने पाए। हमारे बीच मनमुटाव ना हो। ना ही हमारे रास्ते में किसी तरह के भेदभाव अथवा नाराजगी हो। हम सब एक-दूसरे से मिलजुल कर रहते हुए जीवन मार्ग के पथ पर चलते-चलते रहें, तभी हमारे जीवन की सार्थकता सिद्ध होगी।

यदि हम अपने इस जीवन को दूसरों के काम आते हुए मिलजुल कर एक दूसरे की सहायता करते हुए बितायें तो हमारा यह जीवन सही अर्थों में सफल जीवन माना जाएगा। हम किसी भी पंथ अथवा संप्रदाय से संबंध रखते हों, लेकिन हम किसी में भेदभाव न करते हुए सभी के हित की बात करें और सभी लोग मिलजुलकर साथ रहे साथ चलें तो यह जीवन सहज सुगम है।



योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 : अपने अध्यापक की सहायता से रंतिदेव, दधीचि, करण और पौराणिक पात्रों के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।

उत्तर : विद्यार्थी अपने अध्यापक से कक्षा में इस विषय में जानकारी प्राप्त करें।विद्यार्थियों की सहायता के लिए तीनों महान पुरुषों के बारे में बताया जा रहा है।

रंतिदेव : रंतिदेव प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध राजा थे, जो अपने दानधर्म और दयालु स्वभाव के लिए बेहद प्रसिद्ध थे। उनके राज्य में एक बात भयंकर अकाल पड़ा और लोग अकाल के कारण त्राहि-त्राहि कर उठे। पूरे राज्य में अनाज का भंडार समाप्त हो गया था।

राजकोष भी लगभग खाली हो गया था। दयालु स्वभाव के रंतिदेव ने को अपनी प्रजा का दुख देखा ना गया और उन्होंने अपनी प्रजा को राजकोष से अनाज देना आरंभ कर दिया। बाद में वह अनाज भी कम पड़ गया। तब उनके राज परिवार के सदस्यों को भी आधा पेट खा कर गुजारा करना पड़ता था। ऐसी विकट स्थिति में रंतिदेव को भी कई दिनों तक भूखे रहना पड़ा।

एक दिन जब राजा को कई दिनों बाद खाने के लिए कुछ रोटियां मिली तो राजा जैसे ही खाने बैठे तभी एक भूखा व्यक्ति दरवाजे पर आ गया। राजा ने अपनी भूख की परवाह ना करते हुए उस व्यक्ति को खाना खिला दिया। ऐसी मान्यता है कि ईश्वर उनकी परीक्षा ले रहा था और उनकी इस दयालुता से प्रभावित होकर ईश्वर ने उनके राज्य में धन-धान्य का भंडार भर दिया।

दधीचि : दधीचि प्राचीन भारत के एक बेहद ही दानी-ज्ञानी ऋषि थे। वे स्वभाव से अत्यंत परोपकारी थे। वह हर समय में तपस्या में लीन रहते थे। उनके पास अद्भुत शक्तियां की और उनकी तपस्या का महत्व देवता तक मानते थे। एक बार देवराज इंद्र को उनसे कुछ कार्य पड़ा और वह उनसे मिलने आए।

दधीचि ने जब उनसे उनके आने का प्रयोजन पूछा तो देवराज इंद्र ने कहा कि देवता और दानवों में युद्ध छिड़ा हुआ है और दानव हम देवताओं पर भारी साबित हो रहे हैं। यदि फिर भी कुछ उपाय ना किया गया तो सब जगह दानवों का कब्जा हो जाएगा। दधीचि ऋषि ने कहा, देवराज! बताइए मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ। तब देवराज इंद्र ने कहा कि एक उपाय है, यदि आपकी हड्डियों से वज्र बनाया जाए और उससे असुरराज वृत्तासुर को पराजित किया जा सकता है। वृत्तासुर के मारे जाने पर देवता युद्ध जीत सकते हैं।

यह मानवता की भलाई के लिए बेहद आवश्यक है। इंद्र की बात सुनकर दधीचि ने बिना किसी संकोच के अपने प्राण त्याग दिए और फिर उनके शरीर की हड्डियों से बनाए गए वज्र से देवताओं ने असुरों को मारकर विजय प्राप्त की। दधीचि का यह त्याग प्राचीन भारत के इतिहास में अमर हो गया।

