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The economic policies pursued by the colonial government in India were concerned more with the protection and promotion of the economic interests of their home country than with the development of the Indian economy. Critically evaluate the shortcomings of the agricultural and industrial policies pursued by the colonial administration.

To critically evaluate the shortcomings of the agricultural and industrial policies pursued by the colonial government in India, we need to examine various aspects of these policies and their impacts. Let’s break this down into agricultural and industrial policies:

Agricultural Policies:

1. Land Revenue System:
• Introduction of Zamindari, Ryotwari, and Mahalwari systems
• High tax rates, often up to 50% of the produce
• Shortcoming: Led to impoverishment of peasants and frequent famines

2. Commercialization of Agriculture:
• Shift from food crops to cash crops (cotton, indigo, opium)
• Shortcoming: Reduced food security, increased vulnerability to market fluctuations

3. Lack of Investment:
• Minimal investment in irrigation and agricultural technology
• Shortcoming: Stagnation in agricultural productivity

4. Destruction of Traditional Systems:
• Dismantling of community•based land ownership
• Shortcoming: Increased indebtedness and landlessness among peasants

Industrial Policies:

1. De-industrialization:
• Destruction of traditional handicrafts and textile industries
• Shortcoming: Unemployment and loss of skilled artisans

2. One-way Free Trade:
• Allowed British goods to enter India freely while imposing high tariffs on Indian exports
• Shortcomings: Unfair competition, stunted growth of Indian industries

3. Discriminatory Railway Policy:
• Railways primarily built to transport raw materials to ports and British goods inland
• Shortcoming: Did not promote balanced regional development

4. Lack of Technological Transfer:
• Limited transfer of industrial technology to India
• Shortcoming: Hindered the growth of modern industries in India

5. Neglect of Capital Goods Industries:
• Focus on consumer goods industries rather than heavy industries
• Shortcoming: Lack of industrial self•sufficiency

6. Racial Discrimination in Employment:
• Higher positions reserved for British nationals
• Shortcoming: Limited skill development and managerial experience for Indians

Critical Evaluation:

1. Drain of Wealth: These policies resulted in a significant transfer of wealth from India to Britain, hampering India’s economic growth.

2. Structural Changes: The colonial policies fundamentally altered India’s economic structure, making it dependent on Britain for manufactured goods while reducing it to a supplier of raw materials.

3. Underdevelopment: The lack of investment in both agriculture and industry led to overall economic stagnation and underdevelopment.

4. Social Impact: These policies widened economic disparities and created a new class of landlords and moneylenders, altering the social fabric of India.

5. Long-term Consequences: The effects of these policies continued to impact India’s economy even after independence, necessitating significant efforts for industrialization and agricultural reform.

6. Some Positive Aspects: Despite the overall negative impact, some developments like the introduction of railways, modern banking, and the English education system had some positive long-term effects.

In conclusion, while the colonial administration’s policies modernized certain aspects of the Indian economy, they were primarily designed to benefit the British economy at the expense of India’s development. This approach left India with a weak industrial base, an impoverished agricultural sector, and a legacy of economic challenges that persisted well into the post-independence era.


Other questions

In which country was a democratically elected government controlled by an absolute power?

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव; नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे! कौन सा अलंकार है? 1. अनुप्रास अलंकार 2. यमक अलंकार 3. श्लेष अलंकार 4. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार

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नव गति, नव लय, ताल-छंद नव नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव; नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे! इस पंक्ति में अनुप्रास और यमक दोनों अलंकार हैं।

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव; नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे!

अलंकार : अनुप्राल अलंकार और यमक अलंकार

स्पष्टीकरण :

इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार और यमक अलंकार दोनो हैं।

अनुप्रास अलंकार होने के कारण

इस पंक्ति में ‘न’ वर्ण की 10 बार आवृत्ति हुई है। इसलिए यहाँ पर अनुप्रास अलंकार है।
इस पंक्ति में ‘नव’ शब्द की समान अर्थो अलग-अलग एक से अधिक आवृत्ति हुई है इसलिए इस पंक्ति में अलंकार है।

यमक अलंकार होने कारण

‘नव नभ के नव विहग-वृंद’ में
1. ‘नव’ शब्द दो बार आया है।
2. पहला ‘नव’ का अर्थ है ‘नया’, जो ‘नभ’ (आकाश) के लिए विशेषण है।
3. दूसरा ‘नव’ का अर्थ है ‘नौ’, जो ‘विहग-वृंद’ (पक्षियों के समूह) की संख्या बताता है।

इस प्रकार, ‘नव’ शब्द की पुनरावृत्ति हुई है, लेकिन दोनों स्थानों पर इसका अर्थ अलग है। यह यमक अलंकार की पहचान है।

विकल्पों में दिए अन्य दो अलंकार न होने का कारण

पुनरुक्ति प्रकाश एक समान शब्द की लगातार दो बार आवृत्ति होती है, जैसे अलग-अलग, धीरे-धीरे, झम-झम आदि। इस काव्य पंक्ति में ऐसा नही है। यहाँ कोई भी शब्द लगातार दो बार नहीं आया है, इसलिए यहाँ पर पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार नहीं है।

श्लेष अलंकार में एक शब्द के अलग-अलग अर्थ प्रकट होते हैं। यहाँ पर इस पंक्ति में ऐसा नहीं है। इसलिए इस पंक्ति मे पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार भी नही है।


Other question

‘उगलेंगे आग कारखाने, हर ओर अंधेरा छाएगा’ – पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?

“कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गये। हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गये पंकज नये।।”- इस पंक्ति में अलंकार है?

निम्नलिखित वाक्यों के वचन बदलकर लिखिए : 1. लड़के ने आम खाया। 2. पौधा सूख गया । 3. सभा में कवि पधारा । 4. बंदर वृक्ष पर बैठा है। 5. नौकर मॉल जा रहा है। 6. यह कमरा साफ और सुंदर है।​

वाक्यों के वचन बदलकर नए वाक्य इस प्रकार होंगे…

1. लड़के ने आम खाया।
परिवर्तित वाक्य : लड़के ने आम खाए। अथवा लड़कों ने आम खाए।

2. पौधा सूख गया ।
परिवर्तित वाक्य : पौधे सूख गए।

3. सभा में कवि पधारा ।
परिवर्तित वाक्य : सभा में कवि पधारे।

4. बंदर वृक्ष पर बैठा है।
परिवर्तित वाक्य : बंदर वृक्ष पर बैठे हैं।

5. नौकर मॉल जा रहा है।
परिवर्तित वाक्य : नौकर मॉल जा रहे हैं।

6. यह कमरा साफ और सुंदर है।​
परिवर्तित वाक्य : ये कमरे साफ और सुंदर हैं।

टिप्पणी :

जब किसी वाक्य में वचन परिवर्तन को कहा जाता है, तो उसमें वाक्यों की सरंचना के आधार पर ये देखा जाता है कि वाक्य में कर्ता या क्रिया किसका वचन परिवर्तन करना है।

सामान्यतः किसी वाक्य मे कर्ता और क्रिया दोनों का वचन परिवर्तन करना होता है, तभी वाक्य एकवचन से बहुवचन या बहुवचन से एकवचन में बदलता है।

जिस वाक्य में कोई क्रिया न हो वहाँ पर कर्ता का वचन परिवर्तित किया जाता है, जैसा अंतिम वाक्य में किया गया है।


Other questions

निम्नलिखित वाक्यों को एकवचन रूप में परिवर्तित कर दोबारा लिखिए (क) कल मेरी सहेलियाँ आई थीं। (ख) नेतागण पधार रहे हैं। (ग) तुम मुझे दोहे सुनाओ। (घ) रास्ते में गहरे गड्ढे हैं। (ङ) ये वस्तुएँ ले आइए। (च) बच्चों ने प्रश्नों के उत्तर लिखे। (छ) बिल्लियाँ, कुत्तों से डर कर भाग गईं। (ज) थालियाँ यहाँ पर मत रखो। (झ) बच्चे खेल रहे हैं। (ञ) घोड़े तेज़ी से दौड़ रहे हैं।

दिए गए शब्दों के बहुवचन लिखिए। 1. घोंसला 2. टहनी 3. तैयारी 4. नदी 5. नारी 6. लड़का 7. आँख 8. चिडिया. 9. अंडा 10. प्याली 11. घोसला 12. कपड़ा 13. ताला 14. कविता 15. चिड़िया 16. कुटिया

बच्चे ऊँच-नीच का बंधन क्यों तोड़ना चाहते हैं?

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कवि द्वारकाप्रसाद माहेश्वरी द्वारा रचित कविता ‘इतना ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है’ में बच्चे ऊँच-नीच के बंधन को इसलिए तोड़ना चाहते हैं क्योंकि बच्चे ऊँच-नीच का बंधन इसलिए तोड़ना चाहते हैं क्योंकि वे समानता, समरसता, और स्वतंत्रता के मूल्य को समझते हैं और उसे जीना चाहते हैं।
कविता में कहा गया है कि दुनिया को एक समान दृष्टि से देखा जाए और धरा को समता की भाव वृष्टि से सिंचित किया जाए। बच्चे स्वाभाविक रूप से निष्कपट होते हैं और सभी को समान दृष्टि से देखना चाहते हैं। वे भेदभाव और असमानता को नहीं समझते और उन्हें मिटाना चाहते हैं।
कविता में जाति-भेद, धर्म-वेश और रंग-द्वेष की ज्वालाओं से जलते जग का वर्णन है। बच्चे इन भेदभावों को समाप्त करना चाहते हैं क्योंकि वे सभी को समान मानते हैं और किसी भी प्रकार के भेदभाव को स्वीकार नहीं करते।

पूरी कविता इस प्रकार है…

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।

देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥


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क्या माँ के बिना बच्चे का उचित विकास हो सकता है ? क्यों? सोचकर लिखिए

धरती माता ऊँच-नीच का भेद क्यों नहीं करती ?

In which country was a democratically elected government controlled by an absolute power?

One prominent example of a country where a democratically elected government was controlled by an absolute power is Nazi Germany under Adolf Hitler.

Nazi Germany

Adolf Hitler was appointed Chancellor of Germany in January 1933.

Democratic Process: The Nazi Party gained significant power through democratic elections and political manoeuvres. In the March 1933 elections, they secured a substantial number of seats in the Reichstag (German Parliament).

Consolidation of Power: After the Reichstag Fire in February 1933, the Reichstag Fire Decree was issued, which suspended civil liberties and allowed the arrest of political opponents.

Enabling Act: In March 1933, the Reichstag passed the Enabling Act, which gave Hitler’s government the power to enact laws without the Reichstag’s consent, effectively giving him dictatorial powers.

Total Control: Over the next few years, Hitler and the Nazi Party eliminated political opposition, established a totalitarian regime, and controlled all aspects of German life, including the media, education, and the economy.

Outcome: Though initially coming to power through democratic means, Hitler’s regime quickly dismantled democratic institutions and established an absolute dictatorship.

Germany during the Nazi era (1933-1945)

  1. Adolf Hitler was initially appointed as Chancellor through democratic processes in 1933.
  2. The Nazi Party had won a significant number of seats in the Reichstag (German parliament) through elections.
  3. Hitler then used legal and extralegal means to consolidate power, eventually becoming a dictator.
  4. The Enabling Act of 1933 allowed Hitler’s cabinet to enact laws without the consent of parliament.
  5. While maintaining a facade of democratic institutions, Hitler established totalitarian control.

Other Examples

While Nazi Germany is a classic example, other instances can be found in history where democratically elected governments moved towards authoritarian control:

  • Venezuela under Hugo Chávez and Nicolás Maduro
  • Russia’s transition under Vladimir Putin
  • Turkey’s shift under Recep Tayyip Erdogan
1. Venezuela under Hugo Chávez and Nicolás Maduro:

Chávez was elected democratically in 1998, but over time, his administration and that of his successor, Maduro, concentrated power, undermined democratic institutions and suppressed political opposition.

2. Turkey under Recep Tayyip Erdoğan:

Erdoğan was democratically elected, but his administration has been criticized for eroding democratic norms, controlling the media, and consolidating power, particularly after the 2016 coup attempt.

3. Russia’s transition under Vladimir Putin

Under Vladimir Putin, Russia transitioned from a fledgling democracy to an increasingly authoritarian state. Since his rise to power in 1999, Putin has centralized control, curtailed political freedoms, and extended his influence, solidifying his rule through constitutional changes and suppression of dissent.

These examples illustrate how a democratically elected government can be subverted by an individual or party seeking absolute power. However, it’s important to note that once Hitler consolidated his power, Germany could no longer be considered a functioning democracy.


Other questions

 

What do you mean by Constitution? Why was making of the Indian Constitution not an easy affair?​

A constitution is a system of fundamental principles and established precedents according to which a state or other organization is governed. It lays down the structure, powers, and functions of the government and delineates the rights and duties of the citizens. Essentially, a constitution serves as the supreme law of the land, guiding the legal and political framework of a country.

Why Was Making the Indian Constitution Not an Easy Affair?

The making of the Indian Constitution was a complex and challenging task due to several reasons:

1. Diverse Population:

India is a country with immense diversity in terms of language, religion, culture, and ethnicity. The framers of the Constitution had to ensure that the document was inclusive and representative of all these diverse groups.

2. Colonial Legacy:

India had been under British colonial rule for almost 200 years. The transition from a colonial state to an independent democratic republic required a complete overhaul of the existing legal and administrative systems.

3. Partition of India:

The partition of India in 1947, which led to the creation of Pakistan, resulted in significant turmoil and displacement. The framers had to deal with the aftermath of partition, including refugee rehabilitation and communal tensions.

4. Socio-Economic Disparities:

India faced significant socio-economic challenges, including poverty, illiteracy, and a deeply entrenched caste system. The Constitution had to address these issues to promote social justice and equality.

5. Federal Structure:

India is a vast country with distinct regional identities. The Constitution needed to strike a balance between the powers of the central government and the states, ensuring a functional federal system.

6. Legal Traditions:

The framers had to synthesize various legal traditions, including British colonial laws, ancient Indian legal systems, and modern democratic principles.

7. Political Ideologies:

The Constituent Assembly comprised members with different political ideologies, ranging from conservative to socialist. Reaching a consensus on various provisions required extensive debate and compromise.

8. Influence of Global Ideas:

The framers were influenced by global constitutional practices and ideas. They had to adapt these to the Indian context, ensuring that the Constitution was modern yet rooted in Indian traditions.

9. Ensuring Fundamental Rights:

Guaranteeing fundamental rights to all citizens was a crucial and contentious issue. The Constitution needed to balance individual freedoms with the need for social order and progress.

10. Drafting Process:

The drafting process itself was meticulous and time-consuming. Dr. B.R. Ambedkar, the chairman of the drafting committee, and other members worked tirelessly to draft a comprehensive and coherent document.

Conclusion

The making of the Indian Constitution was a monumental task that required addressing the country’s complex social, economic, and political realities. Despite these challenges, the Constituent Assembly succeeded in creating a constitution that has withstood the test of time and continues to guide the world’s largest democracy. The Indian Constitution is celebrated for its inclusiveness, flexibility, and commitment to justice, liberty, equality, and fraternity.


Other questions

Why should we accept the constitution made by the more than 75 years ago​?

What is the difference between imperialism and nationalism?​

Why should we accept the constitution made by the more than 75 years ago​?

Our Constitution, even if made more than 75 years ago, remains relevant and significant for several reasons:

1. Foundational Framework: The Constitution provides the foundational legal and structural framework for the country. It establishes the rule of law, fundamental rights, and the separation of powers, which are essential for the functioning of a democratic society.

2. Timeless Principles: Many principles enshrined in the Constitution, such as justice, liberty, equality, and fraternity, are timeless. These values are fundamental to any society that aspires to be just and equitable.

3. Flexibility and Adaptability: Constitutions are designed to be adaptable to changing circumstances. Most constitutions include provisions for amendments, allowing the document to evolve with the times. The Indian Constitution, for example, has been amended multiple times to address contemporary issues and needs.

4. Continuity and Stability: A constitution provides continuity and stability to the governance of a country. Frequent changes or the rejection of a constitution can lead to political instability and uncertainty. Adhering to a well-established constitution ensures a stable legal and political environment.

5. Collective Wisdom: The original constitution is often a product of extensive deliberation and consensus-building. It reflects the collective wisdom of its framers, who typically include experts, leaders, and representatives from diverse backgrounds. This process ensures that the constitution considers a wide range of perspectives and interests.

6. Protection of Rights: Constitutions protect the fundamental rights and freedoms of individuals. They act as a safeguard against the arbitrary use of power by the state. Rejecting the Constitution could jeopardize these protections.

7. National Identity: The constitution often embodies the historical and cultural ethos of a nation. It serves as a symbol of national identity and unity. Accepting and adhering to the Constitution reinforces a shared sense of belonging and national pride.

8. Judicial Interpretation: Over the years, the judiciary interprets and elaborates on constitutional provisions, creating a rich body of jurisprudence. This body of judicial decisions helps in understanding and applying the Constitution in various contexts.

In summary, accepting and upholding a constitution made more than 75 years ago is essential because it provides a stable, adaptable, and enduring framework for governance. It ensures the protection of fundamental rights, maintains continuity and stability, and reflects the collective wisdom and values of the society.


Other questions

What is the difference between imperialism and nationalism?​

दुर्लभ अर्थव्यवस्था से क्या तात्पर्य है?

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दुर्लभ अर्थव्यवस्था (Scarcity Economy) से तात्पर्य उन परिस्थितियों से है जहां संसाधनों की सीमितता के कारण सभी इच्छाओं और आवश्यकताओं को पूरा करना संभव नहीं होता। इसमें सीमित संसाधनों का प्रभावी और कुशल उपयोग करना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है ताकि अधिकतम संतोष प्राप्त किया जा सके।

दुर्लभ अर्थव्यवस्था (Scarcity Economy) एक ऐसी आर्थिक स्थिति को संदर्भित करती है जहाँ संसाधनों की कमी होती है। इस अवधारणा के मुख्य बिंदु हैं:

दुर्लभ अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ

1. सीमित संसाधन: प्राकृतिक संसाधन जैसे भूमि, पानी, खनिज, और ऊर्जा के स्रोत सीमित होते हैं।
2. असीमित आवश्यकताएँ: मानव की इच्छाएँ और आवश्यकताएँ असीमित होती हैं, जिन्हें सीमित संसाधनों से पूरा करना मुश्किल होता है।
3. विकल्प का चयन: दुर्लभता के कारण संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए विभिन्न विकल्पों में से एक को चुनना पड़ता है।
4. मूल्य और लागत: संसाधनों की कमी के कारण उनकी लागत बढ़ जाती है और उनका मूल्य निर्धारण महत्वपूर्ण हो जाता है।
5. अवसर लागत: किसी एक विकल्प को चुनने पर दूसरे विकल्प को छोड़ना पड़ता है, जिसे अवसर लागत कहते हैं।

उदाहरण

पानी: कई क्षेत्रों में पेयजल की सीमित उपलब्धता के कारण पानी की वितरण और उपयोग में सावधानी बरतनी पड़ती है।
तेल और गैस: जीवाश्म ईंधनों की सीमितता के कारण वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज और उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है।

दुर्लभ अर्थव्यवस्था का मुख्य उद्देश्य होता है संसाधनों का ऐसा प्रबंधन करना जिससे सभी की आवश्यकताएँ पूरी हो सकें और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संसाधन संरक्षित रहें।


Other questions

अर्थव्यवस्था के तीन प्रमुख क्षेत्र के नाम बताएं और उनके बारे में विस्तार से वर्णन करें।

सौर ऊर्जा क्या है? सौर ऊर्जा के क्या-क्या उपयोग है? बिजली की तुलना में सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाए तो उसके क्या लाभ हैं?

What do you mean by physical capital and human capital.​

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Meaning of physical capital and human capital

Physical Capital:

Physical capital refers to the man-made, tangible assets used in production. These assets are created through investment and can be used over extended periods. Examples include:

1. Factories and office buildings
2. Machinery and equipment
3. Infrastructure like roads, bridges, and ports
4. Computers and technology

Physical capital is crucial for economic growth because it increases the productive capacity of an economy. When businesses invest in better equipment or more efficient facilities, they can produce more goods and services with the same amount of labour, leading to higher productivity and economic output.

Human Capital:

Human capital encompasses the intangible assets embodied in individuals. It includes:

1. Knowledge and skills
2. Education and training
3. Health and well-being
4. Creativity and innovation capabilities

Human capital is developed through formal education, on-the-job training, work experience, and personal development. It’s considered a form of capital because, like physical capital, it requires investment (of time and resources) and can generate returns over time.

Relationship to Economic Growth:

Both physical and human capital are essential drivers of economic growth:

1. Complementary nature: Physical and human capital often work together. For example, advanced machinery (physical capital) requires skilled workers (human capital) to operate efficiently.

2. Productivity gains: Both forms of capital increase labour productivity, allowing an economy to produce more with the same amount of labour.

3. Innovation: Human capital, in particular, drives innovation and technological progress, which can lead to the development of new products, services, and more efficient production methods.

4. Long-term growth: Investments in both forms of capital can have long-lasting effects on an economy’s growth potential.

5. Quality of life: Improvements in both physical infrastructure and human capabilities can enhance the overall quality of life, which can indirectly contribute to economic growth.

Understanding the interplay between physical and human capital is crucial for policymakers and businesses when making decisions about investment and economic development strategies.


Other questions

What is the difference between imperialism and nationalism?​

अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले : निदा फ़ाज़ली (कक्षा-10 पाठ-12 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

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NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले : निदा फ़ाज़ली (कक्षा-10 पाठ-12 हिंदी स्पर्श 2)

AB KAHAN DUSRON KE DUKH SE DUKHI HONE WALE : Nida Fazali (Class-10 Chapter-12 Hindi Sparsh 2)


अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले : निदा फ़ाज़ली

पाठ के बारे में…

‘अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले’ निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखा गया एक विचारोत्तेजक निबंध है। इस पाठ के माध्यम से लेखक ने मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति पर कटाक्ष किए हैं। लेखक के अनुसार इस धरती पर प्रकृति ने सभी प्राणियों के लिए जीने का अधिकार और सुविधा दी है, लेकिन मनुष्य नाम के स्वार्थी प्राणी ने पूरी धरती को केवल अपनी ही जागीर समझ लिया है। उसने अन्य प्राणियों जैसे पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, जीव-जंतु आदि को दर-दर भटकने के लिए विवश कर दिया है और उनके जीवन जीने के अधिकार छीन लिए। इसी कारण जीवों की नस्ल खत्म हो चुकी है, यह बहुत तेजी खत्म होने के कगार पर है। मनुष्य को दूसरों के दुख की कोई चिंता नहीं है। वह केवल अपनी स्वार्थी प्रवृत्ति में ही मग्न रहता है।

लेखक के बारे में…

निदा फ़ाज़ली उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार कवि रहे हैं। जिन्होंने आम बोलचाल की भाषा में शेरो शायरी लिखकर और उर्दू कविता लिखकर पाठकों के मन को छुआ है उनसे उनका जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था।  उनकी पहली पुस्तक ‘लफ्जों का पुल’ थी। उन्हें ‘खोया हुआ था कुछ’ नामक रचना के लिए  1999 का साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। अपनी गद्य रचनाओं में शेरो शायरी को पिरोकर वे थोड़े में नहीं बहुत बहुत कुछ कह जाते हैं। निदा फ़ाज़ली ने फिल्मों के लिए अनेक गीत-ग़ज़ल और शेरो-शायरी लिखी हैं। वह हिंदी फिल्मों से गहराई जुड़े रहे हैं। निदा फ़ाज़ली का निधन 8 फरवरी 2016 को हुआ।



हल प्रश्नोत्तर

मौखिक

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए-

प्रश्न 1 : बड़े-बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे क्यों धकेल रहे थे?

उत्तर : बड़े बड़े बिल्डर समुद्र को पीछे इसलिए धकेल रहे थे ताकि वह अधिक से अधिक जमीन पर कब्जा कर सकें और उस पर बड़ी-बड़ी ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी करके लोगों को से बेच कर ढेर सारा पैसा कमा सकें।

बड़े-बड़े बिल्डरों के लिए इमारतें बनाने के लिए जगह की कमी पड़ गई थी। जगह की कमी होने के कारण अब उन्हें समुद्र के किनारे इमारतें बनाने के लिए समुद्र को पाटने की सूझी। इसीलिए वह समुद्र को पीछे धकेल रहे थे ताकि उस जमीन को पाट कर उस पर ऊँची ऊँची इमारतें खड़ी कर सकें।


प्रश्न 2 : लेखक का घर किस शहर में था?

उत्तर : लेखक का घर मुंबई में था, उससे पहले लेखक मध्य प्रदेश के ग्वालियर में रहते थे।

लेखक निदा फ़ाज़ली का घर मुंबई के अंधेरी उपनगर के वर्सोवा इलाके में था, जो कि समुद्र के किनारे स्थित एक प्रसिद्ध इलाका है। लेखक मूलतः मध्यप्रदेश के ग्वालियर के रहने वाले थे, वहीं पर उनका पैतृक घर था।


प्रश्न 3 : जीवन कैसे घरों में सिमटने लगा है?

उत्तर : जीवन अब डब्बे जैसे घरों में सिमटने लगा है और लोग छोटे घरों में रहने को विवश हो गये हैं।

लेखक के अनुसार लोगों का जीवन अब डब्बे जैसे घरों में सिमट कर रह गया है। इसका मूल कारण जनसंख्या का बढ़ना और जगह का कम होना है। पहले जनसंख्या कम थी और जगह ज्यादा, इसलिए लोग बड़े-बड़े घरों में रहते थे, जिसमें दालान-आंगन आदि होते थे। बड़ा परिवार मिलजुल कर रहता था। अब एकल परिवार के दौर में और जगह की कमी के कारण लोग छोटे छोटे डिब्बे जैसे घरों में रहने के लिए विवश हो गए हैं।


प्रश्न 4 : कबूतर परेशानी में इधर-उधर क्यों फड़फड़ा रहे थे?

उत्तर : कबूतर परेशानी में इधर उधर इसलिए फड़ाफड़ा रहे थे, क्योंकि कबूतर के जोड़े के जो दो अंडे थे, वह दोनों अंडे फूट गए थे।

लेखक के घर के रोशनदान में एक कबूतर का जोड़ा रहता था। कबूतरी ने दो अंडे दिये तो एक अंडे को बिल्ली ने खा लिया था, तो दूसरा अंडा लेखक की माँ के गलती से गिरकर फूट गया। अपने दोनों अंडों के फूट जाने के कारण कबूतरों का जोड़ा बेचैनी में इधर-उधर फड़फड़ा रहा था।



लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए

प्रश्न 1 : अरब में लशकर को नूह के नाम से क्यों याद करते हैं?

उत्तर : अरब में लशकर को नूह के नाम से इसलिए याद किया जाता है, क्योंकि नूह को ईश्वर का पैगंबर या दूत माना जाता है।  अरब में लश्कर नाम के एक पैगंबर हैं, जिन्हें नूह कहा जाता है। उनका वर्णन बाइबिल जैसों ग्रंथों में भी मिलता है।

नूह के दिल में अपार करुणा और दया थी। वह हमेशा दूसरों के दुख से दुखी होते थे। लेकिन उनसे भी जीवन में एक गलती हो गई। एक बार एक घायल कुत्ता उनके पास आकर खड़ा हो गया तो उन्होंने कुत्ते को दुत्कारते काटते हुए कहा, दूर हो जा गंदे कुत्ते। तब कुत्ते ने उनकी दुत्कार को सुनकर जवाब दिया कि ना तो मैं अपनी मर्जी से कुत्ता हू, ना ही तुम अपनी मर्जी से इंसान। कुत्ते की यह बात नूह के दिल को गहरे गहराई तक चोट कर गई और आगे जिंदगी अपनी इसी गलती के दुख में दुखी होकर रोते रहे।


प्रश्न 2 : लेखक की माँ किस समय पेड़ों के पत्ते तोड़ने के लिए मना करती थीं और क्यों?

उत्तर : लेखक की माँ शाम को सूरज डूबते समय पेड़ों से पत्ते तोड़ने को मना करती थीं। लेखक की माँ कहती थीं कि शाम के समय पेड़ों से पत्ते तोड़ने से उन्हें कष्ट होता है और पेड़ रोते हैं। इसीलिए वह शाम के समय पेड़ों से पत्ते तोड़ने को मना करती थीं।लेखक की माँ दिया-बत्ती के समय भी पेड़ों से फूलों को तोड़ने को मना करती थी उनका कहना था कि ऐसा करने से फूल बद्दुआ देते हैं। लेखक की माँ लेखक को समझाती थी कि हमेशा दरिया यानी समुद्र को सलाम करो, तो समुद्र खुश होता है। पशु, पक्षियों, कबूतरों को मत सताया करो।


प्रश्न 3 : प्रकृति में आए असंतुलन को क्या परिणाम हुआ?

उत्तर : प्रकृति में आए असंतुलन का यह परिणाम हुआ है कि प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ने लगा है। प्रकृति के असंतुलन के कारण अब गर्मी बहुत अधिक पड़ने लगी है तथा सर्दी भी अधिक पड़ने लगी है। बरसात का समय भी अनिश्चित हो गया है और समय-बेसमय बरसात होने लगी है, जिससे जनधन और फसलों को नुकसान पहुंचता है।

प्रकृति में असंतुलन के कारण समुद्री तूफानों की तीव्रता बढ़ने लगी है और जब-तब आँधी तूफान आने लगे हैंं। प्रकृति में आए असंतुलन के कारण सूखा एवं बाढ़ जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है और इसके साथ ही तरह-तरह के नए लोग भी पैदा हो रहे हैं, जो मानव के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं।


प्रश्न 4 : लेखक की माँ ने पूरे दिन का रोज़ा क्यों रखा?

उत्तर : लेखक के ग्वालियर स्थित मकान के दालान में दो रोशनदान थे, इनमें से एक रोशनदान में कबूतर का एक जोड़ा घोंसला बनाकर रहता था। कबूतर के जोड़े ने अपने घोंसले में दो अंडे दिए थे।

उन दोनों अंडों में से एक अंडा बिल्ली ने गिरा कर तोड़ दिया तो लेखक की माँ ने जब यह देखा तो उन्होंने दूसरे अंडे को बिल्ली से बचाने के लिए उसे उठाने की कोशिश की। अंडा बचाने के चक्कर में उनके हाथ से गलती से अंडा गिरकर टूट गया। यह देखकर कबूतर बेचैन होकर फड़फड़ाने लगे। उनके आँखों में दुख देखकर लेखक की माँ की आँखों में भी आंसू आ गए।

लेखक की माँ एक संवेदनशील महिला थी और पशु पक्षियों के प्रति संवेदना का भाव रखती थी, इसीलिए उन्होंने अपने कृत्य को गुनाह माना और खुदा से माफी मांगने के लिए पूरा दिन रोज़ा रखा।


प्रश्न 5 : लेखक ने ग्वालियर से बंबई तक किन बदलावों को महसूस किया? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : लेखक ने ग्वालियर से बंबई तक अनेक बदलावों को महसूस किया है। लेखक के अनुसार ग्वालियर से बंबई की दूरी में संसार में काफी कुछ बदल गया है। ग्वालियर का लेखक का घर बेहद बड़ा था, जहाँ पर बड़ा आंगन था। पहले के घर बड़े-बड़े होते थे और परिवार भी बड़े बड़े होते थे और परिवार के सभी सदस्य मिलजुल कर रहते थे। अब बंबई जैसे महानगरों में लोग एकल परिवार में सिमट कर रह गए हैं और डब्बेनुमा घरों में रहते हैं।

लेखक वर्सोवा स्थित जिस जगह पर रहता था, वहाँ पर पहले दूर-दूर तक घना जंगल था। वहां पर पेड़-पौधे, परिंदे और दूसरे जानवर रहते थे। अब वहाँ पर समुंदर के किनारे लंबी-चौड़ी बस्ती बन गई है और इस बस्ती के बसाए जाने के कारण कितनी ही परिंदे और जानवरों का घर छिन गया है। कुछ तो छोड़ शहर कर चले गए और जो रह गए उन्हें अपने घर के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है।


प्रश्न 6 : डेरा डालने से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : डेरा डालने का अर्थ है अस्थाई रूप से कहीं पर अपना निवास स्थान बनाना। डेरा अस्थाई घर को कहते हैं। पाठ के आधार पर अगर कहें तो मनुष्य द्वारा की जाने वाली गतिविधियों के कारण पशु पक्षियों को अपनी रहने की जगह को छोड़कर इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। यानि उन्हें अपने रहने के लिए डेरा डालना पड़ता है। पशु पक्षियों को भी रहने के लिए कोई ना कोई जगह चाहिए होती है।

मनुष्य ने हर जगह पर कब्जा बनाना शुरू कर दिया है और उसने पशु पक्षियों की जगह को भी नहीं छोड़ा है। मनुष्य ने जंगल, पेड़-पौधे आदि पर भी कब्जे करने शुरू कर दिए हैं। पहले पेड़ों पक्षी घोंसला बना लेते थे लेकिन मनुष्य में पेड़ों को भी नहीं छोड़ा तो पक्षियों को अपने घोंसले आदि के लिए इमारतों की मचाना आदि पर डेरा डालना पड़ता है, यानी उन्हें अपना अस्थाई घर बनाना पड़ता है।


प्रश्न 7 : शेख अयाज़ के पिता अपने बाजू पर काला च्योंटा रेंगता देख भोजन छोड़कर क्यों उठ खड़े हुए?

उत्तर : शेख अयाज़ के पिता अपनी बाजू पर काला च्योंटा रेंगता देख कर भोजन छोड़कर इसलिए उठ खड़े हुए क्योंकि वह पशु-पक्षियों के प्रति बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे। उनके हृदय में सभी प्राणियों के लिए दया एवं करुणा थी।

एक दिन जब वे स्नान करने के बाद आकर भोजन करने बैठे तो उन्होंने देखा कि एक काला च्योंटा उनके बाजू पर रेंग रहा है। यह देखकर तुरंत भोजन छोड़ कर उठ खड़े हुए। वह समझ गए यह काला च्योंटा स्नान के समय ही कुएँ से उनके साथ आ गया था। वह किसी भी यही प्राणी को उसके घर से बेघर नहीं कर सकते थे। इसीलिए वह तुरंत भोजन छोड़कर कुछ च्योंटे को उसके घर यानि कुएँ पास पहुंचाने चल पड़े, ताकि वह अपने घर से बेघर ना हो पाए।



(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए

प्रश्न 1 : बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर : बढ़ती आबादी का पर्यावरण पर बेहद बड़ा गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है। जैसे-जैसे आबादी बढ़ती जा रही है, पर्यावरण संकट में पड़ता जा रहा है। बढ़ती आबादी के कारण मानव की जरूरतें बढ़ती जा रही हैं, संसाधन कम होते जा रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक दबाव पड़ने लगा है।

बढ़ती आबादी के कारण अधिक लोगों को बसाने के लिए अधिक जगह की आवश्यकता पड़ रही है, जिससे मानव ने जंगल पेड़-पौधे काटने शुरू कर दिए हैं और वहाँ पर ऊँची इमारतें खड़ी करनी शुरू कर दी हैं। जंगल, नदी, पर्वत, समुद्र आदि पर मानव के अतिक्रमण से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है।

जंगलों की कमी से स्वच्छ वायु की कमी हो रही है, बारिश में कमी आ रही है, पेड़ पौधों की कमी होने से गर्मी भी बढ़ती जा रही है। अत्यधिक वर्षा, समय-बेसमय वर्षा, आँधी, तूफान, भूकंप, सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं पर्यावरण में हो रहे, इस असंतुलन का ही परिणाम है और यह पर्यावरण असंतुलन बढ़ती आबादी के कारण मानव के द्वारा प्राकृतिक जगहों पर किए जाने वाले अतिक्रमण के कारण उत्पन्न हुआ है। इसी कारण बढ़ती हुई आबादी का पर्यावरण दुष्प्रभाव ही पड़ा है।


प्रश्न 2 : लेखक की पत्नी को खिड़की में जाली क्यों लगवानी पड़ी?

उत्तर : लेखक की पत्नी को खिड़की में जाली इसलिए लगवानी पड़ी, क्योंकि लेखक के फ्लैट के मचान पर कबूतरों के एक जोड़े ने मैंने अपना डेरा जमा रखा था, यानि अपना घोंसला बना रखा था। कबूतरों ने उस घोसले में अंडे दिए और उन अंडों से बच्चे भी निकल आए थे। इसलिए कबूतर उन्हें दाना-पानी देने के लिए बार-बार आते-जाते रहते थे।

कबूतर कभी-कभी  फ्लैट के अंदर भी चले आते थे। कबूतरों की आवाजाही से लेखक और उसकी पत्नी को असुविधा होने लगी थी। कबूतर अंदर फ्लैट में लेखक की पुस्तकों को भी गंदा कर देते थे। इन सभी असुविधाओं से बचने के लिए लेखक की पत्नी ने घोंसले को थोड़ा आगे खिसका कर बीच में जाली लगा दी ताकि कबूतर अंदर ना आने पायें।


प्रश्न 3 : समुद्र के गुस्से की क्या वजह थी? उसने अपना गुस्सा कैसे निकाला?

उत्तर : समुद्र के गुस्से की यह वजह थी कि बिल्डर लगातार उसकी जमीन को हथियाते जा रहे थे। पहले तो बिल्डरों ने लालच में उसकी जमीन को हथियाना शुरू कर दिया और समुद्र को पीछे धकेलना शुरू कर दिया। इस कारण समुद्र को पहले ऊँकड़ू को कर बैठना पड़ा, फिर भी बिल्डर आगे बढ़ते गए और समुद्र को पीछे धकेलते गए। इससे समुद्र को फिर खड़ा होना पड़ा। फिर भी बिल्डर अपनी हरकतों से बाज नहीं आए और उसकी जमीन को और हथियाते जा रहे थे।

समुद्र का आकार घटता जा रहा था, वैसे सिमटता जा रहा था। अंत में समुद्र के सब्र का बांध टूट गया और वह उसे गुस्सा आया। उसने गुस्से में आकर अपने सीने पर दौड़ते तीन जजों को अलग-अलग दिशाओं में गेंद की तरह उठाकर फेंक दिया। एक जहाज वर्ली के समुद्र के किनारे गिरा। दूसरा बांद्रा में कार्टर रोड के सामने समुद्र के किनारे गिरा तथा तीसरा जहाज गेटवे ऑफ इंडिया के सामने आकर गिरा। इस तरह समुद्र ने तीनों जहाजों को फेंककर अपना गुस्सा निकाला।


प्रश्न 4 : ‘मट्टी से मट्टी मिले,
खो के सभी निशान,
किसमें कितना कौन है,
कैसे हो पहचान’
इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक के कहने का अभिप्राय यह है कि इस संसार में मनुष्य का निर्माण मिट्टी से ही हुआ है और अलग-अलग तरह के मनुष्य अलग-अलग तरह की मिट्टी से बने हैं। लेकिन यह मिट्टी आपस में मिल चुकी हैं। यानी सभी मनुष्य आपस में मिल चुके हैं, और कौन सा मनुष्य कैसा है? वह कहाँ का है? ये सब पहचान करने की कोशिश करना ही व्यर्थ है।

इसलिए मनुष्य में अब भेदभाव करना उचित नहीं और सबको मिलजुलकर ही रहना चाहिए। हर मनुष्य में गुण एवं दोषों का मेल ही होता है। किसी में गुण अधिक होते हैं जो किसी में दुर्गुण अधिक होते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, देशों, शहरों, गाँव से आए हुए मनुष्य किसी अन्य जगह में इतना भी मिल जाते हैं, अपने मूल पहचान से ही अलग हो जाते हैं और उनमें उनकी पहचान बाकी रह गई है यह निश्चित पाना मुश्किल कार्य है और उसकी जरूरत भी नही है।



(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए

प्रश्न 1 : नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। नेचर के गुस्से का एक नमूना कुछ साल पहले बंबई में देखने को मिला था।

आशय : इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक के कहने का आशय यह है कि प्रकृति सहनशील होती है, लेकिन उसके सहन करने की भी एक सीमा है। विराम चिन्ह मानव निरंतर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर रहा है और वह प्रकृति के तत्वों पर अतिक्रमण करता जा रहा है प्रकृति की सहनसीमा अब टूटने लगी है और वह अपना रौद्र रूप दिखाने लगी है। प्रकृति गुस्सा होकर प्राकृतिक आपदाओं के रूप में अपने क्रोध को प्रकट करने लगी है।

ऐसे ही मानव के द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण तथा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से परिणाम का एक उदाहरण बंबई में तब देखने को मिला जब समुद्र ने गुस्से में आकर समुद्र के किनारे खड़े तीन जहाजों को अपनी लहरों से उछाल कर फेंक दिया और तीनों जहाज अलग-अलग जगह पर गिरे। एक वर्ली के समुद्र तट पर, दूसरा बांद्रा में कार्टर रोड के सामने के समुद्र तट पर तथा तीसरा गेटवे ऑफ इंडिया के सामने जा गिरा।

लेखक द्वारा यहाँ पर यह कहने का आशय यह था कि समुद्र द्वारा प्रकट किए क्रोध के कारण समुद्र के किनारे खड़े ये यह दुर्घटना का शिकार हुए। इसलिए मनुष्य को प्रकृति से बहुत अधिक छेड़छाड़ करने से बचना चाहिए नही तो प्रकृति इसकी इसकी सजा अवश्य देगी।


प्रश्न 2 : जो जितना बड़ा होता है उसे उतना ही कम गुस्सा आता है।

आशय : इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक के कहने का आशय यह है कि महान लोगों में हमेशा क्षमा करने तथा क्रोध ना आने का गुण होता है। जो व्यक्ति जितना अधिक बड़ा जितना अधिक महान होता है, उसके अंदर सहनशीलता का भी उतना ही अधिक गुण होता है। पहले तो वह क्रोध करते ही नही और किसी के द्वारा गलती करने पर उसे क्षमा कर देते हैं। क्षमाशीलता का यही गुण ही उन्हें बड़ा और महान बनाता है। ऐसे महान व्यक्ति अपितु क्रोध करते ही नहीं और यदि करते भी हैं,  तो उनका क्रोध बेहद विकराल होता है। फिर उसके सामने कोई नहीं टिक पाता।

समुद्र भी महान होता है। वह मनुष्य द्वारा की जानी वाली छेड़छाड़ को चुपचाप सहन करता रहता है और हमेशा माफ कर देता है. लेकिन जब समुद्र के सब्र का बांध टूट जाता है तो वह अपना क्रोध को विकराल रूप में प्रकट करता है। लेखक ने महान व्यक्तियों और समुद्र के इन्हीं गुणों की तुलना की है।


प्रश्न 3 : इस बस्ती ने न जाने कितने परिंदों-चरिंदों से उनका घर छीन लिया है। इनमें से कुछ शहर छोड़कर चले गए हैं। जो नहीं जा सके हैं उन्होंने यहाँ-वहाँ डेरा डाल लिया है।

आशय : इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक ने जंगलों पर मानव द्वारा किए जाने वाले अतिक्रमण तथा बढ़ते शहरीकरण पर चिंता प्रकट की है। मानव ने नई-नई बस्तियों बसाने के लिए जंगलों को नष्ट करना शुरू कर दिया है। इन जंगलों में पशु-पक्षी आदि रहते थे, जो उनके मूल घर थे।

अब यहां पर बस्तियां बस चुकी हैं, इसलिए यहां के मूलनिवासी पशु-पक्षी आदि को इस जगह को छोड़कर इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। कुछ तो यह शहर छोड़कर ही चले गये हैं और जो कुछ बचे रह गए हैं, उन्हें भी शहर में अपने आश्रय स्थल को ढूंढना पड़ रहा है और इसकी कारण यहाँ-वहाँ इमारतों आदि में अपना डेरा जमा लेते हैं।


प्रश्न 4 : शेख अयाज़ के पिता बोले, ‘नहीं, यह बात नहीं है। मैंने एक घरवाले को बेघर कर दिया है। उस बेघर को कुएँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ।’ इन पंक्तियों में छिपी हुई उनकी भावना को स्पष्ट कीजिए।

आशय : शेख अयाज़ के पिता बोले, नहीं यह बात नहीं है कि मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है। उसके घर को वहाँ पर उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ। इन पंक्तियों के पीछे शेख अयाज़ के पिता की मानवीयता, प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता, करुणा और दयालुता की भावना प्रकट होती है।

शेख अयाज़ के पिता प्राणीमात्र के प्रति दया एवं करुणा का भाव रखते थे। करुणा का मतलब केवल मनुष्य के प्रति दया-करुणा प्रकट करने से नहीं होता बल्कि संसार के हर प्राणी चाहे वह छोटा सा कीड़ा क्यों ना हो, उसके प्रति भी दया एवं करुणा का भाव अपनाना ही सच्ची दया एवं करुणा है।

हमारी दया एवं करुणा चयनित नहीं हो सकती यानी हम किसी के प्रति अपार दया एवं करुणा का भाव अपनाएं और किसी दूसरे प्राणी के प्रति निर्दयी हो जाए तो वह सच्ची दया-करुणा नहीं है।। हर प्राणी के प्रति दया एवं करुणा का भाव होना चाहिए। शेख अयाज़ के पिता एक छोटे से कीड़े के प्रति दया करुणा का भाव रखते थे। गलती से एक कीड़ा कुएँ से उनके कपड़ों के साथ चिपक उनके घर तक आ गया। अब उसे उसके घर से बेघर नहीं कर सकते थे, इसीलिए जब उन्हें वह अपने कपड़ों पर दिखा वे उसे उसके घर यानि कुएँ तक छोड़ने चले गए।



भाषा अध्ययन

प्रश्न 1 : उदाहरण के अनुसार निम्नलिखित वाक्यों में कारक चिह्नों को पहचानकर रेखांकित कीजिए और उनके नाम रिक्त स्थानों में लिखिए; जैसे-
NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 15 अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले Q1
उत्तर : कारक चिन्हों के नाम इस प्रकार होेगे..

(क) माँ ने भोजन परोसा — कर्ता कारक
(ख) मैं किसी के लिए मुसीबत नही हूँ। अधिकरण कारक
(ग) मैंने एक घर वाले को बेघर कर दिया कर्ता कारक, कर्म कारक
(घ) कबूतर परेशान में इधर-उधर फड़फड़ा रहे थे। — अधिकरण कारक
(ङ) दरिया पर जाओ तो उसे सलाम किया करो। — अधिकरण कारक, कर्म कारक


प्रश्न 2 : नीचे दिए गए शब्दों के बहुवचन रूप लिखिए-
चींटी, घोड़ा, आवाज, बिल, फ़ौज, रोटी, बिंदु, दीवार, टुकड़ा।

उत्तर : बहुवचन रूप इस प्रकार होंगे…

चींटीं चीटियां 
घोड़ा — घोड़े
आवाज — आवाजें
बिल — बिलें
फ़ौज — फ़ौजें
रोटी — रोटियां
बिंदु — बिंदुएं
दीवार — दीवारें
टुकड़ा — टुकड़े


प्रश्न 3 : ध्यान दीजिए नुक्ता लगाने से शब्द के अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। पाठ में दफा’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ होता है-बार (गणना संबंधी), कानून संबंधी। यदि इस शब्द में नुक्ता लगा दिया जाए तो शब्द बनेगा ‘दफ़ा’ जिसका अर्थ होता है-दूर करना, हटाना। यहाँ नीचे कुछ नुक्तायुक्त और नुक्तारहित शब्द दिए जा रहे हैं उन्हें ध्यान से देखिए और अर्थगत अंतर को समझिए।
सजा – सज़ा
नाज – नाज़
जरा – ज़रा
तेज – तेज
निम्नलिखित वाक्यों में उचित शब्द भरकर वाक्य पूरे कीजिए-
  1. आजकल ……….. बहुत खराब है। (जमाना/जमाना)
  2. पूरे कमरे को ………… दो। (सजा/सजा)
  3. ………… चीनी तो देना। (जरा/जरा)
  4. माँ दही ………. भूल गई। (जमाना/जमाना)
  5. दोषी को ……….. दी गई। (सजा/सज़ा)
  6. महात्मा के चेहरे पर …………. था। (तेज/तेज़)

उत्तर : रिक्तस्थान की पूर्ति इस प्रकार होगी…

  1. आजकल ज़माना बहुत खराब है। (जमाना/ज़माना)
  2. पूरे कमरे को सजा दो। (सजा/सज़ा)
  3. जरा चीनी तो देना। (जरा/ज़रा)
  4. माँ दही जमाना भूल गई। (जमाना/ज़माना)
  5. दोषी को सज़ा दी गई। (सजा/सज़ा)
  6. महात्मा के चेहरे पर तेज था। (तेज/तेज़)


योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 : पशु-पक्षी एवं वन्य संरक्षण केंद्रों में जाकर पशु-पक्षियों की सेवा-सुश्रूषा के संबंध में जानकारी प्राप्त कीजिए।

उत्तर : ये एक प्रायोगिक कार्य है। विद्यार्थी अपने निकट के वन्य संरक्षण केंद्र में जाएं और वहाँ पर केंद्र के कर्ता-धर्ता कैसे कार्य करते हैं, वे पशु-पक्षियों की कैसे सेवा-सुश्रूषा करते हैंं उनसे जानकारी प्राप्त करें और उनकी कार्यविधि को देखकर समझने का प्रयास करें।



परियोजना कार्य

प्रश्न 1 : अपने आसपास प्रतिवर्ष एक पौधा लगाइए और उसकी समुचित देखभाल कर पर्यावरण में आए असंतुलन को रोकने में अपना योगदान दीजिए।

उत्तर : ये भी एक प्रायोगिक कार्य है। विद्यार्थी नियमित वृक्षारोपण का संकल्प लें।


प्रश्न 2 : किसी ऐसी घटना का वर्णन कीजिए जब अपने मनोरंजन के लिए मानव द्वारा पशु-पक्षियों का उपयोग किया गया हो।

उत्तर : हमारे गाँव में हर साल एक मेला आयोजित होता था, जहाँ पशु-पक्षियों का मनोरंजन के लिए उपयोग किया जाता था। मेले में एक खास आकर्षण था – बंदरों का नाच। कुछ लोग बंदरों को पकड़कर, उन्हें कठोर प्रशिक्षण देते थे और फिर उन्हें रंग-बिरंगे कपड़े पहनाकर नचाते थे। लोग तालियां बजाते और हंसते, लेकिन वे बंदरों की पीड़ा को अनदेखा करते थे।

इसी तरह गाँव में एक और खेल में मुर्गों की लड़ाई करवाई जाती थी, जिसमें दो मुर्गों को आपस में लड़वाया जाता था। यह खेल देखने के लिए बड़ी भीड़ जुटती थी। इन गतिविधियों से पशु-पक्षियों को कष्ट होता था, लेकिन मनोरंजन के नाम पर इनकी तकलीफों की परवाह नहीं की जाती थी।


अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले : निदा फ़ाज़ली (कक्षा-10 पाठ-12 हिंदी स्पर्श 2) (NCERT Solutions)


कक्षा-10 हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ

साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पद : मीरा (कक्षा-10 पाठ-2 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तोप : वीरेन डंगवाल (कक्षा-10 पाठ-5 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

कर चले हम फिदा : कैफ़ी आज़मी (कक्षा-10 पाठ-6 हिंदी स्पर्श भाग-2) (हल प्रश्नोत्तर)

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तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र : प्रहलाद अग्रवाल (कक्षा-10 पाठ-11 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

‘उगलेंगे आग कारखाने, हर ओर अंधेरा छाएगा’ – पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?

‘उगलेंगे आग कारखाने, हर ओर अंधेरा छाएगा’ – इस पंक्ति में अलंकार

‘उगलेंगे आग कारखाने, हर ओर अंधेरा छाएगा’

अलंकार : अतिश्योक्ति अलंकार

स्पष्टीकरण :

इस पंक्ति में ‘अतिशयोक्ति अलंकार’ है। इस पंक्ति में अतिशयोक्ति अलंकार इसलिए है, क्योंकि अतिशयोक्ति अलंकार इस काव्य पंक्ति में किसी घटना का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है। अतिश्योक्ति अलंकार किसी काव्य में तब प्रकट होता है, जब किसी काव्य में कवि द्वारा किसी घटना, प्रसंग आदि का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाए।
अतिशयोक्ति अलंकार की परिभाषा के अनुसार जब किसी घटना अथवा दृश्य आदि के भवन का वर्णन कवि द्वारा इतना बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए कि सामान्य लोक सीमा का उल्लंघन हो जाए और बात अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हो तो वहां पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। इस पंक्ति में भी ‘आग उगलेंगे कारखाने, चारों ओर अंधेरा छाएगा’ के माध्यम से घटना का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन किया जा रहा है, इसलिए यहाँ पर ‘अतिशयोक्ति अलंकार’ होगा।

अलंकार क्या हैं?

अलंकार वे शब्द होते हैं, जो किसी भी काव्य में सौंदर्य को बढ़ा देते हैं। अलंकार किसी काव्य के लिए आभूषण का कार्य करते हैं। जिस तरह किसी मानव के लिए आभूषण उसके सौंदर्य में वृद्धि करते हैं उसी तरह अलंकार किसी काव्य सौंदर्य में वृद्धि करते हैं।


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How human beings are different from other living things.

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Human beings are distinct from other living things in several significant ways, encompassing physical, cognitive, social, and cultural aspects.

Human beings are distinct from other living things in several significant ways. Firstly, humans possess advanced cognitive abilities, including complex reasoning, abstract thinking, and problem-solving skills that far surpass those of other species. This intellectual capacity has enabled us to develop sophisticated languages, create and use advanced tools, and build complex societies and cultures.

Humans have highly developed brains, capable of complex thought processes, problem-solving, and abstract thinking. This intelligence allows for scientific discovery, technological innovation, and sophisticated planning.

Humans have developed complex languages, both spoken and written, enabling detailed communication, expression of ideas, and preservation of knowledge across generations.

Humans possess a high degree of self-awareness and the ability to reflect on their own thoughts, emotions, and actions, leading to personal growth and ethical considerations.

Humans differ from other living beings through advanced cognitive abilities, including complex thought processes, language, self-awareness, and reflection. These abilities enable scientific discovery, technological innovation, and detailed communication. Additionally, humans have developed intricate social structures and cultures, with diverse traditions, customs, and ethical systems. This social complexity is reflected in their creation of art, music, literature, and moral debates.

Technologically, humans are distinguished by their tool-making capabilities and continuous innovation, transforming their environments through machinery, technology, and infrastructure. They experience a wide range of complex emotions and form deep relationships, extending beyond immediate kinship to include various social networks. Humans also significantly impact their environment, engaging in both conservation efforts and activities that can lead to environmental changes. Their adaptability, resilience, and formal education systems further set them apart, enabling them to thrive in diverse environments and continuously advance as a species.

Humans create intricate social structures and cultures, with diverse traditions, customs, laws, and institutions. These cultural elements shape human behaviour and societal organization.

Humans develop and follow moral and ethical systems, debating concepts of right and wrong, justice, and fairness.

Humans express themselves through art, music, literature, and various forms of creative expression, reflecting and shaping cultural identities.Humans continuously innovate, developing new technologies and methods to solve problems, improve living standards, and explore beyond their immediate environment, such as space exploration.


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हिंदी एक भाषा नहीं भारत की पहचान है | यह हमारे नैतिक मूल्यों, संस्कारो और संस्कृति का प्रतीक है। यह सरल सहज और समझने की दृष्टि से बहुत ही सुगम भाषा है। यह विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओ में तीसरे स्थान पर आती है । इस आधार पर ही हम इसके महत्व को समझ सकते है।

भारत की मूल भाषा तथा हमारी संस्कृति की आन बान शान दुनिया की प्राचीनतम भाषाओ में से एक भाषा हिंदी है। हिंदी हम भारतीयों की पहचान है। हिन्दी भाषा को 14 सितम्बर 1949 को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। भारत में राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा का दर्जा दोनों हिंदी को ही प्राप्त है । भारतीय संस्कृति तथा भारतीयता का दुनियाभर में परचम लहराने में हिंदी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हिंदी के आधार पर हम भारतीयों को एक अलग पहचान का दर्जा मिलता है । पर आज हमारी इस मातृभाषा के महत्व को हम भुलाकर विदेशी भाषओं को अपना रहे है । हमारे देश की मातृभाषा के ज्ञाता को हम गंवार और विदेशी भाषाओं के ज्ञाता को हम ज्ञानी मानते है ।

यह हमारे लिए बड़ी विडबंना की बात है कि हम अपनी मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं। हमे जीवन में हिंदी को अपनाकर इसका विकास करना चाहिए । सरकार द्वारा हिंदी के विकास के लिए उठाए जा रहे कदम कारगर साबित हो रहे है । लगातार प्रयासों से कंप्यूटर में हिंदी भाषा को जोड़ने से कार्य आसानी से किया जा रहा है । जो हम भारतीय लोगो के लिए तथा हिंदी भाषी लोगो के लिए उपयोगी साबित हुआ है |

सभी विभागों और कार्यालयों की साईट हिंदी बनाकर उस पर हिंदी में कार्य करना पहले की तुलना में आसन हो गया है । सरकार द्वारा शुरू की जा रही नवीन जन कल्याणकारी योजनाओ का हिंदी के माध्यम से सभी को लाभ मिल सकेगा । अगर तुम मेरे विचार से सहमत हो तो मुझे अवश्य बताना । तुम्हारे सकारात्मक उत्तर की अपेक्षा है । अपने माता-पिता को मेरा चरण स्पर्श कहना । आशा करता हूँ कि हमारी मुलाकात शीघ्र हो ।

तुम्हारा मित्र,
मोहन ।


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अपने चाचा-चाची को अपने जन्मदिन के लिए निमंत्रण पत्र लिखें।

गर्मियों की छुट्टियों में तुम्हारे दिन कैसे बीते हैं, अपनी बुआजी को पत्र लिखें।

अपने घर के बड़े-बूढों से उनके समय की शिक्षा, सामाजिक परिवेश व संस्कृति के विषय में चर्चा करके उसे संवाद के रूप में लिखिए।

संवाद लेखन

बदलते समय परिवेश पर दादा-दादी-पोती का संवाद

 

पोती ⦂ दादा जी आपने कितनी कक्षा तक पढ़ाई की है?

दादा ⦂ बेटी में दसवीं कक्षा तक पढ़ा हूँ।

पोती ⦂ और दादी आपने कितनी तक पढ़ाई की है?

दादी ⦂ बेटी मैं केवल आठवीं तक पढ़ी हूँ, लेकिन हमारे जमाने में 8वीं तक पढ़ाई कर पाना भी बहुत बड़ी बात होती थी।

पोती ⦂ दादा जी आप के समय में लोग ज्यादा क्यों नहीं पढ़ते थे।

दादा ⦂ बेटी, ऐसी बात नहीं है। हमारे समय भी अच्छी पढ़ाई होती थी। लेकिन गाँव आदि में पढ़ाई का इतना अधिक जोर नहीं होता था। लोग खेती के कामों में व्यस्त रहते थे। खेती ही मुख्य रोजगार था, इसी कारण पढ़ाई में अधिक ध्यान नहीं दे थे।

पोती ⦂ अच्छा आपने पढ़ाई करने के बाद कोई नौकरी की थी?

दादा ⦂ हाँ बेटी, मैं दसवीं पास करने के बाद अपने गाँव में पटवारी बना था और लंबे समय तक पटवारी का काम किया। उसके बाद मैं नौकरी छोड़कर खेती के काम में लग गया।

पोती ⦂ दादी, आप अपने घर से स्कूल कैसे जाती थी?

दादी ⦂ हमारे गाँव में स्कूल नहीं था। हमारे बगल के गाँव में स्कूल था और मेरे पिताजी साइकिल पर बैठाकर रोज मुझे स्कूल छोड़ने जाया करते थे और फिर स्कूल से लेकर आया करते थे।

पोती आपके जमाने में टीवी था?

दादी ⦂ नहीं बेटी, हमारे जमाने में टीवी नहीं था। बस केवल रेडियो होता था। उसी पर गाना सुन लेते थे।

पोती ⦂ आप लोग बिना टीवी और सिनेमा के कैसे गुजारा कर लेते थे?

दादा ⦂ बेटी, ऐसी बात नहीं है। पहले के लोग मिलनसार होते थे। टीवी और सिनेमा के बिना भी मनोरंजन किया जा सकता है। हम सभी गाँव के लोग चौपाल पर बैठकर लोकगीत गाया करते थे और नृत्य संगीत का कार्यक्रम होता था। हम सब गाँव के लोग मिलजुलकर अपना मनोरंजन किया करते थे।

पोती ⦂ वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। पहले के पुराने लोग सब लोग कितना मिलकर रहते थे। आज तो  सब अपने में मगन हैं, किसी को किसी की नहीं पड़ी है।

दादा ⦂ ये बात तो है बेटी, जमाना बदल गया है। लोग स्वार्थी और आत्मकेंद्रित हो गए हैं।

पोती ⦂ काश! पहले का जमाना लौट आए।

दादा ⦂ बेटी, ऐसा नहीं हो सकता। परिवर्तन समय का नियम है। बीता समय वापस नहीं आता।


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पाठशाला के चपरासी का साक्षात्कार वाला संवाद लिखें।

200 शब्दों में एक अनुच्छेद लिखिए ‘मनुष्यता क्या है?’

अनुच्छेद लेखन

मनुष्यता क्या है?

 

मनुष्यता से तात्पर्य उस आचरण और व्यवहार से है, जो मानव में ही पाया जाता है, पशुओं में नहीं। कुछ संवेदनात्मक व्यवहार प्रकृति ने केवल मनुष्य के लिए ही प्रदान किए हैं। यह संवेदनात्मक व्यवहार एवं आचरण जो कि मनुष्य के अंदर ही पाए जाते हैं, वही मनुष्यता कहलाती है। यह संवेदनात्मक आचरण और व्यवहार हैं, दया, प्रेम, करुणा, विचारशीलता, बुद्धिमत्ता, संस्कार और सभ्यता आदि। यह सभी मानवीय संवेदनाएं और मानवीय आचरण कहलाते है, जो मनुष्य में पाई जाती है। इन्हीं सभी गुणों और व्यवहारों का समूह ही मनुष्यता है। जो व्यक्ति इन सभी गुणों से रहित होता है, वह मनुष्य होकर भी पशु के समान है।

संसार के सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है, जो अपने भोजन-पानी इतर भी बहुत कुछ कार्य  करता है। संसार के अन्य संभी प्राणी केवल अपने भोजन की तलाश करने और अपने भोजन को करने में ही अपना जीवन व्यतीत कर देते है। भोजन के अतिरिक्त उनका अन्य कोई कार्य नहीं होता। जबकि मनुष्य के अंदर संवेदनाएं, बुद्धि और विचारशीलता भी होती है, जिनके आधार पर अपने भोजन के प्रबंध करने के अतिरिक्त भी अनेक कार्य करता है। इसीलिये मनुष्य इस संसार के सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, जिसमें अनेक विशिष्ट गुण पाए जातें है। यही गुण उसे मनुष्यता की पहचान देते हैं।

इसीलिए जिस व्यक्ति के अंदर ऐसे गुणों का अभाव पाया जाता है उसे अक्सर कह देते हैं, कि उसके अंदर मनुष्यता नहीं बची।


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‘नए घर में प्रवेश’ इस विषय पर एक अनुच्छेद लिखें।

जब मैं बारिश में भीगा… (अनुच्छेद)

Soumen was never late. (Affirmative)

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The affirmative form of ‘Soumen was never late’ is:

Affirmative: Soumen was always on time.

Explanation:

To convert this sentence from negative to affirmative, we need to replace the negative word ‘never’ with its positive equivalent. In this case, ‘never late’ becomes ‘always on time.’

This transformation maintains the original meaning of the sentence while expressing it in a positive way. Both versions convey that Soumen consistently arrived at the expected or designated time, without fail.

The change from negative to affirmative often involves:
1. Identifying the negative element (in this case, ‘never’)
2. Finding an appropriate positive equivalent (‘always’)
3. Adjusting the rest of the sentence to fit the new structure

This process preserves the core meaning while shifting the sentence’s construction from a negative statement to a positive one.


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What do we understand by the words ‘took the teacher apart’?

Write a paragraph on Charles Dickens (300 words)

What do we understand by the words ‘took the teacher apart’?

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The phrase ‘took the teacher apart’ is an idiomatic expression that doesn’t mean literally dismantling the teacher. Instead, it has a figurative meaning:

1. Primary meaning: To criticize or reprimand severely
In this context, it likely means that someone (probably a student, parent, or administrator) strongly criticized or scolded the teacher. They may have pointed out flaws, mistakes, or issues with the teacher’s performance or behaviour in a harsh or detailed manner.

2. Secondary meaning: To question intensely or thoroughly
It could also mean that someone interrogated the teacher extensively, asking many probing questions about a particular issue or situation.

3. Informal usage: To defeat thoroughly (in a debate or argument)
In some cases, it might mean that someone comprehensively won an argument against the teacher, countering all their points effectively.

The exact interpretation would depend on the broader context in which this phrase is used. It’s generally understood to be a negative experience for the teacher, implying they were on the receiving end of severe criticism or intense scrutiny.


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Write a paragraph on Charles Dickens (300 words)

Write an essay about ‘Save Water’

Write a paragraph on Charles Dickens (300 words)

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Paragraph

Charles Dickens

 

Charles Dickens, born on February 7, 1812, in Portsmouth, England, is widely regarded as one of the greatest novelists of the Victorian era. His works, characterized by vivid characters, social criticism, and compelling narratives, have left an indelible mark on English literature and popular culture. Dickens’ writing career began as a journalist, but he quickly rose to fame with the serialized publication of ‘The Pickwick Papers’ in 1836. This success paved the way for a prolific career that produced numerous classics, including ‘Oliver Twist,’ ‘A Christmas Carol,’ ‘David Copperfield,’ and ‘Great Expectations.’

Dickens’ novels often reflected the harsh realities of 19th-century England, particularly the struggles of the working class and the poor. His own experiences of poverty and child labour, when he was forced to work in a factory at the age of 12 due to his father’s imprisonment for debt, deeply influenced his writing. This personal connection to hardship imbued his works with a sense of authenticity and compassion that resonated with readers across social classes.

As a social reformer, Dickens used his platform to criticize the injustices of his time, including child labour, the failings of the legal system, and the squalid conditions in urban slums. His detailed descriptions and memorable characters brought these issues to life for his readers, often spurring public debate and contributing to social change.

Dickens’ writing style was notable for its humour, pathos, and intricate plots. He excelled at creating unforgettable characters, from the miserly Ebenezer Scrooge to the tragic Sydney Carton, that have become iconic figures in literature. His ability to blend comedy and tragedy, often within the same work, showcased his deep understanding of the human condition.

Beyond his novels, Dickens was also a popular public speaker and performer, often giving dramatic readings of his works to enthusiastic audiences. His influence extended far beyond literature, impacting social reform, journalism, and even the celebration of Christmas, which was revitalized in part due to the popularity of ‘A Christmas Carol.

‘Charles Dickens passed away on June 9, 1870, leaving behind a legacy that continues to inspire and entertain readers worldwide. His works remain relevant today, adapted countless times for stage and screen, and studied in schools and universities across the globe.


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Write an essay about ‘Save Water’

When Rabindra’s Mother passed away he was inconsolable. (Change to negative)

Write an essay about ‘Save Water’

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Essay

Save Water

 

Water is an essential resource for all life on Earth, yet it’s often taken for granted. The importance of conserving water cannot be overstated, as freshwater scarcity is becoming an increasingly critical issue worldwide. Saving water is not just an environmental concern; it’s a matter of survival for future generations.

There are numerous ways individuals can contribute to water conservation. Simple habits like turning off taps while brushing teeth or shaving, fixing leaky faucets, and using water-efficient appliances can significantly reduce household water consumption. In our gardens, choosing drought-resistant plants and collecting rainwater for irrigation can make a substantial difference.

On a larger scale, industries and agriculture need to adopt water-saving technologies and practices. Governments should implement policies that encourage water conservation and invest in infrastructure to prevent water loss through leakage and inefficient distribution systems.

Education plays a crucial role in promoting water conservation. Raising awareness about the importance of water and teaching sustainable water use practices in schools and communities can lead to long-term behavioural changes.

By saving water, we not only preserve a vital resource but also reduce energy consumption associated with water treatment and distribution. This, in turn, helps combat climate change. Every drop saved contributes to a more sustainable future, ensuring that clean water remains available for generations to come.

Ultimately, saving water is a collective responsibility. By making conscious efforts to use water wisely, we can make a significant impact on preserving this precious resource for our planet and its inhabitants.


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Write an essay on the topic – ‘Disadvantages of social media in student’s life.​’

Essay on Rabindranath Tagore in 200 words.

When Rabindra’s Mother passed away he was inconsolable. (Change to negative)

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The negative form of the sentence is:

Original sentence: When Rabindra’s Mother passed away he was inconsolable.
Negative sentence: When Rabindra’s Mother passed away he was not consolable.

Explanation:

To change this sentence to negative, we focus on the adjective ‘inconsolable.’ The prefix ‘in-‘ in ‘inconsolable’ already makes it negative, meaning ‘not able to be consoled or comforted.’ To negate this, we remove the prefix ‘in-‘ and add ‘not’ before the adjective.

how does you feel when you came to know that your old class teacher is now not your class teacher write in diary entry​.

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Diary Entry

When my class teacher was no longer my class teacher.

 

10 July 2024 (9.30 PM)

Dear Diary,

Today, I received some unexpected news that has left me with mixed emotions. Ms. Malti, who has been our class teacher at City Girls School, Shimla, for so long, will no longer be teaching our class. I’m not sure how to feel about this change.

On one hand, I’m sad because Ms. Malti has been such an important part of our school lives. Her kind smile, patient explanations, and encouraging words have guided us through so many challenges. I’ll miss her unique way of making even the most difficult subjects interesting.

Yet, I’m also curious about who our new class teacher will be. Will they be as understanding as Ms. Malti? Will they have new teaching methods that might be exciting?

I’m grateful for all Ms. Malti has taught us, both in academics and life lessons. While change can be uncomfortable, I hope this transition brings new opportunities for growth. I’ll always cherish the memories of Ms. Malti’s classes.

Karuna,
Shimla


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Did you help any animal ? and how?

Your friend wants to visit Rajasthan for a trip. Write an E-mail to your friend giving the knowledge about Rajasthan.

Did you help any animal ? and how?

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Memoirs

Once I helped a Cow

 

Yes, I once helped a cow in distress. While walking home one evening, I noticed a cow that had wandered onto a busy road. The animal seemed confused and frightened by the honking vehicles, putting both itself and drivers at risk. Recognizing the danger, I cautiously approached the cow, speaking softly to calm it. Using gentle gestures and a soothing voice, I managed to guide the cow towards the side of the road. It took some patience, but eventually, I led it to a nearby field where it could graze safely.

Once the cow was secure, I contacted the local animal welfare organization to inform them about the situation. They arrived shortly after to check on the animal’s well-being and locate its owner. The experience left me feeling grateful for the opportunity to help a creature in need and reinforced the importance of being aware of and compassionate towards the animals we share our environment with. It was a small act, but one that potentially prevented harm to both the cow and passing motorists.


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Your friend wants to visit Rajasthan for a trip. Write an E-mail to your friend giving the knowledge about Rajasthan.

Which of the following is a synonym for ‘eager’? a) hesitant b) enthusiastic c) lazy d) indifferent

‘निराला की साहित्य साधना’ के लेखक हैं : (i) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ (ii) महादेवी वर्मा (iii) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ (iv) डॉ. राम विलास शर्मा

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सही विकल्प होगा :

(iv) डॉ. राम विलास शर्मा

विस्तृत विवरण

‘निराला की साहित्य-साधना’ एक जीवनी है, जिसकी रचना हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार ‘रामविलास शर्मा’ ने की है।

‘निराला की साहित्य-साधना’ नामक इस रचना के लिए रामविलास शर्मा को 1970 में ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है।

रामविलास शर्मा द्वारा रचित ‘निराला की साहित्य-साधना’ नामक जीवनी का प्रकाशन तीन खंडों में हुआ। पहले खंड का प्रकाशन 1969 में, द्वितीय खंड का प्रकाशन 1972 में तथा तीसरे खंड का प्रकाशन 1976 में हुआ था। इस जीवनी के तीनों खंडों में सबसे प्रसिद्ध खंड प्रथम खंड ही रहा है, जिसमें रामविलास शर्मा निराला के जीवन के अंतरंग पलों के बारे में विस्तृत विवेचन किया है। द्वितीय खंड में उन्होंने निराला के कृतित्व की बात की है और उनकी रचनाओं का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है। तृतीय खंड में उन्होंने निराला द्वारा लिखे गए पत्रों का संग्रह प्रस्तुत किया है।

रामविलास शर्मा हिंदी पर जाने-माने साहित्यकार कवि रहे हैं। उनका जन्म 10 अक्टूबर 1912 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के ऊँचगाँव नामक गाँव में हुआ था उन्होंने अनेक आलोचनात्मक ग्रंथ, भाषा समाज और भाषा विज्ञान पर आधारित पुस्तकें, इतिहास समाज और संस्कृति तथा दर्शन पर आधारित पुस्तकें, कविता, नाटक, उपन्यास, आत्मकथा, साक्षात्कार, पत्र संवाद, संपादकीय जैसी कृतियों की रचना की। उनका निधन 30 मई 2000 को हुआ।


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‘कलम का सिपाही’ किस विधा की रचना है?

‘बाबू गुलाब राय’ की रचना ‘मेरी असफलताएं’ किस विधा की रचना है?

Your friend wants to visit Rajasthan for a trip. Write an E-mail to your friend giving the knowledge about Rajasthan.

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Informal Letter (E-mail writing)

E-mail to the friend giving information about Rajasthan

To: sunita.singh226@gmail.com
From: mitali.sharma83@gmail.com

Subject: Exploring the Royal State of Rajasthan

Dear Sunita,

I hope this email finds you in great spirits! I heard you are planning a trip to Rajasthan, and I couldn’t be more excited for you. Rajasthan, the Land of Kings, is a vibrant state full of rich history, stunning architecture, and diverse culture.

I have visited Rajasthan twice, so I know a lot about Rajasthan. I want to share this knowledge with you. I have a brief guide to help you make the most of your trip.

Major Attractions

1. Jaipur (The Pink City)
Amber Fort: A majestic fort with a blend of Hindu and Mughal architecture.
City Palace: A beautiful palace complex with museums showcasing royal artifacts.
Hawa Mahal: The iconic “Palace of Winds” with its unique honeycomb design.

2. Udaipur (The City of Lakes)
City Palace: Overlooking Lake Pichola, it offers a fascinating insight into the Mewar dynasty.
Lake Pichola: Take a boat ride to enjoy the scenic beauty.
Jag Mandir: An exquisite palace on an island in Lake Pichola.

3. Jaisalmer (The Golden City)
Jaisalmer Fort: One of the largest forts in the world, still inhabited by locals.
Sam Sand Dunes: Experience the Thar Desert with a camel safari and cultural performances.
Patwon Ki Haveli: A cluster of five havelis with intricate carvings and architecture.

4. Jodhpur (The Blue City)
Mehrangarh Fort: A massive fort with a museum, offering a panoramic view of the city.
Umaid Bhawan Palace: A part palace, part museum, and part luxury hotel.
Clock Tower and Sardar Market: A bustling market to experience local life and shop for souvenirs.

5. Ranthambore National Park
Ideal for wildlife enthusiasts, it’s one of the best places to spot tigers in their natural habitat.

Cultural Experiences

Local Cuisine: Don’t miss out on Dal Baati Churma, Ghevar, and Pyaaz Kachori. Each city has its own specialty, so be sure to try local dishes.

Folk Music and Dance: Enjoy performances of Ghoomar, Kalbeliya, and traditional Rajasthani music.
Shopping: Rajasthan is famous for its handicrafts, textiles, jewelry, and pottery. Johari Bazaar in Jaipur and Clock Tower Market in Jodhpur are mustvisits.

Best Time to Visit

The best time to visit Rajasthan is during the cooler months from October to March. The weather is pleasant, making it ideal for sightseeing and exploring.

Travel Tips

Rajasthan can be quite hot, especially in summer. Carry water and stay hydrated. Light, cotton clothes are best. However, some religious sites require modest clothing.

Rajasthan is a popular tourist destination, so it’s wise to book accommodations and major attractions in advance.

I hope this information helps you plan an amazing trip to Rajasthan. If you need any more details or have specific questions, feel free to ask.

Have a fantastic journey and make sure to share your experiences when you get back!

Warm regards,

Mitali


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Write a letter to the editor of the newspaper about complaining the government hospital.

What makes you happy when you’re sad?​ Write your thoughts on this topic

Underline the simple adverb in each sentence. Tell its kind too 1. I gladly accept her offer. 2. I had fever yesterday. 3. She seldom comes to see us. 4. She is too tired to complete the project. 5. Send the peon here. 6. Do things slowly, but surely. 7. I can speak English well. 8. This is somewhat true. 9. Do it now. 10. We pray to God daily.

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These are the sentences with the simple adverbs identified and their types:

1. I gladly accept her offer.
Answer: I gladly accept her offer. – Adverb of Manner

2. I had fever yesterday.
Answer: I had fever yesterday. – Adverb of Time

3. She seldom comes to see us.
Answer: She seldom comes to see us. – Adverb of Frequency

4. She is too tired to complete the project.
Answer: She is too tired to complete the project. – No simple adverb
(‘too’ is an adverb of degree, but it’s not considered a simple adverb in this context as it’s part of the construction “too…to”.)

5. Send the peon here.
Answer: Send the peon here. – Adverb of Place

6. Do things slowly, but surely.
Answer: Do things slowly, but (surely). – Adverbs of Manner

7. I can speak English well.
Answer: I can speak English well. – Adverb of Manner

8. This is somewhat true.
Answer: This is somewhat true. – Adverb of Degree

9. Do it now.
Answer: Do it now. – Adverb of Time

10. We pray to God daily.
Answer: We pray to God daily. – Adverb of Frequency


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He said to me, “We are players.” Change into indirect speech.

Which of the following is a synonym for ‘eager’? a) hesitant b) enthusiastic c) lazy d) indifferent

He said to me, “We are players.” Change into indirect speech.

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The sentence in indirect speech would be:

Direct speech: We are players.
Indirect speech: He told me that they were players.

Explanation:

When converting direct speech to indirect speech, several changes occur:

1. Quotation marks are removed.
2. The reporting verb ‘said’ changes to ‘told’ when there’s an indirect object (me).
3. The pronoun ‘we’ changes to ‘they’ to maintain the perspective of the original speaker.
4. The verb ‘are’ changes to ‘were’ due to backshifting, which occurs when the reporting verb is in the past tense.

Backshifting is a key concept in indirect speech. When the reporting verb is in the past tense (as ‘said’ is here), the tense in the reported speech typically shifts back to one tense. In this case, present simple ‘are’ becomes past simple ‘were’.

This transformation preserves the original meaning while adapting it to the structure of reported speech.


Other questions:

Which of the following is a synonym for ‘eager’? a) hesitant b) enthusiastic c) lazy d) indifferent

Which of the following is a synonym for ‘eager’? a) hesitant b) enthusiastic c) lazy d) indifferent

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The correct answer is:

b) enthusiastic

 

Explanation:

‘Enthusiastic’ is a synonym for ‘eager’ because both words convey a sense of keen interest, excitement, and readiness to engage in something.

These terms describe a positive and energetic attitude towards an activity, idea, or opportunity. When someone is eager or enthusiastic, they show a willingness and desire to participate or get involved. Both words imply a proactive and passionate approach.

The other options are not synonyms:

‘Hesitant’ implies reluctance or uncertainty, opposite to eagerness.
‘Lazy’ suggests a lack of energy or motivation, contrary to the active nature of eagerness.
‘Indifferent’ means lacking interest or concern, which is the antithesis of being eager.

‘Enthusiastic’ best captures the zeal and fervour associated with eagerness, making it the most suitable synonym among the given options.


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When we got to Terminal 2, the flight from London a) had already landed b) had already been landing c) already landed d) was already landing

Write a letter to the editor of the newspaper about complaining the government hospital.

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Formal Letter

Letter to the editor complaining about a government hospital:

 

Date: 9/7/2024

 

To,
The Editor,
The Himachal Times,
Shimla.

Dear Editor,
I am writing to express my deep concern about the deplorable conditions at City General Hospital, our primary government healthcare facility. As a citizen and frequent visitor to the hospital, I feel compelled to bring these issues to public attention.

The hospital is severely understaffed, leading to long wait times and overworked medical personnel. Patients often wait hours, sometimes days, for essential treatments. The shortage of doctors and nurses compromises the quality of care provided.

Additionally, the hospital’s infrastructure is crumbling. Many wards lack basic amenities like clean bedding and functioning bathrooms. The hygiene standards are alarmingly low, posing a risk of secondary infections to already vulnerable patients.

The pharmacy frequently runs out of essential medicines, forcing patients to purchase them at higher prices from private pharmacies. This defeats the purpose of a government hospital meant to serve the economically disadvantaged.

I urge the health department to take immediate action to address these issues. Increased funding, better management, and stricter oversight are desperately needed to improve the hospital’s conditions.

I hope that through this letter the concerned authorities will definitely pay attention to this problem and the condition of the district hospital of our city will improve.

Sincerely,
Abhay Raizada,
Shimla (HP)


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Write a shore essay on the importance of healthy eating habits.

What is the difference between imperialism and nationalism?​

Imperialism and nationalism are two distinct political and social concepts with different objectives, ideologies, and historical impacts. Here are the key differences between the two:

Imperialism

Imperialism is a policy or ideology where a nation extends its power and influence over other countries through colonization, military force, or other means.

Objective

Its main objectives are to expand territorial control and establish economic dominance. Imperialism exploits resources and labour from the colonized territories. Its spread the imperial nation’s culture, religion, and political systems.

Characteristics

It often involves the establishment of colonies or protectorates. It imposes the imperial power’s political, economic, and social structures on the colonized region. It frequently leads to the suppression and exploitation of indigenous populations. It can involve direct control or influence through puppet governments.

Historical Examples

The British Empire, which controlled vast territories across Africa, Asia, and the Americas is the main example of imperialism. The Spanish and Portuguese empires in Latin America are another example of imperialism. The French Empire in Africa and Southeast Asia is also an example of imperialism.

Nationalism

Nationalism is a political and social ideology that emphasizes the interests, culture, and values of a particular nation or group of people, often in opposition to foreign influence or control.

Objectives

Its main objectives are to promote national unity and independence. Its objectives are also to preserve and celebrate the nation’s culture, language, and heritage. It achieves self-determination and political sovereignty for the nation.

Characteristics

It Advocates for the right of people to self-govern and determine their own political status. It Can be a unifying force, bringing people together based on shared identity and common goals. It May manifest as movements for independence, cultural revival, or political reform.
It can sometimes lead to exclusionary or xenophobic attitudes towards other nations or groups.

Historical Examples

The American Revolution, was when the American colonies sought independence from British rule. The Indian independence movement led by figures like Mahatma Gandhi, aimed to end British colonial rule in India. The unification of Germany and Italy in the 19th century was driven by nationalist sentiments.

Key Differences

1. Motivation:

Imperialism: Driven by the desire for expansion, control, and economic gain.
Nationalism: Driven by the desire for self-determination, cultural preservation, and political sovereignty.

2. Impact on Other Nations:

Imperialism: Often imposes control over other nations, leading to exploitation and cultural suppression.
Nationalism: Focuses on the interests of the nation itself, which can lead to movements for independence from imperial powers.

3. Historical Context:

Imperialism: Associated with the colonization and expansion policies of European powers from the 16th to the 20th centuries.
Nationalism: Often arises as a response to imperialism and foreign domination, promoting self-rule and national identity.

4. Outcome:

Imperialism: Results in the creation of empires and colonies.
Nationalism: This can result in the formation of nation-states and independence movements.

In summary, while imperialism involves the domination and exploitation of one nation by another, nationalism focuses on the unity, independence, and self-determination of a nation or group of people.


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Differentiate between the following: Latitude and Longitude

सरदारी और बादशाहत में अंतर बताइए​।

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सरदारी और बादशाहत  में महत्वपूर्ण अंतर इस प्रकार हैं:

शासन प्रणाली

सरदारी : यह एक प्रकार की नेतृत्व व्यवस्था होती थी, जो अक्सर कबीलाई या स्थानीय स्तर पर होती थी। सरदारों का चुनाव समुदाय के लोगों चुनकर किया जाता था। संबंधित कबीले में कोई भी व्यक्ति सरदार हो सकता था। यहाँ पर न तो वंश व्यवस्था होती थी और न ही जाति व्यवस्था होती थी।

बादशाहत : यह एक राजतंत्रीय शासन प्रणाली होती थी, जहाँ एक राजा या बादशाह पूरे राज्य पर शासन करता था। बादशाहत प्रायः वंशानुगत होती थी। इस शासन व्यवस्था में राजा या बादशाह का पुत्र ही राजा या बादशाह बनता था। जनता या प्रजा में से कोई भी सामान्य व्यक्ति बादशाहत पाने का हकदार नहीं होता था।

शासन का क्षेत्र

सरदारी : आमतौर पर छोटे क्षेत्र या समुदाय तक सीमित होती थी। इनका शासन क्षेत्र एक विशेष कबीले या समुदाय तक ही सीमित रहता था जो किसी गाँव आदि तक ही सीमित रहता था। अथवा उस कबीले के भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित रहता था।
बादशाहत : बड़े राज्य या साम्राज्य पर शासन करती थी। बादशाहत का दायरा बेहद बड़ा होता था। राजा या बादशाह किसी बड़े राज्य का होता था। इस राज्य में अनेक नगर और गाँव शामिल होते थे।

निर्णय और अधिकार

सरदारी : सरदार का अधिकार अक्सर समुदाय के सदस्यों की सहमति या परंपरा से आता था। वह अपने समुदाय के लोगों पर किसी तरह का कर आदि नहीं लगाता था। जो भी कार्य होते थे, वह समुदाय के लोगों की आपसी सहमति से होते थे। वह अपने कार्य संचालन के लिये समुदाय के लोगों द्वारा मिलने वाले उपहारों पर निर्भर रहता था।
बादशाहत : बादशाह के पास निर्णय लेने की अंतिम शक्ति होती थी। उसका अधिकार वंशानुगत होता था। उसके निर्णण को दैवीय निर्णय माना जाता था। उसका ही निर्णय अंतिम निर्णय होता था। वह अपने निर्णय के लिए अपने मंत्रियो से परामर्श ले भी सकता था लेकिन उस पर इसकी कोई बाध्यता नहीं थी। वह अपने राज्य के संचालन के लिए अपनी प्रजा पर तरह-तरह के कर लगाता था। जो समय-समय पर राज्य के प्रत्येक नागरिक को देने होते थे।

शक्ति का अधिकार

सरदारी : सरदारी व्यवस्था मे कोई सेना नही होती थी। सरदार लोग किसी भी विवाद, युद्ध या संघर्ष से निपटने के लिए अपने समुदाय के लोगों पर ही निर्भर रहता था। ऐसी किसी भी स्थिति में समुदाय के सामान्य जन ही ये कार्य करते थे। वह इसके लिए कोई वेतन आदि भी नहीं देता था।
बादशाहत : बादशाहत में बादशाह एक स्थायी सेना रखता था। इस सेना का उपयोग वह अपने राज्य की प्रजा को नियंत्रित करने और दूसरे राज्यो से होने वाले संघर्षो में करता था। वह सेना को बाकयदा वेतन देता था। सैनिकों की नियमित भर्ती की जाती थी। वह राज्य की रक्षा के कार्य के लिए ही निश्चित होते थे।


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Write a shore essay on the importance of healthy eating habits.

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Short Essay

Importance of healthy eating habits

 

Healthy eating habits affect our overall health. By adopting healthy eating habits, we can give a new direction to our health. Healthy eating refers to a diet that is rich in nutrients. A diet that is not junk food.

A balanced diet rich in a variety of fruits, vegetables, whole grains, lean proteins and healthy fats provides essential nutrients, which strengthen physical health as well as increase the body’s immunity. Proper nutrition reduces the risk of obesity-related diseases like diabetes, heart disease and some cancers.

Good eating habits contribute to improved mental health, cognitive function, mood and energy levels. For children and adolescents, nutritious diets are important for proper growth and development. Adopting healthy eating patterns early in life can have lifelong benefits, including better food choices and a lower risk of chronic diseases in adulthood. Additionally, mindful eating habits such as portion control and avoiding processed foods can improve digestion and promote a healthy relationship with food.

Ultimately, adopting healthy eating habits can give a new dimension to our long-term health and quality of life.


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Write an essay on the Disadvantages of social media in student’s life.​

Differentiate between the following: Latitude and Longitude

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These are concise differences between latitude and longitude:

Latitude:

➤ Measures distance north or south of the equator
➤ Ranges from 0° at the equator to 90° at the poles
➤ Parallel lines that run east-west around the globe
➤ Expressed in degrees north or south

Longitude:

➤ Measures distance east or west of the Prime Meridian
➤ Ranges from 0° to 180° east or west
➤ Vertical lines that run from pole to pole
➤ Expressed in degrees east or west

Key differences:

1. Direction: Latitude is horizontal, longitude is vertical
2. Reference point: Latitude uses the equator, longitude uses the Prime Meridian
3. Range: Latitude spans 0° to 90°, longitude spans 0° to 180°
4. Purpose: Latitude indicates north-south position, longitude indicates east-west position

Together, latitude and longitude form a coordinate system for precisely locating any point on Earth’s surface.


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Write an essay on Disadvantages of social media in students life.​

Write an essay on the topic – ‘Disadvantages of social media in student’s life.​’

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Essay

Disadvantages of social media in student’s life.​

 

Social media has become an integral part of students’ lives, but its pervasive influence comes with significant drawbacks. One major concern is the time sink it creates, distracting students from academic pursuits and reducing productivity. The constant stream of notifications and the fear of missing out (FOMO) can lead to decreased focus and interrupted study sessions.

Additionally, social media platforms often foster unrealistic comparisons, potentially harming students’ self-esteem and mental health. The curated nature of online profiles can create feelings of inadequacy and anxiety among young users.

Cyberbullying is another serious issue, with the anonymity of the internet sometimes emboldening cruel behaviour. This can lead to severe emotional distress and even impact academic performance.

Furthermore, the addictive nature of social media can interfere with real-world social skills development, as students may prefer online interactions over face-to-face conversations. This can hinder the growth of crucial interpersonal abilities needed for future success.

Lastly, the spread of misinformation on these platforms can negatively influence students’ understanding of important issues, potentially impacting their decision-making abilities.


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Essay on Rabindranath Tagore in 200 words.

What makes you happy when you’re sad?​ Write your thoughts on this topic

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What makes me happy when I feel sad

 

When feeling sad, I often find solace in various activities and connections. I try to reach out to loved ones for support that can provide me comfort and perspective. Engaging in my favourite hobbies or pastimes can offer a welcome distraction and spark joy for me.

Spending time in nature, exercising, or simply taking a walk can boost mood through physical activity and fresh air. Music has the power to lift spirits, while mindfulness and meditation practices can help centre thoughts and emotions.

Acts of kindness, such as volunteering or helping others, can shift focus outward and create a sense of purpose. Taking care of physical health through proper sleep and nutrition is crucial for emotional well-being.

Creative outlets like art or writing allow for emotional expression and processing. Lastly, if sadness persists, seeking professional help can provide valuable tools and support for managing emotions and improving overall mental health.


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When we got to Terminal 2, the flight from London a) had already landed b) had already been landing c) already landed d) was already landing

When we got to Terminal 2, the flight from London a) had already landed b) had already been landing c) already landed d) was already landing

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The correct answer is:

a) had already landed

 

Explanation:

This is the most appropriate choice because it uses the past perfect tense (‘had already landed’), which is used to describe an action that was completed before another past action or time. In this context, it indicates that the flight’s arrival occurred prior to the speaker’s arrival at Terminal 2.

The past perfect is ideal here because:

1. It clearly establishes the sequence of events (flight landing, then arrival at terminal).
2. It emphasizes the completed nature of the landing.
3. It’s commonly used in English to express ‘earlier past’ actions.

Options b) and d) use continuous tenses, which imply an ongoing action and are incorrect for a completed event like landing. Option c) uses simple past, which doesn’t effectively convey the idea that the landing preceded the arrival at the terminal.


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तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र : प्रहलाद अग्रवाल (कक्षा-10 पाठ-11 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

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TEESREE KASAM KE SHILPKAR SHAILENDRA : Prahlad Aggrawal (Class-10 Chapter-11 Hindi Sparsh 2)


तीसरी कसम की शिल्पकार शैलेंद्र – प्रहलाद अग्रवाल

पाठ के बारे में…

यह पाठ ‘तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र’ प्रहलाद अग्रवाल द्वारा लिखा गया एक पाठ है, जिसमें उन्होंने गीतकार शैलेंद्र के बारे में वर्णन किया है। इस पाठ के माध्यम से लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि हिंदी फिल्म जगत में सार्थक और उद्देश्य पर फिल्म बनाना बेहद कठिन और जोखिम भरा काम है।

‘तीसरी कसम’ फिल्म का निर्माण गीतकार शैलेंद्र ने किया था। वे लंबे समय से कवि और हिंदी फिल्मों के गीतकार के रूप में हिंदी फिल्म जगत में अपना नाम बनाए हुए थे। उन्होंने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ को तीसरी कसम के नाम से सिनेमा के पर्दे पर उतारा था। यह फिल्म हिंदी फिल्म जगत के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई और हिंदी फिल्म की अमर कलाकृतियों में से एक मानी जाती है।  इस पाठ के माध्यम से लेखक ने तीसरी कसम के निर्माण के दौरान आने वाली कठिनाइयों और संघर्षों का वर्णन किया है।

लेखक के बारे में…

प्रहलाद अग्रवाल, जिनका जन्म मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में सन 1947 में हुआ था, वह हिंदी फिल्मों के इतिहास और फिल्मकारों के जीवन के बारे में लिखने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हिंदी फिल्मों पर काफी कुछ लिखा है।

उनकी प्रमुख कृतियों में सातवां दशक, तानाशाह, मैं खुशबू, सुपरस्टार, राज कपूर आधी : हकीकत आधा फसाना, कवि शैलेंद्र : जिंदगी की जीत में यकीन, प्यासा : चिर अतृप्त गुरुदत्त, उत्ताल उमंग : सुभाष गई,  ओ रे मांझी : विमल गाय का सिनेमा, महा बाजार के नायक : 21वीं सदी का सिनेमा आदि के नाम प्रमुख हैं।



हल प्रश्नोत्तर

मौखिक

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए-

प्रश्न 1 : ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को कौन-कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?

उत्तर :  ‘तीसरी कसम’ फिल्म को निम्नलिखित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

  • तीसरी कसम फिल्म को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा ‘राष्ट्रपति स्वर्ण पदक’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • ‘तीसरी कसम’ फिल्म को बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फिल्म के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
  • ‘तीसरी कसम’ इनको मास्को फिल्म फेस्टिवल में भी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। इसके अलावा तीसरी कसम फिल्म को अन्य कई महत्वपूर्ण पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

तीसरी कसम फिल्म कवि-गीतकार शैलेंद्र द्वारा निर्मित एक हिंदी फिल्म थी, जिसमें मुख्य भूमिका राज कपूर और वहीदा रहमान ने निभाई थी। ये फिल्म प्रसिद्ध हिंदी लेखक नाथ रेणु के उपन्यास ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित थी।


प्रश्न 2 : शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाई?

उत्तर :  शैलेंद्र ने अपने जीवन काल में सिर्फ एक ही फिल्म बनाई थी। इस फिल्म का नाम ‘तीसरी कसम’ था।शैलेंद्र हिंदी के एक प्रसिद्ध कवि और गीतकार थे, जिन्होंने हिंदी फिल्मों के अनेक अनमोल गीत लिखे।

‘तीसरी कसम’ फिल्म के मुख्य कलाकारों में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता राज कपूर और अभिनेत्री वहीदा रहमान थी। यह फिल्म हिंदी के प्रसिद्ध लेखक फणीश्वर नाथ रेणु के द्वारा लिखे गए उपन्यास ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित थी। यह फिल्म हिंदी फिल्म जगत की अमर कलाकृति में से एक मानी जाती है।


प्रश्न 3 : राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ फ़िल्मों के नाम बताइए।

उत्तर : राजकपूर द्वारा निर्देशित फिल्मों के नाम इस प्रकार हैं…

मेरा नाम जोकर, सत्यम शिवम सुंदरम, संगम, जागते रहो, अजंता, मैं और मेरा दोस्त, प्रेम रोग, राम तेरी गंगा मैली, कल आज और कल, बॉबी।

राज कपूर हिंदी फिल्म जगत के एक जाने-माने निर्माता-निर्देशक थे। जिन्हें हिंदी फिल्म जगत में ‘शोमैन’ के नाम से भी जाना जाता है। उनकी फिल्में बेहद भव्य एवं विशाल कैनवास पर बनाई गई हुई होती थीं, और उनकी फिल्में अपार लोकप्रियता प्राप्त करती थी।

राज कपूर के साथ गीतकार शैलेंद्र, गायक मुकेश और संगीतकार शंकर-जयकिशन इन पाँचों की जुगलबंदी उस समय हिंदी फिल्म जगत में बेहद प्रसिद्ध थी।


प्रश्न 4 : ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और फ़िल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?

उत्तर : कसम फिल्म के नायक और नायिकाओं के नाम इस प्रकार हैं…
नायक : राजकपूर नायिका : वहीदा रहमान

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता राज कपूर ने इस फिल्म में ‘हीरामन’ नामक एक गाड़ीवान की भूमिका निभाई थी। प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री वहीदा रहमान ने इस फिल्म में नौटंकी कलाकार ‘हीराबाई’ की भूमिका निभाई थी। इन फिल्म इन दोनों के बीच घटे प्रसंगों पर आधारित थी, जोकि फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मारे गये गुलफाम’ के कथानक पर हुई है।


प्रश्न 5 : फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किसने किया था?

उत्तर : ‘तीसरी कसम’ फिल्म का निर्माण गीतकार शैलेंद्र ने किया था। शैलेंद्र हिंदी के प्रसिद्ध कवि और गीतकार थे। उन्होंने अनेक हिंदी फिल्मों के लिए अनेक अनमोल गीतों की रचना की है। राज कपूर के साथ उनकी जुगलबंदी प्रसिद्ध थी और उन्होंने राज कपूर की लगभग सभी फिल्मों के लिए गीत लिखे हैं।

‘तीसरी कसम’ फिल्म का निर्माण करते समय उन्होंने राज कपूर को ही मुख्य अभिनेता चुना था और फिल्म की अभिनेत्री वहीदा रहमान थी। तीसरी कसम फिल्म का निर्माण 1966 में हुआ था और इस फिल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने किया था।


प्रश्न 6 : राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?

उत्तर : राज कपूर ने मेरा नाम जोकर के निर्माण के समय इस बात की जरा भी कल्पना नहीं की थी कि उन्हें इस फिल्म के निर्माण में इसका एक भाग बनाने में ही 6 साल का लंबा समय लग जाएगा।

राज कपूर को मेरा नाम फिल्म के निर्माण के समय अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था और उन्होंने अनेक तरह की मुश्किल परिस्थितियों से निभाते हुए एक लंबे समय में मेरा नाम जोकर फिल्म का निर्माण किया था। इस फिल्म के निर्माण ने आर्थिक रूप से काफी कमजोर कर दिया था और उन पर काफी कर्जा चढ़ गया था।


प्रश्न 7: राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया?

उत्तर : राजकपूर की इस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया कि जब राजकपूर ने ‘तीसरी कसम’ फिल्म में अपने अभिनय के लिए उनसे मेहनताना मांगा तो गीतकार शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया।

शैलेंद्र और राज कपूर आपस में घनिष्ठ मित्र थे। राजकपूर की लगभग सभी फिल्मों के लिए शैलेंद्र ने गीत लिखे थे। जब शैलेंद्र ने तीसरी कसम फिल्म का निर्माण आरंभ किया तो उन्हें उम्मीद थी कि राज कपूर दोस्ती के नाते बिना किसी मेहनताने में काम करना स्वीकार कर लेंगे क्योंकि इस फिल्म के निर्माण के लिए उन्हें आर्थिक रूप से काफी परेशानी उठानी पड़ी थी।

लेकिन जब एक दिन राजकपूर ने फिल्म में अपने काम के लिए मेहनताना मांगा तो शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया, क्योंकि उन्हें ऐसी आशा ना थी। लेकिन जब राज कपूर ने तुरंत ही उनसे मुस्कुराते हुए मेहनताने के रूप में केवल 1 रुपये की मांग की, शैलेंद्र को सारी बात समझ में आई और राज कपूर ने वास्तव में उनसे दोस्ती निभाई थी।


प्रश्न 8 : फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?