कर्ण : महाभारत काल के एक बेहद पराक्रमी वीर और स्वभाव से दानी योद्धा था। पांडवों का सबसे बड़ा भाई और कुंती का जेष्ठ पुत्र था, जो सूर्यदेव के आशीर्वाद से जन्मा था। सूर्यदेव ने उसे जन्म से ही कवच-कुंडल प्रदान किया था, जिस कारण उसे पराजित करना किसी के लिए भी संभव नहीं था। वो स्वभाव से बेहद दानी व्यक्ति खा और अपने दरवाजे से किसी को भी खाली हाथ नहीं लौटने देता था।

महाभारत के युद्ध में वह कौरवों की तरफ से लड़ रहा था और उसे पराजित करना आवश्यक था। सूर्य देव द्वारा दिए गए दिव्य कवच कुंडल के कारण उसे पराजित करना असंभव था। तब श्रीकृष्ण और इंद्र ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके कवच और कुंडल दान में मांग लाए। कर्ण सब कुछ जानता था, लेकिन वह अपनी दानी स्वभाव से पीछे नहीं हट सकता था। इसलिए उसने दान में मांगे गए कवच-कुंडल दे दिए और अपना वचन निभाया।


प्र्श्न 2 : परोपकार विषय पर आधारित दो कविताओं और दो दोहों का संकलन कीजिए। उन्हें कक्षा में सुनाइए।

उत्तर : विद्यार्थी परोपकार विषय पर आधारित दो कविताओं और दो दोहों का संकलन करें और उन्हें अपनी कक्षा में पढ़कर सुनाएं। विद्यार्थियों की सुविधा के लिए दो कविताएं और दो दोहे दिए जा रहे हैं…

कविता 1

जीवन में परोपकार करो, तुम सब का उद्धार करो।
जीवन में परोपकार करो, लोगों का बेड़ा-पार करो।
लोगों के सदैव काम आओ, दूसरों को दुख में हाथ बंटाओं
मत करो केवल अपना हित-चिंतन करो सदैव सर्वहित चिंतन

कविता 2

जो दूसरो के हरदम का आया उसी का जीवन सफल है,
जो केवल अपने लिए जीत रहा, उसका जीवन विफल है,
दूसरों के दर्द को समझना, यही मानव स्वभाव सकल है,
दूसरों के हित में जीना उसी में मानव बल है

कबीर का दोहा

स्वारथ सूका लाकड़ा, छांह बिहना सूल।
पीपल परमारथ भजो, सुख सागर को मूल।।

रहीम का दोहा

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बांटन वारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग।।


परियोजना कार्य

प्रश्न 1 : ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ की कविता ‘कर्मवीर’ तथा अन्य कविताओं को पढ़िए तथा कक्षा में सुनाइए।

उत्तर : विद्यार्थियों की सहायता के लिए अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध की कर्मवीर’ नीचे दी जा रही है। वे इस कविता को अपनी कक्षा में पढ़कर सुनाएं।

देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं,
रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं,
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं,
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं हो गये
एक आन में उनके बुरे दिन भी भले
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।
आज करना है जिसे करते उसे हैं, आज ही सोचते कहते हैं
जो कुछ कर दिखाते हैं वही मानते जी की हैं,
सुनते हैं सदा सबकी कही जो मदद करते हैं
अपनी इस जगत में आप ही भूल कर वे
दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं
कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं
जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं
नहीं काम करने की जगह बातें बनाते हैं
नहीं आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं
नहीं यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं
नहीं बात है वह कौन जो होती नहीं
उनके लिए वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए
व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर
वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर
गर्जते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर
आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट
ये कँपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं
भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं


प्रश्न 2 : भवानी प्रसाद मिश्र की ‘प्राणी वही है, प्राणी’ कविता पढिए तथा दोनों कविताओं के भावों में व्यक्त हुई समानता को लिखिए।