उत्तर : फिल्म समीक्षक राजकपूर को कला मर्मज्ञ और आँखों से बात करने वाला कलाकार मानते थे।विस्तार से कला मर्मज्ञ से तात्पर्य कला का पारखी, जिसे कला के विषय में पूर्ण ज्ञान हो और जो एक नजर में ही सही आकलन कर लेता हो।

राजकपूर आँखों से बात करने की कला भी जानते थे और वह आँखों में ही आँखों मैं अपनी बात कह जाते थे और समझ जाते थे। वह फिल्मों में अपनी आँखों के भाव प्रदर्शन से ही बिना संवाद बोले ही अपनी बात कह जाते थे। इसलिए फिल्म समीक्षक  राजकपूर को कला मर्मज्ञ और आँखों से बात करने वाला कलाकार मानते थे।


लिखित
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-
प्रश्न 1 : ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को ‘सैल्यूलाइड पर लिखी कविता’ क्यों कहा गया है?

उत्तर : तीसरी कसम’ फिल्म को सेल्यूलाइड पर उतरी कविता इसलिए कहा गया था क्योंकि यह फिल्म सेल्यूलाइड पर कविता जैसी अनुभूति प्रदान करती थी। सेल्यूलाइड से तात्पर्य कैमरे की रील पर फिल्म को उतारने से होता है।तीसरी कसम फिल्म ग्रामीण जीवन के मार्मिक प्रसंगों को समेटती हुई एक ऐसी भाव प्रणव कहानी थी, जो बिल्कुल काव्यात्मकता का अनुभूति कराती थी।

फिल्म को देखकर ऐसा लगता था कि जैसे सेटेलाइट पर कोई कविता चल रही हो। इस फिल्म में नायक और नायिका का सहज एवं भावपूर्ण अभिनय फिल्म में एक अलग ही अनुभूति उत्पन्न करता है। इसी कारण इस फिल्म को सेल्यूलाइड लिखी गई कविता कहा गया है।


प्रश्न 2 : ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे?

उत्तर : तीसरी कसम’ फिल्म को खरीदार इसलिए नहीं मिल रहे थे, क्योंकि यह फिल्म एक साहित्यिक कृति पर आधारित भाव प्रधान फिल्म थी,  जिसमें साहित्यिकता और कलात्मकता का संगम था। फिल्मकार ने फिल्म की विषय वस्तु और कथानक से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया था। यह एक कलात्मक कृति थी, जिसमें व्यवसायिकता का पुट जरा भी नहीं था।

फिल्म के खरीदार फिल्म को मुनाफे का सौदा मान कर ही खरीदते हैं और उन्हें  ये फिल्म में व्यवसायिक दृष्टि से फायदेमंद नहीं दिख रही थी। इसीलिए इस फिल्म को खरीदा नहीं मिले । लेकिन बाद में इसी फिल्म ने इतिहास रचा और यह फिल्म हिंदी फिल्म जगत की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियों में से एक मानी जाती है।


प्रश्न 3 : शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है?

उत्तर : शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का मुख्य कर्तव्य यह है कि वह दर्शकों की रुचि के अनुसार अपनी कला को प्रदर्शित करें। कलाकार अपने वह दर्शकों/श्रोताओं की रुचि को परिष्कृत करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करें ना कि उनको सस्ता एवं भौंडा मनोरंजन उन पर थोपने का प्रयत्न करें। कलाकार का मुख्य कर्तव्य कला के शुद्ध एवं सात्विक रूप को समाज के सामने प्रस्तुत कर सुंदर एवं स्वस्थ समाज का निर्माण करना होता है।

कलाकार को अपनी कला को विकृत नहीं करना चाहिए और लाभ कमाने के उद्देश्य से कला को सस्ते रूप में नहीं प्रदर्शित करना चाहिए।


प्रश्न 4 : फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफाई क्यों कर दिया जाता है?

उत्तर : फिल्म में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफाई इसलिए कर दिया जाता है ताकि फिल्म निर्माता अपने व्यवसाय उद्देश्यों को साथ कर अधिक से अधिक लाभ कमा सके। फिल्म में त्रासद स्थितियों का ग्लोरिफाई करके दर्शकों की भावनाओं को उत्तेजित किया जाता है, जिससे अधिक से अधिक दर्शक फिल्म देखने को आएं और निर्माताओं को अधिक से अधिक कमाई हो ।

त्रासद स्थितियों का ग्लोरिफाई करके दर्शकों की भावनाओं से खेला जाता है। ये दर्शकों को फिल्म की ओर खींचने की एक व्यवसायिक रणनीति होती है। वास्तविक जीवन में ऐसी त्रासद स्थितियां नही होती जैसी फिल्म में दिखाईं जाती हैं, फिल्म में उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है।


प्रश्न 5 : ‘शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं’- इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : शैलेंद्र ने राज कपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं दिए हैं। इस कथन का आशय यह है कि तीसरी कसम फिल्म में राज कपूर में बेहद तन्मयता से अभिनय किया था। राज कपूर अपनी आँखों से ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए जाने जाते थे। वे आँखों ही आँखों में अपनी भावना व्यक्त कर इतना भावपूर्ण अभिनय करते थे कि देखने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था।

शैलेंद्र राज कपूर के गीतकार रहे हैं उन्होंने अपने गीतों के शब्दों के माध्यम से राज कपूर की भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयत्न किया था। इस फिल्म के गीत भी एक से एक अधिक जानदार थे जो कि शैलेंद्र द्वारा लिखे गए थे। इस फिल्म गीतों के बोलों को राज कपूर ने अपने भावपूर्ण अभिनय से जीवंत कर दिया था। इसीलिए यह कथन बिल्कुल कहना ठीक है कि शैलेंद्र ने ही राज कपूर की भावनाओं को शब्द दिए।


प्रश्न 6 : लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं?

उत्तर : लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शौमैन से तात्पर्य उस व्यक्ति से होता है जिसमें अपने कला के प्रदर्शन द्वारा एक बड़े विशाल जनसमुदाय को आकर्षित करने की क्षमता हो। जिसकी कला का कायल एक विशाल जन वर्ग हो।

राजकपूर एक ऐसे ही आकर्षक व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अपनी कलाकारी गुण से हिंदी सिनेमा जगत को अनेक अनोखी फिल्में प्रदान कीं। उनकी फिल्में बेहद लोकप्रिय होती थी और लोगों के दिल में एक अलग जगह बना लेती थी। उनकी फिल्में ना केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खूब लोकप्रिय होती थी।

लोग उनके नाम से ही फिल्में देखने जाया करते थे। वह केवल एक अभिनेता ही नहीं बल्कि एक निर्माता सफल निर्माता और सफल निर्देशक भी थे। अभिनेता के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने निर्देशन के रूप में एक से एक शानदार फिल्में दें और बेहद लोकप्रियता अर्जित की जिनमें राम तेरी गंगा मैली, प्रेम रोग, बॉबी जैसी फिल्मों के नाम प्रसिद्ध है।

राज कपूर की फिल्में भारत में ही नहीं रूस में बेहद लोकप्रिय होती थीं। वे रूस में बेहद लोकप्रिय थे। पूरे एशिया में जितने विशाल स्तर पर किसी प्रकार की फिल्में नहीं लोकप्रिय होती थीं, जितनी की राजकपूर की फिल्में होती थीं। इसीलिए उन्हें एशिया का सबसे बड़ा शोमैन में कहा गया है।


प्रश्न 7 : फ़िल्म ‘श्री 420′ के गीत ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति क्यों की?

उत्तर : फिल्म ‘श्री 420’ के गीत रातों दसों दिशाओं से कहेगी अपनी कहानियां पर संगीता जयकिशन ने आपत्ति इसलिए की, क्योंकि संगीतकार जयकिशन के अनुसार सामान्यजन इतनी गूढ़ बातों को नहीं समझ सकता। सामान्यजन केवल चार दिशाओं के बारे में जानता है।

गहन विस्तार में जाएं तो दसों दिशाएं भी होती हैं, लेकिन सामान्यजन इस बारे में नहीं जानता इसलिए सामान्य जन केवल चार दिशाओं को समझेगा जो उसकी जनसामान्य सोच के अंतर्गत आता है। वह दसों दिशाओं वाली साहित्यिक सोच के संदर्भ को समझ नहीं पाएगा। इसलिए शंकर जयकिशन को श्री 420 के गीत ‘रातों दसों दिशाओं से कहेगी अपनी कहानियां’ पर आपत्ति थी।

शैलेंद्र इस बात के लिए तैयार नही हुए, अपने अपने गीत को सस्ता नही बनाना चाहते थे इसलिए गीत के शब्द ज्यों के त्यों रहे।



(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-

प्रश्न 1 : राजकपूर द्वारा फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फ़िल्म क्यों बनाई?

उत्तर : राजकपूर द्वारा फिल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फिल्म इसलिए बनाई क्योंकि वह इस फिल्म के माध्यम से अपने कलाकार मन को आत्म संतुष्टि देना चाहते थे। शैलेंद्र एक भागवत कवि हृदय कलाकार थे।

फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा लिखे गए ‘मारे गए गुलफाम’ उपन्यास का कथानक उनके मन को छू गया था। इसी कारण वह इस पर एक फिल्म बनाकर अपने कलाकार मन को संतुष्टि देना चाहते थे। यूं तो वह काफी समय से फिल्म जगत में थे लेकिन उनका फिल्म बनाने का उद्देश्य व्यवसायिक नही था बल्कि वह अपने कलाकार मन की भावनाओं को फिल्मी पर्दे पर उकेरना चाहते थे।

चूँकि फिल्म बनाने का उनका उद्देश्य व्यवसायिक नही था, इसीलिए राज कपूर द्वारा फिल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी उन्होंने तीसरी कसम फिल्म बनाई।


प्रश्न 2 : ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर का महिमामय व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : राजकपूर एक बेहद मंजे हुए कलाकार थे। वह जिस किसी भी किरदार को निभाते थे तो उस पर अपने व्यक्तित्व को हावी नहीं होने देते थे, बल्कि वे उस पर किरदार अपने अंदर आत्मसात कर लेते थे। पर्दे पर उनके द्वारा निभाया गया किरदार वो किरदार ही लगता था, उसमें राज कपूर कहीं भी नजर नहीं आता था। हीरामन के किरदार के साथ भी उन्होंने ऐसा ही किया।

हीरामन एक देहाती व्यक्तित्व वाला किरदार था, जिसको निभाने के लिए राज कपूर ने पूरा देहाती अंदाज अपना लिया था। हीरामन उकड़ूं बैठता है और बातें देहाती अंदाज में करता है तथा ग्रामीण व्यक्तित्व का प्रतीक है। यह सारे गुण उन्होंने हीरामन के किरदार में भर दिए थे।

फिल्म देखते समय उनके किरदार को देखते हुए राज कपूर कहीं भी नहीं दिखाई देते बल्कि उसमें हीरामन ही नजर आता था। इस तरह उनके द्वारा किया गया जीवंत अभिनय हीरामन की आत्मा में उतर गया था।


प्रश्न 3 : लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि ‘तीसरी कसम’ ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है?

उत्तर : लेखक ने ऐसा इसलिए लिखा है कि तीसरी कसम में साहित्य रचना के साथ शत-प्रतिश न्याय किया गया है, क्योंकि शैलेंद्र ने फिल्म का निर्माण करते समय फिल्म की मूल कथा से जरा भी छेड़छाड़ नहीं की थी। उन्होंने इस फिल्म का निर्माण साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा रचित उपन्यास ‘मारे गए गुलफाम’ के कथानक के आधार पर किया था।

उन्होंने मूल कहानी के स्वरूप में जरा भी बदलाव नहीं किया है। शैलेंद्र ने कहानी के सभी पात्रों को यथावत उसी रूप में प्रस्तुत किया है, जिस रूप में उपन्यास में उनका वर्णन किया गया है। उन्होंने ग्रामीण जीवन और उनके पात्रों तथा उनकी बोली को ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया है और पूरी फिल्म एक साहित्य कृति बन गई है। उन्होंने इस फिल्म में ग्रामीण जीवन का सटीक चित्रण किया है।

कहने को इस फिल्म में उस समय के बड़े-बड़े कलाकार जैसे राजकपूर और वहीदा रहमान ने काम किया था लेकिन किसी भी कलाकार का व्यक्तित्व किरदार पर हावी नहीं हुआ है। फिल्म के गीत संगीत भी ग्रामीण जीवन की लोकगीतों पर ही आधारित है। इसीलिए लेखक ने लिखा है कि तीसरी कसम ने साहित्य के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है।


प्रश्न 4 : शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषता है? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर : शैलेद्र के गीतों की मुख्य विशेषता यह होती थी कि उनके गीत सरल और सहज भाषा में रचित होते थे। शैलेंद्र अपने गीतों में बेहद कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे बल्कि जनसाधारण की समझ में आ जाने वाले सरल शब्दों का प्रयोग करते थे। शैलेंद्र के गीत भावपूर्ण होते थे और  उनके गीतों में करुणा, संवेदना जैसे भाव भरे होते थे।

वे आम जनमानस के जीवन से जुड़े होते थे। शैलेंद्र के गीतों में अभिजात्य वर्ग का झूठा पाखंड नहीं होता था। उनके गीत आम जनमानस के अधिक निकट होते थे, जो दिल की गहराइयों को छू लेते थे।


प्रश्न 5 : फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर : फिल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र ने अपने जीवन में ‘तीसरी कसम’ नाम की केवल एक ही फिल्म बनाई थी। लेकिन इस फिल्म के साथ उन्होंने निर्माता के रूप में पूरा न्याय किया था। उन्होंने फिल्म की गुणवत्ता के साथ कोई भी समझौता नहीं किया था। ये फिल्म एक साहित्यिक कृति पर आधारित थी और शैलेंद्र स्वयं साहित्य से संबंध रखते थे।

शैलेंद्र एक कवि-गीतकार थे और उनका कवि हृदय व कलाकार मन किसी भी साहित्यिक कृति के साथ छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं देता था। शैलेंद्र ने ये फिल्म धन कमाने की लालसा स नही नहीं बनाई थी, इसलिए व्यवसाय की दृष्टि से भले ही अच्छे निर्माता नहीं हो पाए लेकिन कलात्मकता और गुणवत्ता की दृष्टि से उन्होंने एक उत्कृष्ट फिल्म का निर्माण किया था। उन्होंने जिस साहित्यिक कृति पर इस फिल्म का निर्माण किया था उसे यथावत पर्दे पर पेश किया।

उन्होंने कहानी के दो मुख्य पात्रों हीरामन और हीराबाई के पवित्र प्रेम को बेहद संवेदनशीलता से पर्दे पर उतारा था। उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ कोई भी समझौता नहीं किया और । इसी कारण उन्होंने एक अनमोल और अमर कलाकृति वाली फिल्म बनाई।


प्रश्न 6 : शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी फ़िल्म में झलकती है-कैसे? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : शैलेंद्र एक सीधे सच्चे सरल व्यक्ति थे। वे एक कवि और गीतकार होने के कारण एक कोमल हृदय वाले कलाकार थे। उनका जीवन सादा एवं सरल होता था और अपने निजी जीवन को वह अपने गीतों के माध्यम से भी प्रकट करते थे। अपने गीतों में उन्होंने कभी भी झूठे अभिजात्य को नहीं अपनाया बल्कि आम जनमानस की भावनाओं को अधिक उभारा है।

शैलेंद्र के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती थी कि उनके गीतों में झूठा प्रदर्शन नहीं होता था बल्कि वह आम जनजीवन की विसंगतियों को बताते थे। उनके गीत की भाषा सरल एवं सहज होती थी इसका मुख्य कारण यह था वह भी स्वयं सच्चे सरल व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे। शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराई उनके निजी जीवन की विशेषता थी और अपनी इसी विशेषता को उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से फिल्में भी प्रकट किया है। जिस तरह तीसरी कसम फिल्म में उन्होंने फिल्म के मुख्य नायक हीरामन को दुनिया की चकाचौंध से दूर रहने वाले एक साधारण ग्रामीण व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है, वैसे ही शैलेंद्र भी स्वयं फिल्म जगत में रहते हुए भी फिल्म जगत की चकाचौंध से दूर सीधे एवं सरल रूप से रहते थे।

फिल्म का निर्माण में भी उन्हें अनेक संघर्षों और कठिनाइयों पड़े थे, लेकिन उन्होंने हार नही मानी और फिल्म का निर्माण करके ही दम लिया। यही बात उन्होंने अपनी फिल्म के नायक और गीतों से भी प्रकट की है। इस तरह उनके निजी जीवन की छाप उनके फिल्म में झलकती है।


प्रश्न 7 : लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम फिल्म कोई सच्चा कवि हृदय ही बना सकता था।’ पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है। शैलेंद्र ने इस फिल्म का निर्माण करते समय जिस तरह की संवेदनशीलता और भावप्रणवता दिखाई है, वह कोई कवि हृदय ही दिखा सकता था।

फिल्म के सभी पात्रों में संवेदनशीलता, करुणा आदि का भाव प्रकट होता है। उन्होंने फिल्म के नायक और नायिका के मनोभावों को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया है जो कि एक कवि हृदय वाला व्यक्ति ही कर सकता था। उन्होंने पूरी फिल्म में संवेदनशीलता तथा भावनात्मकता का ध्यान रखा है। कोई आम फिल्म निर्माता फिल्म के व्यवसायिक पक्षों को भी ध्यान में रखता और फिल्म में कल्पना और अतिशयोक्ति वाले दृश्यों का समावेश कर सकता था, लेकिन शैलेंद्र ने ऐसा नहीं किया उन्होंने मूल साहित्य कृति के यथावत बरकरार रखा और फिल्म को वास्तविकता के अधिक निकट दिखाया है।

ये सारे कार्य के कवि हृदय वाला व्यक्ति ही कर सकता है, इसलिए लेखक के इस कथन से पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है कि ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।



(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए-

प्रश्न 1 : …. वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्मसंतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।

आशय : वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।आशय : इन पंक्तियों का आशय यह है कि शैलेंद्र एक ऐसे भावुक कवि थे, जिन्हें धन और यश की कामना नहीं थी। वह अपनी आत्म संतुष्टि के लिए ही कार्य करते थे। इसी कारण उन्होंने जब तीसरी कसम फिल्म का निर्माण किया तो उस फिल्म का निर्माण उन्होंने धन की लालसा से नहीं किया था बल्कि अपनी आत्म संतुष्टि के लिए किया था।

तीसरी कसम फिल्म जिस साहित्य कृति पर आधारित करके उन्होंने बनाई थी वह साहित्य कृति उनके मन को बेहद भा गई थी और वह इसे फिल्मी पर्दे पर उतारना चाहते थे। उन्हें फिल्म की असफलता के खतरे से आगाह भी किया गया था लेकिन उन्हें तो धन-संपत्ति और यश की कामना ही नहीं थी उन्हें तो अपने कलाकार मन को संतुष्ट करना था।

इसीलिए सारी बातों को परे रखकर इतनी सुंदर और अनुपम फिल्म का निर्माण किया, ऐसा तो एक भावुक कवि हृदय वाला व्यक्ति ही कर सकता था।


प्रश्न 2 : उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।

आशय : इस पंक्ति का यह आशय है कि कवि शैलेंद्र का मानना था कि एक कलाकार को दर्शकों की अभिरूचि की आड़ के बहाने अपनी कला को विकृत नहीं करना चाहिए और ना ही उन पर जबरदस्ती कुछ ऐसा थोपना चाहिए। जब श्री 420 फिल्म एक गाना बनाया जा रहा था तो शैलेंद्र ने उस गीत में दसों दिशाओं शब्द का प्रयोग किया था।

तब संगीतकार जयकिशन ने इस शब्द पर आपत्ति करते हुए कहा कि दसों दिशाओं शब्द आम शब्द नहीं है और इसे आम जनमानस नहीं समझता। लोग केवल चार दिशाएं जानते हैं, दस दिशाएं नहीं। इसलिए इस तरह के शब्दों का प्रयोग करना ठीक नहीं। परंतु शैलेंद्र ने इसका विरोध करते हुए कहा कि हमेशा दर्शकों की रूचि के बहाने हमें अपनी कला को विकृत नहीं करना चाहिए। भले ही लोग दशों दिशा नहीं जानते लेकिन गीत में आने पर उसे जानने लगेंगे।

यदि हम अपने गीतों के माध्यम से सही बात रखेंगे तो दर्शक अवश्य समझेंगे। कलाकार दर्शकों के प्रभाव में आकर गलत बातों को प्रोत्साहित करने लगते हैं, जिससे फिर कला में विकृतता आज आ जाती है। एक कलाकार का मुख्य कर्तव्य होता है कि वह दर्शक, श्रोता की रूचियों का परिष्कार करें यानी उनकी रूचियों को सुधारें और सही बात को सही ढंग से प्रस्तुत करें।


प्रश्न 3 : व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।

आशय : इन पंक्तियों का आशय यह है कि जीवन में सुख और दुख आते जाते रहते हैं। हमारे जीवन में अनेक तरह की कठिनाइयां और विपत्तियां आती हैं, जिनका सामना करना चाहिए। जब भी कोई कठिनाई विपत्ति आदि आती है तो वह उससे छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगता है और कुछ ना कुछ ऐसा प्रयत्न करता है कि उसे उस संकट से मुक्ति मिले। इसलिए जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों से जुड़कर ही जिंदगी में आगे बढ़ा जा सकता है।

जिंदगी में आने वाली कठिनाइयां हमें संघर्ष करने की क्षमता प्रदान करती हैं और हमारे मनोबल को बढ़ाती है।  मनोबल मजबूत होने पर और संघर्ष करने की क्षमता से ही जिंदगी में सफलता पाई जा सकती है, इसलिए कठिनाई आने पर उनसे न घबराकर उनका सामना करना चाहिए।


प्रश्न 4 : दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने वाले की समझ से परे है।

आशय : इस पंक्ति का आशय यह है कि शैलेंद्र ने तीसरी कसम नाम की जो फिल्म बनाई थी, वह व्यवसायिक फिल्म नहीं थी। इसलिए वे निर्माता लोग जो फिल्म बनाकर मुनाफा कमाना चाहते हैं, उनके लिए यह फिल्म उनकी समझ से परे थी। शैलेंद्र ने यह फिल्म अपने संवेदनशील कवि मन की आत्म संतुष्टि कथा एक साहित्यिक कृति का सही संदेश देने के लिए फिल्म बनाई थी।

इस फिल्में व्यवसायिकता समावेश नहीं था बल्कि कलात्मकता और साहित्यिकता का समावेश था। इसलिए फिल्म के नाम पर व्यापार करने वालों के लिए यह फिल्म किसी काम की नहीं थी । यही कारण था कि जब इस फिल्म को आसानी से खरीदार नही मिले थे। बाद में इसी फिल्म में हिंदी फिल्म जगह में एक अनमोल कृति के रूप में अपना नाम दर्ज कराया है।


प्रश्न 5 : उनके गीत भाव-प्रवण थे- दुरूह नहीं।

आशय : इस पंक्ति का आशय यह है कि कभी शैलेंद्र जो भी बेचते थे वह भावनाओं से भरे हुए होते थे। उनके गीतों में आम जनमानस की भावना एवं संवेदना प्रकट होती थी। उनके गीतों की भाषा सरल एवं सहज होती थी, जो किसी भी आम व्यक्ति को आसानी से समझ में आ जाती थी। इसीलिए उनके गीतों को समझना कोई कठिन बात नहीं थी। यही कारण था उनके गीत हर किसी के मन की को गहराई तक छू जाते थे और बेहद लोकप्रिय होते थे।



भाषा अध्ययन

प्रश्न 1 : पाठ में आए ‘से’ के विभिन्न प्रयोगों से वाक्य की संरचना को समझिए।
  1. राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र की हैसियत से शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह भी किया।
  2. रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ।
  3. फ़िल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर-तरीकों से नावाकिफ़ थे।
  4. दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने के गणित जानने वाले की समझ से परे थी।
  5. शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना दोस्ती से परिचित तो थे।

उत्तर : वाक्यों में ‘से’ के विभिन्न प्रयोगों से वाक्य की संरचना को इस प्रकार समझा जा सकता है।

1. राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र की हैसियत से शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह भी किया।
➲ यहाँ ‘से’ का प्रयोग हैसियत के संदर्भ में किया गया है। यह बताता है कि राजकपूर ने एक मित्र के रूप में शैलेंद्र को चेताया।

2. रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ।
➲ यहाँ ‘से’ का प्रयोग स्थान के स्रोत के रूप में किया गया है। यह दर्शाता है कि रातें सभी दिशाओं से कहानियाँ सुनाएंगी।

3. फ़िल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर-तरीकों से नावाकिफ़ थे।
➲ यहाँ ‘से’ का प्रयोग तौर-तरीकों के संदर्भ में किया गया है। यह बताता है कि वह फिल्म इंडस्ट्री के तौर-तरीकों से अनजान थे।

4. दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने के गणित जानने वाले की समझ से परे थी।
➲ यहाँ ‘से’ का प्रयोग तुलना और सीमा के संदर्भ में किया गया है। यह दर्शाता है कि इस फिल्म की संवेदना उस व्यक्ति की समझ से परे थी जो केवल लाभ की गणना जानता है।

5. शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना दोस्ती से परिचित तो थे।
➲ यहाँ ‘से’ का प्रयोग संबंध और कारण के रूप में किया गया है। यह बताता है कि शैलेंद्र राजकपूर की दोस्ती से परिचित थे।

इस प्रकार, ‘से’ का प्रयोग अलग-अलग संदर्भों में किया गया है जैसे हैसियत, स्रोत, तौर-तरीकों, तुलना, और संबंध, जो वाक्य की संरचना और अर्थ को स्पष्ट करने में सहायता करते हैं।


प्रश्न 2 : इस पाठ में आए निम्नलिखित वाक्यों की संरचना पर ध्यान दीजिए-
  1. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म नहीं, सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी।
  2. उन्होंने ऐसी फ़िल्म बनाई थी जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।
  3. फ़िल्म कब आई, कब चली गई, मालूम ही नहीं पड़ा।
  4. खालिस देहाती भुच्चे गाड़ीवान जो सिर्फ दिल की जुबान समझता है, दिमाग की नहीं।

उत्तर : आइए की इन वाक्यों की संरचना को समझते हैं…

1. ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म नहीं, सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी।
संरचना : यह एक वर्णनात्मक वाक्य है जिसमें ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की तुलना सैल्यूलाइड पर लिखी कविता से की गई है। इसमें ‘नहीं’ का प्रयोग नकारात्मकता को इंगित करता है और ‘थी’ का प्रयोग वाक्य को पूर्ण करता है।
• विषय : ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म
• क्रिया : नहीं थी
• वस्तु : सैल्यूलाइड पर लिखी कविता

2. उन्होंने ऐसी फ़िल्म बनाई थी जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।
संरचना : यह एक संयोजक वाक्य है जिसमें दो विचारों को जोड़ने के लिए ‘जिसे’ और ‘ही’ का प्रयोग किया गया है। इसमें ‘उन्होंने’ कर्ता (doer) है, और ‘ऐसी फ़िल्म’ कर्म है।
• विषय : उन्होंने
• क्रिया : बनाई थी
• वस्तु : ऐसी फ़िल्म
• पूरक : जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था

3. फ़िल्म कब आई, कब चली गई, मालूम ही नहीं पड़ा।
संरचना : यह एक समन्वय वाक्य है जिसमें दो घटनाओं (फ़िल्म का आना और जाना) को जोड़कर निष्कर्ष (मालूम नहीं पड़ा) पर पहुँचाया गया है।
• विषय : फ़िल्म
• क्रिया : आई, चली गई
• पूरक : कब, मालूम ही नहीं पड़ा

4. खालिस देहाती भुच्चे गाड़ीवान जो सिर्फ दिल की जुबान समझता है, दिमाग की नहीं।
संरचना : यह एक विशेषणीय वाक्य है जिसमें ‘खालिस देहाती भुच्चे गाड़ीवान’ के गुणों का वर्णन किया गया है। वाक्य में ‘जो’ का प्रयोग संबंधबोधक है और ‘दिल की जुबान’ और ‘दिमाग की नहीं’ का प्रयोग तुलना के रूप में किया गया है।
• विषय : खालिस देहाती भुच्चे गाड़ीवान
• विशेषण : जो सिर्फ दिल की जुबान समझता है
• विपर्यय : दिमाग की नहीं

इस प्रकार, इन वाक्यों की संरचना को समझकर यह ज्ञात होता है कि वाक्य कैसे बनाए गए हैं और उनके तत्व कैसे जुड़े हैं, जो पाठ की संपूर्णता और स्पष्टता में सहायक होते हैं।


प्रश्न 3 : पाठ में आए निम्नलिखित मुहावरों से वाक्य बनाइए-
चेहरा मुरझाना, चक्कर खा जाना, दो से चार बनाना, आँखों से बोलना

उत्तर : मुहावरों पर वाक्य
चेहरा मुरझाना : जैसे राजू को पता चला कि वह परीक्षा में फेल हो गया है तो सुनते ही उसका चेहरा मुरझा गया
चक्कर खा जाना : बाहर बहुत तेज धूप होने कारण राजू थोड़ी देर में चक्कर खाकर गिर पड़ा।
दो से चार बनाना : आजकल लालच और अंधी होड़ का युग है जिसमें लोग दो से चार बनाने में लगे रहते हैं।
आँखों से बोलना : उनका अभिनय इतना भाव प्रणव था कि वह आँखों से बोल काफी कुछ कह देते थे।


प्रश्न 4 : निम्नलिखित शब्दों के हिंदी पर्याय दीजिए।
  1. शिद्दत – …….
  2. याराना – ……….
  3. बमुश्किल – ………
  4. खालिस – ………..
  5. नावाकिफ़ – ……..
  6. यकीन – …………
  7. हावी – …………
  8. रेशा – ……….

उत्तर : दिए गए शब्दों के पर्याय इस प्रकार होंगे..

निम्नलिखित शब्दों के हिंदी पर्याय

1. शिद्दत – तीव्रता, गंभीरता
2. याराना – दोस्ती, मैत्री
3. बमुश्किल – कठिनाई से, मुश्किल से
4. खालिस – शुद्ध, निर्मल
5. नावाकिफ़ – अनजान, अपरिचित
6. यकीन – विश्वास, भरोसा
7. हावी – प्रभावशाली, नियंत्रित करने वाला
8. रेशा – तंतु, तागा


प्रश्न 5 : निम्नलिखित संधि विच्छेद कीजिए-
  1. चित्रांकन – ……… + ………
  2. सर्वोत्कृष्ट – ………. + ………..
  3. चर्मोत्कर्ष – ………… + ………….
  4. रूपांतरण – ……….. + ………….
  5. घनानंद – ………… + …………..

उत्तर : दिए शब्दों के संधि विच्छेद इस प्रकार होंगे…

  1. चित्रांकन : चित्र + अंकन
  2. सर्वोत्कृष्ट : सर्व + उत्कृष्ट
  3. चर्मोत्कर्ष : चरम + उत्कर्ष
  4. रूपांतरण : रूप + अंतरण
  5. घनानंद : घन + आनंद

प्रश्न 6 : निम्नलिखित का समास विग्रह कीजिए और समास का नाम भी लिखिए-
(क) कला-मर्मज्ञ
(ख) लोकप्रिय
(ग) राष्ट्रपति

उत्तर : समास विग्रह इस प्रकार होगा…

(क) कला-मर्मज्ञ : कला का मर्मज्ञ (संबंध तत्पुरुष समास)
(ख) लोकप्रिय : लोक में प्रिय (करण तत्पुरुष समास)
(ग) राष्ट्रपति : राष्ट्र का पति (संबंध तत्पुरुष समास)



योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 : फणीश्वरनाथ रेणु की किस कहानी पर ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म आधारित है, जानकारी प्राप्त कीजिए और मूल रचना पढ़िए।

उत्तर : फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित है फिल्म ‘तीसरी कसम’। यह कहानी एक ईमानदार और मासूम गाड़ीवान, हीरामन, और एक नाचने वाली, हीराबाई, की सरल और भावनात्मक प्रेम कहानी को प्रस्तुत करती है।

‘मारे गए गुलफाम’ कहानी का सारांश

मुख्य पात्र
1. हीरामन : एक सरल और ईमानदार गाड़ीवान, जिसकी दुनिया उसकी बैलगाड़ी और उसके बैल हैं।
2. हीराबाई : एक सुंदर और हृदयस्पर्शी नाचने वाली, जो मेलों और कार्यक्रमों में नृत्य करती है।

कहानी का सारांश
हीरामन की बैलगाड़ी में एक दिन हीराबाई सफर करती है। हीरामन, अपनी निर्दोष और सरल प्रकृति के कारण, हीराबाई के प्रति आकर्षित हो जाता है। हीराबाई की सुंदरता और उसके कोमल व्यवहार से प्रभावित होकर हीरामन उसे अपना दोस्त मान लेता है। कहानी के दौरान, हीरामन और हीराबाई के बीच एक मासूम और भावनात्मक रिश्ता विकसित होता है।

ये कहानी समाज की कठोर वास्तविकताओं और नैतिकताओं को उजागर करती है, जो हीराबाई जैसी नर्तकियों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखता है। अंततः, हीरामन को यह समझ में आता है कि वह हीराबाई को अपने साथ नहीं रख सकता क्योंकि समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा।

कहानी का अंत भावनात्मक और मार्मिक है, जब हीरामन हीराबाई से अलग हो जाता है, अपनी बैलगाड़ी में वापस लौटते हुए। इस अंत में एक गहरा संदेश छुपा है, जो प्रेम और समाज की वास्तविकताओं के बीच संघर्ष को दर्शाता है।

विद्यार्थी किसी भी नजदीकी पुस्तकालय में जाकर फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्य खोजें। उनकी पुस्तकों में ये कहानी मिल जाएगी। वे फणीश्वरनाथ रेणु की किताबों में इस कहानी को पढ़ सकते हैं। इस कहानी को भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और इसे कई भाषाओं में अनूदित भी किया गया है।

विद्यार्थी चाहें तो इसे साहित्यिक पुस्तकालयों, बुकस्टोर्स या ऑनलाइन प्लेटफार्म पर भी खोज सकते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्यिक कार्यों का आनंद उठाने के लिए उनकी अन्य कहानियाँ और उपन्यास भी पढ़ सकते हैं।


प्रश्न 2 : समाचार पत्रों में फ़िल्मों की समीक्षा दी जाती है। किन्हीं तीन फ़िल्मों की समीक्षा पढ़िए और तीसरी कसम’ फ़िल्म को देखकर इस फ़िल्म की समीक्षा स्वयं लिखने का प्रयास कीजिए।

उत्तर : ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की समीक्षा इस प्रकार होगी..

फ़िल्म का नाम : तीसरी कसम
निर्देशक : बासु भट्टाचार्य
मुख्य कलाकार : राज कपूर, वहीदा रहमान
निर्माता : शैलेन्द्र
कहानी : फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित

कहानी का सारांश
‘तीसरी कसम’ एक गहरी भावनात्मक और सामाजिक कथा है जो एक सरल और मासूम गाड़ीवान, हीरामन (राज कपूर), और एक सुंदर नाचने वाली, हीराबाई (वहीदा रहमान), के बीच के अनोखे रिश्ते को प्रस्तुत करती है। फिल्म बिहार के ग्रामीण जीवन की पृष्ठभूमि में सेट है और भारतीय समाज की कठोर सच्चाइयों और नैतिकताओं को उजागर करती है।

राज कपूर ने हीरामन के किरदार में अपनी सरलता और मासूमियत को बेहतरीन तरीके से प्रदर्शित किया है। वहीदा रहमान ने हीराबाई के रूप में अपनी भूमिका को बखूबी निभाया है, उनकी आंखों की गहराई और भावनाओं ने दर्शकों के दिलों को छू लिया। दोनों अभिनेताओं के बीच की केमिस्ट्री अद्वितीय है और उनकी परफॉर्मेंस ने कहानी को जीवंत बना दिया।

बासु भट्टाचार्य का निर्देशन सहज और संवेदनशील है। उन्होंने कहानी के हर पहलू को बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है। ग्रामीण जीवन की बारीकियों को जिस सजीवता से फिल्म में दर्शाया गया है, वह दर्शकों को बिहार की मिट्टी की खुशबू महसूस कराता है।

फ़िल्म का संगीत शंकर-जयकिशन द्वारा रचित है और गीत शैलेन्द्र द्वारा लिखे गए हैं। ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ और ‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे’ जैसे गीतों ने फिल्म को एक खास पहचान दी है। ये गीत कहानी के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं और फिल्म की भावना को और गहराई देते हैं।

फ़िल्म का छायांकन सुब्रत मित्रा द्वारा किया गया है, जो फिल्म के दृश्यों को बेहद खूबसूरत और वास्तविक बनाता है। ग्रामीण परिवेश, खेत-खलिहान, और मेलों की जीवंतता को बहुत ही प्रभावी तरीके से कैप्चर किया गया है।

संपादन में बासु भट्टाचार्य ने बहुत ही सटीकता से काम किया है। फिल्म का प्रवाह धीमा नहीं होता और दर्शक हर पल कहानी से जुड़े रहते हैं।

‘तीसरी कसम’ एक क्लासिक फिल्म है जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई है। यह फिल्म न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि समाज की गहराइयों में जाकर सोचने पर मजबूर करती है। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी और बासु भट्टाचार्य का निर्देशन इसे एक अविस्मरणीय अनुभव बनाते हैं।

यह समीक्षा ‘तीसरी कसम’ की गहराई और सुंदरता को दर्शाने का एक प्रयास है। यह फिल्म भारतीय सिनेमा में अपनी अद्वितीयता और संवेदनशीलता के लिए हमेशा याद रखी जाएगी।



परियोजना कार्य

प्रश्न 1 : फ़िल्मों के संदर्भ में आपने अकसर यह सुना होगा-‘जो बात पहले की फ़िल्मों में थी, वह अब कहाँ’। वर्तमान दौर की फ़िल्मों और पहले की फ़िल्मों में क्या समानता और अंतर है? कक्षा में चर्चा कीजिए।

उत्तर : फिल्में समाज का दर्पण होती हैं और समय के साथ-साथ उनमें भी बदलाव आते रहते हैं। पहले की फिल्मों और वर्तमान दौर की फिल्मों में कई समानताएं और अंतर होते हैं। यहां उन पर एक नजर डालते हैं:

समानताएं

1. कहानी की महत्ता : पहले की फिल्मों में भी कहानी का महत्व था और आज भी है। एक अच्छी कहानी दर्शकों को हमेशा आकर्षित करती है।

2. भावनात्मक तत्व : दोनों दौर की फिल्मों में भावनात्मक तत्व प्रमुखता से दिखते हैं। प्यार, दोस्ती, परिवार और समाज जैसे मूल भावनात्मक विषय हमेशा फिल्म का हिस्सा रहे हैं।

3. गीत-संगीत : संगीत और गीत फिल्मों का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। पहले की फिल्मों में भी संगीत को महत्वपूर्ण माना जाता था और आज भी गीत-संगीत का महत्वपूर्ण स्थान है।

अंतर

1. तकनीकी विकास : पहले की फिल्मों में तकनीकी संसाधनों की कमी थी, जिससे विशेष प्रभाव (VFX) और ध्वनि गुणवत्ता में अंतर होता था। आज की फिल्मों में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिससे दृश्य और ध्वनि में बहुत सुधार हुआ है।

2. कहानी की जटिलता : पहले की फिल्मों में सरल और सीधी कहानियाँ होती थीं, जबकि आज की फिल्मों में जटिल कथानक और विविधता देखी जाती है। आज की कहानियाँ अधिक वास्तविक और जमीनी होती हैं।

3. सामाजिक मुद्दे : पहले की फिल्मों में पारिवारिक और सामाजिक मुद्दों पर जोर दिया जाता था, जबकि आज की फिल्मों में आधुनिक समाज के मुद्दों, जैसे महिला सशक्तिकरण, LGBTQ+ अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य आदि पर ध्यान दिया जाता है। आज की फिल्मे जैसे टायलेट एक प्रेम कथा, पैडमैन, थप्पड़, पिंक, क्वीन, छपाक जैसे फिल्मों ने विभिन्न सामाजिक मुद्दों को उठाया है।

4. अभिनय में अंतर : पहले की फिल्मों में अभिनय का तरीका बहुत नाटकीय होता था। दृश्यों और कहानी में भी नाटकीयता होती थी लेकिन कलाकार हर तरह की भूमिका करने में संकोच नही करते थे। पहले की फिल्मों स्टारडम नहीं होता था।  आजकल की फिल्मों में अधिक स्वाभाविक और वास्तविक अभिनय की प्रवृत्ति तो है, लेकिन बहुत से कलाकार केवल खास रोल ही करना पसंद करते हैं। वह अपने स्टारडम से बाहर नहीं निकलना चाहते थे।

5. गीत-संगीत के स्तर में गिरावट : पहले की फिल्मों के गीत संगीत बेहद मधुर होते थे और गीतों का स्तर उत्कृष्ट कोटि का होता था। गीतों की भाषा शालीन और सभ्य होती थी तथा संगीत में बेहद मधुरता होती थी। पुरानी फिल्मों का गीत संगीत आज भी गुनगुनाया जाता है जबकि आज की फिल्मों के गीत संगीत में गिरावट आई है। गीतों में द्वि-अर्थी शब्दों और अश्लील शब्दों की भरमार होती है। संगीत भी बेहद भौंडा और शोर-शराबे वाला होता है। आज की फिल्मों के गीत-संगीत में से मधुरता गायब हो चली है।

6. सेंसरशिप और स्वातंत्रता : पहले की फिल्मों में सेंसरशिप का कड़ा नियंत्रण था और फिल्मों में कई विषयों पर बात करना कठिन था। आज की फिल्मों में विषयवस्तु पर अधिक स्वतंत्रता है और निर्माता विभिन्न मुद्दों पर खुलकर बात कर सकते हैं।

7. व्यापारिक दृष्टिकोण : पहले की फिल्मों में कला और कहानी पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था, जबकि आज की फिल्मों में व्यापारिक दृष्टिकोण और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन महत्वपूर्ण हो गए हैं। बड़ी बजट की फिल्में और मार्केटिंग पर ज्यादा जोर दिया जाता है।

निष्कर्ष

पहले की फिल्मों में भावनात्मक गहराई और सरलता थी, जबकि आज की फिल्मों में तकनीकी उत्कृष्टता और विविधता है। दोनों ही दौर की फिल्मों का अपना महत्व और खूबसूरती है। पहले की फिल्में एक प्रकार की पारंपरिकता और सादगी लिए हुए होती थीं, जबकि आज की फिल्में आधुनिकता और जटिलता को दर्शाती हैं। दोनों ही अपने-अपने समय का प्रतिनिधित्व करती हैं और दर्शकों को मनोरंजन और विचार दोनों प्रदान करती हैं।

कक्षा में इस विषय पर चर्चा करते समय, दो या दो से अधिक विद्यार्थी दोनों दौर की फिल्मों के उदाहरण दे सकते हैं और उनसे उनके विचार पूछ सकते हैं कि वे किस प्रकार की फिल्मों को अधिक पसंद करते हैं और क्यों। इससे वे फिल्मों की विकास यात्रा और समाज पर उनके प्रभाव को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।


प्रश्न 2 : ‘तीसरी कसम’ जैसी और भी फ़िल्में हैं, जो किसी न किसी भाषा की साहित्यिक रचना पर बनी हैं। ऐसी फ़िल्मों की सूची निम्नांकित प्रपत्र के आधार पर तैयार करें।
क्र. संफिल्म का नामसाहित्यिक रचनाभाषारचनाकार
1.देवदासदेवदासबंगलाशरत्चंद्र

उत्तर : कई साहित्यिक रचनाओं पर फिल्में बनी है। ऐसी ही कुछ फिल्मों के नाम इस प्रकार है…

क्र. संफिल्म का नामसाहित्यिक रचनाभाषारचनाकार
1.देवदासदेवदासबंगलाशरत्चंद्र
2.शतरंज के खिलाड़ीशतरंज के खिलाड़ीहिंदीप्रेमचंद
3.नजरानालक्ष्मण रेखाहिंदीगुलशन नंदा
4.झील के उस पारझील के उस पारहिंदीगुलशन नंदा

प्रश्न 3 : लोकगीत हमें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। तीसरी कसम’ फ़िल्म में लोकगीतों का प्रयोग किया गया है। आप भी अपने क्षेत्र के प्रचलित दो-तीन लोकगीतों को एकत्र कर परियोजना कॉपी पर लिखिए।

उत्तर :  लोकगीत हमारे सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और यह हमारे रीति-रिवाजों, परंपराओं और जीवनशैली को दर्शाते हैं। ‘तीसरी कसम’ फिल्म में भी लोकगीतों का प्रयोग करके कहानी को और अधिक सजीव और प्रभावी बनाया गया है।

यहां आपके लिए कुछ प्रचलित लोकगीत प्रस्तुत किए जा रहें जो भारत के अलग-अलग राज्यों की लोक विरासत को प्रकट करते हैं…

1. बिहार का लोकगीत: ‘बिदेसिया’

बिदेसिया बिहार का एक प्रमुख लोकगीत है, जिसे विशेष रूप से छठ पूजा और विवाह जैसे अवसरों पर गाया जाता है। यह गीत प्रायः प्रवासी मजदूरों के दर्द और उनके परिवारों की भावनाओं को दर्शाता है।

पिया जी सजनवा ए बिदेसिया
बिदेसी पिया जी सजनवा ए बिदेसिया
काहे सजनवा बिदेस गइले ओ बिदेसिया
ए बिदेसिया, बिदेसिया ए बिदेसिया
पिया जी सजनवा ए बिदेसिया

2. राजस्थान का लोकगीत: ‘केसरिया बालम’

केसरिया बालम राजस्थान का एक प्रसिद्ध लोकगीत है जो अपने प्रियजन की वापसी का स्वागत करने के लिए गाया जाता है। यह गीत राजस्थान की संस्कृति और रंगीनता को दर्शाता है।

केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस
केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस
चाकी री चन्दन री गंध पधारो म्हारे देस
केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस

3. महाराष्ट्र का लोकगीत: ‘लावणी’

लावणी महाराष्ट्र का एक लोकप्रिय लोकगीत है जो अपने तेज़ और जीवंत ताल के लिए प्रसिद्ध है। यह गीत विशेष रूप से तमाशा और अन्य लोक नृत्यों में गाया जाता है।

पिंगळ्या पिंजऱ्यात सोन्याचा पिंजरा
उधळला मोगरा
चाफा बोलेना, चाफा चालेना
चाफा चालेना, चाफा बोलेना

परियोजना के लिए सुझाव

विद्यार्थी अपनी परियोजना कॉपी पर इन लोकगीतों को अच्छे तरीके से लिख सकते हैं। इसके साथ ही, आप इन गीतों के बारे में संक्षिप्त परिचय, उनके महत्व और संबंधित सांस्कृतिक जानकारी भी जोड़ सकते हैं। आप चाहें तो कुछ चित्र भी जोड़ सकते हैं जो इन गीतों को और आकर्षक बना देंगे।

परियोजना का स्वरूप इस प्रकार होगा..

1. शीर्षक: अपने क्षेत्र के प्रचलित लोकगीत
2. परिचय: लोकगीतों का महत्व और उनकी विशेषताएं
3. लोकगीत
– गीत का शीर्षक
– गीत के बोल
– गीत का महत्व और प्रसंग

इस प्रकार, विद्यार्थी अपनी परियोजना को पूर्ण कर सकते हैं और अपनी संस्कृति के लोकगीतों को संरक्षित करने में योगदान दे सकते हैं।


तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र : प्रहलाद अग्रवाल (कक्षा-10 पाठ-11 हिंदी स्पर्श 2) (NCERT Solutions)


कक्षा-10 हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ

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महर्षि का संधि विग्रह कीजिए​। संधि का नाम लिखें।

महर्षि का संधि विग्रह :

महर्षि : महा + ऋषि
संधि भेद : गुण स्वर संधि

 

स्पष्टीकरण

‘महर्षि’ में गुण स्वर संधि है। गुण स्वर संधि का जो नियम यहाँ पर लाग होता है, वह नियम इस प्रकार है…
जब ‘आ’ और ‘ऋ’ का मेल होता है तो ‘अर्’ बनता है। महा का ‘आ’ और ऋषि के ‘ऋ’ के मेल से ‘अर्’ बना है। इसी कारण महर्षि में गुण स्वर संधि है।
गुण स्वर संधि जिसे संक्षेप में गुण संधि भी कहते है, ये संधि स्वर संधि के पाँच उपभेदों में एक भेद है।

स्वर संधि के पाँच उपभेद इस प्रकार हैं…

  • दीर्घ स्वर संधि
  • गुण स्वर संधि
  • यण स्वर संधि
  • वृद्धि स्वर संधि
  • अयादि स्वर संधि

संधि से तात्पर्य दो शब्दों के संयोजन से होता है। जब दो शब्दों में से प्रथम शब्द के अंतिम वर्ण और द्वितीय शब्द के प्रथम वर्ण के संयोजन से जो नया शब्द बनता है, वह ‘संधि’ कहलाता है। इस संधि को पुनः उसके मूल शब्दों में अलग कर देना ‘संधि-विच्छेद’ कहलाता है। संधि के तीन भेद होते हैं

  • स्वर संधि
  • व्यंजन संधि
  • विसर्ग संधि

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हिमालय में संधि :

हिमालय : हिम + आलय
संधि का भेद : दीर्घ स्वर संधि

स्पष्टीकरण

‘हिमालय’ में दीर्घ स्वर संधि है, जिसे दीर्घ संधि भी कहते हैं। ये संधि स्वर संधि के पाँच उपभेदों मे से एक उपभेद है।
हिमालय में दीर्घ संधि का जो नियम लागू होता है, वह इस प्रकार है…

जब ‘अ’ और ‘आ’ का मेल होता है तो ‘आ’ बनता है। यहाँ पर हिम के अंतिम वर्ण ‘अ’ और आलय के अंतिम वर्म ‘आ’ का मेल होकर ‘आ’ बन रहा है।

इसलिए इस नियम के अनुसार हिमालय में दीर्घ स्वर संधि है।

स्वर संधि, संधि के तीन भेदों में एक है। संधि के तीन भेद हैं..

  • स्वर संधि
  • व्यंजन संधि
  • विसर्ग संधि

स्वर संधि के पाँच उपभेद..

  • दीर्घ संधि
  • गुण संधि
  • यण संधि
  • वृद्धि संधि
  • अयादि संधि

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निम्नलिखित शब्दों में संधि कीजिए- 1. सम् + चय 2. वाक् + मय 3. राका + ईश 4. सत् + मार्ग 5. निः + पक्ष 6. सु + आगत 6. उत् + लेख 7. एक + एक 8. तत् + लीन 9. तपः + बल

‘भवनम’ का संधि विच्छेद करो।

हिंदी गद्य साहित्य के द्वितीय उत्थान का प्रारंभ हुआ (1) संवत् 1918 में (2) संवत् 1930 में (3) संवत् 1936 में (4) संवत् 1950 में

0

सही विकल्प होगा..

(4) संवत् 1950 में

विस्तृत विवरण

हिंदी गद्य साहित्य के द्वितीय उत्थान का प्रारंभ संवत् 1950 में हुआ था।  हिंदी साहित्य के द्वितीय गद्य उत्थान की बात करें तो यह संवत 1950 से 1955 के बीच माना जाता है अर्थात सन 1888 से 1893 तक हिंदी साहित्य का द्वितीय गद्य उत्थान हुआ था। हिंदी साहित्य का द्वितीय उत्थान भारतेंदु युग के बाद आरंभ हुआ था।

इस समय में हिंदी भाषा के लेखकों ने अन्य भाषाओं के शब्दों को भी गद्य साहित्य में प्रयोग करना शुरू कर दिया था। संस्कृत के शब्द तो पहले से ही प्रयोग किए जाते थे, इसके अतिरिक्त पर अरबी एवं फारसी भाषा तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों का भी बहुतायत से प्रयोग करना आरंभ कर दिया था। अंग्रेजी के शब्द भी गद्य साहित्य में प्रयोग किये जाने लगे थे।


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किस विकल्प में दोनों शब्द तत्सम शब्द हैं? (a) सूरज, अग्नि (b) भानु, आसमान (c) आकाश, सितारा (d) दिनकर, सूर्य.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध किस नाम से प्रकाशित हैं। A. मणि B. फुलमणि C. चिंतामणि D. नीलमणि ​

साइबर अपराध का आतंक विषय पर एक आलेख तैयार कीजिए।

आलेख

साइबर अपराध का आतंक

 

साइबर अपराध का आतंक इस साइबर युग में एक गंभीर चिंतन चिंता का विषय बन गया है। आज इंटरनेट पर साइबर अपराध का बेहद आतंक मचा हुआ है। कोई भी अनजान ईमेल खोलते समय डर लगता है, पता नहीं उसके साथ कौन सा लिंक हो जो वायरस बनकर कंप्यूटर का मोबाइल में प्रवेश कर जाए। किसी भी अंजान व्हाट्सएप नंबर से आये मैसेज को खोलते समय भी ऐसा ही डर लगा रहता है।

हम अक्सर लाभ कमाने के लालच में अथवा इनाम आदि के लालच में किसी ऐसी वेबसाइट पर चले जाते हैं, जहाँ पर बहुत कम समय में ढेर सारा पैसा कमाने के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर बातें की गई हों। वहाँ हमसे सिक्युरिटी मनी को जमा करने की मांग की जाती है। बाद में हम पाते हैं कि हमको ठग लिया गया है। उस समय हम यह नहीं सोचते कि कम समय में ज्यादा पैसा कमाने वाली बात कोई लॉजिक नहीं है। उसी तरह बहुत सी वेबसाइट ऐसी है जो अनेक तरह से फ्रॉड करने का काम करती हैं, इसलिए आज साइबर अपराध इंटरनेट पर अपना आतंक मचाये हुए हैं।

आज इंटरनेट जागरूकता का समय है, इंटरनेट आज के किसी के जीवन की आवश्यकता बन गया है, और किसी को इसका उपयोग करना जरूरी हो गया है। ऐसे में साइबर अपराध के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसलिए आज इंटरनेट जागरूकता आवश्यक है। हमें किसी भी वेबसाइट अनजान व्यक्ति द्वारा भेजे गए मैसेज, ईमेल आदि पर ध्यान देने की जरूरत है। साइबर अपराध के बारे में अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित कर उससे बचने के उपाय के बारे में सोचने की जरूरत है। तब ही हम साइबर अपराध को इंटरनेट पर कम कर सकते हैं।


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स्कूल पिकनिक पर जाने हेतु माँ और पुत्री के बीच हुए संवाद को लिखें।

संवाद लेखन

स्कूल पिकनिक पर जाने हेतु माँ और पुत्री के बीच हुआ संवाद

 

पुत्री ⦂ माँ, मुझे कल ₹500 दे देना।

माँ ⦂ क्यों क्या काम है?

पुत्री ⦂ माँ, हमारे स्कूल की तरफ से पिकनिक का आयोजन किया गया है और कक्षा के सभी छात्र-छात्राएं पिकनिक पर जा रहे हैं। हर छात्र-छात्रा को ₹500 जमा करने हैं। इन पैसों में सुबह का नाश्ता और दोपहर का लंच और शाम का नाश्ता दिया जायेगा।

माँ ⦂ तुम लोग पिकनिक पर कहाँ जाओगे? और कितने बजे से कितने बजे तक पिकनिक है।

पुत्री ⦂ माँ हमारे शहर के बाहर एक रिजॉर्ट स्थित है, वहां पर हम लोग पूरा दिन पिकनिक मनाएंगे और उसके पास के जंगल में घूमेंगे। पिकनिक सुबह 8 बजे से शाँम 5 बजे तक चलेगी।

माँ ⦂ बेटा तुम्हारे पिता आ जाएं तो तुम उनसे कह देना, वह तुम्हें ₹500 दे देंगे।

पुत्री ⦂ ठीक है माँ।

माँ ⦂ लेकिन पिकनिक में ध्यान रखना, जंगल में जंगली जानवर होते हैं।

पुत्री ⦂ माँ, हम लोग जंगल के ज्यादा अंदर नही जायेगे। बस रिजॉर्ट के आसपास का ही जंगल घूमेंगे। वहाँ कोई खतरा नही है।

माँ ⦂ तुम्हे कितने बजे पिकनिक को निकलना है?

पुत्री ⦂ मुझे सुबह 7 बजे तक विद्यालय पहुँचना है, और 7.30 सभी छात्रों के लेकर बस निकल जायेगी।

माँ ⦂ ठीक है बेटी, मैं तुम्हारे कपड़े और जरूरी समान निकाल दे देती हूँ तुम अपना बैग तैयार कर लो।

पुत्री ⦂ हाँ, माँ।


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पाठ ‘हिमालय की बेटियां’ में कालिदास का उल्लेख किया गया है। कालिदास का उल्लेख लेखक ने किस कारण किया है ?

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पाठ ‘हिमालय की बेटियां’ में लेखक ने कालिदास का उल्लेख किया है। कालिदास का उल्लेख लेखक ने ‘हिमालय की बेटियां’ पाठ में इसलिए किया है, क्योंकि कालिदास ने हिमालय को देवात्मा कहा था। इस पाठ में लेखक ने हिमालय की विशेषताओं का वर्णन किया है और उन्हीं विशेषताओं तथा हिमालय से निकलने वाली नदियों की विशेषताओं को बताते हुए लेखक ने यह भी बताया है कि कालिदास ने हिमालय को देवात्मा कहा था।

‘हिमालय की बेटियां’ पाठ में लेखक नागार्जुन ने अपनी हिमालय यात्रा के दौरान लिखा था। ये लेख उन्होंने सन् 1947 में लिखा था। इस पाठ में हिमालय के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन किया है। उन्होंने हिमालय की अनुपम छटा, अठखेलियां करती नदियां, बर्फ से ढकी पहाड़ियों, पेड़-पौधों से बड़ी गाड़ियां, देवदार, चीड़, सनोबर, चिनार जैसे वृक्षों से भरे जंगलों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। हिमालय से निकलने वाली नदियों को लेखक ने हिमालय की बेटियां कहा है।

संदर्भ पाठ :
हिमालय की बेटियां (नागार्जुन)


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रिश्वत लेने देने के बारे में अपनी राय लिखिए ।

विचार/अभिमत

रिश्वत लेना या देना

 

रिश्वत लेने देने मेरे अनुसार एक अपराध है।​ रिश्वत लेने देने से ईमानदारी पर आँच आती है। रिश्वत लेने या देने का कार्य मनुष्य को चरित्र के पतन को इंगित करता है।​ रिश्वत लेने या देने के अनेक दुष्परिणाम भी होते है, जो व्यक्ति मेहनत करता है, वह हमेशा पीछे रह जाता है।​ जो लोग रिश्वत देकर अपना करवा लेते है, वे बिना मेहनत करके आगे निकल जाते है।​ रिश्वत लेना और देना बहुत-बहुत गलत है।​

आज के समय में ईमानदारी नष्ट हो गई है।​ सभी लोग रिश्वत का सहारा लेते है, और अपना काम करवाते है।​ हम सब को रिश्वत को खत्म करने का प्रयास करना चाहिए, ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहिए।​ रिश्वत के कारण आम आदमी और गरीब लोग हमेशा पीछे रह जाते है, उनके काम हमेशा पीछे रह जाते है।​ अमीर लोग हमेशा रिश्वत देकर कुछ मिनटों में काम करवा लेते है।​ रिश्वत देना और साथ में लेना दोनों ही गलत है।


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बेहतर भविष्य के लिए सिर्फ व्यवहारिक विषयों (गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र) की पढ़ाई होनी चाहिए। इस पर विचार लिखें।

अकेली निहत्थी आवाज़ और ब्रह्मास्त्रों से क्या तात्पर्य है? स्पष्ट कीजिए।

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अकेली निहत्थी आवाज़ और ब्रह्मास्त्रों से तात्पर्य उस बिना हथियार के व्यक्ति की है, जिसका संसार में कोई बड़ा महत्व नहीं होता लेकिन फिर भी वह धर्म के विरुद्ध लड़ता है और ब्रह्मास्त्र अर्थात बड़े-बड़े महाशक्तियों के विरुद्ध संघर्ष करता है। वह अपना भविष्य ना जानते हुए कि आगे क्या होगा, यह ना सोच समझ कर भी अधर्म से लड़ने की कोशिश करता है और समाज के प्रभावशाली लोगों का सामना करता है ।’

टूटा पहिया’ कविता के माध्यम से कवि धर्मवीर भारती ने उदाहरण देते हुए अकेली आवाज के लिए अभिमन्यु को प्रतीक बनाया है, जो चक्रव्यूह में अकेले दुस्साहसी बनकर चक्रव्यूह में अकेले ही प्रवेश कर गया और उसने आधे चक्रव्यूह का तो भेदन कर लिया लेकिन आखिर में कौरव सेना के बड़े-बड़े महारथियों ने उसके सब अस्त्र-शस्त्र नष्ट कर डाले।

अभिमन्यु ये जानते हुए भी कि वो चक्रव्यूह से बाहर निकलने की विधि नही जानता है और चक्रव्यूह से बाहर नही निकल पायेगा, वह विरोधी पक्ष के लोगों से लड़ने के लिए चल पड़ा। उसी प्रकार भी आज का लघुमानव यानि आम आदमी भी यह जानते हुए भी उसकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जाएगा।

बड़े-बड़े प्रभावशाली लोग उसकी आवाज को दबाने का प्रयास करेंगे, फिर भी वह अत्याचार और गलत बात का विरोध करता है, संघर्ष करता है, अधर्म के विरुद्ध लगड़ता है। यहाँ पर अकेली निहत्थी आवाज उस आम आदमी का प्रतीक है और ब्रह्मास्त्र उन सभी महारथियों यानि प्रभावशाली लोगों का प्रतीक है।

संदर्भ कविता
टूटा पहिया – धर्मवीर भारती


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‘दुनिया सोती थी पर दुनिया की जीभ जागती थी।’ कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। (नमक का दरोगा)

सिनेमा के लाभ व हानियाँ के बारे में बताते हुए एक लेख लिखें।

सिनेमा मनुष्य के मनोरंजन का एक प्रमुख साधन है। सिनेमा में प्रमुख मनोहारी प्राकृतिक दृश्य, सुंदर एवं सुमधुर गीतों का समावेश, स्वाभाविक अभिनय एवं कथानक की रोचकता आदि मनुष्य को अत्यधिक आकर्षित करते हैं।

सिनेमा के लाभ व हानियाँ इस प्रकार हैं…

सिनेमा के लाभ

  • सिनेमा शिक्षा के प्रसार में भी बड़े उपयोगी हैं। इसके द्वारा वैज्ञानिक और भौगोलिक ज्ञान को अच्छी तरह प्रस्तुत किया जा सकता है। रामायण और महाभारत के प्रसंगों पर बने चित्र लोगों को सत्य, सदाचार और न्याय की प्रेरणा देते हैं।
  • ऐतिहासिक फिल्में अपने युग का आईना बनकर हमें प्रभावित करती हैं। सिनेमा राष्ट्रीय एकता बढ़ाते और राष्ट्रभाषा का प्रचार भी करते हैं। सिनेमा केवल मनोरंजन का ही साधन नहीं है, अपितु यह तो व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ है।
  • सिनेमा ज्ञान के भी स्रोत होते हैं। अनेक देशों की भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक तथा धार्मिक विचारधाराओं को इनसे जाना जा सकता है। अनेक वैज्ञानिक अनुसंधानों एवं प्रयोगों को भी समझा जा सकता है। प्राकृतिक दृश्यों का आनंद भी इनसे मिलता है।
  • शिक्षा के क्षेत्र में आधुनिक युग में सिनेमा का विशेष महत्व बढ़ गया है। सामाजिक दृष्टि से सिनेमा के द्वारा समाज में व्याप्त रूढ़ि और अंधकार तथा बुराइयों से लोगों को परिचित कराया जा सकता है। जैसे-दहेज प्रथा, बाल-विवाह, छुआछूत आदि।
  • सिनेमा राष्ट्रीय एकता तथा भावनात्मक एकता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं।
  • सभी देशों की फिल्मों के आदान-प्रदान और प्रदर्शन विश्व मानव की समस्या से परिचित होकर समृद्धि और शांति का मार्ग ढूँढ़ते हैं। इन फिल्मों के माध्यम से कला, अभिनय ,संगीत , विज्ञान आदि की शिक्षा भी प्रभावी रूप में दी जा सकती है।

सिनेमा की हानियाँ

जहाँ एक सिनेमा के अनेक लाभ हैं, वहीं इसकी अनेक हानियाँ भी हैं।

  • सस्ते और रोमांचक चलचित्र समाज पर बुरा असर भी डालते हैं। इनके कारण समाज में फैशन, दिखावा और निरंकुशता की वृत्तियाँ फैलती हैं।
  • सिनेमा के अश्लील और हिंसात्मक दृश्यों, भद्दे गीतों और पाश्चात्य नृत्यों के कारण लोगों में बुरे संस्कार पैदा होते हैं।
    कुछ फिल्में लोगों को हत्या, शोषण, चोरी, डकैती, तस्करी जैसी बुराइयों की ओर ले जाती हैं। सचमुच, ऐसी फिल्मों से लोगों के चरित्र का पतन होता है।
  • सिनेमा के उपयोगी पक्ष के अतिरिक्त उसकी एक दूसरी तस्वीर भी है, जो विध्वंसात्मक पक्ष करती है। आधुनिक युग में बनने वाली फिल्मों ने युवा पीढ़ी को सर्वाधिक लुभाया है। सिनेमा कलाकारों की अभिनय क्षमता से नहीं, अपितु उनके ऐश्वर्य तड़क-भड़क और आमोद-प्रमोद के जीवन से आकर्षित होकर कई युवक-युवतियाँ अपने मानस में यही स्वप्न देखने लगते हैं। कई बार ऐसे उदाहरण भी मिले हैं, जब ये घर से भाग गए तथा असामाजिक तत्वों के हाथ पड़कर या तो कुमार्ग पर चल पड़े अथवा जीवन से ही हाथ धो बैठे।
  • यह संसार चारों ओर चकाचौंध का संसार है, जिसका आकर्षण युवक और युवतियों को मोहित करता है। इस पक्ष के साथ ही आधुनिक युग में निर्मित होने वाली फिल्में प्रेरणाप्रद और शिक्षादायक भी नहीं होती हैं। उनमें जीवन का सत्य कम और भावनाओं को उदीप्त करने वाले प्रसंग अधिक होते हैं।
  • अश्लील दृश्य, नग्नता, नृत्य और कामुक हाव-भाव, भंगिमा व संवाद किशोर मन को विचलित करते हैं। नए-नए फैशन के प्रति आकर्षण के साथ अनैतिक दृश्य चोरी अपहरण, डकैती और बलात्कार, मार-धाड़ आदि के प्रसंग किशोर-मानस को रोमांचित करते हैं, जिनसे वे अपने अध्ययन में पूर्ण समर्पण नहीं कर पाते हैं।

निष्कर्ष :
इस तरह सिनेमा के एक तरफ अनेक लाभ हैं, तो दूसरी तरफ अनेक हानियाँ भी हैं। हमें सिनेमा की हानियों से बचते हुए उसके लाभ को उपयोगी बनाना होगा।


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चोल साम्राज्य पर एक लेख लिखिए।

भ्रष्टाचार मुक्त भारत विकसित भारत (निबंध)

अगर पेड़ ना होते तो क्या होता?

अगर पेड़ न होते तो क्या होता

 

अगर पेड़ ना होते तो हमारे अस्तित्व की कल्पना ही नहीं कर सकते। प्रकृति ने हमें कई प्रकार के उपहार दिए हैं जिनमें पेड़ सर्वश्रेष्ठ हैं, जो हमें जीवन में हमेशा सहायता करते है जो व्यक्ति के जीवन को बनाए रखते है। शुद्ध वातावरण प्रदान करते है। जो एक स्वस्थ जीवन के लिए महत्वपूर्ण होता है।

पेड़ हमें आक्सीजन प्रदान करते हैं जो हमें जीवित रहने के लिए अत्यंत आवश्यक है इसके बिना तो हम 1 घंटा भी जीवित नहीं रह सकते। पेड़ हमारे ही नहीं बल्कि इस धरती पर मौजूद सभी जीव जंतुओं के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । पेड़ पौधे हमारे जीवन के संतुलन के साथ ही प्रकृति के संतुलन को भी बनाए रखते है।

पेड़ पौधों से ही प्रकृति की सुन्दरता का दृश्य प्राप्त होता है। पेड़ पौधों के अभाव में प्रकृति का कोई अस्तित्व ही नहीं होता है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से वर्षा कम होने लगी है। अपर्याप्त वर्षा से जल स्रोत दूषित हो रहा है। हवा में जहरीली गैसों के बढ़ने से पर्यावरण में प्रदूषण की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई है। यदि समय रहते मनुष्य नहीं सँभला और उसने पेड़ों के संरक्षण व संवर्धन की तरफ उचित ध्यान नहीं दिया तो यह धरती पेड़-पौधों एवं वनस्पतियों से विहीन हो जाएगी । मनुष्य साँस-साँस को तरसेगा। सूखा, अकाल या बाढ़ की भयावह स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

मनुष्यों का पेड़ों के बिना जीवन संभव नहीं है, वृक्ष है तो जीवन है। इसलिए हमें जितना हो सके उतने पेड़ लगाने चाहिए । यदि पेड़ नहीं होते तो, यह एक भयानक कल्पना है, हमें पेड़ों को काटने वालों का निश्चित ही विरोध करना चाहिए ।


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‘मन्नू भंडारी’ द्वारा लिखित ‘दो कलाकार’ कहानी के दोनों पात्रों का परिचय दीजिए। आपका प्रिय कलाकार कौन और क्यों है? इस पर विचार व्यक्त कीजिए।

आपने अग्रवाल प्रकाशन से कुछ पुस्तकें मँगवाई थी। लेकिन अभी तक उन पुस्तकों का पार्सल आपको नहीं मिला है। पार्सल रद्द करने के लिए प्रकाशन को ई-मेल लिखिए।

ई-मेल लेखन

पार्सल रद्द करने का ई-मेल

 

To: support@Aggrawalpublication.com
From: Raghav581@gmail.com

विषय : – पार्सल कैंसिल करवाने बाबत ।

दिनांक : 07 -07-2024

मान्यवर,
निवेदन है कि गत सप्ताह मैंने आपके संस्थान से कुछ पुस्तकें मँगवाई थी । इस पार्सल को दिनांक 05/07/2024 तक अपने नियत स्थान तक प्रेषित किया जाना था । इस पत्र के माध्यम से मैं आपको अत्यंत खेद सहित यह बताना चाहता हूँ कि अब मुझे अब तक पार्सन नहीं मिला, इसलिए मैं पार्सल की बुकिंग को निरस्त करवाना चाहता हूँ, क्योंकि प्राप्त कर्ता उक्त तिथि में नियत स्थान पर उपलब्ध नहीं रहेगा । बुकिंग के बाद पार्सल की निरस्तीकरण की सूचना देने के लिए मुझे बहुत खेद है ।

अतः मैं आपसे विनम्रता पूर्वक आग्रह करता हूँ कि आप इस पार्सल की बुकिंग निरस्त करने की औपचारिकताएं पूर्ण कर दें । बुकिंग निरस्त करने की निर्धारित नियमों के अनुसार अग्रिम राशि में नियत कटौती करके यदि संभव हो तो भुगतान राशि को शीघ्र ही वापस करने की कृपा करें।
आपके द्वारा किए गए इस कार्य के लिए मैं आपका सदा आभारी रहूँगा । साथ ही मैं आपको यह भी आश्वासन देता हूँ कि यदि मुझे भविष्य में किसी अन्य बुकिंग की आवश्यकता पड़ती है तो मैं आपकी सेवा अवश्य लूंगा ।

अत्यंत खेद सहित,

धन्यवाद
राघव सिंह,
न्यू टाउन,
शिमला


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महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध को रोकने के लिए हर क्षेत्र में महिला थाना स्थापित किए जाने हेतु महिला आयोग की अध्यक्षा की ओर से राज्य के मुख्यमंत्री को ई-मेल लिखिए।

मान लीजिए कि आप बहुत दिनों से स्कूल नहीं गए हैं। अपने किसी मित्र से इन दिनों विज्ञान विषय में करवाए गए कार्य की कॉपी स्कैन करके ई-मेल से भेजने का अनुरोध कीजिए।

पाठशाला के चपरासी का साक्षात्कार वाला संवाद लिखें।

संवाद

पाठशाला के चपरासी का साक्षात्कार

 

पत्रकार ⦂ तुम्हारा नाम क्या है?

चपरासी  साहब, मेरा नाम राम दुलारे है।

पत्रकार ⦂ तुम्हारी तनख्वाह कितनी है?

चपरासी ⦂ साहब, मेरी तनख्वाह 8000 रूपये महीना है।

पत्रकार ⦂ तुम इस पाठशाला में कब से काम कर रहे हो?

चपरासी  मुझे इस विद्यालय में काम करत-करते 20 बरस हो गए।

पत्रकार ⦂ 8 हजार रुपए में आज के समय में तुम्हारा गुजारा हो जाता है क्या?

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पत्रकार ⦂ तुम्हारी ड्यूटी का समय कितने बजे से कितना बजे तक है।

चपरासी ⦂ साहब मुझे सुबह सात बजे विद्यालय आना पड़ता है और शाम पाँच बजे मेरी छुट्टी होती है।

पत्रकार  अच्छा, तुम्हें क्या-क्या काम करना पड़ता है?

चपरासी ⦂ साहब, मुझे रोज विद्यालय के पीरियडों के लिए घंटी बजानी पड़ती है। उसके अलावा प्रधानाचार्य जी के कार्यालय का सारा सामान उनके ऑफिस में लाना-ले जाना होता है तथा स्टाफ रूम के अन्य सदस्यों के छोटे-मोटे काम करने पड़ते हैं। विद्यालय की फाइलों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी मेरा काम है। नोटिस बोर्ड पर नोटिस चिपकाना मेरा काम है।

पत्रकार ⦂ अच्छा, यह तो काफी मेहनत का काम है, जिसके मुकाबले तुम्हारी तन्ख्वाह काफी कम है।

चपरासी ⦂ प्रधानाचार्य जी ने आश्वासन दिया है कि अगले महीने मेरी तनख्वाह बढ़ा देंगे।


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नसीरुद्दीन ने अपने मित्र को कहाँ घुमाना चाहा?

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नसीरुद्दीन ने अपने मित्र को मोहल्ले में घुमाना चाहा था।

एक बार नसीरुद्दीन अपने पुराने दोस्त जमाल साहब से मिले। अपने पुराने दोस्त जमाल साहब से मिलकर एक बड़े खुश हुए और उन्होंने बहुत देर तक अपने दोस्त के साथ गपशप की। उसके बाद वह अपने दोस्त से बोले, ‘चलो दोस्त, मोहल्ले में घूम आएं।’ यह सुनकर उनके दोस्त जमाल साहब ने जाने से मना कर दिया।

नसीरुद्दीन ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘मैं यह मामूली सी पोशाक पहना हूँ, इस पोशाक में मैं बाहर लोगों से नहीं मिल सकता।’

तब नसीरुद्दीन ने कहा, ‘बस इतनी सी बात।’ फिर तुरंत जाकर दोस्त के लिए भड़कीली अचकन निकाल कर ले आए और अपने दोस्त जमाल साहब को पहनने को दे दी।

संदर्भ पाठ
कक्षा – 4 पाठ – 5 ‘दोस्त की पोशाक’


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ढीले-ढाले कुर्ते के अंदर से निकालकर रहमत ने लेखक को क्या दिखाया​? (काबुलीवाला – रवींद्रनाथ टैगोर)

तताँरा-वामीरो की कथा : लीलाधर मंडलोई (कक्षा-10 पाठ-10 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

ढीले-ढाले कुर्ते के अंदर से निकालकर रहमत ने लेखक को क्या दिखाया​? (काबुलीवाला – रवींद्रनाथ टैगोर)

ढीले-ढाले कुर्ते के अंदर से रहमत ने कागज का एक टुकड़ा निकाल कर लेखक को दिखाया था। उस कागज के टुकड़े पर रहमत की बेटी के हाथों की छाप बनी हुई थी। रहमत के बेटी काबुल में रहती थी। जब रहमत वहाँ से भारत आया था तो वह कागज के टुकड़े पर अपनी लड़की के हाथों की छाप ले आया था। काली स्याही की सहायता से अपनी बेटी नन्हें हाथ की छा वाले कागज को रहमत अपने कुर्ते की जेब में हमेशा संभाल कर रखता था।

जब रहमत लेखक से मिलने आया तो उसने अपने कुर्ते की जेब से वही कागज निकालकर लेखक को दिखाया था। लेखक ने देखा था कि उस कागज पर किसी बच्ची के नन्हे हाथों की छाप थी।

रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित कहानी ‘काबुलीवाला’ कहानी मूल रूप से बंगाली में लिखी हुई कहानी है। इस कहानी में लेखक ने अफगानिस्तान के काबुल शहर से कलकत्ता आए हुए एक अफगानी व्यक्ति रहमत के बारे में वर्णन किया है। सब लोग उसे काबुलीवाला कह कर बुलाते थे। वह काबुल से भारत के कलकत्ता (कोलकाता) शहर में रोजगार की तलाश में आया था। वह काजू, बादाम, किशमिश जैसे सूखे मेवे आदि बेचकर अपना व्यवसाय करता था।

लेखक की लड़की मिनी से काबुलीवाला का अच्छा मेलमिलाप हो गया था और वह लेखक की लड़की को अक्सर मुफ्त में ही काजू बादाम दे जाया करता था। एक बार किसी विवाद के कारण काबुलीवाला को जेल की सजा हो गई और वह कई वर्षों जेल में बिताने के बाद लेखक से मिलने उसके घर पर आया था।


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एक स्वतंत्र व्यक्ति की तुलना उड़ते हुए पक्षी से करते हुए अपने विचार लिखिए। ​

विचार लेखन

स्वतंत्र व्यक्ति और उड़ते पक्षी के बीच तुलना

 

एक स्वतंत्र व्यक्ति की तुलना उड़ते हुए पक्षी से की जा सकती है क्योंकि दोनों ही स्वतंत्रता, स्वतंत्र विचारों और अनंत संभावनाओं के प्रतीक होते हैं। एक तरफ जहाँ खुला आसमान पक्षी के लिए अनंत संभावनाओं का प्रतीक है। वह बिना किसी बंधन के ऊँचाईयों तक उड़ सकता है, अपने पंखों के सहारे अपनी दिशा तय कर सकता है। वहीं दूसरी तरफ एक स्वतंत्र व्यक्ति भी बिना किसी सामाजिक या मानसिक बंधन के अपनी इच्छाओं और सपनों को पूरा करने की क्षमता रखता है। वह अपने निर्णय स्वयं लेता है और अपनी राह स्वयं चुनता है।

पक्षी स्वच्छंदता का प्रतीक होता है। उसे न तो किसी का डर होता है और न ही किसी पर निर्भरता। वह अपने भोजन की तलाश खुद करता है और अपने घोंसले को स्वयं बनाता है। वह अपना जीवन बिना किसी रोट-टोक के स्वतंत्रता से जीता है, उसके लिए नगर, राज्य, देश जैसी भौगोलिक सीमाओं के बंधन नहीं हैं।

स्वतंत्र व्यक्ति भी आत्मनिर्भर होता है। वह अपने जीवन के निर्णय खुद लेता है और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए कठिन मेहनत करता है। उसे अपने पर विश्वास होता है और वह अपनी राह खुद बनाता है। आकाश की विशालता पक्षी को अनंत संभावनाओं का अहसास कराती है। वह नए-नए स्थानों की खोज कर सकता है, नए अनुभवों का आनंद ले सकता है।

इस प्रकार, एक स्वतंत्र व्यक्ति और उड़ते हुए पक्षी में बहुत सी समानताएँ हैं। दोनों ही स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं, अनंत संभावनाओं की तलाश में रहते हैं, और अपने स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता पर गर्व करते हैं। उनके लिए स्वतंत्रता केवल एक स्थिति नहीं, बल्कि एक जीवन शैली है।


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क्षमा को एक दैवीय गुण क्यों कहा गया है?

क्षमा को एक दैवीय गुण क्यों कहा गया है?

क्षमा को एक दैवीय गुण इसलिए कहा गया है क्योंकि यह मनुष्य के उच्चतम नैतिक मूल्यों और गुणों का प्रतीक है। क्षमा का अर्थ है किसी व्यक्ति की गलतियों या अपराधों को माफ कर देना और उनके प्रति द्वेष या क्रोध न रखना। यह गुण न केवल शांति और सौहार्द्र को बढ़ावा देता है बल्कि व्यक्ति के मानसिक और आध्यात्मिक विकास में भी सहायक होता है।

किसी की गलतियों को क्षमा कर देना आसान नहीं होता। ये गुण अपनाना विशिष्टता का प्रतीक है। जिसके अंदर करुणा है दया है, वही व्यक्ति क्षमा कर सकता है। करुणा और दया जैसे गुण स्वयं में दैवीयता का प्रतीक है, इसलिए जिसमें क्षमा का गुण है वह दैवीय गुणों से युक्त हो जाता है।

क्षमा व्यक्ति को अहंकार, क्रोध और द्वेष जैसे नकारात्मक भावनाओं से मुक्त करती है। यह आत्मा की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है और व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करती है।

क्षमा करने से व्यक्ति और समाज में शांति और सौहार्द्र का वातावरण बनता है। यह संबंधों को मजबूत बनाता है और संघर्षों को समाप्त करता है। क्षमा दया और करुणा का प्रतीक है, जो ईश्वर के प्रमुख गुण माने जाते हैं। जो व्यक्ति क्षमा करता है, वह ईश्वर की करुणा का अनुभव करता है और दूसरों को भी उसका अनुभव कराता है।

क्षमा करने से मन में शांति और संतोष का अनुभव होता है। यह तनाव और चिंता को कम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारता है। क्षमा का अभ्यास समाज में नैतिकता और मूल्य आधारित जीवन को बढ़ावा देता है। यह समाज को अधिक मानवतावादी और सहिष्णु बनाता है।

इन्ही सब कारणों से क्षमा एक दैवीय गुण है क्योंकि यह व्यक्ति और समाज दोनों के लिए कल्याणकारी है और मनुष्य को ईश्वर के समीप लाने में सहायक होता है।


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क्या जीव-जंतुओं को पिंजरे में बंद करके रखना उचित है? अपने विचार लिखिए।

“दहेज हत्या एक कानूनी अपराध” इस विषय पर लघु निबंध लिखिए।

लघु निबंध

दहेज हत्या एक कानूनी अपराध

 

दहेज हत्या क्या है ?

दहेज हत्या क्या है? इससे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि दहेज क्या है? दहेज का अर्थ है जो संपत्ति, विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ़ से वर को दी जाती है। दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं। यूरोप, भारत, अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है । भारत में इसे दहेज, हुँडा या वर-दक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नकद या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है। आज के आधुनिक समय में भी दहेज़ प्रथा नाम की बुराई हर जगह फैली हुई है । पिछड़े भारतीय समाज में दहेज़ प्रथा अभी भी विकराल रूप में है।

आइए अब आपको बताते है कि दहेज हत्या क्या होती है : 

भारतीय संविधान की धारा 304-B के तहत दहेज के लालच में विवाहिता बधू को मारने के अपराध को दहेज हत्या कहा जाता है। भारतीय दंड संहिता 1860 में 1986 में जोड़े गए इस प्रावधान के अनुसार विवाह के सात साल में किसी महिला की जलने या किसी अन्य प्रकार की शारीरिक चोट से मृत्यु हो जाती है और यह दिखाया जाता है कि मृत्यु के पूर्व उसे पति या पति के परिजन द्वारा क्रूरता या प्रताड़ना, दहेज की किसी मांग को लेकर किया जाता था, तो उसे दहेज हत्या माना है । जो कोई भी दहेज हत्या करता है, तो उसे कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है ।


Other question…

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डॉ. रमणी अटकुरी की चरित्रगत विशेषताओं पर टिप्पणी लिखें।

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डॉ. रमणी अटकुरी की चारित्रिक विशेषताएं इस प्रकार हैं…

  • डॉ. रमणी अटकुरी ने अपना जीवन गरीबों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है।
  • वह एक बेहद ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ डॉक्टर हैं।
  • वे डॉक्टरी के पेशे को व्यापार नहीं सेवा मानती हैं।
  • वह जंगल के लोगों के इलाज के लिए हर हफ्ते मुसीबतें झेलकर भी उन लोगों का इलाज करने के लिए जाती है।
  • डॉ. रमणी अटकुरी के अपने शहर के क्लीनिक से जंगल का क्लीनिक अच्छा लगता है, क्योंकि उनके अंदर सेवा की भावना है।
  • यदि किसी मरीज की चिकित्सा के लिए उन्हें आधी रात भी जंगल जाना पड़े और वहीं पर रात में रुकना पड़े तो वे संकोच नही करती।
संदर्भ पाठ

बात उस मंगलवार की 


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जंगल के महत्व और उनसे होने वाले लाभ पर एक निबंध लिखिए।

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निबंध

जंगल और उनका महत्व

 

जंगल पृथ्वी की प्रकृति के लिए वरदान हैं। जंगल विभिन्न प्रकार की जंगलस्पतियों से बने होते हैं जैसे पेड़, पौधे, पर्वतारोही, लता, झाड़ियाँ, झाड़ियाँ और घास। एक जंगल में कई प्रकार की फूलों की प्रजातियां होने के कारण इसमें कई प्रकार की जीव-जंतु प्रजातियां भी पाई जाती हैं। जंगलों में जल निकाय भी होते हैं। जंगल जंगल्यजीवों के लिए आवास हैं जिनमें स्तनधारी, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और कीड़े शामिल हैं। ग्रह पृथ्वी के स्वास्थ्य के लिए जंगल पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण हैं और सभी जीजंगल रूपों जो इसे निवास करते हैं। जंगलों की कटाई एक गंभीर समस्या है, और हमें अपने जंगलों की रक्षा के लिए सभी प्रयास करने चाहिए।

जंगल के महत्व

  • जंगल से हमें आक्सीजन प्राप्त होती है। जंगल कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करके आक्सीजन छोड़ते है। जिससे इस प्रकृति में आक्सीजन और कार्बन-डाइ-ऑक्साइड के बीच में संतुलन बना रहता है।
  • जंगल और भी कई तरह की ग्रीन हाउस गैसों को ग्रहण करके प्रकृति का संतुलन बनाए रखता है। जंगलों के होने से वर्षा की मात्रा भी ठीक रहती है और जंगलों के आसपास कभी भी सूखा नहीं पड़ता है।
  • यह वातावरण में संतुलन बनाए रखने का कार्य करता है। यह सभी जंगली जानवरों व पक्षियों को घर प्रदान करता है।
  • जीव-जंतुओं का पोषण भी इन जंगलों से ही होता है। जंगलों से कई लोग अपना जीजंगलयापन करते है। वह इसी से ही अपना भोजन भी प्राप्त करते है और कई मौकों पर अपनी आजीविका भी यहीं से चलाते है।
  • एक साथ बड़ी मात्रा में पेड़-पौधे मिट्टी के कटाव को रोकते है। जंगलों के होने से वातावरण भी ठंडा रहता है। जंगलों के होने से प्रकृति में प्रदूषण भी कम होता है।
  • जंगलों से हमें लकड़ी भी प्राप्त होती है, जिससे आज विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती है, जो काफी आवश्यक है।

जंगल के बिना नुकसान

  • यदि जंगल नहीं होंगे तो वर्षा भी समय पर नहीं होगी, जिससे सूखा पड़ने का खतरा बढ़ जाएगा।
  • जंगल या पेड़-पौधे न होने से बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है। यदि पेड़-पौधे या जंगल नहीं होंगे तो पानी की कमी भी होगी।पेड़-पौधों के न होने से वातावरण में आक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है, जो जीव-जंतुओं के लिए खतरनाक है। बिना पेड़-पौधों के प्रदूषण भी बढ़ता है।
  • जंगली जानवरों का घर छीन जाता है, जिससे वें बेघर होकर इंसानी बस्तियों में आने लगते है।

निष्कर्ष

जंगल (जंगल) पर्यावरण का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। हालांकि, दुर्भाग्यवश मानव विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नेत्रहीन रूप से पेड़ों को काट रहा है जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है। वृक्षों और जंगलों को बचाने की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

वर्तमान में दुनिया के 7 अरब लोगों को प्राणवायु (आक्सीजन) प्रदान करने वाले जंगल खुद अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विशेषज्ञों की राय है कि यदि जल्द ही इन्हें बचाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं विकराल रूप ले लेंगी। एक व्यक्ति को जिंदा रहने के लिए उसके आसपास 16 बड़े पेड़ों की जरूरत होती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि जमीन के एक तिहाई हिस्से पर जंगल होना चाहिए जबकि भारत में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के करीब 23 फीसदी हिस्से पर जंगल हैं, लेकिन हाल ही में आई एक गैर सरकारी संस्था की रिपोर्ट बताती है कि भारत के केवल 11 प्रतिशत हिस्से पर जंगल हैं। ऐसा है तो यह काफी गंभीर और चिंतनीय है।


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दी गई कविता के आधार पर पूछ गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। कविता चिडि़या को लाख समझाओ कि पिंजड़े के बाहर धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है, वहाँ हवा में उन्हें अपने जिस्म की गंध तक नहीं मिलेगी। यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है, पर पानी के लिए भटकना है, यहाँ कटोरी में भरा जल गटकना है। बाहर दाने का टोटा है, यहाँ चुग्गा मोटा है। बाहर बहेलिए का डर है, यहाँ निर्द्वंद्व कंठ-स्वर है। फिर भी चिडि़या मुक्ति का गाना गाएगी, मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी, पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी, हरसूँ ज़ोर लगाएगी और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी। 1. धरती को बहुत बड़ी और निर्मम क्यों कहा गया है? 2. पिंजरे के अंदर दाने-पानी की क्या व्यवस्था है? 3. कौन-सी मुश्किलों के बाद भी चिड़िया मुक्त होना चाहेगी? 4. चिड़िया मुक्ति के लिए किस तरह प्रयास करेगी? 5. पिंजरे में बंद चिड़िया कैसे उड़ पाएगी ?

इस प्रश्न में दी गई कविता हिंदी के जाने-माने कवि ‘सर्वेश्वर दयाल सक्सेना’ द्वारा रचित ‘मुक्ति की आकांक्षा’ कविता है। ये पूरी कविता इस प्रकार है…

चिडि़या को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहाँ हवा में उन्हें
अपने जिस्म की गंध तक नहीं मिलेगी।
यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहाँ कटोरी में भरा जल गटकना है।
बाहर दाने का टोटा है,
यहाँ चुग्गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहाँ निर्द्वंद्व कंठ-स्वर है।
फिर भी चिडि़या
मुक्ति का गाना गाएगी,
मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,
पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,
हरसूँ ज़ोर लगाएगी
और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।

इस कविता के आधार पर पूछे गए निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार होंगे….​

1. धरती को बहुत बड़ी और निर्मम क्यों कहा गया है?

धरती को बहुत बड़ी और निर्मम इसलिए कहा गया है क्योंकि पिंजरे के बाहर की दुनिया बहुत विस्तृत और कठिन है। वहाँ चिड़िया को अपने आप को सुरक्षित रखने और भोजन पाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। उसे अपनी गंध तक नहीं मिलेगी, और उसे हर वक्त खतरे का सामना करना पड़ेगा।

2. पिंजरे के अंदर दाने-पानी की क्या व्यवस्था है?

पिंजरे के अंदर दाने और पानी की अच्छी व्यवस्था है। वहाँ पानी कटोरी में भरा हुआ है और दाने चुग्गे के रूप में आसानी से मिल जाते हैं। पिंजरे में चिड़िया को दाने-पानी की कोई कमी नहीं होती।

3. कौन-सी मुश्किलों के बाद भी चिड़िया मुक्त होना चाहेगी?

चिड़िया मुक्त होना चाहेगी भले ही बाहर समुद्र, नदी और झरना हो, पर पानी के लिए भटकना पड़े। वहाँ दाने का टोटा हो, बहेलिए का डर हो, परंतु फिर भी वह पिंजरे की निर्द्वंद्व स्थिति से बाहर निकलकर स्वतंत्रता का अनुभव करना चाहेगी।

4. चिड़िया मुक्ति के लिए किस तरह प्रयास करेगी?

चिड़िया मुक्ति के लिए अपने पूरे प्रयास करेगी। वह मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी, जितना अंग पिंजरे से बाहर निकाल सकेगी, निकालेगी और हर संभव जोर लगाएगी ताकि पिंजड़ा टूट जाए या खुल जाए और वह उड़ सके।

5. पिंजरे में बंद चिड़िया कैसे उड़ पाएगी?

पिंजरे में बंद चिड़िया पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर ही उड़ पाएगी। वह अपने मुक्त होने की चाह में हरसंभव प्रयास करेगी और मौका मिलते ही आजादी की उड़ान भरेगी।


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“हमारा जीवन दूसरों को सहायता करने से ही सफल होता है।” ‘गानेवाली चिड़िया’ कहानी के आधार पर बताइए?

अगर चिड़िया और शार्क बोल पाती तो उनके बीच क्या वार्तालाप होता। एक काल्पनिक संवाद लिखिए।

दिए गए शब्दों का समास विग्रह करके समास का नाम लिखिए। 1. आरामकुर्सी 2. स्वरचित 3. गुणहीन 4. जीवनसाथी 5. धर्मवीर 6. अधर्म 7. मालगोदाम 8. परमानंद 9. वचनामृत 10. चौमासा 11. यथानियम 12. ऊँच-नीच 13. लंबोदर 14. महावीर 15. संसारसागर 16. पंजाब 17. प्रतिवर्ष ​ 18. चक्रपाणि 19. राजमहल 20. नीलकमल

दिए गए शब्दों का समास विग्रह करके समास का नाम इस प्रकार होगा…

  1. आरामकुर्सी : आराम के लिए कुर्सी
    समास भेद : तत्पुरुष समास (संप्रदान तत्पुरुष)
  2. स्वरचित : स्वयं द्वारा रचित
    समास भेद : तत्पुरुष समास (करण तत्पुरुष)
  3. गुणहीन : गुण से हीन
    समास भेद : अपादान तत्पुरुष
  4. जीवनसाथी : जीवन का साथी
    समास भेद : तत्पुरुष समास (संबंध तत्पुरुष)
  5. धर्मवीर : धर्म में वीर
    समास भेद : तत्पुरुष समास (अधिकरण तत्पुरुष)
  6. अधर्म : न धर्म
    समास भेद : तत्पुरुष समास (नञ तत्पुरुष समास)
  7. मालगोदाम : माल का गोदाम
    समास भेद : तत्पुरुष समास (संबंध तत्पुरुष)
  8. परमानंद : परम है जो आनंद
    समास भेद : कर्मधारण्य समास
  9. वचनामृत : वचन रूपी अमृत
    समास भेद : कर्मधारण्य समास
  10. चौमासा : चार मासों का समाहार
    समास भेद :  द्विगु समास
  11. यथानियम : नियम के अनुसार
    समास भेद : अव्ययीभाव समास
  12. ऊँच-नीच : ऊँच और नीच
    समास भेद : द्वंद्व समास
  13. लंबोदर : लंबा है जिनका उदर अर्थात भगवान गणेश
    समास भेद : बहुव्रीहि समास
  14. महावीर : महान है जो वीर
    समास भेद : कर्मधारण्य समास
  15. संसारसागर : संंसार रूपी सागर
    समास भेद : कर्मधारण्य समास
  16. पंजाब : पाँच आब (नदियों) का क्षेत्र
    समास भेद : द्विगु समास
  17. प्रतिवर्ष ​: हर एक वर्ष
    समास भेद : अव्ययीभाव समास
  18. चक्रपाणि : चक्र है पाणि (हाथ) में जिनके अर्थात भगवान विष्णु
    समास भेद : बहुव्रीहि समास
  19. राजमहल : राजा का महल
    समास भेद : तत्पुरुष समास (संबंध तत्पुरुष)
  20. नीलकमल : नीला है जो कमल
    समास भेद : कर्माधारण्य समास

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‘आटे-दाल’ इस समस्त पद का समास विग्रह और समास भेद क्या होगा?

‘सिंहद्वार’ का समास विग्रह कीजिए।

निम्नलिखित समस्तपदों का विग्रह करके समास का नाम लिखिए- (क) हथकड़ी (ख) रोगग्रस्त (ग) शताब्दी (घ) त्रिवेणी (ङ) कमलनयन (च) लाभ-हानि (छ) नवग्रह (ज) तुलसीकृत (झ) राजीवलोचन (ञ) बैलगाड़ी (ट) यथासंभव (ठ) घुड़सवार (ड) लंबोदर

निम्नलिखित समस्तपदों का विग्रह कर समास भेद बताइए: सत्याग्रह, लोकप्रिय, दशानन, चंद्रमुख, त्रिकोण, षट्कोण, नीलांबर, देहलता, राजकुमारी, रात-दिन, तुलसीकृत, वनवासी, देशभक्ति, यथाशक्ति, नीलकंठ, रसोईघर।

अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य महोदय को एक प्रार्थना पत्र लिखें, जिसमें कक्षा के शरारती बच्चों द्वारा अनुशासन भंग करने की शिकायत की गई हो।

औपचारिक पत्र

शरारती बच्चों की शिकायत करते हुए विद्यालय के प्रधानाचार्य महोदय को एक प्रार्थना पत्र

दिनाँक – 6/7/2024

सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,
राजकीय इंटर कॉलेज,
मेरठ

विषय: कक्षा में अनुशासन भंग की शिकायत

माननीय महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं अंंकुश शर्मा, कक्षा 9-ब का छात्र हूँ। मैं आपका ध्यान हमारी कक्षा में कुछ शरारती बच्चों द्वारा लगातार किए जा रहे अनुशासन भंग की ओर आकर्षित कराना चाहता हूँ। पिछले कुछ सप्ताहों से, कुछ छात्र नियमित रूप से कक्षा में व्यवधान उत्पन्न कर रहे हैं। वे अक्सर शिक्षकों की अनुमति के बिना कक्षा में बातें करते हैं। अन्य छात्रों को परेशान करते हैं और उनका ध्यान भटकाते हैं। वे कक्षा के दौरान अपने मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं। शिक्षकों के निर्देशों को अनसुना कर देते हैं। ये छात्र कक्षा में बेहद शोर भी मचाते हैं, जिससे इस व्यवहार के कारण कक्षा का शैक्षणिक माहौल प्रभावित हो रहा है और अन्य छात्रों को पढ़ने में कठिनाई हो रही है। हमने इस मुद्दे को अपने कक्षा शिक्षक के साथ उठाया है, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।

अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप इस मामले में हस्तक्षेप करें और उचित कार्रवाई करें ताकि हमारी कक्षा में एक स्वस्थ और अनुशासित वातावरण बनाया जा सके।

शरारती छात्रों की सूची इस प्रकार है..
1. रजनीश अरोरा
2. वैभव रस्तोगी
3. मयंक कश्यप
4. देवेंद्र राजपुरोहित
5. योगेश आहूजा

धन्यवाद।

भवदीय,
अंकुश शर्मा,
कक्षा : 9-ब
रोल नंबर : 04


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विद्यालय के प्रधानाचार्य को चरित्र प्रमाण पत्र देने का अनुरोध करते हुए एक प्रार्थना पत्र लिखिए ।

आपके विद्यालय में पीने का पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। इसकी शिकायत करते हुए सुधार के लिए प्रार्थना करते हुए प्रधानाचार्य को पत्र लिखिए।

निम्नलिखित शब्दों में उपसर्ग जोड़कर नए शब्द बनाएं (1) बोध (2) इलाज (3)यत्न (4)ध्वनि

दिए गए शब्दों में उपसर्ग जोड़कर नए शब्द इस प्रकार होंगे…

(1) बोध

आत्म + बोध : आत्मबोध
सु + बोध : सुबोध
+ बोध : अबोध

(2) इलाज

ला + इलाज : लाइलाज

(3) यत्न

प्र + यत्न : प्रयत्न
सु + यत्न : सुयत्न

(4) ध्वनि

प्रति + ध्वनि : प्रतिध्वनि

 

उपसर्ग क्या हैं?