उत्तर : ‘भवानी प्रसाद मिश्र’ की कविता ‘प्राणी वही प्राणी है’ को पढ़कर तथा ‘मनुष्यता’ कविता को पढ़कर दोनों कविताओं के भाव में यह समानता दिखी कि दोनों कविताएं मनुष्यता पर ही केंद्रित हैं। दोनों कविताओं में मानव के उस मूल स्वभाव को मुख्य रूप से रेखांकित किया गया है, जिसके कारण वह संसार में अन्य सभी प्राणियों से अलग माना जाता है। मानव का सबसे मूल स्वभाव उसके अंदर बसी मानवीयता यानी मनुष्यता होती है। सच्चा मनुष्य वही होता है जो अपने दुखों की परवाह ना कर दूसरों के दुखों को भी अनुभव करें और सबके दुख में हमेशा काम आए। किसी भी तरह के संकट आने पर वह घबराए नहीं तथा सच्चे मन से परोपकार का कार्य करे। दोनों कविताओं में मनुष्यता और परोपकार जैसे गुणों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यही दोनों कविता का मूल भाव है।


मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-4, हिंदी, स्पर्श 2) (NCERT Solutions)

कक्षा-10 हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ के साल्यूशन

साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पद : मीरा (कक्षा-10 पाठ-2 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तोप : वीरेन डंगवाल (कक्षा-10 पाठ-5 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)


Other questions

एक उदार मनुष्य की क्या-क्या उपलब्धियाँ होती हैं? ‘मनुष्यता’ कविता के आधार पर स्पष्ट करे।

पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए “गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हंस ऊपर से, गिरा बिद्ध होकर खर-शर से, हुई पक्ष की हानी।” “हुई पक्ष की हानी। करुणा भरी कहानी।”

अपने माता-पिता के साथ बिताए सुखद पलों के अनुभवों को अनुच्छेद के रूप में लिखिए।

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अनुच्छेद

माता-पिता के साथ बिताए सुखद पलों के अनुभवों का वर्णन

माता-पिता के साथ बिताए गए जीवन के हर पल सुखद होते हैं। बचपन में हमारे माता-पिता हमें हमें हर तरह के जो सुख-साधन उपलब्ध कराते हैं। वैसा आनंद हमें बड़े होने पर नहीं प्राप्त हो पाता क्योंकि हम जीवन के संघर्षों में उलझ जाते हैं।

मेरे माता-पिता के साथ बिताए गए अनेक सुखद पल है। ऐसे ही सुखद पलों में एक प्रसंग याद आता है, जब मैं अपने माता-पिता के साथ माउंट आबू घूमने जा रहा था। मेरे माता-पिता मेरी जिद पर ही मुझे घुमाने के लिए ले जा रहे थे। हम लोग दिल्ली से माउंट आबू जाने के लिए ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। रास्ते में एक स्टेशन पड़ा तो मेरे पिता स्टेशन पर से कुछ खाने का सामान लेने के लिए उतरे। उन्हें खाने का सामान लेने में समय का ध्यान नहीं रहा। अचानक ट्रेन चल पड़ी, जब तक पिताजी को ट्रेन चलने पता चलता तब तक ट्रेन स्पीड पकड़ चुकी थी और पिताजी ट्रेन में नहीं चढ़ पाए।

मैं और मेरी माँ दोनों ट्रेन में अकेले रह गए। अब हम लोग बड़े परेशान हुए कि अब क्या किया जाए। ये सब देखकर मैं रोने लगा था। मेरी माँ ने मुझे गले से लगाया और समझाया कि चिंता मत करो,  हम लोग पिताजी को ढूंढ लेंगे। आसपास के यात्रियों ने भी हम लोगों को हौसला दिया। पिताजी का मोबाइल भी ट्रेन में ही हमारे पास था इसलिए हम लोग उनसे संपर्क नहीं सकते थे। कुछ देर बाद पिताजी का फोन आया, वो किसी दूसरे व्यक्ति के मोबाइल से कॉल कर रहे थे। उन्होंने बताया कि वह दो घंटे बाद आने वाली एक ट्रेन में बैठ जाएंगे, जो माउंट आबू ही जा रही है। तुम लोग डेस्टिनेशन वाले स्टेशन को उतर जाना, मैं आधे घंटे बाद वहां पर पहुंच जाऊंगा।

जब हमारा स्टेशन आ गया तो हम लोग उतर गए और स्टेशन पर ही बैठकर इंतजार करने लगे। लगभग दो घंटे बाद पिताजी भी हमें आते हुए दिखाई दिए। वह पीछे आने वाली ट्रेन से आ गए थे। उन्हें देखकर हम लोगों ने राहत की सांस ली। फिर हम मैंने अपने माता पिता के साथ माउंट आबू में खूब इंजॉय किया। हम लोग तीन दिन वहाँ रहे। आज भी माउंट आबू में बिताए गए वह सुखद पल और ट्रेन में घटी वह घटना याद आ जाती है।