उपसर्ग किसी शब्द के आगे लगने वाले शब्दांश होते है। उपसर्ग किसी शब्द के लिए विशेषण का कार्य करते हैं। यहाँ पर इतना अंतर है कि विशेषण शब्दों अपना स्वतंत्र अर्थ और अस्तित्व होता है, जबकि उपसर्ग रूपी विशेषणों का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नही होता। ये केवल उपसर्ग के रूप में किसी शब्द से पहले प्रयुक्त किए जाते हैं।


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दिए गए शब्दों में उपसर्ग लगाकर नए शब्द बनाइए। (क) नाम (ख) देश (ग) पका (घ) हत्था (ङ) गिनत (च) कूल (छ) मरण (ज) दृष्टि

दिए गए उपसर्ग से दो-दो शब्द बनाइए- (क) पुनर् (ख) हर (ग) सम् (घ) कु (च) अ (छ) बिन (ज) प (ङ) स्व

तताँरा-वामीरो की कथा : लीलाधर मंडलोई (कक्षा-10 पाठ-10 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

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NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

तताँरा-वामीरो की कथा : लीलाधर मंडलोई (कक्षा-10 पाठ-10 हिंदी स्पर्श 2)

TATANRA-VAMIRO KI KATHA (Class-10 Chapter-10 Hindi Sparsh 2)


तताँरा-वामीरो की कथा : लीलाधर मंडलोई

पाठ के बारे में…

प्रस्तुत पाठ ‘तताँरा वामीरो की कथा’ में लेखक लीलाधर मंडलोई ने एक प्रेमी युगल की लोककथा का वर्णन किया है। हर क्षेत्र के साथ कोई ना कोई लोक कथाएं जुड़ी होती हैं। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भी तरह-तरह के कहानियां किस्से मशहूर हैं।

लेखक लीलाधर मंडलोई ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह के एक छोटे से द्वीप पर केंद्रित होकर यह कथा लिखी है। यह कथा एक प्रेमी युगल तताँरा और वामीरो की कथा है, जिसमें उनके बीच पनपे प्रेम और गाँव की परंपराओं के कारण उनके विचारों का वर्णन किया गया है।

लेखक ने इस पाठ के माध्यम से यह संदेश दिया है कि प्रेम सब को जोड़ता है और घृणा सबको तोड़ती है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह के गाँव में एक परंपरा थी जिसके अंतर्गत अलग-अलग गाँव के युवक युवती आपस में विवाह नहीं कर सकते थे ।

तताँरा और वामीरो अलग-अलग गाँव के युवक-युवती थे। इस कारण दोनों में प्रेम होने के बावजूद दोनों का विवाह नहीं हो सका। इसलिए तताँरा ने अपने प्राण त्याग दिए तथा वामीरो भी उसके विरह में विक्षिप्त हो गई। बाद में गाँव वालों ने इस परंपरा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

लेखक के बारे में…

लीलाधर मंडलोई का जन्म छिंदवाड़ा जिले के गाँव गुढ़ी में सन 1954 को हुआ था। वह मूल रूप से कवि हैं और उन्होंने छत्तीसगढ़ अंचल की गोली में कई मीठी कविताएं लिखी हैं, जो वहां से जनजीवन का सजीव चित्रण करती हैं। इसके अलावा उन्होंने कुछ कहानियां लिखी हैं।

अंडमान निकोबार द्वीप समूह की जनजातियों पर लिखा उनका यह गद्य एक अलग ही शास्त्रीय अध्ययन को प्रस्तुत करता है। उनकी प्रमुख कृतियों में घर-घर घूमा,  मगर एक आवाज, देखा अनदेखा और काला पानी आदि के नाम प्रमुख हैं।



हल प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए।

प्रश्न 1 : तताँरा-वामीरो कहाँ की कथा है?

उत्तर : ‘तताँरा-वामीरो की कथा’ अंडमान निकोबार द्वीप समूह की लोककथा है। इस कथा में एक युवक तताँरा और युवती वामीरो की प्रेम कथा का वर्णन किया गया है, जो दोनों अलग-अलग गाँव के निवासी थे। तताँरा पासा गाँव का निवासी था जबकि वामीरो लापती गाँव की रहने वाली थी।

प्रश्न 2 : वामीरो अपना गाना क्यों भूल गई?

उत्तर : वामीरो समुद्र तट पर बैठी हुई अपनी ही धुन में मधुर गाना गा रही थी। अचानक ऊँची लहर आई और उसको भिगो दिया, इस कारण चौंककर वामीरो अपना गाना गाना भूल गई।

प्रश्न 3 : तताँरा ने वामीरो से क्या याचना की?

उत्तर : तताँरा वामीरो का बेहद मधुर गाना सुनकर मंत्रमुग्ध हो गया था। उसने वामीरो से याचना थी कि वह अगले दिन भी इसी जगह पर आए और वह उससे मिलने के लिए आएगा। उसने वामीरो से रोज उसी जगह पर आने की याचना की और कहा कि वह अपना अधूरा गाना पूरा करके ही जाए।

प्रश्न 4 : तताँरा और वामीरो के गाँव की क्या रीति थी?

उत्तर : तताँरा और वामीरो के गाँव की यह रीति थी कि दो अलग-अलग गाँव के युवक-युवती आपस में विवाह नहीं कर सकते थे। अर्थात किसी एक गाँव का युवक या उस गाँव की युवती किसी दूसरे गाँव के युवक या युवती से विवाह नहीं कर सकते थे।

प्रश्न 5 : क्रोध में तताँरा ने क्या किया?

उत्तर : क्रोध में तताँरा ने अपने कमर में लटकी तलवार को निकाल लिया और वह तलवार अपनी पूरी शक्ति से जमीन के अंदर गाड़ दी और गुस्से में तलवार को बाहर खींचने लगा। उसके ऐसा करने से पूरी जमीन दो टुकड़ों में बंट गई और वह द्वीप दो टुकड़ों में विभाजित हो गया।


लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-

प्रश्न 1: तताँरा की तलवार के बारे में लोगों का क्या मत था?

उत्तर : तताँरा की तलवार के विषय में लोगों का यह मत था कि तताँरा की तलवार एक दैवीय गुणों से युक्त तलवार थी। लकड़ी की बनी उस तलवार का तताँरा सामान्य स्थिति में प्रयोग नहीं करता था और ना ही कभी अपने से अलग होने देता था। वह किसी विशेष परिस्थिति में ही उस तलवार का प्रयोग करता था। लोगों का मानना था कि वह तलवार अद्भुत एवं विलक्षण रहस्यों से युक्त थी और वह कोई साधारण नहीं बल्कि असाधारण तलवार थी।

प्रश्न 2 : वामीरो ने तताँरा को बेरुखी से क्या जवाब दिया?

उत्तर : वामीरो ने तताँरा को बेरुखी से यह जवाब दिया कि वह उससे सवाल क्यों पूछ रहा है और वह उसे इस तरह क्यों देख रहा है? वह अपने गाँव के पुरुष अलावा दूसरे किसी अन्य गाँव के पुरुषों से ना ही बात करती है और ना ही उसके किसी सवाल का जवाब देती है। इसलिए वह उसके अजीब से सवालों का जवाब क्यों दे?

प्रश्न 3 : तताँरा-वामीरो की त्यागमयी मृत्यु से निकोबार में क्या परिवर्तन आया?

उत्तर : तताँरा और वामीरो की त्यागमयी मृत्यु से निकोबार द्वीप के गाँवों में यह परिवर्तन आया कि सभी गाँवों में आपस में वैवाहिक संबंध स्थापित होने लगे। इससे पहले निकोबार द्वीप के सभी गाँवों में यह प्रथा प्रचलित थी कि एक गाँव का युवक या युवती दूसरे गाँव के युवक या युवती से विवाह संबंध स्थापित नहीं कर सकता था। अर्थात गाँवों के बीच आपसी वैवाहिक संबंध की परंपरा नही थी।

युवक या युवती का विवाह उसी गाँव के युवक या युवती से होता था। तताँरा और वामीरो की मृत्यु के बाद निकोबार द्वीप के सभी गाँवों के लोगों ने इस प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। अब सभी गाँवों में आपस में वैवाहिक संबंध स्थापित होने लगे थे।

प्रश्न 4 : निकोबार के लोग तताँरा को क्यों पसंद करते थे?

उत्तर : निकोबार यह लोग तताँरा को इसलिए पसंद करते थे क्योंकि तताँरा का स्वभाव बेहद विनम्र, मधुर एवं मिलनसार था। वह स्वभाव से परोपकारी और समय पड़ने पर सबकी मदद करने वाला युवक था। वह सदैव दूसरों की सहायता करने के लिए तत्पर रहता था। किसी भी मुसीबत में वह तुरंत सहायता करने के लिए आ जाता था। इसके अलावा वह नेक, ईमानदार, विनम्र तथा साहसी युवक था और उसके स्वभाव में आत्मीयता थी। उसके इन्हीं गुणों के कारण निकोबार के लोग तताँरा को पसंद करते थे ।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-

प्रश्न 1 : निकोबार द्वीप समूह के विभक्त होने के बारे में निकोबारियों का क्या विश्वास है?

उत्तर : निकोबार द्वीप समूह के विभक्त होने के बारे में निकोबार के लोगों यह मत था। यह विश्वास था कि पहले अंडमान और निकोबार दोनों द्वीप समूह एक ही है और यह बाद में अलग हुए। इसके संबंध में निकोबार दिनों में एक दंतकथा प्रचलित थी। उनके विश्वास के अनुसार पहले एक अंडमान निकोबार द्वीप समूह में तताँरा और वामीरो दोनों युवक-युवती एक दूसरे से प्रेम करते थे। दोनों युवक-युवती अलग-अलग गाँव के निवासी थे।

उस समय गाँव में यह परंपरा थी कि अलग-अलग गाँव के युवक-युवती आपस में विवाह नहीं कर सकते थे। इसी कारण दोनों का विवाह नहीं हो पाया। एक दिन वामीरो की माँ से तताँरा का विवाद होने पर तताँरा को इतना गुस्सा आया कि उसने अपनी दैवीय तलवार को पूरी ताकत से जमीन में गाड़ दिया और उसे खींचता हुआ दूर तक चलता चला गया। इस कारण वहाँ से जमीन दो टुकड़ों में बंट गई और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह दोनों अलग-अलग बन गए। दोनो प्रेमी युगल ने अपना जीवन भी बलिदान कर दिया।

इसके बाद निकोबार द्वीप समूह के गाँव के सभी लोगों को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने उस पुरानी परंपरा को ही खत्म कर दिया, जिसके अंतर्गत एक ही अलग-अलग गाँव के युवक युवती आपस में जगह नहीं कर सकते थे।

प्रश्न 2 : तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद कहाँ गया? वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर : तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद समुद्र के किनारे टहलने चला गया। जब अथक परिश्रम करने के बाद तताँरा समुद्र के तट पर गया तो संध्या का समय हो रहा था। दूर क्षितिज पर सूरज डूबता हुआ दिखाई दे रहा था। पक्षियों का झुंड अपने-अपने घोंसलों की ओर जा रहा था। समुद्र की ओर से आ रही ठंडी ठंडी हवा मन को बेहद शांति प्रदान कर रही थी। सूरज की लाली से समुद्र के पानी पर रंग-बिरंगी आकृतियां बन रही थीं, जो अद्भुत सौंदर्य उत्पन्न कर रही थी। समुद्र की लहरों का पानी आवाज सुनकर ऐसा लग रहा था, जैसे कोई गीत गा रहा हो। समुद्र के किनारे का वह दृश्य बेहद ही मनमोहक था।

प्रश्न 3 : वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में क्या परिवर्तन आया?

उत्तर : वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में अनोखा परिवर्तन आ गया था। वामीरो से मिलने के बाद तताँरा बहुत बेचैन हो गया और वह अपनी सुध-बुध खो बैठा था। उसके मन में एक अजीब सी हलचल हो गई थी। जिस शाम को वह वामीरों से मिला उस शाम के बाद वह पूरी रात उसने बेचैनी में काटी। उसका ह्रदय व्यथित था और उसे रात काटना भारी लग रहा था। उसे रात ही नहीं पूरा दिन भी ऐसा ही बेचैन भरा लगा ।

जैसे-तैसे अगले दिन की शाम आई और वह समुद्र तट पर जा पहुंचा, जहाँ उसे वामीरो मिली थी। उसे वामीरो के आने की उम्मीद थी। इसलिए इसी बेचैनी में वामीरो के आने की प्रतीक्षा करता रहा। प्रतीक्षा का एक-एक पल उसे बहुत भारी लग रहा था। अचानक पेड़ों के पीछे से वामीरो को आते देखकर उसके मन में खुशी का ठिकाना नहीं रहा और वह एकटक वामीरो को निहारने लगा।

प्रश्न 4 : प्राचीन काल में मनोरंजन और शक्ति-प्रदर्शन के लिए किस प्रकार के आयोजन किए जाते थे?

उत्तर : प्राचीन काल में मनोरंजन एवं शक्ति प्रदर्शन के लिए अनेक तरह के आयोजन किए जाते थे। इस तरह के मनोरंजन एवं शक्ति-प्रदर्शन के कार्यक्रमों के लिए प्राचीन काल में जगह-जगह मेलों का आयोजन किया जाता था, जिनमें विभिन्न तरह के जानवरों, मुख्यता सांडों की लड़ाई करवाई जाती थी। इसके अलावा पहलवानों की कुश्तियों के दंगल भी आयोजित किए जाते थे।

तलवारबाजी जैसी प्रतिस्पर्धा का भी आयोजन किया जाता था। जिससे लोगों का मनोरंजन होता था। यह कार्यक्रम मनोरंजक होने के साथ-साथ शक्ति प्रदर्शन के कार्यक्रम भी होते थे। इन मेलों में तीतर बटेर की लड़ाई पतंगबाजी आदि का आयोजन भी किया जाता था तथा तरह-तरह के नाच गाने के प्रोग्राम भी आयोजित किए जाते थे। इस तरह के मेलों में आसपास के गाँव के लोग इकट्ठे होते थे तथा नृत्य-संगीत-भोज आदि का प्रबंध होता था।

प्रश्न 5 : रूढ़ियाँ जब बंधन बन बोझ बनने लगें तब उनका टूट जाना ही अच्छा है। क्यों? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : रूढ़ियां जब बंधन बन बोझ बनने लगे, तब उनका टूट जाना ही अच्छा होता है, क्योंकि रूढ़ियां हर समय प्रासंगिक नहीं होती हैं। रूढ़ियां मान्यताओं के रूप में किसी विशेष समय में बनाई जाती हैं। लेकिन आवश्यक नहीं कि रूढ़ियां हर समय प्रासंगित ही रहें। समय परिवर्तनशील है और समय के साथ-साथ विचार एवं जीवन शैली तथा लोगों की सोच भी बदलने लगती है। ऐसी स्थिति में पुरानी परंपराओं से चिपके रहने से वह परंपराएं रुढ़ियाों के रूप में बंधन बनकर बोझ बन जाती हैं।

इसी तरह की रूढ़ि के कारण ही तताँरा एवं वामीरो का आपस में विवाह नहीं हो सका और उन्हें अपने जीवन का बलिदान करना पड़ा। यदि निकोबार द्वीप समूह के सभी गाँव अपनी पुरानी रूढ़ि से चिपके नहीं होते तो तताँरा और वामीरो का विवाह हो गया होता। इसी कारण रूढ़ि जब बंधन बन बोझ बनने लगे तो उसे त्याग देना ही अच्छा होता है।


(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए

प्रश्न 1 : जब कोई राह न सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसने शक्ति भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा।

आशय :  इन पंक्तियों का आशय यह है कि जब तताँरा और वामीरो आपस में प्रेम करते थे तो दोनों के अलग-अलग गाँव का होने के कारण इन दोनों का मिलन संभव नहीं था। एक दिन मेले में वामीरो की माँ द्वारा तताँरा का अपमान करने से तताँरा बेहद क्रोधित हो गया। उसने उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।

तताँरा वामीरो की माँ को कुछ बोल नहीं सकता था। अपने क्रोध को शांत करने के लिए जब उसे कुछ नहीं सूझा तो उसने अपनी कमर में बंधी तलवार निकाल ली और उसे पूरी ताकत से जमीन में गाड़ दिया। फिर गुस्से में उस तलवार को जमीन से खींचने लगा और खींचता हुआ दूर तक चला गया । इस तरह वे जमीन बीच में से चिर गई और दो टुकड़ों में बंट गई ।

तभी से निकोबार वासियों की यही मान्यता है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह इसी कारण अलग-अलग हो गए थे। पहले दोनों द्वीप एक ही द्वीप थे।

प्रश्न 2 : बस आस की एक किरण थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी।

आशय : इस पंक्ति का आशय यह है कि जब तताँरा वामीरो से पहली बार समुद्र तट पर मिला था तो वामीरो को पहली नजर में देखते ही उसे उसे बेहद प्रेम हो गया था। उसके बाद उसके मन में एक हलचल सी मच गई थी। उसने वामीरो से अगले दिन आने के लिए कहा था। इसीलिए उसने रात और दिन किसी तरह बेचैनी में गुजारा और अगली शाम पुनः उसी समुद्र तट पर पहुंच गया, जहाँ उसे वामीरो मिली थी। उसका मन एक उधेड़बुन में था। कभी उसे लगता वामीरो नहीं आएगी और कभी उसे लगता वामीरो अवश्य आएगी।

इसी उधेड़बुन में बेहद तीव्र उत्कंठा से वामीरो की प्रतीक्षा कर रहा था। उसे लग रहा था कि यदि वामीरों नही आई तो समुद्र की लहरों की तरह उसे अपनी आशायें भी डूबती रही थीं। उसके मन में एक आशा थी कि वामीरो उससे मिलने अवश्य आएगी और ऐसा हुआ भी जब वामीरो दूर पेड़ों के झुंड के बीच में आती हुई दिखाई दी।


भाषा अध्ययन

प्रश्न 1 : निम्नलिखित वाक्यों के सामने दिए कोष्ठक में (✓) का चिह्न लगाकर बताएँ कि यह वाक्य किस प्रकार का है-
  1. निकोबारी उसे बेहद प्रेम करते थे। (प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधात्मक, विस्मयादिबोधक)
  2. तुमने एकाएक इतना मधुर गाना अधूरा क्यों छोड़ दिया? (प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधात्मक, विस्मयादिबोधक)
  3. वामीरो की माँ क्रोध में उफन उठी। (प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधात्मक, विस्मयादिबोधक)
  4. क्या तुम्हें गाँव का नियम नहीं मालूम ? (प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधात्मक, विस्मयादिबोधक)
  5. वाह! कितना सुंदर नाम है। (प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधात्मक, विस्मयादिबोधक)
  6. मैं तुम्हारा रास्ता छोड़ दूंगा। (प्रश्नवाचक, विधानवाचक, निषेधात्मक, विस्मयादिबोधक)

उत्तर :

  1. निकोबारी उसे बेहद प्रेम करते थे। — विधानवाचक
  2. तुमने एकाएक इतना मधुर गाना अधूरा क्यों छोड़ दिया? — प्रश्नवाचक
  3. वामीरो की माँ क्रोध में उफन उठी। — विधानवाचक
  4. क्या तुम्हें गाँव का नियम नहीं मालूम ? — प्रश्नवाचक
  5. वाह! कितना सुंदर नाम है। — विस्मयादिबोधक
  6. मैं तुम्हारा रास्ता छोड़ दूंगा। — विधानवाचक
प्रश्न 2 : निम्नलिखित मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
(क) सुध-बुध खोना
(ख) बाट जोहना
(ग) खुशी का ठिकाना न रहना
(घ) आग बबूला होना
(ङ) आवाज़ उठाना

उत्तर : दिए गए मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग इस प्रकार होगा…

(क) सुध-बुध खोना 
अर्थ : अपनी हालत का ध्यान नही रहना, होश खो देना
वाक्य प्रयोग : जब रोहन ने अपनी प्रेमिका को अचानक सड़क पर देखा, तो वह सुध-बुध खो बैठा और उसे अपने आसपास की दुनिया का कोई ध्यान नहीं रहा।

(ख) बाट जोहना
अर्थ : प्रतीक्षा करना
वाक्य प्रयोग : माँ रात भर अपने बेटे की बाट जोहती रही, जो शहर से घर लौटने वाला था।

(ग) खुशी का ठिकाना न रहना
अर्थ : बहुत प्रसन्न होना।
वाक्य प्रयोग : जब अनु को पता चला कि उसे अपनी पसंदीदा कंपनी में नौकरी मिल गई है, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

(घ) आग बबूला होना
अर्थ : बहुत अधिक क्रोध करना
वाक्य प्रयोग : जब मैनेजर ने कर्मचारियों की तनख्वाह में कटौती की घोषणा की, तो सभी कर्मचारी आग बबूला हो गए।

(ङ) आवाज़ उठाना
अर्थ : विरोध करना
वाक्य प्रयोग : छात्रों ने विश्वविद्यालय में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाई और एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आयोजन किया।

प्रश्न 3 : नीचे दिए गए शब्दों में से मूल शब्द और प्रत्यय अलग करके लिखिए-
NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 12 तताँरा-वामीरो कथा Q3

उत्तर : दिए गए शब्दों में मूल शब्द और प्रत्यय इस प्रकार होंगे…
चर्चित : चर्चा + इत
साहसिक : साहस + इक
छटपटाहट : छटपट + आहट
शब्दहीन : शब्द + हीन

प्रश्न 4 : नीचे दिए गए शब्दों में उचित उपसर्ग लगाकर शब्द बनाइए
……….. + आकर्षक = ……….
………… + ज्ञात = ………
………… + कोमल = …………
………. + होश = ………..
………… + घटना = ………….

उत्तर : दिए गए शब्दों में उचित उपसर्ग लगाकर शब्द इस प्रकार होंगे…
अन + आकर्षक = अनाकर्षक
+ ज्ञात = अज्ञात
सु + कोमल = सुकोमल
बे + होश = बेहोश
दुर + घटना = दुर्घटना

प्रश्न 5 : निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तित कीजिए
  1. जीवन में पहली बार मैं इस तरह विचलित हुआ हूँ। (मिश्र वाक्य)
  2. फिर तेज़ कदमों से चलती हुई तताँरा के सामने आकर ठिठक गई। (संयुक्त वाक्य)
  3. वामीरो कुछ सचेत हुई और घर की तरफ दौड़ी। (सरल वाक्य)
  4. तताँरा को देखकर यह फूटकर रोने लगी। (संयुक्त वाक्य)
  5. रीति के अनुसार दोनों को एक ही गाँव का होना आवश्यक था। (मिश्र वाक्य)

उत्तर : दिए गए वाक्यों का निर्देशानुसार परिवर्तन इस प्रकार होगा…

  1. जीवन में पहली बार मैं इस तरह विचलित हुआ हूँ।
    मिश्र वाक्य : जीवन में पहली बार है कि मैं विचलित हुआ हूँ।
  2. फिर तेज़ कदमों से चलती हुई तताँरा के सामने आकर ठिठक गई।
    संयुक्त वाक्य : फिर तेज कदमों से चलती हुई तताँरा के पास आई और ठिठक गई।
  3. वामीरो कुछ सचेत हुई और घर की तरफ दौड़ी।
    सरल वाक्य : वामीरो कुछ सचेत होकर घर की ओर दौड़ी।
  4. तताँरा को देखकर यह फूटकर रोने लगी।
    संयुक्त वाक्य : उसने तताँरा को देखा और फूट-फूटकर रोने लगी।
  5. रीति के अनुसार दोनों को एक ही गाँव का होना आवश्यक था।
    मिश्र वाक्य : रीति के अनुसार यह आवश्यक था कि दोनों एक ही गाँव के हों।
प्रश्न 6. नीचे दिए गए वाक्य पढ़िए तथा ‘और’ शब्द के विभिन्न प्रयोगों पर ध्यान दीजिए-
  1. पास में सुंदर और शक्तिशाली युवक रहा करता था। (दो पदों को जोड़ना)
  2. वह कुछ और सोचने लगी। (‘अन्य’ के अर्थ में)
  3. एक आकृति कुछ साफ़ हुई… कुछ और … कुछ और… (क्रमशः धीरे-धीरे के अर्थ में)
  4. अचानक वामीरो कुछ सचेत हुई और घर की तरफ़ दौड़ गई। (दो उपवाक्यों को जोड़ने के अर्थ में)
  5. वामीरो का दुख उसे और गहरा कर रहा था। (‘अधिकता’ के अर्थ में)
  6. उसने थोड़ा और करीब जाकर पहचानने की चेष्टा की। (‘निकटता’ के अर्थ में)

उत्तर : यह एक अवलोकर कार्य है, इसे छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 7. नीचे दिए गए शब्दों के विलोम शब्द लिखिए-
भय, मधुर, सभ्य, मूक, तरल, उपस्थिति, सुखद।

उत्तर : दिए गए शब्दों के विलोम शब्द इस प्रकार होंगे..

भय – निर्भय
मधुर – कटु
सभ्य – असभ्य 
मूक – वाचाल
तरल – ठोस
उपस्थित – अनुपस्थित
सुखद – दुखद

प्रश्न 8 : नीचे दिए गए शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए-
समुद्र, आँख, दिन, अँधेरा, मुक्त।

उत्तर : दिए गए शब्दों के दो-दो पर्यायवाची
समुद्र – रत्नाकर, सागर
आँख – नयन, लोचन
दिन – दिवस, वार
अँधेरा – तिमिर, अंधकार
मुक्त – आजाद, स्वतंत्र

प्रश्न 9 : नीचे दिए गए शब्दों को वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
किंकर्तव्यविमूढ़, विह्वल, भयाकुल, याचक, आकंठ।

उत्तर : दिए गए शब्दों के वाक्य प्रयोग इस प्रकार होंगे..

किंकर्तव्यविमूढ़ : कैकेयी द्वारा श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास दिए जाने के वचन की मांग पर राजा दशरथ किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए।
विह्वल : जब वह सैनिक युद्ध के मैदान से सकुशल वापस लौटकर घर आया तो उसकी माँ भाव विह्वल हो गई।
भयाकुल : जैसे ही भूकंप के कारण इमारत हिलने लगी तो सभी भयाकुल होकर भागने लगे।
याचक : सुदामा कृष्ण से बोले कि मैं तो याचक बनकर आपके द्वार पर आया हूँ।
आकंठ : हमारे देश की भ्रष्टचार व्यवस्था का आलम  ये है कि सभी अधिकारी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं।

प्रश्न 10. ‘किसी तरह आँचरहित एक ठंडा और ऊबाऊ दिन गुजरने लगा’ वाक्य में दिन के लिए किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया गया है? आप दिन के लिए कोई तीन विशेषण और सुझाइए।

उत्तर : दिने के तीन विशेषण इस प्रकार होंगे..
लंबा दिन
अच्छा दिन
बुरा दिन

प्रश्न 11 : इस पाठ में ‘देखना’ क्रिया के कई रूप आए हैं-‘देखना’ के इन विभिन्न शब्द-प्रयोगों में क्या अंतर है?

NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 12 तताँरा-वामीरो कथा Q11
इसी प्रकार ‘बोलना’ क्रिया के विभिन्न शब्द-प्रयोग बताइए।
NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 12 तताँरा-वामीरो कथा Q11.1
उत्तर :
NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 12 तताँरा-वामीरो कथा Q11.2

प्रश्न 12 : वाक्यों के रेखांकित पदबंधों का प्रकार बताइए-
  1. उसकी कल्पना में वह एक अद्भुत साहसी युवक था।
  2. तताँरा को मानो कुछ होश आया
  3. वह भागा-भागा वहाँ पहुँच जाता।
  4. तताँरा की तलवार एक विलक्षण रहस्य थी।
  5. उसकी व्याकुल आँखें वामीरो को ढूंढने में व्यस्त थीं।

उत्तर : वाक्यों के रेखांकित पदबंधों के प्रकार इस तरह होंगे…

  1. उसकी कल्पना में वह एक अद्भुत साहसी युवक था।
    पदबंध भेद : विशेषण पदबंध
  2. तताँरा को मानो कुछ होश आया
    पदबंध भेद : क्रिया पदबंध
  3. वह भागा-भागा वहाँ पहुँच जाता।
    पदबंध भेद : क्रिया विशेषण पदबंध
  4. तताँरा की तलवार एक विलक्षण रहस्य थी।
    पदबंध भेद : विशेषण पदबंध
  5. उसकी व्याकुल आँखें वामीरो को ढूंढने में व्यस्त थीं।
    पदबंध भेद : विशेषण पदबंध

योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 : पुस्तकालय में उपलब्ध विभिन्न प्रदेशों की लोककथाओं का अध्ययन कीजिए।

उत्तर : विद्यार्थी अपने क्षेत्र के निकटतम पुस्तकालय जायें और अलग-अलग प्रदेशों की लोककथाओं से संबंधित पुस्तकों को ढूंढें और उन्हें अपने पर लाकर पढ़ें।

प्रश्न 2 : भारत के नक्शे में अंडमान निकोबार द्वीप समूह की पहचान कीजिए और उसकी भौगोलिक स्थिति के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।

उत्तर : अंडमान निकोबार द्वीप समूह भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के बीच स्थित हैं। यह द्वीप समूह दो प्रमुख भागों में बंटा है: अंडमान द्वीप और निकोबार द्वीप।

भौगोलिक स्थिति
1. अक्षांश और देशांतर : ये द्वीप 6° से 14° उत्तरी अक्षांश और 92° से 94° पूर्वी देशांतर के बीच स्थित हैं।
2. कुल क्षेत्रफल : लगभग 8,249 वर्ग किलोमीटर।
3. द्वीपों की संख्या : कुल 572 द्वीप, जिनमें से कुछ ही आबाद हैं।
4. मुख्य शहर : पोर्ट ब्लेयर, जो कि अंडमान का मुख्यालय है।
5. प्राकृतिक विशेषताएँ : घने वन, समृद्ध जैव विविधता, प्रवाल भित्तियाँ, और समुद्री जीवन के लिए प्रसिद्ध।

ये द्वीप समूह प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरणीय महत्व के कारण एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी हैं।

प्रश्न 3 : अंदमान निकोबार द्वीप समूह की प्रमुख जनजातियों की विशेषताओं का अध्ययन पुस्तकालय की सहायता से कीजिए।

उत्तर : विद्यार्थी इस विषय से संबंधित पुस्तकें पुस्तकालय से लाएं उन्हें पढ़ें।

प्रश्न 4 : दिसंबर 2004 में आए सुनामी का इस द्वीप समूह पर क्या प्रभाव पड़ा? जानकारी एकत्रित कीजिए।

उत्तर : दिसंबर 2004 में आए सुनामी का अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। इस प्राकृतिक आपदा ने द्वीप समूह के बुनियादी ढांचे और जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया।  विशाल लहरों ने तटीय क्षेत्रों को तहस-नहस कर दिया, जिससे हजारों लोग बेघर हो गए। लगभग 3500 लोग मारे गए और कई लोग लापता हो गए। कृषि, मछली पालन और पर्यटन उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। द्वीपों की भू-आकृति बदल गई; कुछ छोटे द्वीप जलमग्न हो गए और तटरेखा में परिवर्तन आया। सड़कों, पुलों और भवनों का व्यापक रूप से क्षरण हुआ, जिससे पुनर्निर्माण की आवश्यकता पड़ी। इस आपदा ने द्वीप समूह की जीवनशैली और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला।


परियोजना कार्य

प्रश्न 1 : अपने घर-परिवार के बुजुर्ग सदस्यों से कुछ लोककथाओं को सुनिए। उन कथाओं को अपने शब्दों में कक्षा में सुनाइए।

उत्तर : विद्यार्थी अपने दादा-दादी, नाना-नानी से अपने क्षेत्र की लोककथाओं को सुनें। इन लोककथाओं को अच्छे से समझ लें और फिर अपने अंदाज में अपनी कक्षा में सुनाएं।


तताँरा-वामीरो की कथा : लीलाधर मंडलोई (कक्षा-10, पाठ-10 हिंदी, स्पर्श भाग 2) (NCERT Solutions)


कक्षा-10 हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ

साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पद : मीरा (कक्षा-10 पाठ-2 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तोप : वीरेन डंगवाल (कक्षा-10 पाठ-5 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

कर चले हम फिदा : कैफ़ी आज़मी (कक्षा-10 पाठ-6 हिंदी स्पर्श भाग-2) (हल प्रश्नोत्तर)

आत्मत्राण : रवींद्रनाथ ठाकुर (कक्षा-10 पाठ-7 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

बड़े भाई साहब : प्रेमचंद (कक्षा-10 पाठ-8 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

डायरी का एक पन्ना : सीताराम सेकसरिया (कक्षा-10 पाठ-9 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

‘मन्नू भंडारी’ द्वारा लिखित ‘दो कलाकार’ कहानी के दोनों पात्रों का परिचय दीजिए। आपका प्रिय कलाकार कौन और क्यों है? इस पर विचार व्यक्त कीजिए।

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‘दो कलाकार’ कहानी हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका ‘मन्नू भंडारी’ द्वारा लिखी एक सामाजिक कहानी है, जो दो सहेलियों अरुणा एवं चित्रा पर केंद्रित है। अरुणा और चित्रा दोनों इस कहानी की मुख्य पात्र हैं। वह एक हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करती हैं और दोनों में गाढ़ी मित्रता है, हालांकि दोनों के स्वभाव में भिन्नता है।

अरुणा को समाज सेवा में अनेक रुचि है, जबकि चित्र को कला में अधिक रुचि है और वह एक सफल चित्रकार बनना चाहती है। अरुणा गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाती है और समाज सेवा के कार्य करती जबकि चित्रा अपनी चित्रकला प्रतिभा को निखारने में लगी रहती है। दोनों के स्वभाव भिन्नता होने के बावजूद तो दोनों में गहरी मित्रता है और आसपास के लोग तक उनकी मित्रता से ईर्ष्या करते हैं।

अरुणा

अरुणा का स्वभाव व्यवहारिकता पर केंद्रित है। वह जीवन की व्यवहारिकता को समझती है। इसलिए वह अपनी सहेली चित्रा की तरह बेजान चित्रों को कागज पर उकेरने की जगह सजीव चित्रों को संवारती है। ये सजीव चित्र वे असहाय बच्चे हैं, जो अपनी माँ के मरने पर अनाथ हो चुके हैं। वह मानवता को अधिक प्राथमिकता देती है, और वास्तविक समाज सेवा के कार्य करना चाहती है। इसीलिए वह भिखारिन के मर जाने पर उसके अनाथ बच्चों को गोद ले लेती है और उनको पालती पोसती है।

चित्रा

चित्र का स्वभाव अरुणा के विपरीत है। वह केवल अपने यश और प्रसिद्ध के लिए काम करती है। यद्यपि वह कलाकार है लेकिन उसमें व्यवहारिकता नहीं है। वह केवल संवेदनशील घटनाओं पर चित्र बनाने में यकीन करती है लेकिन उसके अंदर वास्तविक संवेदनाएं नहीं है। यदि उसके अंदर वास्तविक संवेदनाएं होती तो वह भिखारिन के मर जाने पर भिखारिन के शव के पास बैठे उसके रोते-बिलखते बच्चों वाले दृश्य का स्केच वहीं बैठकर नहीं बनाती बल्कि उन बच्चों की मदद करने का प्रयास करती। वह है एक संवेदनहीन कलाकार है। उसकी प्रतिभा केवल बेजान रेखाचित्रों खींचने तक ही सीमित है।

इस तरह इस कहानी के दो मुख्य पत्र दोनों कलाकार अलग-अलग स्वभाव होने के बावजूद भी एक दूसरे की पक्की सहेली है।

अंत में…

यदि सच्चे कलाकार की बात की जाए तो अरुणा सच्ची कलाकार है क्योंकि उसने कागज बेजान चित्र नहीं बनाए बल्कि सजीव चित्र बनाए।

मेरे प्रिय कलाकार की बात की जाए तो मेरी प्रिय कलाकार भारत की प्रसिद्ध कालजयी दिवंगत पार्श्वगायिका लता मंगेशकर हैं, क्योंकि उनके गाने मेरे मन को छूने लेते हैं। उनकी आवाज में अनोखा जादू है। भारत के इतिहास में उनके जैसी गायिका नहीं हुई है। उनके हर गाने को सुनकर मुझे असीम शांति का अनुभव होता है। उनकी गाने सहाबहार हैं और हर पीढ़ी द्वारा उतनी ही तन्मयता से सुने जाते हैं। यद्यपि वह आज हमारे बीच शरीर के रूप में मौजूद नहीं हैं लेकिन अपने गानों और आवाज के रूप में वह हर पल हमरे बीच हैं।


Other question

यदि अरुणा उन दोनों बच्चों की देखभाल नहीं करती, तो उन बच्चों के साथ क्या-क्या हो सकता था?

विश्व-नागरिक होने की भावना ही व्यक्ति के मन में सच्ची मानवता का संचार करती है। इस पर अपने विचार लिखिए।

गिल्लू को किन से आपत्ति थी ? ​(गिल्लू – महादेवी वर्मा)

महादेवी वर्मा द्वारा लिखित ‘गिल्लू’ पाठ में ऐसा स्पष्ट रूप से उल्लिखित नही है कि गिल्लू की किस से आपत्ति थी, लेकिन पाठ में दिए गए वर्णन के अनुसार गिल्लू को लेखिका के घर में पल रहे अन्य पालतू जानवरों जैसे कुत्ते-बिल्लियों से आपत्ति थी। इसका मुख्य कारण यह था कि लेखिका एक पशु प्रेमी ही और उनके घर में अनेक तरह के पशु पक्षी पालते थे जिनमें कुत्ते, बिल्ली, मोर, गाय आदि जैसे पशु थे।

गिल्लू एक नन्ही गिलहरी थी, उसको लेखिका के घर में पलने वाले अन्य पालतू पशुओं जैसे कुत्ते-बिल्ली आदि से भय रहता था। यह कुत्ते बिल्ली गिल्लू को कहीं नुकसान नहीं पहुंचा दे इसीलिए लेखिका गिल्लू को विशेष रूप से सुरक्षित अलग जगह पर रखती थी ताकि लेखिका के अन्य पालतू पशु गिल्लू को कोई नुकसान न पहुंच सकें।

इसके अलावा गिल्लू को कौओं से भी आपत्ति थी क्योंकि जब गिल्लू बेहद छोटा था तब कौओं ने ही गिल्लू को अपनी चोंचें मारकर घायल किया था। तब लेखिका ने हीं उन कौओं से गिल्लू के प्राणों की रक्षा की और गिल्लू को अपने घर में लाकर न केवल उसका उपचार लिया बल्कि उसे अपने घर में पाला भी।

‘गिल्लू’ रेखाचित्र लेखिका महादेवी वर्मा द्वारा लिखित एक संस्मरणात्मक पाठ है,जिसमें लेखिका ने गिल्लू नामक एक छोटी से गिलहरी के बारे में वर्णन किया जो लेखिका के घर में पालतू थी।


Other questions

‘गिल्लू’ पाठ में लेखिका की मानवीय संवेदना अत्यंत प्रेरणादायक है । टिप्पणी लिखिए ।

लेखिका व गिल्लू के आत्मिक संबंधों पर प्रकाश डालिए।

गुड टच और बैड टच के बारे में बात करते हुए दो मित्रों के बीच हुए संवाद को लिखिए।

संवाद

गुड टच और बैट टच पर दो मित्रों के बीच संवाद

 

सुमन ⦂ अरे कोमल, कल स्कूल में गुड टच और बैड टच के बारे में जो सेशन हुआ था, उसके बारे में तुम क्या सोचती हो?

कोमल ⦂ वो बहुत जरूरी था सुमन। मुझे लगता है कि हर बच्चे को यह जानना चाहिए।

सुमन ⦂ तुम्हे क्या समझ आया। क्या तुम समझा सकती हो।

कोमल ⦂ गुड टच मतलब ऐसा स्पर्श जो हमें अच्छा महसूस कराए और जिसमें हमारी सहमति हो, जैसे माँ का गले लगाना या पिता का स्नेह करना। भाई बहन का गले लगाना।

सुमन ⦂ और बैड टच?

कोमल ⦂ बैड टच मतलब ऐसा स्पर्श जो हमें असहज लगे। जैसे कोई बिना हमारी अनुमति के हमें गलत तरीके से छूए। ऐसे स्पर्श से हमें बचना चाहिए और किसी बड़े को बताना चाहिए।

सुमन ⦂ हाँ, मुझे भी ऐसा ही लगता है। मैंने पहली बार सीखा कि हमें अपने शरीर के निजी अंगों को लेकर सतर्क रहना चाहिए।

कोमल ⦂ बिल्कुल सही। और यह भी कि अगर कोई हमें अजीब तरह से छूए तो उसे ‘नहीं’ कहना और किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताना बहुत जरूरी है।

सुमन ⦂ हाँ, और यह भी कि हमें दूसरों की निजता का भी सम्मान करना चाहिए।

कोमल ⦂ सही कहा। मुझे लगता है कि हमें अपने छोटे भाई-बहनों को भी यह सब समझाना चाहिए।

सुमन ⦂ अच्छा विचार है। साथ ही, हमें याद रखना चाहिए कि अगर कभी कुछ गलत हो, तो चुप नहीं रहना है।

कोमल ⦂ बिल्कुल! हमें अपने माता-पिता, शिक्षक या किसी विश्वसनीय वयस्क से बात करनी चाहिए।

सुमन ⦂ सही कहा कोमल। यह जानकारी हमारी सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

कोमल ⦂ हाँ सुमन, और इससे हम दूसरों की मदद भी कर सकते हैं।


Other questions

आउटडोर खेलों का महत्व समझाते हुए माँ-बेटे के बीच संवाद लिखिए।

परीक्षा में आए कठिन प्रश्न-पत्र के बारे में दो मित्रों के बीच संवाद लिखिए।

महिला और दूधवाला के बीच हुए संवाद को लिखें।

वर्षा ऋतु और ग्रीष्म ऋतु को मानव-रूप देकर उनके बीच कल्पित वार्तालाप को संवाद रूप में ​लिखिए।

‘कनक’ शब्द के अलग-अलग अर्थ बताकर वाक्य लिखिए।​

कनक के दो अलग-अलग अर्थ और उनके वाक्य प्रयोग इस प्रकार होंगे…

1. कनक : सोना

अर्थ : सोना – एक बहुमूल्य धातु
वाक्य-1 : रमेश ने कनक की बनी हुई अंगूठी अपनी पत्नी सुमन को उपहार में दी।
वाक्य-2 : रावण की लंका नगरी पूरी तरह कनक से बनी हुई थी।

2. कनक : गेहूँ

अर्थ : गेहूँ – एक अनाज
वाक्य-1 : किसान अपनी छोटे भाई से बोला कि इस वर्ष हमारे खेतों में कनक की फसल बहुत अच्छी हुई है।
वाक्य-2 : राजेश अपनी पत्नी से बोला कि शाम को कनक की मोटी रोटी और लहसुन की चटनी बना लेना।

3. कनक : धतूरा

अर्थ : धतूरा – एक मादक पदार्थ
वाक्य 1 : रामू शामू से बोला ये कनक का पौधा है, इसकी पत्तियां-जड़े खाने से आदमी पागल हो जाता है।
वाक्य 2 : हरीश के कुत्ते ने जब से जंगल में लगे कनक के पौधे की थोड़ी पत्तियां क्या खा लीं वह बौराया सा घूम रहा है।


Other questions

अभिराम और अविराम में अंतर कीजिए।

झरने और नदी में क्या अंतर है?

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की काव्य रचना ‘सरोज स्मृति’ एक शोकगीत है। स्पष्ट करें।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘सरोज स्मृति’ एक शोकगीत है, जो उनकी पुत्री सरोज की असामयिक मृत्यु के बाद लिखी गई थी। इस कविता में निराला ने अपने दुख, वेदना और पुत्री के प्रति गहरे स्नेह को व्यक्त किया है।  इस कविता में निराला की जो दुख और वेदना प्रकट होती है, उससे स्पष्ट होता है, ये कविता एक शोकगीत है..

अपने निजी दुख का वर्णन

‘सरोज स्मृति’ में निराला ने अपने निजी जीवन के सबसे दुखद क्षण का वर्णन किया है। अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु ने उन्हें गहरे शोक में डाल दिया था, और इस कविता में उस शोक की गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कविता के माध्यम से वे अपनी पीड़ा और वियोग के भावों को अभिव्यक्त करते हैं।

अपनी पुत्री के प्रति स्नेह और ममता

कविता में निराला ने सरोज के प्रति अपनी ममता और स्नेह को दर्शाया है। उन्होंने सरोज की स्मृतियों को संजोते हुए उसके व्यक्तित्व, उसकी मासूमियत और उसकी अच्छाइयों का वर्णन किया है। इससे स्पष्ट होता है कि सरोज उनके लिए कितनी महत्वपूर्ण थी।

जीवन की नश्वरता का बोध

सरोज स्मृति में निराला ने जीवन की नश्वरता और मृत्यु की अनिवार्यता का भी उल्लेख किया है। उन्होंने इस बात पर विचार किया है कि कैसे एक पिता अपने संतान को खोने के दुख को सहन करता है और जीवन की क्षणभंगुरता को स्वीकारता है।

काव्यात्मक शोक

कविता की भाषा और शैली भी इसे शोकगीत के रूप में प्रस्तुत करती है। शब्दों का चयन, भावनाओं की गहराई और निराला की साहित्यिक प्रतिभा सभी मिलकर इस कविता को एक प्रभावी और मार्मिक शोकगीत बनाते हैं।

जैसे…

सरोज, तुम्हारे बिना सूना है जीवन,
हर पल, हर क्षण, अश्रु बहते रहते अनवरत।
तुम्हारी स्मृतियों में डूबा हूँ, तुमसे ही है हर रागिनी।

निष्कर्ष

इस प्रकार इस सभी बिंदुओं से स्पष्ट होता है कि ‘सरोज स्मृति’ कविता वास्तव में एक शोकगीत ही है, क्योंकि इस कविता के माध्यम महाकवि सू्र्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी पुत्री सरोज की असामयिक मृत्यु से अपने हृदय में उपजे गहरे दर्द को व्यक्त किया है, जो इसे एक सच्चा शोकगीत बनाता है। इस कविता में उनके व्यक्तिगत दुख, पुत्री के प्रति स्नेह, जीवन की नश्वरता का बोध, और काव्यात्मक शोक सभी मिलकर इसे एक मार्मिक और प्रभावशाली शोकगीत बनाते हैं।


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निराला जी की परोपकार भावना इस विषय पर 100 शब्दों में लिखें।

विप्लव का वीर किसे कहा गया है?

डायरी का एक पन्ना : सीताराम सेकसरिया (कक्षा-10 पाठ-9 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

डायरी का एक पन्ना : सीताराम सेकसरिया (कक्षा-10 पाठ-9 हिंदी स्पर्श 2)

DIARY KA EK PANNA : Sitaram Seksaria (Class-10 Chapter-9 Hindi Sparsh 2)


डायरी का एक पन्ना : सीताराम सेकसरिया

पाठ के बारे में…

पाठ के बारे में….

“डायरी का एक पन्ना” पाठ जोकि लेखक ‘सीताराम सेकसरिया’ द्वारा लिखा गया पाठ है, उसमें उन्होंने गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत में मनाए जाने वाले पहले स्वतंत्रता दिवस का वर्णन किया है। वह दिन 26 जनवरी 1931 का दिन था, जब  गुलाम भारत में पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। हालांकि भारत उस समय स्वतंत्र नहीं हो पाया था लेकिन आजादी की कामना करने वाले भारतीयों ने इस दिवस को स्वतंत्रता दिवस के प्रतीक दिवस में रूप के रूप में चुन कर इसको स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाया था। बाद में सन 1950 में यही दिन यानि 26 जनवरी का दिन भारत का गणतंत्र दिवस बना।

इस पाठ में लेखक ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में कोलकाता में निकलने वाले जुलूस का वर्णन किया है, जो 26 जनवरी 1931 को भारत का पहला स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए निकाला गया था। अंग्रेजों ने इस जुलूस का दमन करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। लेखक स्वयं उस जुलूस में शामिल था।

लेखक के बारे में…

सीताराम सेकसरिया जिनका जन्म सन 1892 में राजस्थान के नवलगढ़ जिले में हुआ था। वह व्यापार एवं व्यवसाय से जुड़े होने के बावजूद साहित्य कार्य भी करते रहे थे और भारत के स्वाधीनता संग्राम में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उन्होंने अनेक साहित्य, सांस्कृतिक और नारी शिक्षण संस्थान की स्थापना की तथा उनका संचालन किया। वह महात्मा गांधी, रविंद्र नाथ ठाकुर तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निकट भी रहे थे। उन्होंने कुछ समय आजाद हिंद फौज में मंत्री के रूप में भी कार्य किया।

सन 1962 में उन्हें पद्मश्री सम्मान भी मिला था उन्होंने अनके कृतियों की रचना की इसमें मन की बात , स्मृति युग, बीता युग, नई याद और एक कार्यकर्ता की डायरी का नाम प्रमुख है।

उनका निधन 1962 में हुआ था।



हल प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए।

प्रश्न 1 : कलकत्ता वासियों के लिए 26 जनवरी 1931 का दिन क्यों महत्वपूर्ण था?

उत्तर : 26 जनवरी 1931 का दिन कलकत्ता वासियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि ठीक एक वर्ष पहले 26 जनवरी 1930 को गुलाम भारत में पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। उस समय कलकत्ता के वासी इस स्वतंत्र दिवस में अपना कुछ योगदान नहीं दे पाए थे। 26 जनवरी 1931 को इस दिन की पुनरावृत्ति थी, यानी पहली वर्षगांठ थी। इसलिए इस बार बंगाल के लोगों विशेषकर कलकत्ता के लोगों ने इस दिवस को मनाने के लिए जोर-शोर से तैयारियों की थीं। उन्होंने अपने मकानों तथा सार्वजनिक स्थानों को सजाया था और राष्ट्रीय झंडे लगाए थे। इसलिए कलकत्ता वासियों के लिए 26 जनवरी 1931 का दिन महत्वपूर्ण था।

प्रश्न 2 : सुभाष बाबू के जुलूस का भार किस पर था?

उत्तर : सुभाष बाबू के जुलूस का भार पूर्णोदास पर था। पूर्णोदास ने ही जुलूस का सारा प्रबंध अपने हाथ में ले लिया था। उन्होंने जुलूस में जगह-जगह झंडे आदि लगाने का बंदोबस्त किया था। लेकिन बाद में अंग्रेजों की पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया ।

प्रश्न 3 : विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू के झंडा गाड़ने पर क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर : विद्यार्थी संगठन मंत्री अविनाश बाबू के झंडा गाड़ने पर यह प्रतिक्रिया हुई कि जैसे ही अविनाश बाबू ने श्रद्धानंद पार्क में झंडा गाढ़ा तो पुलिस ने उन्हें तुरंत पकड़ लिया। पुलिस ने अविनाश बाबू के साथ आए अनेक लोगों के साथ मारपीट की और उन सभी को वहां से हटा दिया। अविनाश बाबू प्रांतीय विद्यार्थी संघ के मंत्री थे और जुलूस वाले दिन वह श्रद्धानंद पार्क में झंडा गाड़ रहे थे, जब पुलिस ने उनको पकड़ लिया था।

प्रश्न 4 : लोग अपने-अपने मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर किस बात का संकेत देना चाहते थे?