माता-पिता के साथ बचपन में ऐसे अनेक सुखद अनुभव हुए थे। एक दूसरे में अनुभव में जब मैं अपनी कक्षा में ही नहीं बल्कि पूरे विद्यालय में प्रथम आया तो मेरे माता-पिता में घर पर एक बड़ी पार्टी दी, जिसमें सभी लोगों को बुलाया। मेरे पिताजी ने एक साइकिल उपहार में दी। दो महीनों बाद मेरा जन्मदिन भी आ गया तो मेरे जन्मदिन पर पिताजी ने मुझे एक घड़ी उपहार में दी।

मुझे पत्रिकाएं पढ़ने का शौक था, तो माँ जब बाजार जातीं तो मैं उनसे अपनी पसंदीदा पत्रिकाएं और पुस्तकें मंगाता था। मैंने अपने अपने माता-पिता से कहकर अपने कमरे मे एक किताबों की अलमारी बनवा रखी थी, जिसमें मैं सारी पत्रिकाएं और पुस्तकें संभाल कर रखता था।

इस तरह माता-पिता के साथ बिताए गए सुखद पलों की एक लंबी सूची है। वह सुखद पल आज भी याद आते हैं।


Other questions…

‘यात्रा जिसे मैं भूल नहीं सकता’ विषय पर अनुच्छेद लिखिए।​

‘आलस करना बुरी आदत है’ इस विषय पर अनुच्छेद लिखें।

‘नारी के बढ़ते कदम​’ पर अनुच्छेद लेखन करिए।

अगर मेरे मामा का घर चाँद पर होता। (अनुच्छेद)

दोहे : बिहारी (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर) (पुराना पाठ्यक्रम)

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NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

दोहे : बिहारी (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2)

DOHE : Bihari (Class-10 Chapter-3 Hindi Sparsh 2)


दोहे : बिहारी

पाठ के बारे में…

इस पाठ में कवि बिहारी के नीतिगत दोहों की व्याख्या की गई है। कवि बिहारी श्रृंगार परक रचना के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अनेक श्रृंगार दोहों की रचना की। इसके अलावा उन्होंने लोक ज्ञान, शास्त्र ज्ञान पर आधारित नीति के दोहे भी रचे हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नीति संबंधी बातें कहीं हैं। यह दोहे ऐसे ही नीति वचनों पर आधारित दोहे हैं।



रचनाकार के बारे में…

कवि ‘बिहारी’ सोलहवी-सत्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध हिंदी कवि थे। वे श्रृंगार रस के कवि रहे हैं। उनकी अधिकतर रचनाओं में श्रृंगार रस की प्रधानता मिलती है। उनकी कविताओं में नायक और नायिका की वे सारी चेष्टाएं मिलती है, जिन्हें हाव-भाव कहा जाता है। उनकी रचनाओं की भाषा मुख्यतः ब्रज रही है, जिसमें साहित्यकता का पुट है। उनकी रचनाओं में पूर्वी और बुंदेलखंडी शब्दों का भी मिश्रण मिलता है।

कवि बिहारी का जन्म सन 1595 ईस्वी में ग्वालियर में हुआ था। 7-8 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ ओरक्षा चले गए, जहाँ उन्होंने आचार्य केशवदास से काव्य में शिक्षा प्राप्त की। यहीं पर वह रहीम के संपर्क में आए। कवि बिहारी एक रसिक कवि थे और उनकी काव्य में रसिकता मिलती है। उनके व्यक्तिगत जीवन में भी रसिकता का समावेश था, उनका स्वभाव मूलतः विनोदी और व्यंगप्रिय था।

कवि बिहारी की केवल एक ही रचना ‘सतसई’ नाम से उपलब्ध है। इसमें लगभग 700 संग्रहित है। सन् 1663 में उनका निधन हुआ।



हल प्रश्नोत्तर

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

प्रश्न 1 : छाया भी कब छाया ढूंढने लगती है?

उत्तर : कवि बिहारी के अनुसार छाया भी तक छाया ढूंढने लगती है, जब जेठ के महीने में बड़ी तेज धूप होती है। जेठ महीने की यह तेज धूप सर पर इस प्रकार तेजी से पड़ने लगती है कि मनुष्य के शरीर की छाया या अन्य वस्तुओं की छाया भी छोटी होती जाती है। तब जेठ की भीषण गर्मी वाली उस दुपहरी में छाया भी छाया ढूंढने लगती है।


प्रश्न 2 : बिहारी की नायिका यह क्यों कहती है ‘कहि है सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात’ – स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : ‘कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात’ इस पंक्ति से माध्यम से बिहारी की नायिका ये कहना चाहती कि उसके मन की बात और उसके हृदय की वेदना का उसका प्रियतम अपने हृदय की वेदना से ही समझ जायेगा। नायिका कागज के माध्यम से अपने प्रियतम को संदेश देना चाहती है।

जब वह कागज पर अपने प्रियतम के लिए संदेश लिख रही है तो लिखते समय वह कंपकंपाने लगती है उससे संदेश नही लिखा जाता है और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगते हैं इसके साथ ही उसे संदेश लिखने मे लाज भी आ रही है। वह जानती है कि जो उसकी अवस्था है वही उसके प्रियतम की अवस्था होगी। इसलिये वो अपने प्रियतम को लिखती है कि ‘कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात’ अर्थात तुम अपने हृदय की वेदना से ही मेरे हृदय की वेदना का अंदाज लगा लेना।


प्रश्न 3 : सच्चे मन में राम बसते हैं−दोहे के संदर्भानुसार स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : कवि बिहारी ने इस दोहे के माध्यम से यह बात स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है कि ईश्वर को पाने के लिए व्यर्थ के कर्मकांड करने की आवश्यकता नहीं है। व्यर्थ के कर्मकांड करना, माला जपना, तिलक लगाना, छापे लगवाना आदि करने से राम यानि ईश्वर नहीं प्राप्त होते।

ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मन में सच्ची भक्ति पैदा करनी पड़ती है। अपने मन को निर्मल बनाकर प्रभु के प्रति सच्ची भक्ति करने से उनको सच्चे मन से याद करने से ही भगवान प्रसन्न होते हैं। कुछ लोग पूरे जीवन केवल आडंबर रहते रहते हैं, लेकिन उन्हें ईश्वर प्राप्त नहीं हो पाते।

ईश्वर का निवास सच्चे, शुद्ध और सात्विक, निर्मल मन में होता है। कच्चा मन काँच के समान नाजुक होता है जो जरा सा आघात लगने सी ही टूट जाता है। सच्चा मन इतना नाजुक नही होता।


प्रश्न 4 : गोपियाँ श्रीकृष्ण की बाँसुरी क्यों छिपा लेती हैं?

उत्तर : गोपियां श्रीकृष्ण की बांसुरी इसलिए छुपा लेती है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कराना चाहती हैं, वह श्रीकृष्ण को रिझाना चाहती हैं।

लेकिन श्रीकृष्ण हैं कि अपनी बांसुरी बजाने में ही मगन रहते हैं, गोपियों को ओर ध्यान नही देते। इसलिए वह श्रीकृष्ण की बांसुरी छुपा देती है ताकि श्रीकृष्ण अपनी बांसुरी को भूलक उनसे बातें करें।

हो सकता है श्रीकृष्ण बांसुरी के विषय में उनसे पूछें। इससे उन्हें श्रीकृष्ण से बात करने का अवसर प्राप्त होगा, उनसे नोकझोंक होगी। इसीलिए गोपियां श्रीकृष्ण को रिझाने के लिए उनकी बांसुरी छुपा देती हैं।


प्रश्न 5 : बिहारी कवि ने सभी की उपस्थिति में भी कैसे बात की जा सकती है, इसका वर्णन किस प्रकार किया है? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर : कवि बिहारी ने बताया है कि सभी की उपस्थिति में भी इशारों ही इशारों में बात की जा सकती है और बिना बोले ही अपने मन की बात कही जा सकती है। कवि के नायक और नायिका सभी की उपस्थिति में इशारों ही इशारों में अपने मन की बात कर रहे हैं। नायक सभी की उपस्थिति में ही नायका को कुछ इशारे करता है और नायिका इशारे ही इशारे में मना करती है।

इस पर नायक नायिका की इस शैली पर रीझ उठता है। नायक की इस हरकत पर नायिका खीझ उठती है। नायक और नायिका के नेत्र मिले और नायक के मन में प्रसन्नता हुई, वही नायिका लज्जा आँखों में लज्जा के भाव लिए हुए थी। इस तरह सभी की उपस्थिति में ही बिना बोले ही इशारों ही इशारों में बात की जा सकती है, ये कवि बिहारी ने स्पष्ट किया है।