उत्तर : लोग अपने-अपने मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय झंडा लहरा कर इस बात का संकेत देना चाहते थे कि उन्होंने अपने देश की आजादी को पाने का मन में ठान लिया है। वह अपनी देशभक्ति सिद्ध करना चाहते थे और अंग्रेजों को यह बताना चाहते थे कि वह स्वयं को स्वतंत्र मान चुके हैं और अपने देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। वह अंग्रेजों को राष्ट्रीय डंडा फहराकर यह बताना चाहते थे कि वे अपने देश की स्वतंत्रता पाने के लिए मर मिटने को और कुछ भी करने को तैयार हैं।

प्रश्न 5 : पुलिस ने बड़े-बड़े पार्कों और मैदानों को क्यों घेर लिया था?

उत्तर : पुलिस ने बड़े-बड़े पार्को और मैदानों को इसलिए घेर लिया था क्योंकि 26 जनवरी 1931 के उस दिन कोलकाता की जनता स्वतंत्रता दिवस को मनाने के लिए आयोजन आदि करना चाहती थी। पुलिस उस समय यह नहीं चाहती थी कि स्वतंत्र दिवस का यह आयोजन हो और लोग मैदानों और पार्कों में इकट्ठा हो सकें। पुलिस लोगों को मैदानों में सभा करने से और राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकना चाहती थी, इसीलिए पुलिस ने बड़े-बड़े पार्कों तथा मैदानों को घेर लिया था कि वहाँ पर लोगों की भीड़ जमा ना हो पाए और लोग स्वतंत्रता दिवस का आयोजन नहीं कर पाएं, ना ही वह राष्ट्रीय झंडा फहरा पाएं।



लिखित

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30) शब्दों में लिखिए।

प्रश्न 1 : 26 जनवरी 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए क्या-क्या तैयारियाँ की गईं ?

उत्तर : 26 जनवरी 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए अनेक तरह की तैयारियां की गई थी। इस दिन कलकत्ता के लोगों ने अपने घरों को खूब सजाया था। सभी मकानों पर राष्ट्रीय झंडे फहराए गए थे। घरों के अलावा मुख्य-मुख्य सार्वजनिक स्थानों पर तथा शहर के कोने-कोने पर राष्ट्रीय ध्वज फहराए गए थे। मकानों को भव्य तरीके से सजाया गया था। पूरा कलकत्ता नगर ही सज-धज गया था और ऐसा लग रहा था कि उस दिन सचमुच में वास्तविक रूप से स्वतंत्रता मिल गई हो। इस तरह 26 जनवरी 1931 का दिन अमर बन गया।

प्रश्न 2 : ‘आज जो बात थी वह निराली थी’ − किस बात से पता चल रहा था कि आज का दिन अपने आप में निराला है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : आज जो बात थी वह निराली थी इसका इस बात से पता चल रहा था क्योंकि 26 जनवरी 1931 का यह दिन अपने आप में ही निराला था। 26 जनवरी 1930 को गुलाम भारत का पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। 26 जनवरी 1931 का दिन 1 साल पूरा होने का दिन था और यह आजादी की पहली वर्षगांठ की थी।

उस दिन की पुनरावृत्ति होने के कारण कलकत्ता वासियों में खूब उत्साह एवं जोश खरोश था। 1930 के वर्ष वह उतने जोश-खरोश से नहीं बना पाए थे, लेकिन अब 26 जनवरी 1931 का दिन उन्हें अपने भावनाओं उत्साह एवं उमंग को प्रदर्शित करने का अवसर दे रहा था। इसीलिए इस दिन को यादगार बनाना चाहते थे। अंग्रेजों ने भी कलकत्ता निवासियों के जुलूस आदि निकालने पर रोक लगाने तथा उनका दमन करने के लिए पूर्ण प्रबंध कर रखा था। अंग्रेजों के कड़े सुरक्षा प्रबंधन और विरोध के बावजूद भी हजारों की संख्या में लोग लाठी खाकर भी जुलूस में भाग लेते रहे थे।

सरकार द्वारा दमन के अनेकों प्रयास किए जाने के बावजूद आम जनता और कार्यकर्ता मिलजुलकर मॉन्यूमेंट के पास जमा होते जा रहे थे। क्या स्त्री, क्या पुरुष सभी ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। स्त्रियों ने पुरुषों की तरह ही आंदोलन में बढ़-चढ़कर अपना योगदान दिया। इस तरह ये दिन यादगार बन गया था। इन सब बातों से पता चल जाता कि आज जो बात है निराली थी।

इस दिन कलकत्ता के वासियों ने अपने देश-प्रेम, देश के प्रति निष्ठा तथा आजादी के संघर्ष और एकता का प्रदर्शन किया था।

प्रश्न 3 : पुलिस कमिश्नर के नोटिस और कौंसिल के नोटिस में क्या अंतर था?

उत्तर : पुलिस कमिश्नर नोटिस और काउंसिल के नोटिस में मुख्य अंतर यह था कि पुलिस कमिश्नर के नोटिस में यह बात उल्लेखित थी कि अमुक-अमुक धारा के अनुसार कोई भी सभा नहीं हो सकती। इसके बावजूद यदि लोग सभा आदि करेंगे और सभा में भाग लेते हुए पाए गए तो उनको दोषी मानता उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

जबकि काउंसिल के नोटिस में यह बात हुई लिखी थी कि मॉन्यूमेंट के ठीक नीचे 4:24 पर झंडा फहराया जाएगा और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी। काउंसिल के नोटिस में सारी जनता का आह्वान किया था कि वह अधिक से अधिक संख्या में मॉन्यूमेंट के नीचे इकट्ठी हो जाए। यानी काउंसिल का नोटिस पुलिस कमिश्नर के नोटिस के लिए एक तरह की खुली चुनौती का। दोनों नोटिस एक दूसरे के विरुद्ध थे।

प्रश्न 4 : धर्मतल्ले के मोड़ पर आकर जुलूस क्यों टूट गया?

उत्तर : धर्मतल्ले के मोड़ पर आकर जुलूस इसलिए टूट गया क्योंकि जुलूस सुभाष बाबू के नेतृत्व में पूरे जोश के साथ आगे बढ़ रहा था, लेकिन सुभाष बाबू को पुलिस ने पकड़ लिया और पुलिस उन्हें अपने साथ लेकर गाड़ी में बिठाकर लाल बाजार के लॉकअप में ले गई। इसके बाद धर्मतल्ले के मोड़ पर पुलिस ने जुलूस के लोगों पर लाठियां बरसानी शुरु कर दीं। जिससे अनेक लोग घायल हो गए और स्वयं को बचाने के चक्कर में जुलूस तितर-बितर को कर बिखर गया। हालाँकि कुछ महिलाओं ने धर्मतल्ले के मोड़ पर धरना भी दिया लेकिन पुलिस उन्हें भी पकड़कर लालबाजार के लॉकअप में ले गई। इस तरह धर्मतल्ले लेकर मोड़ पर जुलूस टूट गया।

प्रश्न 5 : डा. दासगुप्ता जुलूस में घायल लोगों की देख-रेख तो कर रहे थे, उनके फ़ोटो भी उतरवा रहे थे। उन लोगों के फ़ोटो खींचने की क्या वजह हो सकती थी? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : डॉक्टर स्वप्नदासगुप्ता जुलूस में घायल लोगों की देखरेख तो कर ही रहे थे, उनके फोटो भी उतरवा रहे थे। डॉक्टर स्वप्न दास गुप्ता द्वारा जुलूस में घायल लोगों के फोटो खींचने की मुख्य वजह यह थी कि वह इन फोटो के द्वारा पूरे देश के लोगों को अंग्रेजों के जुल्मों को दिखाना चाहते थे।

वह यह फोटो समाचार पत्र आदि में प्रकाशित करवा कर या अन्य किसी माध्यम से जनता के बीच पहुंचा कर अंग्रेजों के जुल्म का प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाना चाहते थे। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि एक तो देश के अन्य लोगों को अंग्रेजों के अत्याचार और दमन के बारे में पता चले और दूसरे लोग भी अंग्रेजों के जुल्म को देखकर और कलकत्ता के वासियों का संघर्ष देखकर प्रेरित हों तथा देश की स्वतंत्रता के आंदोलन के लिए और अधिक संगठित होकर आगे आयें।

(ख) निम्नलिखित शब्दों के उत्तर (50-60) शब्दों में लिखिए।

प्रश्न 1 : सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज की क्या भूमिका थी?

उत्तर : सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज में एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अलग-अलग संघ से जुड़ी स्त्रियों ने अलग-अलग भूमिकायें निभाई थीं। जहाँ गुजराती सेविका संघ की ओर से एक जुलूस निकाला गया तो मारवाड़ी बालिका विद्यालय में झंडा फहराकर झंडोत्सव मनाया गया। सुभाष बाबू के इस जुलूस में जानकी देवी और मदालसा बाजार जैसी महत्वपूर्ण महिलाओं ने भी भाग लिया था।

लाठीचार्ज की भी परवाह नहीं की थी और लाठीचार्ज को सहते हुए भी मॉन्यूमेंट तक जा पहुंचीं। धर्मतल्ले के मोड़ पर तो नीति स्त्रियों ने धरना भी दे दिया था। लगभग 105 स्त्रियों ने अपनी गिरफ्तारी दी । इस तरह पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियां भी स्त्रियों ने भी सुभाष बाबू के जुलूस में बेहद महत्वपूर्ण और समान भूमिका निभाई थी।

प्रश्न 2 : जुलूस के लाल बाज़ार आने पर लोगों की क्या दशा हुई?

उत्तर : लाठीचार्ज चाहते हुए भी लोग नारे लगा रहे थे और लोगों का जोश कम नहीं हुआ था। पुलिस लोगों को लाठी से मार रही थी और उन्हें गिरफ्तार करके ले  जा रही थी। स्त्रियां भी अपनी गिरफ्तारी दे रही थीं। बृजलाल गोयनका झंडा लेकर मॉन्यूमेंट की तरफ दौड़ा लेकिन दौड़ते दौड़ते वह गिर पड़ा। तब पुलिस ने उसे पकड़ लिया। मदालसा जोकि स्त्रियों के समूह का नेतृत्व कर रही थी, उसने भी अपनी गिरफ्तारी दी।

मदालसा को पुलिस पकड़ कर ले गई और थाने में उसके साथ मारपीट की। फिर भी लोगों का जोश कम नहीं हुआ और वह गिरफ्तारी देते जा रहे थे और लाठीचार्ज को सहते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। इस जुलूस में पुलिस के द्वारा किए गए लाठीचार्ज में लगभग 200 से अधिक लोग घायल हो गए थे, जिन में स्त्रियां भी शामिल थीं और उसकी हालत गंभीर हो गई थी।

प्रश्न 3 : ‘जब से कानून भंग का काम शुरू हुआ है तब से आज तक इतनी बड़ी सभा ऐसे मैदान में नहीं की गई थी और यह सभा तो कहना चाहिए कि ओपन लड़ाई थी।’ यहाँ पर कौन से और किसके द्वारा लागू किए गए कानून को भंग करने की बात कही गई है? क्या कानून भंग करना उचित था? पाठ के संदर्भ में अपने विचार प्रकट कीजिए।

उत्तर : जब से कानून भंग का काम शुरू हुआ है तब से आज तक इतनी बड़ी सभा ऐसे मैदान में नहीं की गई थी और यह सभा तो कहना चाहिए कि ओपन लड़ाई थी।’ यहाँ पर उस कानून के भंग होने की बात की गई है, जो कोलकाता के पुलिस कमिश्नर ने नोटिस दिया था।

26 जनवरी 1931 के दिन कोलकाता के पुलिस कमिश्नर ने नोटिस निकाला की अमुक-अमुक धारा के अनुसार शहर में कोई भी सभा नहीं हो सकती। यदि किसी ने सभा की और सभा में जिन लोगों ने भी भाग लिया उन्हें दोषी मानकर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसी नोटिस के विरोध में कौंसिल ने अपनी तरफ से नोटिस निकाला कि मॉन्यूमेंट के नीचे स्थित था 4:24 पर राष्ट्रीय झंडा फहराया जाएगा और भारत की स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी।

मॉन्यूमेंट के नीचे अधिक से अधिक लोगों के इकट्ठा होने का आह्वान किया गया था। यह बिल्कुल अंग्रेजी सत्ता को चुनौती के समान था। पुलिस कमिश्नर ने जो नोटिस निकाला था, उसके विरोध में  ये नोटिस विरोध का प्रतीक था। अंग्रेजी सरकार स्वतंत्रता सेनानियों का विरोध करने के लिए नियम बना रही थी और उन नियमों को स्वतंत्रता के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता था। अंग्रेजों का तो उद्देश्य यही था कि वह किसी भी तरह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दबाए। इसीलिए वह इस तरह के कानून निकालते थे और भारतीयों को कानून का उल्लंघन करना जरूरी हो गया था।

पुलिस कमिश्नर ने देशवासियों के स्वतंत्रता दिवस मनाने के अधिकार का हनन करने का प्रयास किया था और स्वतंत्रता के आंदोलन को दबाने का प्रयास किया था, इसीलिए काउंसिल ने उसका विरोध करते हुए जनता का आह्वान करते हुए अपना नोटिस निकाला।

प्रश्न 4 : बहुत से लोग घायल हुए, बहुतों को लॉकअप में रखा गया, बहुत-सी स्त्रियाँ जेल गईं, फिर भी इस दिन को अपूर्व बताया गया है। आपके विचार में यह सब अपूर्व क्यों है? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर : बहुत से लोग घायल हुए , बहुतों को लॉकअप में रखा गया, बहुत सी स्त्रियां जेल गई, फिर भी इस दिन को अपूर्व इसलिए बताया गया है, क्योंकि ऐसा इससे पहले गठित नहीं हुआ था। 26 जनवरी 1931 का दिन भारत की स्वतंत्रता दिवस को मनाने की पुनरावृत्ति दिवस था, क्योंकि 26 जनवरी 1930 को भारत की प्रथम स्वतंत्रता का दिवस मनाया गया था। 26 जनवरी 1931 को उसकी पुनरावृत्ति थी।

इस कारण देशवासियों में बेहद उत्साह था। बंगाल और कलकत्ता के वासियों में बहुत अधिक ही उत्साह और उल्लास था। लोग उत्साह और उल्लास से भरे हुए थे। उन्होंने अपने घरों को सजाया और जगह-जगह झंडे लगाए। वह इस दिन को यादगार बना देना चाहते थे। केवल पुरुषों ने ही नहीं स्त्रियों ने भी इस दिन आंदोलन करने और जुलूस निकालने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

स्त्रियों ने भी पुरुषों के भांति लाठियां। कई स्त्रियां घायल भी हुईं। अनेक पुरुषों एवं महिलाओं को पुलिस की लाठीचार्ज में घायल होना पड़ा। पुलिस ने उन्हें बुरी तरह से मारा पीटा और उन्हें लॉकअप में भी बंद किया। फिर भी लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। लोगों ने जोश-खरोश से जुलूस निकाला, गिरफ्तारियां दी और झंडे फहराए। कोलकाता में ऐसा पहली बार हुआ था, इसीलिए यह अपूर्व था।

(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए।

आशय स्पष्ट कीजिए। आज तो जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ है। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर कलंक था कि यहाँ काम नहीं हो रहा है वह आज बहुत अंश में धुल गया।

आशय : इस कथन का आशय यह है कि बंगाल या कलकत्ता वासियों के संदर्भ में यह कहा जाता था कि वह स्वाधीनता से संबंधित आंदोलन में कुछ विशेष नहीं करते। वह स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए जाने वाले प्रयासों में विशेष रूप से बढ़ चढ़कर भाग नहीं लेते और स्वतंत्रता संग्राम हेतु यहां पर अधिक कार्य नहीं किया जाता। यह सब बातें कलकत्ता वासियों और बंगाल वासियों के लिए एक कलंक के समान थी।

लेकिन 26 जनवरी 1931 के दिन भारत के दूसरे स्वतंत्रता दिवस मनाने हेतु कलकत्ता वासियों ने संगठित होकर जिस तरह का संघर्ष किया, जिस तरह का आंदोलन किया, जुलूस निकाला, उत्साह दिखाया, वह अपूर्व था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में कलकत्ता वासियों ने एक अनोखा आंदोलन किया जिसने पूरे देश में इस आंदोलन को चर्चा में ला दिया था। कलकत्ता वासियों ने, जिनमें स्त्री एवं पुरुष दोनों शामिल थे, लाठियां खाई घायल हुए जेल गए लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे और राष्ट्रीय ध्वज फहराकर आकर स्वतंत्रता के आंदोलन की प्रतिज्ञा पढ़ी।

इस तरह इससे पहले कलकत्ता वासियों के माथे पर लगा कलंक धुल गया कि यहाँ पर भारतीय स्वतंत्रता के लिए काम नहीं हो रहा।

आशय स्पष्ट कीजिए। खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी ?

आशय : इस कथन का आशय यह है कि 26 जनवरी 1931 के दिन कोलकाता के कमिश्नर ने नोटिस निकाला था कि कोलकाता में किसी भी जगह पर कोई भी सभा नहीं की जाएगी । उसने तरह-तरह की धाराओं का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी ने भी सभा की ओर जो व्यक्ति सभा में शामिल हुआ उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी और उसे गिरफ्तार किया जाएगा।

कमिश्नर ने यह नोटिस उस आंदोलन को कुचलने के लिए निकाला था जिसने 26 जनवरी 1931 के दिन कोलकाता में जगह जगह पर झंडे आदि फहराकर  भारत की स्वतंत्रता दिवस मनाने का आयोजन किया जाना था। अंग्रेजों को यह बात स्वीकार नहीं थी इसीलिए पुलिस कमिश्नर ने ऐसे नोटिस निकाल कर ऐसे आयोजन को शुरू होने से पहले ही खत्म करने का कुत्सित प्रयास किया था। लेकिन इस नोटिस के जवाब में काउंसिल ने उन्हें चुनौती देते हुए अपनी तरफ से एक नोटिस निकाला जिसमें कहा गया कि 4:24 पर मॉन्यूमेंट के नीचे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहरायगा जाएगा और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी।

पुलिस कमिश्नर द्वारा जारी किए गए नोटिस के विरोध में इस तरह का नोटिस निकालना खुला चैलेंज था। ऐसा नोटिस निकालकर न केवल कमिश्नर के नोटिस अवज्ञा की गई बल्कि विरोध में अपना नोटिस निकालकर मॉन्यूमेंट के नीचे सभा भी की गई थी। अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देकर ऐसी सभा पहले कभी नही हुई थी इसलिए ये कहा गया कि खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी।



भाषा अध्ययन

1.
I. निम्नलिखित वाक्यों को सरल वाक्य में बदलिए।
(क) दो सौ आदमियों का जुलूस लालबाज़ार गया और वहाँ पर गिरफ़्तार हो गया।

सरल वाक्य : दो सौ आदमियों का जुलूस लालबाज़ार जाकर गिरफ़्तार हो गया।

(ख) मैदान में हजारों आदमियों की भीड़ होने लगी और लोग टोलियां बना-बनाकर मैदान में घूमने लगे।

सरल वाक्य : मैदान में हजारों आदमियों की जमा भीड़ टोलियां बनाकर मैंदान में घूमने लगी।

(ग) सुभाष बाबू को पकड़ लिया गया और गाड़ी में बैठ कर लालबाजार लॉकअप में भेज दिया गया।

सरल वाक्य : सुभाष बाबू को पड़कर गाड़ी में बैठकर लालबाजार लॉकअप में भेज दिया गया

II. ‘बड़े भाईसाहब’ पाठ में से दो सरल, संयुक्त और मिश्र वाक्य छांटकर लिखिए।

उत्तर : बड़े भाईसाहब पाठ में से दो-दो सरल, संयुक्त और मिश्र वाक्य छाँटकर इस प्रकार होंगे…

सरल वाक्य : वह स्वभाव से बड़े अध्ययनशील थे।
सरल वाक्य : उनकी रचनाओं को समझना छोटे मुँह बड़ी बात है।

संयुक्त वाक्य : रावण ने अभिमान किया और दीन दुनिया दोनों से गया।
संयुक्त वाक्य : मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्मसम्मान भी बढ़ा।

मिश्र वाक्य : मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ लेकिन असफल रहा।
मिश्र वाक्य : मैं कह देता कि मुझे अपना अपराध स्वीकार है।

2. निम्नलिखित वाक्य संरचनाओं को ध्यान से पढ़िए और समझिए कि जाना, रहना और चुकना क्रियाओं का प्रयोग किस प्रकार किया गया है। (क) 1. कई मकान सजाए गए थे। 2. कलकत्ते के प्रत्येक भाग में झंडे लगाए गए थे। (ख) 1. बड़े बाज़ार के प्रायः मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहरा रहा था। 2. कितनी ही लारियाँ शहर में घुमाई जा रही थीं। 3. पुलिस भी अपनी पूरी ताकत से शहर में गश्त देकर प्रदर्शन कर रही थीं। (ग) 1. सुभाष बाबू के जुलूस का भार पूर्णोदास पर था, वह प्रबंध कर चुका था। 2. पुलिस कमिश्नर का नोटिस निकल चुका था।

उत्तर : उपरोक्त वाक्यों की संरचनाओं को ध्यान से पढ़कर और समझ कर ‘जाना’, ‘रहना’ और ‘चुकना’ क्रियाओं के विषय में यह पता चलता है कि इन क्रियाओं का प्रयोग मुख्य क्रिया के रूप में नहीं किया गया है, बल्कि इन क्रियाओं का प्रयोग रंजक क्रियाओं के रूप में किया गया है। इन क्रियाओं का प्रयोग इस तरह करने के कारण मुख्य क्रियाएं संयुक्त क्रिया बन गई हैं।

3. नीचे दिए गए शब्दों की संधि कीजिए- श्रद्धा + आनंद = …. प्रति + एक = ……. पुरुष + उत्तम = ……… झंडा + उत्सव = …….. पुनः + आवृत्ति = ……… ज्योतिः + मय = …….

उत्तर : नीचे दिए गए शब्दों की संधि इस प्रकार होगी…

श्रद्धा + आनंद = श्रद्धानंद
संधि भेद : दीर्घ स्वर संधि

प्रति + एक = प्रत्येक
संधि भेद : यण स्वर संधि

पुरुष + उत्तम = पुरुषोत्तम
संधि भेद : गुण स्वर संधि

झंडा + उत्सव = झंडोत्सव
संधि भेद : गुण स्वर संधि

पुनः + आवृत्ति = पुनरावृत्ति
संधि भेद : विसर्ग संधि

ज्योतिः + मय = ज्योतिर्मय
संधि भेद : विसर्ग संधि



योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 : भौतिक रूप से दबे हुए होने पर भी अंग्रेजों के समय में ही हमारा मन आजाद हो चुका था। अत: दिसंबर सन् 1929 में लाहौर में कांग्रेस का एक बड़ा अधिवेशन हुआ, इसके सभापति जवाहरलाल नेहरू जी थे। इस अधिवेशन में यह प्रस्ताव पास किया गया कि अब हम ‘पूर्ण स्वराज्य से कुछ भी कम स्वीकार नहीं करेंगे। 26 जनवरी 1930 को देशवासियों ने पूर्ण स्वतंत्रता के लिए हर प्रकार के बलिदान की प्रतिज्ञा की। उसके बाद आज़ादी प्राप्त होने तक प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। आजादी मिलने के बाद 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उत्तर : प्रश्न मे जो जानकारी दी गई है, वह विद्यार्थियों के ज्ञानवर्द्धन हेतु दी गई है। विद्यार्थी इस जानकारी का स्मरण रखें।

प्रश्न 2 : डायरी-यह गद्य की एक विधा है। इसमें दैनिक जीवन में होने वाली घटनाओं, अनुभवों को वर्णित किया जाता है। आप भी अपनी दैनिक जीवन से संबंधित घटनाओं को डायरी में लिखने का अभ्यास करें।

उत्तर : यहाँ पर विद्यार्थियों की सहायता के लिए एक दिन का डायरी लेखन प्रस्तुत है…

डायरी: 5 जुलाई 2024

आज का दिन बहुत खास था। आज मेरा जन्मदिन था। सुबह जैसे ही उठा तो मेरे माता-पिता और छोटी बहन मेरे बिस्तर के पास खड़े थे। उन्होंने मेरे आँखे खोलते ही मुझे एक स्वर में ‘हैप्पी बर्थडे टू यू’ कहा। मम्मी ने नाश्ते में मेरे पसंद के आलू के परांठे बनाए थे। नाश्ता करके और तैयार होकर मैं अपने स्कूल निकल गया। मैं अपने साथ छोटी-छोटी चॉकलेट ले गया था जो मैंने अपने कक्षा में सभी को बांटी। मैंने अपने खास दोस्तों को शाम के घर पर आने का निमंत्रण दिया क्योंकि मेरे घर पर मेरे माता-पिता जन्मदिन की पार्टी रखी थी। शाम को घर पहुँचकर मैने नए कपड़े पहने। रात 8 बजे पार्टी शुरु हुई। मैने अपने जन्मदिन का केक काटा। मेरे सभी खास दोस्त और हमारे नजदीकी रिश्तेदार पार्टी में आये थे। मेरे माता पिता ने मुझे एक साइकिल भेंट की। मेरी छोटी बहन में मुझे एक किताब भेंट की। इसी तरह सभी ने मुझे कुछ न कुछ उपहार दिया। केक काटने के बाद नाच-गाने और भोजन का कार्यक्रम हुआ। रात 10 बजे तक पार्टी चलती रही। मेरे जन्मदिन का ये दिन सचमुच यादगार रहा।

शिवम

प्रश्न 3 : जमना लाल बजाज, महात्मा गांधी के पाँचवें पुत्र के रूप में जाने जाते हैं, क्यों? अध्यापक से जानकारी प्राप्त करें।

उत्तर : जमनालाल बजाज को महात्मा गांधी का ‘पाँचवाँ पुत्र’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने गांधीजी के आदर्शों और विचारधारा को न केवल अपनाया बल्कि अपने जीवन में भी उतारा। उनके और गांधीजी के बीच का संबंध एक गुरु-शिष्य से कहीं अधिक था; वह एक गहरे और व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ाव का प्रतिनिधित्व करता था।

जमनालाल बजाज, बजाज उद्योग घराने के संस्थापक थे और राजस्थान के प्रसिद्ध व्यापारी थे। उन्हें अंग्रेजों से रायबहादुर की उपाधि भी मिली थी। गांधी जी से मिलने के बाद वह गांधी जी की विचाधारा से प्रभावित हुए। तब उन्होंने अंग्रेजों सी दूरी बना ली उनका दिया सम्मान लौटा दिया और पूरी तरह से गांधी जी के अनुयायी बन गए।

जमनालाल बजाज ने अपनी संपत्ति और संसाधनों का उपयोग समाज सेवा के लिए किया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भूमिका निभाई और गांधीजी के आदर्शों का अनुसरण करते हुए कई सामाजिक सुधार कार्य किए। उन्होंने ने गांधीजी के असहयोग आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन और अन्य कई अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अपना समय, धन और ऊर्जा गांधीजी के आंदोलनों को सफल बनाने में लगाया। जमनालाल बजाज ने एक साधारण जीवन जीने का संकल्प लिया और अपने भौतिक सुखों का त्याग किया, जो गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप था। उन्होंने अपने परिवार के साथ भी गांधीजी के सिद्धांतों का पालन किया। गांधीजी ने भी उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानते हुए उन्हें अपने पुत्र के समान स्नेह और सम्मान दिया।

इन सभी कारणों से, जमनालाल बजाज को गांधीजी का पाँचवाँ पुत्र कहा जाने लगा।

प्रश्न 4 : ढाई लाख का जानकी देवी पुरस्कार जमना लाल बजाज फाउंडेशन द्वारा पूरे भारत में सराहनीय कार्य करने वाली महिलाओं को दिया जाता है। यहाँ ऐसी कुछ महिलाओं के नाम दिए जा रहे है-
श्रीमती अनुताई लिमये 1993 महाराष्ट्र; सरस्वती गोरा 1996 आंध्र प्रदेश;
मीना अग्रवाल 1996 असम, सिस्टर मैथिली 1999 केरल; कुंतला कुमारी आचार्य 2001 उड़ीसा।
इनमें से किसी एक के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कीजिए।

उत्तर : दी गई महिलाओं की सूची में एक महिला श्रीमती सरस्वती गोरा के विषय में जानकारी इस प्रकार है…

श्रीमती सरस्वती गोरा: एक समाजसेविका का प्रेरणादायक जीवन

श्रीमती सरस्वती गोरा, जिन्हें 1996 में आंध्र प्रदेश से जानकी देवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, एक प्रभावशाली समाजसेविका थीं। उन्होंने अपने जीवन को समाज सुधार और सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनके कार्य और योगदान ने न केवल आंध्र प्रदेश बल्कि पूरे भारत में समाज सुधार के विभिन्न क्षेत्रों में एक नई दिशा दी।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

सरस्वती गोरा का जन्म 28 सितंबर 1912 को आंध्र प्रदेश में हुआ था। उनकी शिक्षा और परवरिश एक ऐसे वातावरण में हुई जहाँ उन्हें सामाजिक न्याय और समानता के मूल्य सिखाए गए। उनके पति गोपाल गोरा भी एक प्रसिद्ध समाजसेवक थे, जिन्होंने उन्हें समाज सेवा के क्षेत्र में प्रेरित किया।

समाज सेवा और योगदान

सरस्वती गोरा ने अपने पति के साथ मिलकर “आंध्र महिला सभा” की स्थापना की, जो महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों के लिए काम करती थी। उन्होंने महिलाओं के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन के विभिन्न कार्यक्रम चलाए। इसके अलावा, उन्होंने जाति भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ भी संघर्ष किया।

स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका

सरस्वती गोरा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने महात्मा गांधी के आदर्शों का पालन करते हुए असहयोग आंदोलन और अन्य राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित किया और उन्हें प्रेरित किया।

पुरस्कार और सम्मान

1996 में उन्हें जानकी देवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके समाज सुधार के कार्यों और योगदान के लिए था। यह पुरस्कार जमनालाल बजाज फाउंडेशन द्वारा समाज सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को दिया जाता है।

उनके कार्यों की महत्ता

सरस्वती गोरा का जीवन और उनके कार्य समाज सेवा के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए अनथक प्रयास किए और अपने कार्यों से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाए। उनका जीवन एक सच्ची समाजसेविका का उदाहरण है, जिन्होंने अपने कार्यों से समाज को एक नई दिशा दी।

सरस्वती गोरा का योगदान आज भी समाज सेवा के क्षेत्र में प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है, और उनकी यादें उनके द्वारा किए गए महान कार्यों के रूप में जीवित हैं।

परियोजना कार्य

प्रश्न 1 : स्वतंत्रता आंदोलन में निम्नलिखित महिलाओं में जो योगदान दिया, उसके बारे में संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करके लिखिए-
(क) सरोजिनी नायडू
(ख) अरुणा आसफ अली
(ग) कस्तूरबा गांधी

उत्तर : तीनों महिलाओं के विषय में संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है…

सरोजिनी नायडू

सरोजिनी नायडू, जिसे “भारत कोकिला” के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रमुख नेता थीं। उन्होंने महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित किया और गांधीजी के सत्याग्रह में सक्रिय भूमिका निभाई। 1925 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं, और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अरुणा आसफ अली

अरुणा आसफ अली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक प्रमुख नेता थीं। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर विद्रोह का नेतृत्व किया। वे एक प्रमुख क्रांतिकारी थीं और बाद में दिल्ली की पहली मेयर भी बनीं। उन्होंने कई जेल यातनाओं को सहन किया लेकिन अपने संकल्प में अडिग रहीं।

कस्तूरबा गांधी

कस्तूरबा गांधी, महात्मा गांधी की पत्नी, स्वतंत्रता संग्राम में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलीं। उन्होंने सत्याग्रह और नमक आंदोलन में भाग लिया और कई बार जेल गईं। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और स्वच्छता पर जोर दिया और अपने जीवन में गांधीजी के सिद्धांतों को अपनाकर समाज सेवा की।

प्रश्न 2 : इस पाठ के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में कलकत्ता (कोलकाता ) के योगदान का चित्र स्पष्ट होता है। आजादी के आंदोलन में आपके क्षेत्र का भी किसी न किसी प्रकार का योगदान रहा होगा पुस्तकालय, अपने परिचितों या फिर किसी दूसरे स्त्रोत से इस संबंध में जानकारी हासिल कर लिखिए।

उत्तर : विद्यार्थी इस विषय में अपने क्षेत्र की जानकारी लिखे। वे जिस क्षेत्र, जिस जिले, शहर या गाँव में रहते है उसके बारे में अपने माता-पिता, परिचित और स्थानीय लोगों से पूछें। स्थानीय इतिहास से संबंधित पुस्तकें पढ़ें और अपने क्षेत्र की जानकारी लिखें।

 
प्रश्न 3 : ‘केवल प्रचार में दो हजार रुपया खर्च किया गया था। तत्कालीन समय को मद्देनज़र रखते हुए अनुमान लगाइए कि प्रचार-प्रसार के लिए किन माध्यमों का उपयोग किया गया होगा?

उत्तर : उस समय न तो टीवी था और न ही इंटरनेट। प्रचार माध्यम के रूप में अखबार, इश्तेहार या कुछ हद तक रेडियो हुआ करता था। आंदोलन के प्रचार के लिए झंडे बनवाने, इश्तेहार छपवाने में अधिकतर पैसे गए होंगे। दीवारों आदि पर जो नारे लिखे गए होंगे वो कार्यकर्ताओं ने सेवा भावना  के रूप में लिखे होंगे। बाकी खर्चा आवागमन मे खर्चा हुआ होगा।

प्रश्न 4 : आपको अपने विद्यालय में लगने वाले पल्स पोलियो केंद्र की सूचना पूरे मोहल्ले को देनी है। आप इस बात का प्रचार बिना पैसे के कैसे कर पाएँगे? उदाहरण के साथ लिखिए।

उत्तर : पल्स पोलियो केंद्र की सूचना पूरे मोहल्ले में बिना पैसे के निम्नलिखित तरीकों से प्रचारित कर सकते हैं:

व्यक्तिगत संपर्क के द्वारा अपने दोस्तों, पड़ोसियों, और सहकर्मियों से मिलकर जानकारी दी जा सकती है।

सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स जैसे व्हाट्सएप और फेसबुक पर संदेश और पोस्ट साझा करके जानकारी दी जा सकती है।

जैसे

प्रिय दोस्तों,
रविवार, 10 जुलाई को हमारे विद्यालय में पल्स पोलियो केंद्र सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक खुलेगा। कृपया 0-5 वर्ष के बच्चों को पोलियो की खुराक दिलवाएं। धन्यवाद।

मोहल्ले में लोगों के घर-घर जाकर उनको इस बारे जागरूक किया जा सकता है।


डायरी का एक पन्ना, लेखक – सीताराम सेकसरिया (कक्षा-10, पाठ-9 हिंदी, स्पर्श भाग 2) (NCERT Solutions)


कक्षा-10 हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ

साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पद : मीरा (कक्षा-10 पाठ-2 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तोप : वीरेन डंगवाल (कक्षा-10 पाठ-5 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

कर चले हम फिदा : कैफ़ी आज़मी (कक्षा-10 पाठ-6 हिंदी स्पर्श भाग-2) (हल प्रश्नोत्तर)

आत्मत्राण : रवींद्रनाथ ठाकुर (कक्षा-10 पाठ-7 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

बड़े भाई साहब : प्रेमचंद (कक्षा-10 पाठ-8 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

कर्म की प्रधानता पर कहानी लिखिए​।

कहानी

कर्म की प्रधानता

एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में राजाराम नाम का एक मेहनती किसान रहता था। राजाराम बहुत गरीब था, लेकिन वह अपने परिश्रम से कभी हार नहीं मानता था। वह रोज सुबह जल्दी उठकर खेतों में काम करता और देर शाम तक मेहनत करता रहता।

गाँव में एक और व्यक्ति था, किसनलाल, जो राजाराम का पड़ोसी था। किसनलाल एक आलसी और कायर व्यक्ति था, जो हमेशा भाग्य और किस्मत के भरोसे रहता था। वह हमेशा कहता था कि उसकी किस्मत खराब है, इसलिए वह कभी सफल नहीं हो पाता।

एक दिन गाँव में एक साधू बाबा आए। गाँव वाले साधू बाबा के पास अपनी समस्याओं का समाधान पूछने गए। राजाराम और किसनलाल भी साधू बाबा के पास गए। राजाराम ने अपनी मेहनत की बात बताई और कहा कि वह और भी मेहनत करना चाहता है ताकि वह अपनी गरीबी से बाहर निकल सके। वहीं, किसनलाल ने अपनी किस्मत की दुहाई दी और कहा कि उसकी किस्मत खराब है इसलिए वह कुछ भी नहीं कर पाता।

साधू बाबा ने दोनों की बातें सुनीं और फिर मुस्कराते हुए कहा, “अच्छा, मुझे तुम्हारे खेत दिखाओ।” राजाराम और किसनलाल दोनों अपने-अपने खेत लेकर गए। साधू बाबा ने राजाराम के खेत में हरी-भरी फसल देखी और किसनलाल के खेत में जंगली घास उगी हुई देखी।

साधू बाबा ने कहा, “राजाराम, तुम्हारे खेत में हरी-भरी फसल इसलिए है क्योंकि तुम मेहनत करते हो और अपने खेत का ख्याल रखते हो। वहीं, किसनलाल, तुम्हारे खेत में जंगली घास इसलिए है क्योंकि तुम मेहनत नहीं करते और अपने खेत का ख्याल नहीं रखते। किस्मत नहीं, बल्कि मेहनत और कर्म ही जीवन में सफलता दिलाते हैं।”

राजाराम की मेहनत की प्रशंसा करते हुए साधू बाबा ने कहा, “कर्म ही प्रधान है। यदि तुम मेहनत करोगे, तो तुम्हारी किस्मत भी तुम्हारा साथ देगी।” किसनलाल ने यह सुनकर अपनी गलती मानी और राजाराम से प्रेरणा लेकर उसने भी मेहनत करनी शुरू कर दी।

कुछ महीनों बाद, किसनलाल का खेत भी हरी-भरी फसलों से लहलहा उठा। उसने समझ लिया कि किस्मत का खेल केवल मेहनत और कर्म पर निर्भर करता है। इस तरह, गाँव में कर्म की प्रधानता की एक अनमोल शिक्षा फैल गई और सभी गाँव वाले मेहनत करने लगे, जिससे गाँव समृद्ध और खुशहाल बन गया।


Other questions

‘काश मैंने समय का महत्व समझा होता तो आज मैं भी सफल होता।’ वाक्य को आधार बनाकर कोई घटना या कहानी लिखिए।

सफलता और परिश्रम के विषय पर एक छोटी-सी कहानी लिखिए।

भक्तिकालीन काव्य की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं? सोदाहरण समझाइये ।

भक्तिकालीन काव्य हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण काल है जिसमें भक्ति और श्रद्धा के भाव प्रमुख रूप से व्यक्त किए गए हैं। भक्तिकालीन काव्य की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं…

1. भक्ति भावना : इस काल के काव्य में ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और श्रद्धा का भाव व्यक्त किया गया है। कवियों ने अपने आराध्य देव की स्तुति की है और भक्ति के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के मिलन की कामना की है।

उदाहरण के लिए, सूरदास ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया है:

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो।
मथुरा के मंगवाय मिठाई, माखन अरु मिश्री मुझको न भायो।।

2. सगुण और निर्गुण भक्ति : भक्तिकालीन काव्य को दो भागों में बाँटा जा सकता है –

सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति।

सगुण भक्ति में ईश्वर को मूर्ति, रूप, लीलाओं के माध्यम से व्यक्त किया गया है, जैसे तुलसीदास की रामचरितमानस।

निर्गुण भक्ति में निराकार ईश्वर की उपासना की गई है, कबीर, रैदास आदि कवि।

उदाहरण के लिए कबीर का एक दोहा…

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोंदूंगी तोहे।।

3. साधना और आत्मानुभूति : भक्तिकालीन कवियों ने अपने काव्य में साधना और आत्मानुभूति का वर्णन किया है। वे आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति के लिए भक्ति मार्ग को सर्वोत्तम मानते थे।

उदाहरण के लिए, मीराबाई के पद से उनके आराध्य श्रीकृष्ण के प्रति अगाध भक्ति का प्रकटीकरण होता है…

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो।।

4. सरल भाषा और शैली : इस काल के कवियों ने अपनी रचनाओं में सरल, सहज और भावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने जन-जन तक अपने विचारों को पहुंचाने के लिए अवधी, ब्रजभाषा, राजस्थानी जैसी लोक भाषाओं का उपयोग किया।

उदाहरण के लिए, तुलसीदास की चौपाई से समझते हैं..

श्रीरामचरितमानस पवित्र गंगा, तुलसीदास के काव्य की बानी।
जो जन पढ़े अथवा सुन आवे, हर हर हर हर पाप हरामी।।

5. मानवता और सामाजिक समरसता : भक्तिकालीन काव्य में सामाजिक समरसता, समानता और मानवता के विचार भी व्यक्त किए गए हैं। कबीर, रैदास, और अन्य संत कवियों ने जाति-पाति, धर्म-भेद आदि को नकारते हुए मानवता की महत्ता को स्वीकार किया।

उदाहरण के लिए…

अवल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे।
एक नूर से सब जग उपज्या, कौन भले कौन मंदे।।

6. गुरु महिमा : इस काल के कवियों ने गुरु की महिमा का भी गान किया है। गुरु को ज्ञान का स्रोत और आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाला मार्गदर्शक माना गया है।

उदाहरण के लिए कबीरदास के इस दोहे में गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।

भक्तिकालीन काव्य की इन विशेषताओं से यह स्पष्ट होता है कि यह काल भक्ति, साधना, और ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा के भाव से ओत-प्रोत था।


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राम के सुनते ही तुलसी की बिगड़ी बात बन जाएगी। तुलसी के इस भरोसे का कारण क्या है?

ठगनी क्यूँ नैना झमकावै, तेरे हाथ कबीर न आवै।। “इस पंक्ति में ‘ठगनी’ किसे कहा गया है?

कबीर, गुरुनानक और मीराबाई इक्कीसवीं शताब्दी में प्रासंगिक है कैसे?

कबीर अपना चरखा चलाते हुए भजन क्यों गाते रहते थे?

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कबीर अपना चरखा चलाते हुए भजन इसलिए गाते रहते थे क्योंकि वह कर्म और ईश्वर चिंतन दोनों कार्यों को साथ करने में यकीन रखते थे। कबीर ईश्वर की भक्ति को महत्व देते थे और ईश्वर के निराकार रूप को मानते थे। लेकिन वह केवल ईश्वर चिंतन में ही अपना समय व्यतीत नहीं करते थे वह कर्म को भी उतना ही महत्व देते थे।

उनके जीवन में ज्ञान और कर्म दोनों का समान महत्व था। वह कर्म करने के लिए कोई उद्यम करते रहते थे और निरंतर चरखा चलाते रहते थे और ईश्वर के भजन भी गाते रहते थे। वह कर्म साधना करने के साथ-साथ ईश्वर की ध्यान साधना भी करते रहते थे। वे समय का सदुपयोग करते थे। उनके अनुसार ईश्वर को याद करने का कोई विशिष्ट समय नहीं होता बल्कि जब चाहों और हर समय ईश्वर को याद किया जा सकता है।


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साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

कबीर सुमिरन सार है, और सकल जंजाल। आदि अंत सब सोधिया, दूजा देखौं काल।। अर्थ बताएं?

‘नए घर में प्रवेश’ इस विषय पर एक अनुच्छेद लिखें।

अनुच्छेद

नए घर में प्रवेश


अमित की प्रतिक्रिया उसका क्या स्वभाव बताती है। (क्लास 11, पाठ – रजनी​।)

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अमित की प्रतिक्रिया उसके आत्मविश्वास ही स्वभाव को दर्शाती है। अमित को पता था कि उसने अपना पेपर ठीक किया है, लेकिन आशा के अनुरूप उसे नंबर ना मिलने पर वह दुखी व उदास मन से घर आता है। वह अपनी माँ से गुस्से में कहता है कि उसने पहले ही कहा था कि उसकी ट्यूशन लगवा दो। बिना ट्यूशन के उसे कम नंबर मिलेंगे। उसे मालूम था कि उसने पर्चा अच्छा किया है लेकिन फिर भी उसकी कक्षा के गणित के अध्यापक उसे ट्यूशन की जबरदस्ती करते थे और ट्यूशन ना लेने पर नंबर कम आने की धमकी देते थे और ऐसा ही हुआ भी । इसीलिए उसने ऐसी प्रतिक्रिया दी। यह उसके आत्मविश्वास और विरोध दोनों की मिली जुली प्रतिक्रिया थी।

‘रजनी’ पाठ में अमित रजनी की सहेली लीला का बेटा था। अमित मेधावी छात्र था। जब अमित के परीक्षा में गणित विषय में कम आए तो रजनी ने उसके विद्यालय में जाकर प्रधानाचार्य से इसका विरोध प्रकट किया और उसकी उत्तर पुस्तिका देखने की मांग की। प्रधानाचार्य उत्तर पुस्तिका दिखाने से मना कर दिया। रजनी ट्यूशन प्रथा के विरोध में आवाज उठाती है और वह इसके लिए प्रेस की भी सहायता लेती है। अंत में स्कूल का बोर्ड उसकी मांग के आगे झुक जाता है और अध्यापकों द्वारा छात्रों पर जबरदस्ती ट्यूशन लगाने के खिलाफ सख्त नियम बना देता है।


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अपने मोहल्ले से आवागमन की सुविधा नहीं है इसके लिए हरियाणा रोडवेज को पत्र लिखो।

औपचारिक पत्र

हरियाणा रोडवेज महाप्रबंधक को पत्र

दिनांक – 2 जुलाई 2024सेवा में,
श्रीमान महाप्रबंधक,
हरियाणा परिवहन निगम,
चंडीगढ़ ।

विषय- बस सुविधा उपलब्ध करवाने बाबत ।

महोदय, निवेदन है कि हम भरोली क्षेत्र, हरियाणा के निवासी है । हम अपने क्षेत्र की परिवहन निगम की बस-सेवा के अभाव में परेशान हैं । हमें रोज बस अड्डे तक जाने के लिए अपने वाहन या रिक्शा आदि का सहारा लेना पड़ता है । यहाँ से सैकड़ो कर्मचारी दैनिक बस-अड्डे तथा रेलवे स्टेशन तक जाते है। आपसे निवेदन है कि हमारे क्षेत्र तक भी एक बस-सेवा आरंभ करें। इससे आम आदमी को काफी सुविधा होगी। हमारे क्षेत्र में बस सुविधा उपलब्ध नहीं है। जिस स्थान से हमें बस लेनी पड़ती है, वह बहुत ही दूर है। हम कई बार इस विषय पर पत्र लिखकर अपनी परेशानी बयान कर चुके हैं, परंतु अब तक इस दिशा में कोई कार्य नहीं हुआ है।

अतः आपसे निवेदन है कि शीघ्र ही हमारे क्षेत्र से बस सुविधा आरंभ की जाए। हम सभी क्षेत्र के निवासी सदा आपके आभारी रहेगें।सधन्यवाद !
प्रार्थी,
कृष्णा,
भरोली, हरियाणा ।

 

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अपने विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस मनाने हेतु विद्यालय के प्रधानाचार्य को पत्र लिखें।

महादेव भाई हँसी मजाक में अपने को क्या कहते थे? (क) गाँधी जी का गधा (ग) गाँधी जी का घोड़ा (ख) गाँधी जी का हम्माल (घ) इनमें से कोई नही​।

सही विकल्प है :
(ख) गाँधी जी का हम्माल

विस्तृत विवरण

महादेव भाई मजाक-मजाक में अपने को गांधीजी का हम्माल कह देते थे। उन्हें गाँधीजी का हम्माल कहने में कोई संकोच नहीं होता था कभी-कभी वह अपना परिचय उनके पीर-बावर्ची, भिश्ती, खर के रूप में भी दे दिया करते थे। इस तरह के परिचय देकर गाँधी जी के साथ अपना संबंध जोड़ने में गौरव का अनुभव किया करते थे। भाई महादेव देसाई गाँधीजी के निची सचिव थे और वह गाँधीजी का कार्य व्यवस्थापन करते थे। वह सेवा धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति थे और गाँधीजी के कट्टर अनुयाई थे।


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किस विकल्प में दोनों शब्द तत्सम शब्द हैं? (a) सूरज, अग्नि (b) भानु, आसमान (c) आकाश, सितारा (d) दिनकर, सूर्य.