(ख) निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
  • मनौ नीलमनी-सैल पर आतपु पर्यौ प्रभात।
  • जगतु तपोबन सौ कियौ दीरघ-दाघ निदाघ।
  • जपमाला, छापैं, तिलक सरै न एकौ कामु।
    मन-काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु।।

उत्तर : भाव इस प्रकार होगा :

1. मनौ नीलमनी-सैल पर आतपु पर्यौ प्रभात।

भावार्थ : इस पंक्ति के माध्यम से कवि बिहारी श्रीकृष्ण के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण के सौंदर्य की तुलना नीलमणि पर्वत और उस पर पड़ रही सूरज की सुनहरी धूप से की है।

कवि बिहारी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के नीले शरीर पर उनके द्वारा धारण किए गए पीतांबर यानी पीले वस्त्र इस प्रकार शोभायमान दिखाई दे रहे हैं कि जैसे नीलमणि पर्वत पर सुबह के समय सूरज की सुनहरी धूप निकल रही हो। नीलमणि पर्वत पर गिर रही सुनहरी धूप के समान श्रीकृष्ण का सौंदर्य अद्भुत प्रतीत हो रहा है।

2. जगतु तपोबन सौ कियौ दीरघ-दाघ निदाघ।

भावार्थ : कवि बिहारी कहते हैं कि ग्रीष्म ऋतु के प्रचंड आवेग के कारण सारा जंगल ही तपोवन के समान हो गया है। जंगल में अलग-अलग प्रजाति के पशु रहते हैं जिनमें आपसी दुश्मनी होती है, लेकिन इस भीषण गर्मी ने सभी पशुओं को एक साथ ला खड़ा किया है और सभी पशु आपसी बैरभाव बुलाकर एक ही छत के नीचे जमा हो गए हैं।

ग्रीष्म ऋतु की भीषण गर्मी ने उनके अंदर के बैरभाव को मिटा दिया है और पूरा जंगल तपोवन के समान हो गया है। तपोवन में रहने वाले प्राणी आपस में कोई बैरभाव नहीं रखते और मिलजुल कर रहते हैं। उसी प्रकार भीषण गर्मी के कारण जंगल के पशु भी आपसी बैरभाव भुलाकर एक साथ रहने लगे हैं।

3. जपमाला, छापैं, तिलक सरै एकौ कामु।
    मन-काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु।।

भावार्थ : कवि बिहारी कहते हैं कि तरह-तरह के प्रपंच रखने से और बाहरी आडंबर कर्मकांड आदि करने से ईश्वर की राम यानी ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। माला फेरने से, हल्दी चंदन का लेप लगाने से, माथे पर तिलक लगाने से भी ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती।

ईश्वर को प्राप्त करने के लिए ऐसे ही लोगों का मन तो बहुत कच्चा होता है, जो जरा सी बात पर ही डोलने लगता है। इन लोगों का मन काँच के समान कच्चा होता है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए मन को कच्चा नहीं सच्चा होना चाहिए। जो सच्चे हृदय से ईश्वर को याद करता है, जिससका मन निर्मल है, छल कपट नहीं है। उसको ही राम यानि ईश्वर मिलते हैं।



योग्यता विस्तार

1. सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। देखन के छोटे लगे, घाव करे गंभीर।। अध्यापक की मदद से बिहारी विषयक इस दोहे को समझने का प्रयास करें। इस दोहे से बिहारी की भाषा संबंधी किस विशेषता का पता चलता है।

उत्तर : कवि बिहारी द्वारा रचित इस दोहे को पढ़कर कवि बिहारी की इस विशेषता का पता चलता है कि बिहारी ने बहुत कम शब्दों में ही बहुत बड़ी बात कह दी है। कवि बिहारी थोड़ी से शब्दों में बड़ी एवं गूढ़ बात कहने में निपुण थे। वह गागर में सागर भरने की कला में माहिर थे। इस दोहे को पढ़कर भी उनकी इसी विशेषता का पता चलता है। इस दोहे के पड़कर पता चलता है कि उनके दोहे देखने में भले ही छोटे लगते हों लेकिन वह मन बहुत गहरी छाप छोड़ते हैं।



परियोजना कार्य

1. बिहारी कवि के विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए और परियोजना पुस्तिका में लगाइए

उत्तर : ये प्रायोगिक कार्य है। विद्यार्थी कवि बिहारी के विषय में पाठ्य पुस्तकों से और इंटरनेट से जानकारी एकत्रित करें और अपनी पाठ्य पुस्तिका में चिपकाएं।


दोहे : बिहारी (कक्षा-10 पाठ-3, हिंदी, स्पर्श 2) (NCERT Solutions)

कक्षा-10, हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ

साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पद : मीरा (कक्षा-10 पाठ-2 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तोप : वीरेन डंगवाल (कक्षा-10 पाठ-5 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)


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औंधाई सीसी सु लखि बिरह-बरनि बिललात । बिचहीं सूखि गुलाब गौ छींटौ छुई न गात ।। अर्थ बताएं।

लैकै सुघरु खुरुपिया, पिय के साथ। छइबैं एक छतरिया, बरखत पाथ ।। रहीम के इस दोहे का भावार्थ लिखिए।

‘डिजीभारतम्’ पाठ का सारांश हिंदी में लिखिए।

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‘डिजीभारतम्’ पाठ का सारांश (हिंदी में)

‘डिजीभारतम्’ पाठ भारत की डिजिटल क्रांति को समर्पित एक पाठ है। जिसमें डिजिटल इंडिया के बारे में बताया गया है। यह पाठ भारत के डिजिटल इंडिया के मूल भाव को लेकर एक खाका प्रस्तुत करता है। इस पाठ में भारत में हुई वैज्ञानिक प्रकृति के उन आयामों को छुआ गया है, जिन्हें भारत ने पिछले समय में हासिल किया है।

इंटरनेट ने हम सभी के जीवन को कितना सरल बना दिया है और इंटरनेट की क्रांति के कारण संसार में सभी लोगों के कितने कार्य आसान हो गए हैं, इस पाठ में यह बताया गया है। भारत ने डिजिटल जगत में एक नया मुकाम हासिल किया है, यह डिजीभारतम् पाठ से पता चलता है।

डिजीभारतम् पाठ में बताया गया है कि समय बदलने के साथ-साथ मनुष्य की आवश्यकताएं भी बदलती रही है। पहले शिक्षा और ज्ञान का साधन किताबें और गुरु द्वारा शिष्य को मुँह से बोलकर ज्ञान देने तक सीमित था। प्राचीन काल में ताड़पत्रों और भोजपत्रों पर लेखन कार्य आरंभ होकर पुस्तक तक तक पहुंचा। अब यही पुस्तक डिजिटल रूप में कम्प्यूटर या मोबाइल की स्क्रीन पर आ गई हैं और पुस्तकों से आगे बढकर ज्ञान डिजिटल रूप में बदल गया है।

आज ज्ञान का दायरा बहुत बड़ा हो गया है और तरह की जानकारी इंटरनेट के माध्यम से कम्प्यूटर और मोबाइल की स्क्रीन पर चंद सेकंड में सहज रूप से और आसानी से उपलब्ध है। समाचार पत्र और पुस्तक आदि सभी अब मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन पर आसानी से पढ़े जा रहे हैं। इससे पुस्तकों के लिए कागज का निर्माण में कटने वाले वृक्षों पर भी अधिक जोर नहीं पड़ेगा।

डिजिभारतम् पाठ में भारत की आर्थिक क्रांति को भी बताया गया है कि कैसे भारत ने डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और यूपीआई के माध्यम से एक नई क्रांति खड़ी की है। अब सारे बैंकिंग कार्य और पैसों के लेनदेन के कार्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से होने लगे हैं और भारत कैशलेस ट्रांजैक्शन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

कहीं पर भी यात्रा करने के लिए टिकट खरीदना, किसी समारोह का टिकट खरीदना हो, किसी को पैसे भेजने हों या कहीं पर खरीदारी करनी हों, सब कुछ घर बैठे मोबाइल या कंप्यूटर के माध्यम से आसानी से होने लगा है। डिजिटल क्रांति ने भारत सहित पूरे विश्व को प्रभावित किया है और लोगों का जीवन बेहद आसान किया है। आने वाले समय में भारत में डिजिटल क्रांति और अधिक होने वाली है, और लोगों की जीवन शैली एकदम बदलने वाली है, यही इस पाठ के माध्यम से बताया गया है।


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