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भ्रष्टाचार मुक्त भारत विकसित भारत (निबंध)

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निबंध

भ्रष्टाचार मुक्त भारत विकसित भारत

 

प्रस्तावना

मानव की परख करने के लिए उसके आचरण और व्यवहार को अधिक महत्व दिया गया है। मानवता की पहचान के लिए जिन गुणों का होना आवश्यक है, उनमें कर्तव्य-परायणता, सहानुभूति, सत्य-प्रियता एवं परोपकार आदि प्रमुख है। इन्हीं गुणों से युक्त व्यक्ति सदाचारी कहलाता है। इसके प्रतिकूल आचरण करने वाले व्यक्ति को भ्रष्टाचारी की संज्ञा दी गई है। इस प्रकार व्यक्ति का जो कार्य आचरण के विरूद्ध होगा या फिर आचरण के अनुचित होगा हम उसे हम भ्रष्टाचार कहेंगे । भ्रष्टाचार की समस्या आज की ज्वलंत समस्या है ।

भ्रष्टाचार का दानव मनुष्य को अपने पंजे में दबोच रहा है और उसका गला घोंट रहा है । भ्रष्टाचार से अभिप्राय है रिश्वत व बेईमानी । इसके मूल में धन इकट्ठा करने की लिप्सा रहती है । किसी भी व्यक्ति की योग्यता, अनुभव आदि को ताक पर रखकर दूसरे अयोग्य व्यक्ति को किसी पद पर नियुक्त करना भी भ्रष्टाचार के अन्तर्गत ही आता है। वस्तुओं में मिलावट करना, जनता की विवशताओं का अनुचित लाभ उठाकर आवश्यक वस्तुओं को गोदाम में भर लेना भी भ्रष्टाचार है। क्या आपने कभी सोचा है कि भ्रष्टाचार का क्या कारण है।

वैसे तो भ्रष्टाचार के बहुत से कारण है लेकिन इनमें सबसे प्रमुख है…

सामाजिक कारण

भ्रष्टाचार बढ़ने का मुख्य कारण देश की सामाजिक नैतिकता । इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में सामाजिक नैतिकता का स्तर बहुत गिरा हुआ है। भारतीय समाज और प्रशासन में अनेक अत्याचार होते रहते हैं, परंतु उनके विरुद्ध आवाज उठाने वाले बहुत कम हैं। इसके विपरीत, नाजायज तरीके से भी पैसे कमाने वाले को काफी सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। एक ईमानदार शिक्षक को समाज में उतनी प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त होती जितनी एक घूसखोर सरकारी कर्मचारी को। हमारे समाज ही ऐसी है जहाँ भ्रष्टाचार का विकसित होना स्वाभाविक है। एक ओर अधिकारी वर्ग घूस लेने में नहीं हिचकिचाते और तो और दूसरी ओर आम नागरिक भी कर से बचना पसंद करते हैं।

भारत देश एक बहुत बड़ा देश है और आबादी भी बहुत ज्यादा है । इसका कार्यतंत्र बहुत ही विशाल है । इसलिए, यहाँ भ्रष्टाचार बहुत अधिक अंदर तक फैला हुआ है । भ्रष्टाचार मुक्त भारत को देखना शायद आज भारत के हर नागरिक का एक सपना है।

भ्रष्टाचार किसी भी देश के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है और भ्रष्टाचार का कीड़ा आज भारत के बड़े नेता से लेकर आम आदमी तक फैल चुका है। आज हम सभी देखते है कि आम आदमी भी पैसे देकर अपने काम को जल्दी से जल्दी करवाना चाहता है। आज आप चंद पैसों में किसी कानून व नियम को दबा सकते है और नियमों के रास्ते उसी काम को करने में आपको महीनों या वर्षों भी लग सकते है ।

आर्थिक कारण

जिस देश की आर्थिक स्थिति दयनीय होगी, वहाँ का प्रशासन भी भ्रष्ट होगा । वास्तव में, आर्थिक व्यवस्था प्रशासन को अपने रूप में ढाल लेती है । यह निर्विवाद है कि जो देश गरीब रहेगा वह प्रशासकीय कर्मचारियों को उतना वेतन नहीं दे सकता जिससे वे सारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें।

यद्यपि उन्हें अपने वेतन के अनुसार ही अपनी आवश्यकताएँ बनाकर रखनी चाहिए। वे भी आराम पूर्ण जीवन व्यतीत करना पसंद करते हैं । फिर, जब आसानी से उन्हें नाजायज तरीके से पैसे की प्राप्ति हो सकती है तो फिर दुःख भरा जीवन क्यों व्यतीत करें ? यह मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति कर्मचारियों को भ्रष्ट करने में काफी सहायक सिद्ध हुई है। यह बात भी सही है कि प्रशासन में ऐसे लोगों की ही संख्या अधिक है जो अपने वेतन से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकते अतः वे घूस लेने के लिए बाध्य हो जाते हैं ।

राजनीतिक कारण

भ्रष्टाचार का मुख्य कारण हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था है। राजनीतिक दलों के कारण भी भ्रष्टाचार फैलता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता भारत में भी भ्रष्टाचार फैलाने में राजनीतिक दल बहुत अधिक सहायक रहे हैं। राजनीतिक नेताओं और बड़े व्यवसायियों के बीच की इस संधि ने एक ऐसे वातावरण को जन्म दिया है, जिसमें एक बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार के लिए राजनीतिक क्षेत्र पर आक्रमण करना संभव हो गया है।

भारत में प्रशासन की बागडोर बड़े-बड़े राजनीतिक नेताओं के हाथों में है, जिन्होंने भारत में स्वतंत्रता–संग्राम में बहुत त्याग किया था, तथा वे इस बात का दावा करते हैं कि वे आराम और विलासिता पूर्ण जीवन के अधिकारी हैं और देश के विकास का भार अब नई पीढ़ी के छोटे लोगों को वहन करना है।

अशिक्षित नेतृत्व ने भी भ्रष्टाचार को विकसित करने में काफी सहायता पहुँचाई है। अपने अज्ञान के ही कारण मंत्रियों को प्रशासकों पर काफी निर्भर रहना पड़ता है जो उनकी कमजोरी से लाभ उठाते हैं। वह उन्हें भ्रष्ट बनने से नहीं रोकते, भ्रष्टाचार का सबसे गंभीर कारण यह है कि राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति और राष्ट्रीय संपत्ति को नियंत्रित करने वालों में घनिष्ठ संबंध पाया जाता है।

भ्रष्टाचार से मुक्त भारत ही विकसित हो सकता है।

हम सभी को अपने भारतीय होने पर गर्व है और मैं आशा करती हूँ कि आप सभी भी मेरी तरह भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त होते हुए देखना चाहते होंगे । यह कार्य काफी मुश्किल है। लेकिन, यह सोचकर हम भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना या सपना तो नहीं छोड़ सकते है । हमें इसके लिए लगातार सही दिशा में कार्य करने होंगे ।

भ्रष्टाचार की समस्या का हल केवल कानूनी तौर पर ही नहीं किया जा सकता। इसके निवारण के लिए जन संचार माध्यमों का विशेष योगदान हो सकता है । हमें समाचार–पत्रों, दूरदर्शन, एवं आकाशवाणी प्रसारणों द्वारा भ्रष्टाचार के विरूद्ध जंग छेड़ देनी चाहिए । सबसे पहले तो ऐसी समितियाँ बनाई जानी चाहिए जो स्वयं कर्तव्य–परायण, ईमानदार, न्याय प्रियता में विश्वास रखती हो । इसके अतिरिक्त सामान्य विषमताओं को दूर करके सभी को समान सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए । आम जनता के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए।

गाँधी जी के अनुसार यदि आप विश्व में परिवर्तन देखना चाहते है तो इसकी शुरुआत स्वयं से करनी होगी । यह एक ऐसी समस्या है जो कि देश को खोखला बना रही है । देश को बचाने के लिए समय रहते ही हम सभी को साथ मिलकर भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास करना चाहिए। जिस से हमारा देश भ्रष्टाचार मुक्त भारत बन सकेगा हमें हमारे देश के कानूनों को और अधिक कठोर करना होगा। भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए सभी संभव कार्यों को ऑनलाइन के माध्यम से किया जाए । इस पूरे तंत्र की सबसे छोटी और सबसे जरूरी कड़ी आम आदमी है।

आम आदमी अगर अपने आचरण में सुधार कर ले, तो आधी समस्या तो खुद ही सुलझ जाएगी। इसके साथ-साथ हमें बच्चों में सबसे पहले निष्ठा व देश-प्रेम की भावना को जगानी होगी। जिससे जब वह इस तंत्र में काम करें, तब वे भ्रष्टाचार के कार्यों से बच सके ।


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‘हमारे राष्ट्रीय पर्व’ पर निबंध लिखो।

ग्रीष्म अवकाश पर निबंध लिखें।

दिए गए वाक्यों में से विशेषण चुनकर उनके भेदों के नाम लिखिए- क) बाहर कुछ लोग खड़े हैं। ख) पाँच मीटर कपड़ा लाओ। ग) कुछ पक्षी पेड़ पर बैठे हैं। घ) वह किताब मेरी है। ङ) थोड़ी चीनी नीचे गिर गई।

विशेषण के नाम और भेद

क) बाहर कुछ लोग खड़े हैं।
विशेषण : कुछ
विशेष्य : लोग
विशेषण का भेद : परिमाणवाचक विशेषण
विशेषण का उपभेद : अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण

ख) पाँच मीटर कपड़ा लाओ।
विशेषण : पाँच मीटर
विशेष्य : कपड़ा
विशेषण का भेद : परिमाणवाचक विशेषण
विशेषण का उपभेद : निश्चित परिमाणवाचक विशेषण

ग) कुछ पक्षी पेड़ पर बैठे हैं।
विशेषण : कुछ
विशेष्य : पक्षी
विशेषण का भेद : संख्यावाचक विशेषण
विशेषण का उपभेद : अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण

घ) वह किताब मेरी है।
विशेषण : सार्वनमिक विशेषण
विशेष्य : किताब
विशेषण का भेद : संख्यावाचक विशेषण
विशेषण का उपभेद : अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण

ङ) थोड़ी चीनी नीचे गिर गई।
विशेषण : थोड़ी
विशेष्य : चीनी
विशेषण का भेद : परिमाणवाचक विशेषण
विशेषण का उपभेद : अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण


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“आज हमारे घर गाजर का स्वादिष्ट” हलवा बन रहा है।- रेखांकित अंश का पदबंध बताइए- A-संज्ञा पदबंध B-विशेषण पदबंध C-सर्वनाम पदबंध D-क्रिया विशेषण पदबंध

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‘भारत देश सीता-सावित्री का देश है।’ इस वाक्य में ‘सीता-सावित्री’ शब्द बोध कराते हैं- 1. व्यक्तिवाचक संज्ञा का 2. समूहवाचक संज्ञा का 3. जातिवाचक संज्ञा का 4. भाववाचक संज्ञा का

उचित विकल्प है :

3. जातिवाचक संज्ञा

स्पष्टीकरण :

‘भारत देश सीता सावित्री का देश है।’ इस वाक्य में सीता-सावित्री शब्द जातिवाचक संज्ञा का बोध कराते हैं। यहाँ पर सीता और सावित्री इन दो शब्दों को अलग-अलग प्रयोग किया जाए तो यह शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा होंगे क्योंकि यह किसी व्यक्ति विशेष का नाम है। लेकिन यहाँ पर सीता-सावित्री शब्द व्यक्ति के संदर्भ में नहीं प्रयुक्त किया गया है। बल्कि स्त्रियों की ऐसी जाति के संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है, जो सीता-सावित्री जैसी हैं।

सीता-सावित्री मनुष्य की ऐसी जाति के रूप में प्रयुक्त किया गया है, जिसका आचरण सीता-सावित्री जैसा होता है। इसी कारण ‘भारत देश सीता सावित्री का देश है।’ इस वाक्य में जातिवाचक संज्ञा होगी।

जातिवाचक संज्ञा के माध्यम से एक संपूर्ण जाति का बोध कराया जाता है। यहाँ पर सीता-सावित्री के माध्यम से किसी व्यक्ति विशेष का नहीं पूरी बल्कि पूरी जाति का बोध हो रहा है। इसलिए यह जातिवाचक संज्ञा है। सीता सावित्री उस नारी के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाता है, जिसका आचरण शुद्ध हो, पवित्र हो। यहाँ पर सीता-सावित्री को उन सभी नारियों की जाति के संदर्भ में प्रयोग किया गया है, जिनका आचरण शुद्ध एवं पवित्र होता है। इसीलिए यह जातिवाचक संज्ञा होगी।


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निम्नलिखित वाक्यों से संज्ञा छाँटिए और उसके भेद लिखिए- वाक्य 1. अध्यापिका पढ़ाती हैं। 2. सच्चाई एक अच्छा गुण है। 3. हिमालय विशाल पर्वत है। 4. हीरा बहुमूल्य रत्न है। 5. भारतीय सेना बेहद कुशल सेना है। 6. जल ही जीवन है।

‘वे सुंदर मकानों में रहते हैं।’ इस वाक्य को ‘अपूर्ण वर्तमानकाल’ में बदले।

बेहतर भविष्य के लिए सिर्फ व्यवहारिक विषयों (गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र) की पढ़ाई होनी चाहिए। इस पर विचार लिखें।

विचार लेखन

बेहतर भविष्य के लिए सिर्फ व्यवहारिक विषयों जैसे गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र की पढ़ाई होनी चाहिए

बेहतर भविष्य के लिए सिर्फ व्यवहारिक विषयों जैसे गणित, विज्ञान, अर्थशास्त्र की पढ़ाई होनी चाहिए। इस विचार से हम पूरी तरह सहमत नहीं है, व्यवहारिक विषयों की पढ़ाई बेहद आवश्यक है और उनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन एक अच्छे नागरिक बनने के लिए सामाजिक और नैतिक विषयों की पढ़ाई भी आवश्यक है। किसी भी देश के एक अच्छे नागरिक के लिए उसमें संस्कार और नैतिकता होनी भी आवश्यक है ताकि वह अपने जिम्मेदारियों को समझ सके। पढ़ाई रोजगार उपयोगी होनी चाहिए, ये सही बात है, लेकिन एक निश्चित समय तक सामाजिक शिक्षा भी आवश्यक है ताकि छात्र के अंदर एक आदर्श नागरिक के गुण विकसित हो सकें।

सामाजिकता और व्यवहारिकता दोनों का समन्वय नागरिक के निर्माण में सही सही संयोजन होता है। हमारे विचार के अनुसार व्यवहारिक विषयों के साथा सामाजिक विषयों की पढ़ाई आवश्यक है। एक निश्चित समय तक साामाजिक और व्यवहारिक विषयों का संयुक्त पढ़ाई आवश्यक है। कम से कम 10वी कक्षा तक मिश्रित शिक्षा होनी चाहिए। 10वीं कक्षा के बाद व्यवहारिक शिक्षा के विषयों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है।


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भाषा भिन्नता का आदर करना चाहिए। अपने विचार लिखिए।

किसी भी देश के विकास के लिए उसके नागरिक को स्वस्थ रहना आवश्यक है। जीवन में स्वस्थ रहने का क्या महत्व है? आप अपने स्वास्थ्य के लिए क्या-क्या उपाय करते हैं? अपने विचारों को प्रस्तुत के रूप में लिखिए।

आउटडोर खेलों का महत्व समझाते हुए माँ-बेटे के बीच संवाद लिखिए।

संवाद लेखन

आउटडोर खेल के महत्व को लेकर माँ-बेटे की बीच संवाद

 

माँ ⦂ बेटा, तुम फिर से टीवी के सामने बैठे हो? बाहर जाकर खेलते क्यों नहीं हो?

बेटा ⦂ माँ, बाहर धूप बहुत है आप मुझे टीवी देखने दो।

माँ ⦂ तुम समझते क्यों नहीं, हर समय या तो टीवी के आगे बैठे रहोगे या कम्प्यूटर-मोबाइल से चिपके रहोगे। तुम कोई भी आउटडोर खेल खेलने क्यों नहीं जाते?

बेटा ⦂ माँ खेल-खेल होता है आउटडोर हो या इंडोर।

माँ ⦂ नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं। तुम जो घर पर बिस्तर पर बैठे या कुर्सी पर बैठे मोबाइल, कम्प्यूटर आदि पर जो गेम खेलते रहते हो उनसे तुम्हारे शरीर को कोई फायदा नहीं होता। जबकि तुम यदि बाहर जाकर खेल खेलोगे तो तुम्हारे शरीर को बहुत लाभ होगा।

बेटा ⦂ (आश्चर्य से) सच माँ? बाहर खेलने से क्या फायदे होते हैं?

माँ ⦂ हाँ, बिल्कुल। बाहर खेलने से तुम्हारा शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है। दौड़ने, कूदने, और खेलने से शरीर की सभी मांसपेशियां मजबूत होती हैं और तुम तंदुरुस्त रहते हो।

बेटा ⦂ अच्छा, और क्या?

माँ ⦂ इसके अलावा, जब तुम बाहर दोस्तों के साथ खेलते हो, तो तुम नई-नई चीजें सीखते हो, जैसे टीम वर्क, एक-दूसरे की मदद करना, और खेल के नियमों का पालन करना। यह सब चीजें तुम्हारे सामाजिक कौशल को बेहतर बनाती हैं।

बेटा ⦂ यह तो बहुत अच्छा है, माँ। और क्या?

माँ ⦂ बाहरी खेल खेलने से तुम्हारी मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होती है। ताजी हवा में खेलने से तुम्हारा दिमाग शांत होता है और तनाव कम होता है। इससे तुम्हारी एकाग्रता भी बढ़ती है, जो पढ़ाई में भी मदद करती है।

बेटा ⦂ तो माँ, कौन-कौन से खेल खेल सकता हूँ मैं?

माँ ⦂ बहुत सारे खेल हैं, बेटा। तुम क्रिकेट, फुटबॉल, बास्केटबॉल, बैडमिंटन जैसे खेल खेल सकते हो। ये सभी खेल तुम्हारे शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बहुत अच्छे हैं।

बेटा ⦂ (उत्साहित होकर) माँ, अब मुझे समझ में आ गया। मैं अभी जाकर अपने दोस्तों के साथ खेलने जाता हूँ।

माँ ⦂ यह हुई ना बात, बेटा! जाओ और खूब खेलो। और हाँ, खेलते वक्त ध्यान रखना कि कोई चोट न लगे।

बेटा ⦂ ठीक है माँ, मैं ध्यान रखूँगा। धन्यवाद, माँ!

माँ ⦂ (मुस्कराते हुए) खुश रहो, बेटा। खेलो और स्वस्थ रहो।


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दिल्ली की गर्मी से राहत पाने के लिए किसी हिल स्टेशन जैसे शिमला, मनाली, कश्मीर आदि घूमने के बारे में माता-पिता और बेटी के बीच हुए संवाद को लिखिए।

मान लीजिए आपकी मुलाकात किसी दूसरे ग्रह के निवासी से हो जाती है। दूसरे ग्रह के निवासी के साथ हुई बातचीत को संवाद के रूप में लिखिए।

दिल्ली की गर्मी से राहत पाने के लिए किसी हिल स्टेशन जैसे शिमला, मनाली, कश्मीर आदि घूमने के बारे में माता-पिता और बेटी के बीच हुए संवाद को लिखिए।

संवाद लेखन

दिल्ली की गर्मी से राहत पाने के लिए हिल स्टेशन जाने के बारे में संवाद

 

माँ ⦂ बेटा, इस बार की गर्मी तो वाकई बहुत ज्यादा हो गई है।

बेटी ⦂ हाँ माँ, इस बार की गर्मी सच में असहनीय है। मुझे तो दिल्ली में रहना ही मुश्किल हो रहा है।

पिता ⦂ (हँसते हुए) तुम दोनों ठीक कह रहे हो। इस बार की गर्मी ने सबको परेशान कर दिया है।

बेटी ⦂ पापा, क्या हम इस बार कहीं घूमने जा सकते हैं? जैसे शिमला, मनाली या कश्मीर? वहाँ की ठंडी हवा में कुछ राहत मिलेगी।

माँ ⦂ (सहमत होते हुए) हाँ, यह अच्छा विचार है। हमें भी कुछ बदलाव की जरूरत है।

पिता ⦂ सही कहा, तुम्हारी माँ ने। चलो, हम योजना बनाते हैं। तुम दोनों शिमला और मनाली में से कौन-सा पसंद करोगे?

बेटी ⦂ (उत्साहित होकर) पापा, मुझे तो शिमला और मनाली दोनों ही पसंद हैं। लेकिन अगर चुनना हो, तो इस बार मनाली चलें? मैंने सुना है कि वहाँ के बर्फीले पहाड़ बहुत सुंदर हैं।

माँ ⦂ हाँ, मनाली भी बहुत अच्छा है। वहाँ के हिडिंबा मंदिर, सोलांग वैली और रोहतांग पास बहुत प्रसिद्ध हैं।

पिता ⦂ ठीक है, मनाली ही चलते हैं। मैं आज ही ऑनलाइन होटल बुक कर लेता हूँ और टिकट्स भी देख लेता हूँ।

बेटी ⦂ (खुश होकर) धन्यवाद, पापा! मुझे बहुत खुशी हो रही है। अब मैं जल्दी से अपनी पैकिंग कर लेती हूँ।

माँ ⦂ (मुस्कराते हुए) हाँ, बेटा, लेकिन अपने गर्म कपड़े और जरूरी चीजें रखना मत भूलना।

पिता ⦂ और हाँ, हम वहाँ जाकर ज्यादा घूम-फिर सकें, इसके लिए थोड़ी प्लानिंग भी कर लेते हैं।

बेटी ⦂ बिल्कुल पापा! मैं तो वहाँ की हर एक जगह देखना चाहती हूँ।

माँ ⦂ चलो, अब सब तैयारियाँ कर लेते हैं। मुझे भी मनाली में जाना बहुत अच्छा लगेगा।

पिता ⦂ तो फिर, मनाली की यात्रा के लिए तैयार हो जाओ। हम सब मिलकर इस गर्मी को ठंडी यादों में बदल देंगे!

बेटी ⦂ हुर्रे! मनाली, हम आ रहे हैं!

माँ ⦂ (मुस्कराते हुए) हाँ, अब मनाली की ठंडक में गर्मी को भूल जाएंगे।


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मान लीजिए आपकी मुलाकात किसी दूसरे ग्रह के निवासी से हो जाती है। दूसरे ग्रह के निवासी के साथ हुई बातचीत को संवाद के रूप में लिखिए।

अपनी सहेली के जन्मदिन पर जाने को लेकर माँ-बेटी के बीच संवाद लिखें।

‘काश मैंने समय का महत्व समझा होता तो आज मैं भी सफल होता।’ वाक्य को आधार बनाकर कोई घटना या कहानी लिखिए।

कहानी

काश मैंने समय का महत्व समझा होता तो आज मैं भी सफल होता।

 

समय इस संसार में सबसे बड़ा कीमती है। एक बार जो समय बीत गया, वह वापस नहीं लौटता है। सब कुछ वापस लौट सकता है, लेकिन समय वापस नहीं लौट सकता।इसलिए समय का महत्व समझना चाहिए। जीवन बहुत छोटा होता है और समय का एक एक पल कीमती होता है।

मैंने इस समय के महत्व को नहीं समझा और अपना समय व्यर्थ गवाँ दिया इसलिए जीवन में मैं वह सफलता प्राप्त नहीं कर पाया जो प्राप्त करनी चाहिए थी। बचपन में मेरे माता-पिता ने मुझे अच्छे स्कूल में दाखिला करा दिया था। मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही थी लेकिन फिर मेरी अपने मोहल्ले मे पड़ोस में ऐसे दोस्तों के साथ संगत हो गई, जिनके साथ रहकर पढ़ाई में कम ध्यान देने लगा और उन लोगों के साथ खेलकूद में अधिक ध्यान देने लगा।

मेरे माता-पिता मेरी बिगड़ती आदतों को देख कर मुझे मुझे समझाते रहते थे कि तुम बेकार के कामों में अपना समय मत गवाँओ। तुम्हारा अभी पढ़ाई का समय है। यदि तुमने यह समय गवा दिया तो तुम आगे बहुत पछताओगे। मैं उनकी बात नहीं सुनता था और कहता रहता था। नहीं मैं पढ़ाई पर भी ध्यान दे रहा हूँ जबकि मैं पढ़ाई पर ध्यान नहीं देता था और खेलकूद तथा बेकार की गतिविधियों में अपना समय गवाँता रहता था।

इसका परिणाम यह हुआ कि मैं पढ़ाई में पिछड़ता गया। दसवीं की परीक्षा में मेरे बहुत कम आए। उसके बाद भी मुझे अकल नही आयी। मेरे माता पिता नें मुझे बहुत समझाया और डांटा लेकिन मैं उनको सुधरने का वादा करके भी नही सुधरा और अपनी मनमर्जी करता रहा। उसके बाद 12वीं परीक्षा में भी मेरे बहुत कम आए।

मेरी कक्षा के लगभग सारे दोस्तों ने साइंस स्ट्रीम में दाखिला लिया जबकि मुझे कम अंक आने के कारण आर्ट में दाखिला लेना पड़ा। मैं अपने दोस्तों से पिछड़ चुका था। अब मुझे अपनी गलती का अहसास होने लगा था, इसलिए मैं तनावग्रस्त रहने लगा।

मैं ग्रेजुएशन पूरा नही कर पाया और मेरी पढ़ाई छूट गई। मुझे एक कंपनी में छोटी-मोटी नौकरी से संतोष करना पड़ा। जबकि मेरे सभी स्कूली दोस्त डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, आईएएस आदि बनकर अच्छा जीवन जी रहे हैं। यदि मैं अपने मोहल्ले के गलत दोस्तों की गलत संगत में नहीं पड़ता तो आज मैं भी सफल होता, लेकिन मैं वैसा नहीं बन पाया।

इसलिए समय बड़ा कीमती होता है। समय रहते उसकी पहचान कर लेनी चाहिए, नहीं तो बाद में पछताना पड़ता है।


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शब्द शक्ति, अमिधा, लक्षणा, व्यंजना। (हिंदी व्याकरण)

शब्द शक्ति : हिंदी व्याकरण में शब्द शक्ति’ से तात्पर्य शब्दों की उस शक्ति से होता है जो शब्द के अर्थ का बोध कराती है। हर शब्द में एक अर्थ छिपा होता है। उस शब्द के मूल अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति को शब्द शक्ति’ कहा जाता है। आइये शब्द शक्ति को समझते हैं…

शब्द शक्ति

शब्द शक्ति से तात्पर्य शब्द के अर्थ का भाव का बोध कराने वाली शब्द शक्ति से होता है। किसी भी शब्द या शब्द समूह में एक अर्थ छुपा होता है, वह मूल अर्थ का बोध कराने की शक्ति को शब्द शक्ति कहा जाता है। शब्द के अर्थ का बोध जिस भाव या रीत द्वारा कराया जाता है, वही उस शब्द की शक्ति है। शब्दों के अर्थ के बोध के अलग-अलग प्रकार होते हैं। उसी आधार पर शब्द शक्ति भी अलग-अलग प्रकार की होती है।

शब्द शक्ति के भेद

शब्दों के अनुसार शब्द के अर्थ तीन प्रकार के होते हैं।

  • वाच्यार्थ
  • लक्ष्यार्थ
  • व्यंग्यार्थ

इन्हीं तीन अर्थ के आधार पर शब्द शक्ति भी तीन प्रकार की होती है, जो कि इस प्रकार है :

✫  अमिधा
✫  लक्षणा
  व्यंजना

अभिधा

अमिधा शब्द शक्ति से तात्पर्य शब्द के उस अर्थ बोध से होता है, जो शब्द का सबसे प्रचलित एवं साधारण अर्थ होता है। किसी शब्द को सुनने या पढ़ने के बाद वाचक या श्रोता उस शब्द का जो सबसे प्रसिद्ध एवं प्रचलित अर्थ ग्रहण करें, वह ‘अमिधा’ शब्द शक्ति कहलाती है अमिधा शब्द शक्ति में शब्द के सांकेतिक अर्थ का बोध होता है।

अभिधा में शब्द शक्ति से युक्त शब्द के अर्थ में कोई विरोधाभास प्रकट नही होता और ना ही कोई कोई अवरोध नही होता और उसका सीधा अर्थ प्रकट होता है।

जैसे…
सुरेन्द्र खाना खा रहा है।

यहाँ पर सीधा स्पष्ट है कि सुरेन्द्र नाम का एक व्यक्ति खाना खा रहा है।

आशीष खेल रहा है।

यहाँ पर सीधा स्पष्ट है कि आशीष नाम का एक बालक खेल रहा है। इस तरह अमिधा शब्द शक्ति के माध्य से शब्द का सबसे सामान्य और सबसे प्रचलित अर्थ प्रकट होता है।

लक्षणा

‘लक्षणा’ शब्द शक्ति से तात्पर्य किसी शब्द की उस शक्ति से होता है, जिसमें वह शब्द अपना कोई सामान्य अर्थ प्रकट ना करके कोई विशिष्ट अर्थ प्रकट करता हो। लक्षणा शब्द शक्ति में इसमें शब्द की शक्ति लक्ष्यार्थ अर्थ होती है वो अपने मुख्य अर्थ को छोड़कर किसी अन्य विशेष अर्थ को प्रकट करती है।

अमिधा के अन्तर्गत सामान्य अर्थ में शब्द के जिस अर्थ को लिया जाता है, लक्षणा शब्द शक्ति के अंतर्गत उस अर्थ को किसी अन्य विशिष्ट अर्थ के संदर्भ में ग्रहण किया जाता है।

लक्षणा शब्द शक्ति में शब्दों का एक विशिष्ट अर्थ छिपा होता है, जो शब्द को सामान्य अर्थ से अलग विशिष्ट अर्थ प्रयुक्त करता है।

जैसे…
भारत जाग उठा।

यहाँ पर भारत से तात्पर्य एक व्यक्ति से नही बल्कि देश से है। भारत के जागने का विशिष्ट अर्थ है कि भारत देश में एक चेतना आयी।

दूसरा उदाहरण
हरीश बिल्कुल गधा है।

यहाँ पर हरीश नाम के व्यक्ति को गधा बताकर ये कहने का ये प्रयास नही किया जा रहा है कि हरीश गधा नामक जानवर है, बल्कि ये बताने का प्रयास किया जा रहा है कि गधा एक मूर्ख प्राणी माना जाता है इसलिये हरीश की संज्ञा गधे से करके हरीश को मूर्ख बताने का प्रयास किया गया है।

व्यंजना

व्यंजना शब्द शक्ति में शब्द का अर्थ ना तो वाच्यार्थ होता है और ना ही लक्ष्यार्थ होता है। यहाँ पर शब्द का अर्थ अलग-अलग संदर्भों में एक ही समय में अलग अलग हो सकता है। व्यंजना शक्ति में शब्द शक्ति में मुख्य और लक्ष्य अर्थ से अलग व्यंजन निहित होता है।

व्यंजना शब्द शक्ति से युक्त शब्द का अर्थ अलग अलग व्यक्ति के लिए अलग अलग हो सकता है। व्यंजना शब्द शक्ति में एक ही तरह के शब्दों से अलग-अलग व्यक्तियों के लिये अलग-अलग अर्थ प्रकट होते हों तो वहाँ ‘व्यंजना’ शब्द शक्ति होती है।

जैसे…
सुबह के पाँच बज गए।

सुबह के पाँच बजने का अलग-अलग लोगों के लिए अलग अर्थ होगा।

  • किसी घरेलू महिला के लिए इसका अर्थ घर के कामकाज को शुरु करना है।
  • किसी कामकाजी पुरुष या महिला के लिये इसका अर्थ अपने दफ्तर के लिए तैयार होने से है।
  • किसी छात्र के लिए इसका अर्थ विद्यालय जाने के लिए तैयार होने से है।
  • रात की पाली के किसी चौकीदार या किसी कारखाने के श्रमिक के लिए इसका अर्थ ड्यूटी समाप्त होने से है।

 


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दिए गए पदयांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। स्वतंत्रता की लड़ी लड़ाई। तुमने हमको मुक्ति दिलाई, हुई दासता दूर देश की। आया उत्तम-नूतन युग है। बापू ! तुमको कोटि नमन है। सत्य अहिंसा को अपनाया, प्रेम-एकता का गुण गाया। नैतिकता का पंथनछोड़ा, रखा पवित्र साध्य-साधन है। बापू! तुमको कोटि नमन है। तुमने किया समर्पित तन-मन, तुमने किया समर्पित जीवन। गए जेल आजादी के हित. किया तिर कष्ट-सहन है। बापू। तुमको कोटि नमन है। यह भारत है मणी तुम्हारा, तुम्हें न भूलेगा जग सारा। तुमसे सतत प्रेरणा लेकर, हो सकता प्रसन्न जन-जन है। बापू तुमको कोटि नमन है।। 1. कवि बापू के प्रति समर्पित क्यों है? 2. गांधी जी जेल क्यों गए थे? 3. बापू ने कौन से मार्ग पर चलने का प्रण लिया? 4. भारत देश गांधी का ऋणी क्यों है? 5. गांधी जी से क्या प्रेरणा ली जा सकती है?

स्वतंत्रता की लड़ी लड़ाई।
तुमने हमको मुक्ति दिलाई,
हुई दासता दूर देश की।
आया उत्तम-नूतन युग है।
बापू ! तुमको कोटि नमन है।
सत्य अहिंसा को अपनाया,
प्रेम-एकता का गुण गाया।
नैतिकता का पंथनछोड़ा,
रखा पवित्र साध्य-साधन है।
बापू! तुमको कोटि नमन है।
तुमने किया समर्पित तन-मन,
तुमने किया समर्पित जीवन।
गए जेल आजादी के हित.
किया तिर कष्ट-सहन है।
बापू। तुमको कोटि नमन है।
यह भारत है मणी तुम्हारा,
तुम्हें न भूलेगा जग सारा।
तुमसे सतत प्रेरणा लेकर,
हो सकता प्रसन्न जन-जन है।
बापू तुमको कोटि नमन है।।

1. कवि बापू के प्रति समर्पित क्यों है?

उत्तर : कवि बापू के प्रति समर्पित है क्योंकि उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी और हमें दासता से मुक्ति दिलाई। उन्होंने सत्य और अहिंसा का पालन किया और प्रेम, एकता, और नैतिकता के गुण सिखाए।

2. गांधी जी जेल क्यों गए थे?

उत्तर : गांधी जी आजादी के हित के लिए जेल गए थे। उन्होंने तन-मन से समर्पित होकर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और कष्ट सहन किया।

3. बापू ने कौन से मार्ग पर चलने का प्रण लिया?

उत्तर : बापू ने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का प्रण लिया। उन्होंने नैतिकता और प्रेम-एकता को अपनाया और इन्हें अपने जीवन में स्थान दिया।

4. भारत देश गांधी का ऋणी क्यों है?

उत्तर : भारत देश गांधी का ऋणी है क्योंकि उन्होंने देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए अपने जीवन का समर्पण किया। उन्होंने देश को दासता से मुक्त कराया और उत्तम-नूतन युग की शुरुआत की।

5. गांधी जी से क्या प्रेरणा ली जा सकती है?

उत्तर : गांंधी जी से सत्य, अहिंसा, नैतिकता, प्रेम और एकता की प्रेरणा ली जा सकती है। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि किस प्रकार से संघर्ष और त्याग से महान उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है।


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बड़े भाई साहब : प्रेमचंद

पाठ के बारे में…

‘बड़े भाई साहब’ नामक पाठ मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई एक रोचक कहानी है, जिसमें एक बड़े भाई साहब हैं, जो हमेशा अपने छोटे भाई की पढ़ाई के विषय में सोचते रहते हैं। हालाँकि बड़े भाई साहब खुद स्वयं पढ़ाई में इतने अच्छे नहीं थे, लेकिन छोटे भाई के प्रति उनकी चिंता बड़े भाई होने के नाते उनके कर्तव्य का बोध कराती है। छोटे भाई से उम्र में केवल 5 साल बड़ा होने के कारण उनसे बड़ी-बड़ी अपेक्षा की जाती हैं। इसी कारण बड़ा होने के नाते वे खुद भी छोटे भाई के सामने  अपना बड़प्पन बनाए रखते हैं और छोटे भाई को किसी गलत राह पर चलने से रोकते-टोकते रहते हैं। बड़े भाई बने रहने के चक्कर में उनका उनका बचपन भी तिरोहित हो गया है, इस पाठ के माध्यम से लेखक ने यही बताने का प्रयत्न किया है।

लेखक के बारे में…

मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य का गौरव माने जाते हैं। उनका असली नाम धनपतराय था। उनका जन्म उत्तरप्रदेश के बनारस के लमही गाँव में हुआ था। वे हिंदी में मुंशी प्रेमचंद के नाम से और उर्दू में नवाबराय नाम से लिखते थे। ब्रिटिश शासन के समय उनका उर्दू में रचित कहानी संग्रह ‘सोज़े वतन’  अंग्रेजों की आँखों की किरकिरी बन गया था। उन्होंने ‘हंस’ नामक उन्होंने पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया और हंस के साथ-साथ ‘माधुरी’ नामक प्रमुख पत्रिका का संपादन किया।

उनके प्रसिद्ध उपन्यास गोदान, सेवासदन, निर्मला, रंगभूमि, मंगलसूत्र, कर्मभूमि, सेवाश्रम, गबन आदि के नाम प्रमुख हैं। बड़े भाई साहब उनके द्वारा रचित कहानियों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने सैकड़ों कहानियों की रचना की जो एक से बढ़कर एक हैं। उनका निधन 8 अक्टूबर 1936 को हुआ।



हल प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए।

प्रश्न-1 : कथा नायक की रूचि किन कार्यों में थी ?

उत्तर : कथा नायक की रुचि मुख्यतः खेलकूद का कार्य करने, कंकरिया उछालने, मैदानों की हरियाली का आनंद लेने, कनकौवे उड़ने यानी पतंगबाजी करने , दोस्तों से गपबाजी करने, दोस्तों के साथ कागज की तितलियां बनाकर उड़ाने, फाटक या चारदीवारी पर चढ़कर उछलने कूदने तथा फाटक को गाड़ी जैसा बनाकर उस पर झूला झूलने, सदा दोस्तों के साथ कई तरह की धमाचौकड़ी और मस्ती करने में होती थी। कथावाचक का मन पढ़ाई में बिल्कुल भी नहीं लगता था।

प्रश्न-2 : बड़े भाई छोटे भाई से हर समय पहला सवाल क्या पूछते थे?

उत्तर : बड़े भाई साहब छोटे भाई से हमेशा यही सवाल पूछते थे, कहाँ थे? जब भी छोटा भाई बाहर से घूम-फिर कर, दोस्तों के साथ गपबाजी, मस्ती करके, धमाचौकड़ी मचा कर घर वापस लौटा तो बड़े भाई साहब का छोटे भाई से सबसे पहला सवाल यही होता था, कहाँ थे?

प्रश्न-3 : दूसरी बार पास होने पर छोटे भाई के व्यवहार में क्या परिवर्तन आया?

उत्तर : दूसरी बार पास होने पर छोटे भाई के विवाह में यह परिवर्तन आया कि अब अधिक स्वतंत्र और स्वच्छंद हो गया था, क्योंकि दूसरी बार पास होने पर बड़े भाई साहब ने छोटे भाई को डांटना, रोकना-टोकना कम कर दिया था। बड़े भाई साहब ने सहनशील रवैया अपना लिया था और वह छोटे भाई से हर घड़ी, कहाँ थे? नहीं पूछते थे और ना ही उसे बात-बात पर रोकते-टोकते थे। इस कारण छोटा भाई आजाद सा हो गया। अब  छोटा भाई अधिक मनमानी करने लगा था और उसे कनकौवे उड़ाने यानि पतंगबाजी करने का नया शौक पैदा हो गया था। अब वह खेलने कूदने में अधिक समय बिताने लगा था।

प्रश्न-4 : बड़े भाई साहब छोटे भाई से उम्र में कितने बड़े थे और वे कौन-सी कक्षा में पढ़ते थे?

उत्तर : बड़े भाई साहब छोटे भाई से उम्र में पाँच साल बड़े थे और बड़े भाई साहब नवीं कक्षा में पढ़ते थे।बड़े  साहब छोटे भाई यानी कथा वाचक से मात्र पाँच साल बड़े होने के बावजूद उसे केवल तीन कक्षा तक का ही आगे थे। जब छोटा भाई पाँचवी कक्षा में पढ़ता था तो बड़े भाई साहब के उस वक्त नवीं कक्षा में पढ़ते थे। बाद में बड़े भाई साहब फेल होते गए और छोटे भाई और बड़े भाई के बीच का अंतर मात्र एक कक्षा का रह गया था।

प्रश्न-5 : बड़े भाई साहब दिमाग को आराम देने के लिए क्या करते थे?

उत्तर : बड़े भाई साहब अपने दिमाग को आराम देने के लिए अनेक तरह के यतन-जतन करते रहते थे, कभी वह किताब के हाशियों पर चिड़ियों, बिल्लियों, कुत्तों आदि के चित्र आदि बनाते रहते थे। इसके अलावा वे कापी में एक ही शब्द को कई बार लिखने लगते थे और कभी-कभी तो वे बेमेल शब्द को लिखते रहते थे। कभी-कभी वह सुंदर शायरी भी लिखा करते थे। इस तरह बड़े भाई साहब अपने दिमाग को आराम देने के लिए तरह-तरह के प्रयोजन अपनाते थे।


लिखित

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30) शब्दों में लिखिए।

प्रश्न-1 : छोटे भाई ने अपनी पढ़ाई का टाइम-टेबिल बनाते समय क्या-क्या सोचा और फिर उसका पालन क्यों नहीं कर पाया?

उत्तर : छोटे भाई ने अपनी पढ़ाई का टाइम टेबल बनाते समय यह सोचा था कि वह अब खूब मन लगाकर पढ़ाई करेगा और अपने बड़े भाई साहब को शिकायत का एक भी मौका नहीं देगा। इसी कारण छोटे भाई ने टाइम टेबल बनाते समय रात ग्यारह बजे तक का टाइम टेबल बना लिया था और हर विषय के लिए अलग समय निर्धारित कर लिया था। लेकिन छोटे भाई ने टाइम टेबल में खेल के लिए कोई समय नहीं दिया था, इसी कारण उसका ध्यान हर समय खेल के मैदान बाहर की धमाचौकड़ी, हवा के हल्के-हल्के झोंके, फुटबॉल आदि खेलना, कबड्डी, वॉलीबाल जैसे खेल खेलना आदि गतिविधियों में ही लगा रहता था, इसी कारण वह अपने पढ़ाई के टाइम टेबल का पालन नहीं कर पाया।

प्रश्न-2 : एक दिन जब गुल्ली-डंडा खेलने के बाद छोटे भाई बड़े भाई साहब के सामने पहुँचा तो उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर : एक दिन जब गुल्ली-डंडा खेलने के बाद छोटा भाई वापस घर आया तो बड़े भाई के सामने पड़ने पर बड़े भाई उस पर बेहद के क्रोधित हुए। उन्होंने यह जानकर कि छोटा भाई गुल्ली-डंडा खेल कर आया है, उसे बहुत डांटा। उन्होंने छोटे भाई से अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहा और गुल्ली-डंडा खेल की बहुत आलोचना की। उन्होंने गुल्ली-डंडा खेल की बुराइयां बताते हुए कहा कि यह खेल खेलने से तुम्हारा भविष्य चौपट हो जाएगा। उन्होंने छोटे भाई को यह भी ताना दिया कि वो कक्षा में अव्वल आ गया है, इसी कारण से अहंकार हो गया है और अहंकार तो रावण का भी नहीं रहता और सब के अहंकार का एक न एक दिन अंत होता ही है। इसीलिए उसे अपने अव्वल आने पर अहंकार  नहीं करना चाहिए और अपनी पढ़ाई पर अधिक से अधिक ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न-3 : बड़े भाई को अपने मन की इच्छाएँ क्यों दबानी पड़ती थीं?

उत्तर : बड़े भाई को अपने मन की इच्छाएं इसलिए दबानी पड़ती थीं, क्योंकि वह छोटे भाई से पाँच साल उम्र में बड़े थे। दोनों भाई एक हॉस्टल में रहते थे, इस कारण बड़े भाई होने के नाते वह छोटे भाई के अभिभावक के रूप में के। अभिभावक की भूमिका निभाने के कारण उन्होंने छोटे भाई के सामने अपना बड़प्पन प्रदर्शित करना होता था। वे ऐसा कोई भी गलत कार्य करना चाहते थे, कि जिसे देखकर छोटा भाई उनका अनुकरण करें और अपनी पढ़ाई से अपना ध्यान हटा ले। इसीलिए अपने स्वभाव का वैसा ही प्रदर्शन करते थे, जैसे बड़े लोग अपनी छोटो के सामने करते है। उनका सोचना कि यदि गलत रास्ते पर चलेंगे, तो छोटा की जिम्मेदारी कौन संभालेगा। बड़े भाई साहब का भी मन बाल सुलभ हरकतों को करने का करता था। उनका मन भी मौज मस्ती करने पतंग उड़ाने का करता था, लेकिन छोटे भाई के प्रति अपने नैतिक कर्तव्य बोध के कारण वह अपने मन की इच्छाओं को दबा लेते थे।

प्रश्न-4 : बड़े भाई साहब छोटे भाई को क्या सलाह देते थे और क्यों?

उत्तर : बड़े भाई साहब छोटे भाई को हमेशा पढ़ाई में अधिक से अधिक ध्यान देने की सलाह देते रहते थे। वे चाहते थे कि छोटा भाई हर समय पढ़ाई करें और अच्छे अंको से पास हो। वे यह नहीं चाहते थे कि छोटा भाई खेलकूद में अधिक समय बिताये और उसका ध्यान पढ़ाई हटे। छोटे भाई को अंग्रेजी विषय पर अधिक ध्यान देने के लिए भी सलाह देते रहते थे, वह कहते थे कि अंग्रेजी विषय को पढ़ने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है और यदि मेहनत नहीं करोगे तो तुम उसी दर्जे में रह जाओगे, पास नहीं हो पाओगे। इस तरह छोटे भाई को हमेशा पढ़ाई पर अधिक से अधिक ध्यान देने की सलाह और खेलकूद में से दूर रहने की सलाह देते रहते थे।

प्रश्न-5 : छोटे भाई ने बड़े भाई साहब के नरम व्यवहार का क्या फ़ायदा उठाया?

उत्तर : छोटे भाई ने बड़े भाई के नरम व्यवहार का अनुचित फायदा उठाया। जब छोटा भाई दूसरी बार अपनी कक्षा में अव्वल आ गया तो बड़े भाई ने उसे रोकना-टोकना कम कर दिया था। बड़े भाई ने छोटे भाई के प्रति अब अधिक सहनशील रवैया अपना लिया था और वो ज्यादा रोक-टोक नही पाते थे। छोटे भाई के अव्वल आने के कारण  छोटे भाई का आत्मविश्वास बढ़ गया था और बड़े भाई का रौब छोटे भाई पर पहले जैसा नहीं रहा था। इसी कारण छोटे भाई ने उसका अनुचित लाभ उठाना शुरू कर दिया। अब वह  अधिक स्वतंत्र और स्वच्छंद हो गया था। वो अधिक मनमानी करने लगा था और खेलकूद में अधिक ध्यान देने लगा था। अब उसे पतंग उड़ाने का नया शौक पैदा हो गया था। छोटे भाई को मन में यह सोच आ गई थी कि जिस तरह अपनी कक्षा में अव्वल आ गया है, वैसे ही अगली कक्षा में आ जायेगा।


निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60) शब्दों में लिखिए।

प्रश्न-1 : बड़े भाई की डाँट-फटकार अगर न मिलती, तो क्या छोटा भाई कक्षा में अव्वल आता? अपने विचार प्रकट कीजिए ।

उत्तर : बड़े भाई साहब की डांट-फटकार अगर छोटे भाई को ना मिली होती तो छोटा भाई कक्षा में अव्वल आ ही नहीं आ पाता। क्योंकि छोटा भाई पढ़ने के साथ-साथ खेलकूद पर भी बहुत ध्यान देता था और उसका मन पढ़ाई से अधिक खेलकूद में लगता था। हालांकि यह बात अलग थी कि वह पढ़ाई में होशियार था, लेकिन खेलकूद की तरफ उसका आकर्षण निरंतर बढ़ते रहने के कारण यदि बड़े भाई साहब उसे रोकते-टोकते नहीं तो वह खेलकूद की ओर अधिक आकर्षित होता जाता और पढ़ाई की तरफ से उसका ध्यान कम हो सकता था।

बड़े भाई साहब की डांट फटकार और नसीहत के कारण छोटा भाई थोड़ा सचेत हो गया था। उसे बड़े भाई साहब का भय लगा रहता था, इसी कारण वह ध्यान पूर्वक पढ़ाई करने लगा था। यदि बड़े भाई साहब उसे इस तरह डांटते-फटकारते पर करते नहीं, तो हो सकता है कि वह पढ़ाई से अधिक खेलकूद की तरफ ध्यान देता और तब वह परीक्षा में अव्वल आ ही नहीं पाता।

प्रश्न-2 :  बड़े भाई साहब के अनुसार जीवन की समझ कैसे आती है?

उत्तर : बड़े भाई साहब के अनुसार जीवन की समझ अनुभवों से आती है, केवल किताबी ज्ञान से नहीं आती है। बड़े भाई साहब जीवन के व्यावहारिक अनुभवों को किताबी ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार किताबी ज्ञान प्राप्त कर डिग्रियां हासिल करने से आदमी विद्वान नहीं बन जाता। जब तक उसे जीवन के वास्तविक एवं व्यवहारिक रूप का अनुभव नहीं होगा, तब तक वह जीवन में सफल नहीं हो सकता। किताबी ज्ञान द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के अलावा जीवन के व्यवहारिक रूप को भी समझना आवश्यक होता है। दोनों के मिले-जुले रूप से ही जीवन की समझ आती है। इसीलिए बड़े भाई साहब के अनुसार किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यहारिक ज्ञान भी प्राप्त करते रहना चाहिए। तब ही  शिक्षा का सही अर्थ सार्थक होगा। किताबी ज्ञान के अलावा जीवन में सदगुणों का विकास भी जरूरी है, जो मनुष्य के चरित्र का निर्माण करते हैं।

प्रश्न-3 : छोटे भाई के मन में बड़े भाई साहब के प्रति श्रद्धा क्यों उत्पन्न हुई?

उत्तर : छोटे भाई के मन में बड़े भाई के प्रति श्रद्धा इसलिए उत्पन्न हुई, क्योंकि जब वह अपनी परीक्षा में दूसरी बार भी अव्वल आया तो उसे यह एहसास हो गया था कि उसकी सफलता के पीछे बड़े भाई साहब का ही हाथ है। बड़े भाई साहब ने छोटे भाई को बेहद समझाया था कि पढ़ाई में भले ही अच्छा हो गया हो और उस उनसे अधिक अंक लाता हो, लेकिन जीवन के अनुभवों में वह अभी भी कच्चा है क्योंकि वह उनसे छोटा है। बड़े भाई साहब ने छोटे भाई को जीवन संबंधित अनेक नसीहतें देते हुए समझाया कि जीवन में अपने से बड़ों का अलग महत्व होता है। वह छोटों का विशेष ध्यान रखते हैं और किसी भी तरह की विपत्ति आने पर उसको संभाल लेते हैं, जिससे उनके छोटे बेफिक्र रहते हैं।

बड़े भाई साहब ने समझाया कि उनका काम भी यही है कि वह अपने छोटे भाई का ध्यान रखें और उसे किसी भी तरह की परेशानी ना पैदा होने दें। बड़े भाई साहब ने उसे आने वाली कक्षा की पढ़ाई की कठिनाइयों के बारे में भी बताया और कहा कि उसकी भलाई के कारण ही वह अपनी इच्छाओं का दमन करते हैं और उस पर विशेष ध्यान देते हैं। बड़े भाई की ये सारी  नसीहत और बातें सुनकर छोटे भाई की आँखें खुल गई और उसे एहसास हो गया कि यदि परीक्षा में अव्वल आ रहा है, तो इसमें उसके बड़े भाई साहब का भी योगदान है, क्योंकि उन्होंने डांटते-फटकारते हुए उसे गलत राह पर चलने से हमेशा रोका। इन्हीं सब कारणों से छोटे भाई के मन में बड़े भाई साहब के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गई।

प्रश्न-4 : बड़े भाई की स्वभावगत विशेषताएँ बताइए?

उत्तर : बड़े भाई साहब की स्वभावगत विशेषताएं इस प्रकार हैं…

आदर्श भाई : बड़े भाई साहब का सबसे प्रमुख स्वभाव यह है कि वह एक आदर्श भाई थे, और उसी तरह का व्यवहार भी करते हैं। उन्हें अपने छोटे भाई के हित की चिंता हमेशा लगी रहती थी। इसी कारण वे अपने छोटे भाई को किसी भी तरह के गलत राह पर भटकने से रोकते रहते थे। एक बड़े भाई का जो कर्तव्य होता है वह सभी कर्तव्य निभाते थे।
संस्कारी : बड़े भाई साहब बड़ों का आदर करने वाले एक संस्कार व्यक्ति थे। वह अपने बड़ों, अपने माता-पिता तथा गुरुजनों सभी का सम्मान करते थे। इसी कारण वह अपने छोटे भाई को भी बड़ों का सम्मान करने की सीख दिया करते हैं।
संयमी और कर्तव्य परायण : बड़े भाई साहब बेहद संयमित स्वभाव के व्यक्ति थे। छोटे भाई को मौज मस्ती करते देखकर और घूमते देखकर उनका मन भी वैसा ही सब करने का करता था, लेकिन वह स्वयं पर संयम स्थापित करके रखते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि यदि वह भी अपने छोटे भाई की तरह आचरण करने लंगेगे हो जाएंगे तो फिर छोटे भाई को कौन संभालेगा। यह उनका अपने छोटे भाई के प्रति कर्तव्य को भी प्रकट करता है।
परिश्रमी : बड़े भाई साहब खासे परिश्रमी थे और वे हमेशा परिश्रम को महत्व देते थे। हालाँकि वे पढ़ाई में कमजोर थे, लेकिन वह पढ़ाई में परिश्रम पूरा करते थे। उन्हें चित्रकारी करने का बेहद शौक था। वे आराम के क्षणों में जानवरों के चित्र बनाते थे।
अनुभवी एवं समझदार : बड़े भाई साहब छोटे भाई से केवल 5 वर्ष अधिक थे, लेकिन उन्हें जीवन के अनुभवों की अधिक समझ थी। अपने छोटे भाई के सामने ऐसी बातें करते थे और ऐसा आचरण प्रदर्शित करते थे जैसे कोई घर का बड़ी उम्र का व्यक्ति करता है।  उन्हें जीवन के अनुभवों की समझ अपनी उम्र से अधिक और छोटे भाई को भी जीवन के व्यहारिक अनुभवों के बारे में नसीहतें देते रहते थे।

प्रश्न-5 : बड़े भाई साहब ने ज़िंदगी के अनुभव और किताबी ज्ञान में से किसे और क्यों महत्वपूर्ण कहा है?

उत्तर : बड़े भाईसाहब ने जिंदगी के अनुभव और किताबी ज्ञान में से जिंदगी के अनुभव को अधिक महत्वपूर्ण कहा है। बड़े भाई साहब जिंदगी के अनुभव को अधिक महत्व देते थे। उनका मानना था कि ज्यों-ज्यों मनुष्य की उम्र बीत जाती है, उसे जिंदगी के अधिक अनुभव प्राप्त होने लगते हैं। वह अच्छे और बुरे के भेद को समझने लगता है। उनका कहना था कि बड़ों के पास भले ही बड़ी-बड़ी डिग्रियां ना हो लेकिन उनके पास जिंदगी के अनुभवों की कोई कमी नहीं होती है। बड़े भाई साहब का मानना था जिंदगी जीने के लिए जिंदगी के व्यावहारिक अनुभव महत्वपूर्ण होते हैं। भले ही हम एम. ए. की डिग्री हासिल कर ले, लेकिन घर जाने के लिए जिंदगी का व्यावहारिक अनुभव होना आवश्यक होता है। उनके अनुसार जिंदगी के अनुभव को पुस्तक किताबी ज्ञान से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उसके लिए जीवन के व्यवहारिक रूप को समझना आवश्यक होता है। केवल किताबों में सिर खपाने की जगह जिंदगी के व्यावहारिक कार्यों को भी करते रहना चाहिए ताकि जिंदगी व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो सके।

प्रश्न-6 : बताइए पाठ के किन अंशों से पता चलता है कि −
(क) छोटा भाई अपने भाई साहब का आदर करता है।
(ख) भाई साहब को ज़िंदगी का अच्छा अनुभव है।
(ग) भाई साहब के भीतर भी एक बच्चा है।
(घ) भाई साहब छोटे भाई का भला चाहते हैं।

उत्तर : 
(क) छोटा भाई अपने भाई साहब का आदर करता है।
पाठ के अंश : फिर भी मैं भाई साहब का आदर करता था और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्ने बांधने, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्याएं सब गुप्त रूप से हल की जाती थी। मैं भाई साहब को यह संदेह ना करने देना चाहता था कि उनका सम्मान और लिहाज मेरी नजरों में कम हो गया है।

(ख) भाई साहब को ज़िंदगी का अच्छा अनुभव है।
पाठ के अंश : मैं तुमसे 5 साल बड़ा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिंदगी का जो तजुर्बा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., एम. फिल् और डी. लिट् ही क्यों ना हो जाओ। समझ किताबें पढ़ने से नही आती–दुनिया देखने से आती है।

(ग) भाई साहब के भीतर भी एक बच्चा है।
पाठ के अंश : संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौवा हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे है। उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा हॉस्टल की तरफ दौड़ लगे, मैं पीछे पीछे दौड़ रहा था।

(घ) भाई साहब छोटे भाई का भला चाहते हैं।
पाठ के अंश : तो भाईजान, यह गरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गए हो और अब स्वतंत्र हो। मेरे रहते तुम बेराह ना चलने पाओगे। अगर तुम जो ना मानोगे तो मैं थप्पड़ देखा कर इसका प्रयोग भी कर सकता हूँ। मैं जानता हूँ, तुम्हें मेरी बातें जहर लग रही है।


(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए।

प्रश्न-1 : इम्तिहान पास कर लेना कोई चीज़ नहीं, असल चीज़ है बुद्धि का विकास।

उत्तर : बड़े भाई साहब के अनुसार केवल इम्तिहान पास कर लेना ही बुद्धि का विकास नहीं होता महत्वपूर्ण नहीं होता यानी केवल परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने से ही जीवन में सफलता नहीं मिल जाती। जीवन में व्यवहारिक ज्ञान का भी अलग महत्व होता है। जीवन के अलग-अलग पहलुओं को व्यावहारिक रूप से समझने से भी बुद्धि का विकास होता है। जीवन व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर ही जिया जाता है। अनपढ़ लोग भी अपना जीवन किसी ना किसी तरह जीते ही हैं। इसलिए केवल इम्तिहान पास कर लेना कोई बड़ी बात नहीं बल्कि इम्तिहान पास करने के साथ-साथ जीवन के व्यवहारिक अनुभव को हासिल करने से ही बुद्धि का विकास होता है।

प्रश्न-2 : फिर भी जैसे मौत और विपत्ति के बीच भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकड़ा रहता है, मैं फटकार और घुडकियाँ खाकर भी खेल-कूद का तिरस्कार न कर सकता था।

लेखक के अनुसार जिस तरह जीवन में अनेक तरह की संकट, दुख, कष्ट आदि आने के बावजूद मनुष्य जीवन के मोह-माया और सांसारिक भोग विलास के आकर्षण में उलझा ही रहता है। वह उनके प्रति महू छोड़ नहीं पाता, उसी तरह छोटा भाई भी अपने बड़े भाई से रोज डाँट-डपर सुनकर, तरह-तरह के ताने-उलाहने सुनकर भी खेलकूद के प्रति अपने मोह का त्याग नहीं कर पाता था। यही लेखक ने स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है।

प्रश्न-3 : बुनियाद ही पुख्ता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने?

उत्तर : बड़े भाई साहब के अनुसार जब तक मकान की नींव मजबूत नहीं होगी उस पर ऊँचा मकान कैसे बन सकता है। अर्थात एक मजबूत भवन के निर्माण के लिए उसकी नींव को उतना ही अधिक मजबूत होना आवश्यक है। यहाँ पर बड़े भाई साहब ने मनुष्य के जीवन के विकास के संदर्भ में यह बात कही है । अच्छी शिक्षा और जीवन का व्यावहारिक अनुभव एक बुनियाद की तरह काम करता है। सुनहरे भविष्य के लिए अच्छी शिक्षा, अच्छे संस्कार और जीवन का व्यावहारिक अनुभव आवश्यक है।

प्रश्न-4 : आँखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला आ रहा था, मानो कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नए संस्कार ग्रहण करने जा रही हो।

उत्तर : इस पंक्ति में लेखक ने छोटे भाई द्वारा पतंग लूटे जाने के प्रसंग का वर्णन किया है। लेखक जब पतंग लूट रहा था तो उसकी आँखें आसमान की तरफ थी और उसका मन पतंग में ही उलझा हुआ था। उसे पतंग एक दिव्य आत्मा की तरह दिखाई दे रही थी और आसमान से धीरे धीरे लहराकर मंद-मंद गति से धरती की और आती हुई पतंग ऐसे लग रही थी कि जैसे कोई आत्मा एकदम विरक्त भाव से पृथ्वी पर दूसरा जन्म लेने हेतु आ रही हो।


भाषा अध्ययन

प्रश्न-1 : निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची लिखिए।
नसीहत, रोष, आज़ादी, राजा, ताज्जुब

उत्तर : दिए गए शब्दों के पर्यायवाची इस प्रकार होंगे…
नसीहत : सीख, सलाह
रोष : क्रोध, गुस्सा
आज़ादी : स्वतंत्रता, मुक्त
राजा : नृप, नरेश
ताज्जुब : आश्चर्य, हैरानी

प्रश्न-2 : प्रेमचंद की भाषा बहुत पैनी और मुहावरेदार है। इसीलिए इनकी कहानियाँ रोचक और प्रभावपूर्ण होती हैं। इस कहानी में आप देखेंगे कि हर अनुच्छेद में दो-तीन मुहावरों का प्रयोग किया गया है। उदाहरणतः इन वाक्यों को देखिए और ध्यान से पढ़िए-

निम्नलिखित मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
सिर पर नंगी तलवार लटकना, आड़े हाथों लेना, अंधे के हाथ बटेर लगना, लोहे के चने चबाना, दाँतों पसीना आना, ऐरागैरा नत्थू-खैरा।

उत्तर : मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग इस प्रकार होगा…

1. सिर पर नंगी तलवार लटकना
वाक्य प्रयोग : उसका प्रमोशन रोक दिया गया है और अब उसके सिर पर नंगी तलवार लटक रही है, क्योंकि कंपनी उसे निकालने का सोच रही है।

2. आड़े हाथों लेना
वाक्य प्रयोग : शिक्षक ने देर से आने वाले छात्रों को आड़े हाथों लिया और उन्हें सख्त चेतावनी दी।

3. अंधे के हाथ बटेर लगना
वाक्य प्रयोग : उसकी लॉटरी में इतनी बड़ी रकम निकल आई, यह तो अंधे के हाथ बटेर लगने जैसा ही है।

4. लोहे के चने चबाना
वाक्य प्रयोग : नए खिलाड़ी को टीम में अपनी जगह बनाने के लिए वाकई लोहे के चने चबाने पड़े।

5. दाँतों पसीना आना
वाक्य प्रयोग : इस कठिन गणित के सवाल को हल करते हुए मेरे दाँतों पसीना आ गया।

6. ऐरागैरा नत्थू-खैरा
वाक्य प्रयोग : इस महत्वपूर्ण बैठक में ऐरागैरा नत्थू-खैरा को बुलाना सही नहीं होगा, केवल संबंधित विशेषज्ञ ही शामिल हों।

प्रश्न-3 : निम्नलिखित तत्सम, तद्भव, देशी, आगत शब्दों को दिए गए उदाहरणों के आधार पर छाँटकर लिखिए।
NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 10 बड़े भाई साहब Q3
तालीम, जल्दबाज़ी, पुख्ता, हाशिया, चेष्टा, जमात, हर्फ़, सूक्ति-बाण, जानलेवा, आँखफोड़, घुड़कियाँ, आधिपत्य, पन्ना, मेला-तमाशी, मसलन, स्पेशल, स्कीम, फटकार, प्रात:काल, विद्वान, निपुण, भाई साहब, अवहेलना, टाइम-टेबिल

उत्तर : सभी शब्दों की छंटनी नीचे टेबल में दी गई है।

तत्समतद्भवदेशजआगत
चेष्टाजानलेवाघुड़कियाँतालीम (उर्दू)
सूक्ति-बाणआँखफोड़फटकारजल्दबाज़ी (उर्दू)
अधिपत्यपन्नापुख्ता (उर्दू)
मेलाभाई साहबहाशिया (उर्दू)
प्रातःकालहर्फ़ (उर्दू)
विद्वानजमात (उर्दू)
निपुणस्कीम (अंग्रेजी)
अवहेलनास्पेशल (अंग्रेजी)
टाइम-टेबिल (अंग्रेजी)

 

प्रश्न-4 : क्रियाएँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं-सकर्मक और अकर्मक
सकर्मक क्रिया- वाक्य में जिस क्रिया के प्रयोग में कर्म की अपेक्षा रहती है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं;
जैसे- शीला ने सेब खाया।
मोहन पानी पी रहा है।
अकर्मक क्रिया- वाक्य में जिस क्रिया के प्रयोग में कर्म की अपेक्षा नहीं होती, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं;
जैसे- शीला हँसती है।
बच्चा रो रहा है।
नीचे दिए वाक्यों में कौन-सी क्रिया है- सकर्मक या अकर्मक? लिखिए-
  1. उन्होंने वहीं हाथ पकड़ लिया।
  2. फिर चोरों-सी जीवन कटने लगा।
  3. शैतान का हाल भी पढ़ा ही होगा।
  4. मैं यह लताड़ सुनकर आँसू बहाने लगता।
  5. समय की पाबंदी पर एक निबंध लिखो।
  6. मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

उत्तर :  क्रियाएं इस प्रकार होंगी..

  1. उन्होंने वहीं हाथ पकड़ लिया। — सकर्मक क्रिया
  2. फिर चोरों-सा जीवन कटने लगा। — सकर्मक क्रिया
  3. शैतान का हाल भी पढ़ा ही होगा। — सकर्मक क्रिया
  4. मैं यह लताड़ सुनकर आँसू बहाने लगता। — सकर्मक क्रिया
  5. समय की पाबंदी पर एक निबंध लिखो। — सकर्मक क्रिया
  6. मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था। — अकर्मक क्रिया
प्रश्न-5 : ‘इक’ प्रत्यय लगाकर शब्द बनाइए-
विचार, इतिहास, संसार, दिन, नीति, प्रयोग, अधिकार
उत्तर : इस प्रत्यय लगाकर शब्द..

प्रमाण + इक — प्रमाणिक
तमस + इक — तामसिक
विचार + इक — वैचारिक
साहस + इक — साहसिक
मूल + इक — मौलिक


योग्यता विस्तार

प्रश्न-1 : प्रेमचंद की कहानियाँ मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं। इनमें से कहानियाँ पढ़िए और कक्षा में सुनाइए। कुछ कहानियों का मंचन भी कीजिए।

उत्तर : ये एक प्रायोगिक कार्य है। विद्यार्थी अपनी कक्षा में इस करने का प्रयास करें। वे प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ें और अपनी कक्षा में सुनाएं। कहानियों का मंचन भी करें।

प्रश्न-2 : शिक्षा रटंत विद्या नहीं है-इस विषय पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।

उत्तर : शिक्षा का उद्देश्य केवल रटंत विद्या तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा का मूल उद्देश्य छात्रों को जीवन के विभिन्न पहलुओं के लिए तैयार करना है, जिसमें ज्ञान, समझ, और व्यावहारिक कौशल शामिल हैं। रटंत विद्या से छात्र केवल परीक्षा पास करने के लिए सामग्री याद कर लेते हैं, बिना उसकी गहरी समझ के। यह ज्ञान जल्दी ही भूल जाता है और छात्रों में सृजनात्मकता और समस्या समाधान कौशल का विकास नहीं हो पाता। सच्ची शिक्षा वह है जो छात्रों को सोचने, समझने और ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में लागू करने की क्षमता देती है।

शिक्षा का लक्ष्य छात्रों को समग्र रूप से विकसित करना है, न कि केवल रटंत विद्या तक सीमित रखना। शिक्षण विधियों में परिवर्तन की आवश्यकता है, जिससे छात्रों में गहन समझ, सृजनात्मकता, और व्यावहारिक कौशल का विकास हो सके। यह सुनिश्चित करेगा कि वे केवल जानकारी को याद न करें, बल्कि उसे समझें और जीवन में उपयोग कर सकें।

प्रश्न 3. क्या पढ़ाई और खेलकूद साथ-साथ चल सकते हैं-कक्षा में इस पर वाद-विवाद कार्यक्रम आयोजित कीजिए।

उत्तर : वाद-विवाद : क्या पढ़ाई और खेलकूद साथ-साथ चल सकते हैं?

पक्ष में

हाँ, पढ़ाई और खेलकूद साथ-साथ चल सकते हैं। दोनों का संतुलन छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए महत्वपूर्ण है। खेलकूद से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, जो मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। इससे छात्र अधिक सक्रिय और ऊर्जावान महसूस करते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई में भी सुधार होता है। कई अध्ययन बताते हैं कि खेलकूद में भाग लेने वाले छात्रों की एकाग्रता और स्मरण शक्ति बेहतर होती है। इसलिए, खेलकूद और पढ़ाई का मेल छात्रों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखता है।

विपक्ष में

नहीं, पढ़ाई और खेलकूद का साथ-साथ चलना मुश्किल है। दोनों में संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि समय का उचित बंटवारा नहीं हो पाता। खेलकूद में अधिक समय देने से पढ़ाई का समय कम हो जाता है, जिससे अकादमिक प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है। छात्रों को अच्छे अंक पाने के लिए अध्ययन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके अलावा, खेलकूद में लगी चोटें भी पढ़ाई में बाधा बन सकती हैं।

प्रश्न 4. क्या परीक्षा पास कर लेना ही योग्यता का आधार है? इस विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

उत्तर : परीक्षा पास कर लेना ही योग्यता का आधार है इस विषय पर चर्चा इस प्रकार होगी..

पहला मत

परीक्षा पास करना एक महत्वपूर्ण योग्यता का मापदंड है क्योंकि यह छात्रों की ज्ञान और समझ को मापता है। परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने से यह साबित होता है कि छात्र ने विषय को अच्छी तरह से समझा और सीखा है। यह नौकरी और उच्च शिक्षा के लिए प्राथमिक मानदंड भी है।

दूसरा मत

परीक्षा पास कर लेना ही योग्यता का संपूर्ण आधार नहीं हो सकता। योग्यता का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान, नैतिक मूल्य, और सृजनात्मकता भी है। कुछ छात्र परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते लेकिन वे अन्य क्षेत्रों में अत्यधिक सक्षम हो सकते हैं।



परियोजना कार्य

प्रश्न-1 : कहानी में जिंदगी से प्राप्त अनुभवों को किताबी ज्ञान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बताया गया है। अपने माता-पिता बड़े भाई-बहिनों या अन्य बुजुर्ग/बड़े सदस्यों से उनके जीवन के बारे में बातचीत कीजिए और पता लगाइए कि बेहतर ढंग से जिंदगी जीने के लिए क्या काम आया-समझदारी/पुराने अनुभव या किताबी पढ़ाई?

उत्तर : कहानियों और जिंदगी के अनुभवों में हमें अक्सर यह सिखाया जाता है कि वास्तविक जीवन के अनुभव किताबी ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। इस विषय पर, मैंने अपने माता-पिता और बड़े भाई-बहनों से बातचीत की और उनके जीवन के अनुभवों से कुछ महत्वपूर्ण बातें सीखीं।

मेरे पिता ने बताया कि उनके जीवन में कई ऐसी परिस्थितियाँ आईं जहाँ किताबी ज्ञान से ज्यादा समझदारी और पुराने अनुभव काम आए। जब उन्होंने अपना व्यापार शुरू किया, तो कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन समस्याओं को हल करने में उनके जीवन के अनुभव और समझदारी ने अधिक मदद की। उन्होंने यह भी कहा कि किताबी ज्ञान आवश्यक है, लेकिन समझदारी और अनुभव के बिना वह अधूरा है।

मेरी माँ ने भी अपने जीवन से कुछ उदाहरण साझा किए। उन्होंने बताया कि परिवार का प्रबंधन और बच्चों की परवरिश में किताबी ज्ञान से ज्यादा समझदारी और अनुभव ने मदद की। उन्होंने कई बार पुरानी पीढ़ियों के अनुभवों से सीखा और उन्हें अपने जीवन में लागू किया।

मेरे बड़े भाई ने यह बताया कि उनके करियर में किताबी ज्ञान के साथ-साथ अनुभवी लोगों से मिली सलाह और उनके स्वयं के अनुभवों ने उन्हें आगे बढ़ने में मदद की। उन्होंने कई बार किताबी ज्ञान का उपयोग किया, लेकिन उसे व्यावहारिक जीवन में लागू करने के लिए समझदारी और अनुभव की जरूरत पड़ी।

बातचीत से यह स्पष्ट हुआ कि बेहतर ढंग से जिंदगी जीने के लिए समझदारी और पुराने अनुभव अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। किताबी पढ़ाई महत्वपूर्ण है और हमें मूलभूत ज्ञान प्रदान करती है, लेकिन जिंदगी की वास्तविक समस्याओं को हल करने के लिए अनुभव और समझदारी की आवश्यकता होती है।

इसलिए, हमें दोनों का संतुलन बनाए रखना चाहिए और जीवन के अनुभवों से सीखना चाहिए ताकि हम जिंदगी को बेहतर ढंग से जी सकें।

प्रश्न-2 : आपकी छोटी बहिन/छोटा भाई छात्रावास में रहती/रहता है। उसकी पढ़ाई-लिखाई के संबंध में उसे एक पत्र लिखिए।

उत्तर : छोटी बहन को पत्र

प्रिय छोटी बहिन रजनी
खुश रहो,

आशा है तुम स्वस्थ और प्रसन्न हो। यहाँ सब कुशल हैं। तुम छात्रावास में अच्छे से रह रही हो और अपनी पढ़ाई में ध्यान दे रही हो, यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई।

पढ़ाई के इस महत्वपूर्ण समय में कुछ बातें तुम्हें याद दिलाना चाहता हूँ। सबसे पहले, अपने दिनचर्या को सही तरीके से व्यवस्थित करो। समय पर उठो, नियमित रूप से कक्षाओं में भाग लो, और जो भी काम मिले उसे समय पर पूरा करो। खुद पर विश्वास रखो और मेहनत से पढ़ाई करो। कोई भी विषय कठिन लगे तो तुरंत अपने शिक्षक से पूछो या अपने मित्रों की सहायता लो।

अपनी सेहत का भी ध्यान रखो। नियमित रूप से भोजन करो और पर्याप्त नींद लो। पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ी बहुत खेलकूद भी जरूरी है, इससे मन ताज़ा रहता है और पढ़ाई में भी मन लगता है।

याद रखो कि हम सब तुम्हारे साथ हैं और तुम्हें हर कदम पर सपोर्ट करेंगे। अगर तुम्हें कभी किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो या किसी समस्या का सामना करना पड़े, तो बिना हिचकिचाए हमें लिखो या फोन करो।

तुम्हारे उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए,

तुम्हारा भाई
रमन


बड़े भाई साहब, लेखक – प्रेमचंद (कक्षा-10, पाठ-8 हिंदी, स्पर्श भाग 2) (NCERT Solutions)


कक्षा-10 हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ

साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पद : मीरा (कक्षा-10 पाठ-2 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तोप : वीरेन डंगवाल (कक्षा-10 पाठ-5 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

कर चले हम फिदा : कैफ़ी आज़मी (कक्षा-10 पाठ-6 हिंदी स्पर्श भाग-2) (हल प्रश्नोत्तर)

आत्मत्राण : रवींद्रनाथ ठाकुर (कक्षा-10 पाठ-7 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

अफ़ासानी निकितन किसके काल में भारत आया?​

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अफ़ासानी निकितन एक रूसी व्यापारी था जो पंद्रहवीं शताब्दी में भारत आया था। उस दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य जैसे साम्राज्य थे और राजा कृष्णदेव राज के पूर्ववर्ती राजा का शासन था।

अफ़ासानी निकितन सन 1466 से 1475 के बीच रूस से अपने विशेष विदेश यात्रा पर निकला था। 8 वर्षों की अपनी विदेश यात्रा के काल में वह 3 वर्षों तक भारत रहा। वह जब रूसे व्यापार हेतु चला दो रास्त में वह कई बार लूटा गया। बाद में उसने विदेश यात्रा करने निर्णय लिया। उसने भारत के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। वह रूस से चलकर जॉर्जिया, आर्मेनिया और ईरान के रास्ते भारत आया था।

अफ़ासानी निकितन का भारत में पहला पड़ाव महाराष्ट्र में मुंबई के निकट ‘चौपा’ नामक गाँव था। यह एक समुद्र तटीय गाँव था। जहाँ पर अफ़ासानी निकितन ने अपना पहला कदम रखा। वहाँ से उसने भारत में कई जगह की यात्राएं की और अपने साथ वह जो सामान लाया था, उसने वह सामान बेचा। अपने साथ वह एक अच्छी नस्ल का घोड़ा भी लाया था क्योंकि उस समय भारत में अच्छी नस्ल के घोड़ों की कमी होती थी और भारत के बाहर से अरबी व्यापारी आकर भारत में उच्च कोटि की नस्ल के घोड़े बेचते थे। अफासानी निकितन ने भी अपने साथ एक अच्छी नस्ल का घोड़ा लाकर, उसने वह घोड़ा भारत में बेचा।

अफ़ासानी निकितन 3 वर्षों तक भारत में रहा और उसने अपनी भारत यात्रा पर एक पुस्तक भी लिखी, जिसका नाम ‘तीन समुद्र पार का सफरनामा’ है। मूल रूप से रूसी भाषा में लिखी गई इस पुस्तक में अफ़ासानी निकितन ने अपनी भारत यात्रा का वर्णन किया है। उसने अपनी भारत यात्रा के दौरान विजयनगर साम्राज्य, गुलबर्गा, बीदर, गोलकुंडा जैसे राज्यों की यात्रा की, क्योंकि उसने इन सभी जगह का वर्णन अपनी पुस्तक में किया है। इस तरह अफ़ासानी निकितन जब भारत आया था तो उस समय दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य का शासन था।


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स्तूपों की खोज कैसे हुई? समझाइए।

किताब-उल-हिंद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

निम्नलिखित शब्दों में संधि कीजिए- 1. सम् + चय 2. वाक् + मय 3. राका + ईश 4. सत् + मार्ग 5. निः + पक्ष 6. सु + आगत 6. उत् + लेख 7. एक + एक 8. तत् + लीन 9. तपः + बल

निम्नलिखित शब्दों में संधि कीजिए…

1. सम् + चय : संचय
संधि भेद : व्यंजन संधि

2. वाक् + मय : वांङ्मय
संधि भेद : व्यंजन संधि

3. राका + ईश : राकेश
संधि भेद : गुण स्वर संधि

4. सत् + मार्ग : सत्मार्ग
संधि भेद : व्यंजन संधि

5. निः + पक्ष : निष्पक्ष
संधि भेद : विसर्ग संधि

6. सु + आगत : स्वागत
संधि भेद : यण स्वर संधि

6. उत् + लेख : उल्लेख
संधि भेद : व्यंजन संधि

7. एक + एक : एकाएक
संधि भेद : गुण स्वर संधि

8. तत् + लीन : तल्लीन
संधि भेद : व्यंजन संधि

9. तपः + बल : तपोबल
संधि भेद : विसर्ग संधि

संधि के तीन भेद होते हैं..

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि

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चोल साम्राज्य

परिचय

चोल राज्य दक्षिण भारत का एक प्रमुख और शक्तिशाली साम्राज्य था जो लगभग 9वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी तक फलता-फूलता रहा। इस साम्राज्य का योगदान कला, वास्तुकला, साहित्य, और प्रशासन के क्षेत्र में अद्वितीय रहा है।

स्थापना और विस्तार

चोल वंश की स्थापना करिकाल चोल ने की थी, लेकिन इसे वास्तविक महानता राजराजा चोल और उनके पुत्र राजेंद्र चोल के शासनकाल में मिली। राजराजा चोल प्रथम (985-1014 ईस्वी) ने चोल साम्राज्य का विस्तार किया और इसे एक शक्तिशाली नौसैनिक शक्ति बनाया। उनके पुत्र, राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 ईस्वी) ने इस साम्राज्य को और भी विस्तारित किया, जिसमें उन्होंने बंगाल की खाड़ी के पार श्रीविजय साम्राज्य (वर्तमान इंडोनेशिया और मलेशिया) तक अपने अभियानों को फैलाया।

प्रशासन

चोलों का प्रशासनिक तंत्र अत्यंत व्यवस्थित और सुसंगठित था। उन्होंने केंद्र, प्रांत, और स्थानीय स्तर पर प्रशासन का संचालन किया। गांवों में स्वायत्तता दी गई थी और वे अपने मामलों का संचालन स्वयं करते थे, जो “उर” और “सभाएँ” कहलाती थीं। कर संग्रह, भूमि रिकॉर्ड और सैन्य संगठन में भी चोल प्रशासन का विशेष योगदान था।

कला और वास्तुकला

चोल काल में कला और वास्तुकला ने अत्यधिक प्रगति की। बृहदेश्वर मंदिर (राजराजेश्वर मंदिर) तंजावुर में राजराजा चोल प्रथम द्वारा बनवाया गया था, जो चोल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। चोल शासकों ने कांस्य मूर्तिकला में भी विशेष योगदान दिया, जिनमें नटराज की मूर्तियाँ विश्व प्रसिद्ध हैं।

साहित्य और संस्कृति

चोल राज्य के दौरान तमिल साहित्य और संस्कृति का बहुत विकास हुआ। संगम साहित्य, भक्ति काव्य, और धार्मिक ग्रंथों की रचना हुई। चोल शासकों ने तमिल भाषा और साहित्य को प्रोत्साहन दिया।

अंतिम समय

13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, चोल साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया। पंड्या और होयसला साम्राज्यों ने चोलों की शक्ति को चुनौती दी और अंततः 1279 ईस्वी में पंड्या साम्राज्य ने चोलों को परास्त कर दिया।

निष्कर्ष

चोल राज्य ने दक्षिण भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी प्रशासनिक नीतियों, कला, वास्तुकला, और सांस्कृतिक योगदान ने भारतीय उपमहाद्वीप की धरोहर को समृद्ध किया। चोल शासकों का गौरवशाली युग भारतीय इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा।


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अब्दुल फजल कौन था? अकबरनामा को उसके महत्वपूर्ण योगदान में से एक क्यों माना जाता है स्पष्ट कीजिए!

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स्तूपों की खोज और उनके पुनः प्रकाश में आने की कहानी काफी रोचक और ऐतिहासिक है। यह विशेष रूप से 19वीं और 20वीं शताब्दी में हुई जब भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में पुरातात्विक खोजें जोर पकड़ने लगीं।

स्तूपों की खोज कैसे हुई? जानते हैं…

प्रारंभिक साक्ष्य और इतिहास

1. अशोक का योगदान : मौर्य सम्राट अशोक (273-232 ईसा पूर्व) ने बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद भारत में कई स्तूपों का निर्माण कराया। उन्होंने गौतम बुद्ध के अवशेषों को पूरे देश में विभाजित किया और उन्हें स्तूपों में संरक्षित किया। अशोक ने स्तूपों को बौद्ध धर्म के प्रचार के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया।

2. साहित्यिक साक्ष्य : प्रारंभिक बौद्ध साहित्य, जैसे कि त्रिपिटक, में स्तूपों का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों में स्तूपों के महत्व और उनके निर्माण की विधि का वर्णन है।

यूरोपीय खोज और पुरातत्व

1. अलेक्जेंडर कनिंघम : 19वीं शताब्दी में अलेक्जेंडर कनिंघम, जो कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक थे, ने भारत में कई प्रमुख बौद्ध स्थलों की खोज की। उन्होंने सांची, सारनाथ, और बोद्धगया जैसे महत्वपूर्ण स्थलों की खुदाई की और वहाँ स्तूपों की पहचान की।

2. जेम्स प्रिंसेप : जेम्स प्रिंसेप ने भारतीय पुरालेखों और शिलालेखों का अध्ययन किया। उन्होंने ब्राह्मी लिपि को डिकोड किया, जिससे हमें अशोक के शिलालेखों को पढ़ने में मदद मिली और बौद्ध धर्म के इतिहास को समझने में सहायता मिली।

महत्वपूर्ण खोजें

1. सांची स्तूप : सांची का महान स्तूप, जो मध्य प्रदेश में स्थित है, भारत के सबसे महत्वपूर्ण और संरक्षित स्तूपों में से एक है। इसकी खोज 19वीं शताब्दी में हुई और यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

2. अमरावती स्तूप : आंध्र प्रदेश में स्थित यह स्तूप प्रारंभिक भारतीय कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ की खुदाई में सुंदर नक्काशी और बौद्ध कला के नमूने मिले।

3. धमेक स्तूप : सारनाथ में स्थित यह स्तूप वह स्थल है जहाँ गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। यह स्तूप अशोक द्वारा निर्मित मूल स्तूप के स्थान पर बना है।

आधुनिक समय में

1. यूनेस्को और संरक्षण : कई प्रमुख स्तूपों को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता मिली है, जिससे उनके संरक्षण और पुनर्निर्माण के प्रयासों में वृद्धि हुई है।

2. वैज्ञानिक विधियाँ : आधुनिक पुरातात्विक तकनीकों, जैसे कि रेडियोग्राफी और कार्बन डेटिंग, ने स्तूपों की खोज और उनके निर्माण की तिथि निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

निष्कर्ष

स्तूपों की खोज ने न केवल बौद्ध धर्म के इतिहास को उजागर किया है, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को भी पुनर्जीवित किया है। इन खोजों ने हमें प्राचीन काल की स्थापत्य कला, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक संरचना के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की हैं।


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सामान्य तथा निकृष्ट वस्तुओं में अन्तर

अर्थशास्त्र के संदर्भ में सामान्य वस्तुएं अथवा श्रेष्ठ वस्तुएं वह वस्तुएं होती हैं, जो उपभोक्ता की दृष्टि में उपभोग की दृष्टि से श्रेष्ठ होती है और जिन्हें उपभोक्ता आय में वृद्धि होने पर प्राथमिकता देता है। ऐसी वस्तुओं की गुणवत्ता उत्तम होती है। सामान्य वस्तुओं के मूल्य और उनकी मांग के वक्र में धनात्मक संबंध होता है। ऐसी वस्तुओं की आय-मांग का वक्र धनात्मक ढाल वाला होता है, अर्थात ये वक्र बाएं से दाएं ऊपर की ओर चढ़ता चला जाता है। जैसे-जैसे उपभोक्ता की आय में वृद्धि होती है, ऐसी वस्तुओं की उसकी मांग में भी वृद्धि होती है और यदि उपभोक्ता की आय में कमी होती है तो मांग में भी कमी होती है। ऐसी वस्तुएं उपभोक्ता अच्छी आय होने पर खरीदते हैं और उनके लिए ऐसी वस्तुएं महत्व रखती हैं, जिससे उन्हें पूर्ण संतुष्टि का अनुभव होता है।

जैसे देसी घी, रेशमी कपड़े, बासमती चावल, उच्च स्तरीय ब्रांड की वस्तुएं आदि ।

निकृष्ट अथवा निम्न वस्तुओं से तात्पर्य उन वस्तुओं से है जो उपभोक्ता की दृष्टि में कमतर अर्थात हीन होती हैं। ऐसी वस्तुओं को उपभोक्ता केवल आय और खरीदारी सामर्थ्य कम होने पर ही खरीदता है अथवा श्रेष्ठ वस्तुओं की अनुलब्धता में और कोई विकल्प न होने पर ही खरीदता है। निकृष्ट वस्तुओं की आय-मांग वक्र में ऋणात्मक संबंध होता है। अर्थात ये वक्र बायें से दायें ऊपर से नीचे की ओर गिरता जाता है। जैसे-जैसे उपभोक्ता की आय में कमी होती है वह निकृष्ट वस्तुओं की खरीदने को विवश होता है। जैसे ही उपभोक्ता आय बढ़ने लगती है, वह निकृष्ट वस्तुओं का उपभोग छोड़कर श्रेष्ठ वस्तुओं को खरीदने लगता है।

जैसे देसी घी के स्थान पर वनस्पति घी, रेशमी कपड़े के स्थान पर सूती या खादी कपडे, बासमती चावल के स्थान पर मोटा अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, साधारण चावल आदि।


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धूलि-धूसर का समास-विग्रह करें।

धूलि-धूसर का समास-विग्रह इस प्रकार होगा

समस्त : धूलि-धूसर
समास विग्रह : धूलि से धूसर
समास भेद : तत्पुरुष समास
तत्पुरुष समास का उपभेद : करण तत्पुरुष समास

स्पष्टीकरण :

‘धूलि-धूसर’ इसमें ‘करण तत्पुरुष समास’ है। इसमें तत्पुरुष समास का उपभेद ‘करण तत्पुरुष’ समास है। इसका मुख्य कारण ये है कि ‘धूलि-धूसर’ का जब समास विग्रह करेंगे को तो इसमें ‘से’ कारक चिन्ह का प्रयोग होगा। उसका समस्त पद बनाते समय इस कारक चिन्ह का लोप हो जाएगा।

करण तत्पुरुष समास तत्पुरुष समास का एक उपभेद है। ‘करण तत्पुरुष’ समास में समस्त पद का विग्रह करते समय ‘से’ अथवा ‘के द्वारा’ कारक चिन्ह का लोप होता है।

जैसे :

शोकाकुल : शोक से आकुल
मनमाना : मन से माना हुआ
करुणापूर्ण : करुणा से पूर्ण


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‘सीना-पिरोना’ का समास विग्रह कीजिए।

‘आटे-दाल’ इस समस्त पद का समास विग्रह और समास भेद क्या होगा?

सीताएलिया की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

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सीताएलिया वह स्थान है जहाँ पर रावण ने माता सीता का अपहरण कर उन्हें कैदी बनाकर रखा था। सीताएलिया श्रीलंका में स्थित एक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थान है। यहाँ पर अनके पहाड़ियां हैं और उन पारियों में गुफाएं हैं। इन्हीं में से एक गुफा में रावण ने सीता माता का अपहरण करके उन्हें कैदी बनाकर रखा था।

अशोक वाटिका यहीं पर स्थित गुफा है, जहाँ पर सीता माता को कैद करके रखा गया था। यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थान है, जहां पर चारों तरफ पहाड़ियां ही पहाड़िया है और चारों तरफ ऊंचे ऊंचे हरे-भरे वृक्ष फैले हैं। यहाँ पर सीता माता का मंदिर भी जो इस बात को प्रकट करता है कि कभी यहाँ पर माता सीता रहीं थी।

सीताएलिया (या नुवारा एलिया) श्रीलंका के सेंट्रल प्रांत में स्थित है। यह स्थान श्रीलंका के पहाड़ी क्षेत्रों में आता है और अपनी ठंडी जलवायु, हरे-भरे चाय के बागान, और सुंदर प्राकृतिक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। नुवारा एलिया को ‘लिटिल इंग्लैंड’ भी कहा जाता है क्योंकि इसका वातावरण और स्थापत्य शैली ब्रिटिश औपनिवेशिक युग की याद दिलाते हैं।

सीताएलिया के चारों ओर हरे-भरे जंगल फैले हुए हैं, जो इसकी प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ा देते हैं। इन जंगलों में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं, जो यहाँ की जलवायु को शीतल और ताजगी से भरपूर बनाते हैं।

सीताएलिया की पहाड़ियाँ और पर्वत श्रृंखलाएं इसके प्राकृतिक सौंदर्य को एक नया आयाम देती हैं। ये पर्वत अपनी ऊँचाई से एक भव्य दृश्य प्रस्तुत करते हैं और यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत सुंदर दिखाई देता है।

सीताएलिया की नदियाँ और झरने यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता में चार चाँद लगा देते हैं। बहते हुए पानी की कलकल ध्वनि और झरनों का शीतल जल यहाँ आने वाले पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। ये झरने और नदियाँ इस क्षेत्र की जैव विविधता को भी समृद्ध करते हैं।

नुवारा एलिया का शांत और ठंडा वातावरण, हरी-भरी पहाड़ियाँ, और आकर्षक स्थलों की वजह से यह जगह पर्यटकों के बीच बहुत ही लोकप्रिय है।


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“आज हमारे घर गाजर का स्वादिष्ट” हलवा बन रहा है।- रेखांकित अंश का पदबंध बताइए- A-संज्ञा पदबंध B-विशेषण पदबंध C-सर्वनाम पदबंध D-क्रिया विशेषण पदबंध

सही विकल्प है :

B – विशेषण पदबंध

विस्तृत विवरण :

इस वाक्य में “आज हमारे घर गाजर का स्वादिष्ट” यह पदसमूह​ एक विशेषण पदबंध होगा। ‘विशेषण पदबंध’ वे पदबंध होते हैं, जिनमें पूरा पद समूह एक विशेषण की तरह कार्य कर रहा होता है।

इस वाक्य में “आज हमारे घर गाजर का स्वादिष्ट” यह पूरा पदसमूह एक विशेषण की तरह कार्य कर रहा है और हलवे की विशेषता को बता रहा है। इसलिए यह एक विशेषण पदबंध है।

पदबंध क्या हैं?

पदबंध से तात्पर्य पदों के उस समूह से होता है जो मिलकर किसी एक पद का कार्य करते हैं। अर्थात दो या दो से अधिक पद जब मिलकर किसी एक पद की तरह कार्य करते हैं तो वह पदबंध कहलाते हैं।


अस्वाद व्रत का अर्थ ​क्या है?

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अस्वाद का अर्थ है, स्वाद ना लेना और अस्वाद व्रत का अर्थ है, स्वाद की कामना न करना और अपनी जिह्वा पर नियंत्रण रखना। स्वाद यानि रस मजा यानी कोई भी खाद्य पदार्थ खाते वक्त हमें जो स्वाद लगता है वह ही आस्वाद है। अस्वाद व्रत का अर्थ है स्वाद के खाने हेतु स्वाद की मनोवृति पर अंकुश लगाना अर्थात भोजन को स्वाद के लिए नहीं बल्कि शरीर की जरूरत के अनुसार मानकर खाना। भोजन करते समय लोग स्वाद को अधिक महत्व देते हैं और स्वाद के कारण अलग-अलग तरह की चीजें खाते हैं, उसमें वह यह नहीं देखते कि उनके शरीर को इससे क्या लाभ क्या हानि है। उन्हें उसका स्वाद अच्छा लग रहा है, इसलिए वह खा रहे हैं। स्वाद की प्रवृत्ति पर नियंत्रण लगाना और स्वाद के प्रति निर्विकार भाव रखना ही आस्वाद व्रत है ।


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अगर दरिया कंकड़ और रोड़े को और आगे ले जाता, तो क्या होता है? विस्तार से बताइए।

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अगर दरिया कंकड़ और रोड़े को और आगे ले जाता तो धीरे-धीरे कंकड़ या रोड़ा छोटा होता जाता और छोटा होते-होते अंत में वह बालू के एक जर्रे यानी रेत के एक कण जितना छोटा हो जाता और समुद्र के किनारे अन्य बालू भाइयों यानि अन्य बालू के कणों से जा मिलता। इस तरह वह एक सुंदर बालू का किनारा बन जाता। इस बालू के किनारे पर छोटे-छोटे बच्चे खेलते और बालू के घरोंदे बनाते। इस तरह भले ही कंकड़ और रोड़े का मूल अस्तित्व भले ही समाप्त हो जाता लेकिन वे रेत के कण के रूप में अपनी सार्थक उपयोगिता के रूप में रहता।

संदर्भ पाठ

पाठ – संसार पुस्तक है, लेखक – जवाहरलाल नेहरु (कक्षा-6 पाठ-12)


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गर्मियों की छुट्टियों में तुम्हारे दिन कैसे बीते हैं, अपनी बुआजी को पत्र लिखें।

औपचारिक पत्र

छुट्टियों के बारे में बताते हुए बुआजी को पत्र

 

दिनांक : 2 जुलाई 2024,

प्रिय बुआ जी,
चरण स्पर्श ।

मुझे पूरी आशा है कि आप स्वस्थ और प्रसन्न होंगी। हम सब भी यहाँ पर स्वस्थ और प्रसन्न हैं।

बुआजी, आज ही आपका पत्र प्राप्त हुआ था। आपने मुझसे मेरी गर्मियों की छुट्टियों के बारे में पूछा कि मैं गर्मियों की छुट्टियों में मेरा समय कैसे बीता और मैं कहाँ गईं? तो बुआजी गर्मियों की छुट्टियों में मेरा समय बहुत अच्छा बीता। बुआजी, गर्मियों की छुट्टियों में पहले हम अपनी नानी के घरगए थे। वहाँ पर मैं 15 दिनों तक रही। नानी के साथ समय बिताना बहुत ही मजेदार था। नानी ने हमें तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाकर खिलाए। नानी, बहुत ही स्वादिष्ट खाना बनाती हैं। नानी के बगीचे में सेब और आम के पेड़ लगे थे। हमने जीभर कर आम और सेबों का मजा लिया। एक दिन हम सब लोग गाँव के पास एक झील के किनारे पिकनिक पर भी गए थे, जहां पर हमने बहुत मजे किए और झील के किनारे बैठकर खूब गप्पें मारी।

इसके बाद हम पहाड़ों की यात्रा पर गए। वहां का मौसम बहुत सुहावना था। हमने बहुत सारी नई जगहें देखीं और प्रकृति की सुंदरता का आनंद लिया। पहाड़ों में ट्रैकिंग करना और झरने के पास बैठकर पानी की कलकल ध्वनि सुनना एक अद्भुत अनुभव था।

मुझे फोटोग्राफी का बहुत शौक है, इसलिए मैंने वहां की सुंदर तस्वीरें भी खींची हैं। मैं जल्द ही आपको वो तस्वीरें दिखाऊंगी।

छुट्टियों के दौरान मैंने कुछ नई किताबें भी पढ़ीं और बहुत कुछ सीखा। अब स्कूल खुलने का समय आ गया है और मैं नई ऊर्जा के साथ तैयार हूँ।

आपकी भतीजी
ज्योत्सना,
शिमला


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‘सीना-पिरोना’ का समास विग्रह कीजिए।

सीना-पिरोना सीना पिरोना का समास विग्रह इस प्रकार है..

समस्त पद : सीना-पिरोना
समास विग्रह : सीना और पिरोना
समास का नाम : द्वन्द्व समास

स्पष्टीकरण :

‘सीना-पिरोना’ में जंतु समाज इसलिए है क्योंकि सीना-पिरोना इस समस्त पद में दोनों पद प्रधान है। द्वंद्व समास में दोनों पद प्रधान होते हैं। द्वंद्व समास का विग्रह करते समय किसी योजक द्वारा उन्हें पृथक किया जाता है। सीना और पिरोना दोनों पद प्रधान है और दोनों पदों का समान मुख्य अर्थ है, इसी कारण यहां पर द्वंद्व समास प्रयुक्त हो रहा है।

द्वंद्व समास की परिभाषा के अनुसार दोनों समास में दोनों पद प्रधान होते हैं तथा जब इन पदों का समास विग्रह किया जाता है तो इन पदों के बीच ‘और’, ‘अथवा’, ‘या’, ‘एवं’ जैसे योजक लगते हैं।

द्वंद्व समास के कुछ उदाहरण…

माता-पिता : माता और पिता
राजा-रानी : राजा और रानी
सुख-दुख : सुख और दुख


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‘दुनिया सोती थी पर दुनिया की जीभ जागती थी।’ कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। (नमक का दरोगा)

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‘दुनिया सोती थी पर दुनिया की जीभ जागती थी’ इस कथन का आशय यह है कि किसी भी घटना के प्रसारित होने में समय नहीं लगता। पंडित अलोपदीन को जैसे ही दरोगा वंशीधर ने गिरफ्तार किया वैसे ही घटना तेजी से पूरे नगर में फैल गई। इस कथन का आशय भी यही है कि किसी भी घटना को प्रसारित में लोग दिन-रात भी नहीं देखते। ऐसा भले ही लग रहा हो कि रात का समय और दुनिया सो रही हो लेकिन लोग की जुबान शांत नही रहती। उनकी जुबान पर कोई बात स्थिर नही रह पाती। वह जो कुछ सुनते है उसे दूसरे तक पहुँचाने में जरा भी देरी नहीं करते। इस तरह लोगों की जुबान (जीभ) शांत नही रहती थी।

‘नमक का दरोगा’ कहानी में यह कथन उस समय आया है, जब दरोगा वंशीधर ने पंडित अलोपदीन को गिरफ्तार कर लिया। पंडित अलोपदीन शहर की जानी-मानी हस्ती थे। उनके पास अपार धन था फिर भी दरोगा बंशीधर ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया तो लोगों को आश्चर्य हुआ कि अपनी धन संपत्ति के बलबूते पर किसी को भी खरीद लेने वाले पंडित अलोपदीन आज गिरफ्तार कैसे हो गए। रात में वंशीधर ने अलोपदीन को गिरफ्तार किया था लेकिन सुबह होते-होते यह घटना पूरे नगर में आज की तरह फैल गई थी।


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किसे ‘देव-दुर्लभ त्याग’ कहा गया है और क्यों?

‘नमक का दरोगा’ पाठ में धर्म को ‘देव-दुर्लभ त्याग’ कहा गया है। यहाँ पर दरोगा वंशीधर धर्म का प्रतीक है क्योंकि वह अपने कर्तव्यपथ पर अडिग है। उसने किसी भी तरह के लोभ के जाल में न फंसते हुए अपने कर्तव्य का पालन किया। इस तरह वंशीधर ने देव दुर्लभ त्याग किया। ऐसा त्याग करना आसान नहीं होता। ऐसे त्याग करने के लिए देवता भी हिचकिचा जाते हैं, लेकिन दरोगा मुंशी वंशीधर ने ऐसे त्याग को करने में जरा भी संकोच नहीं दिखाया।

मुंशी वंशीधर ने अपनी कर्तव्य निष्ठा का पालन करते हुए पंडित अलोपदीन द्वारा दी गई हजारों रुपए की रिश्वत को भी ठुकरा दिया। 40000 रुपए की रिश्वत ठुकराना कोई आसान कार्य नहीं होता। इतनी बड़ी राशि को देखकर बड़े-बड़े के ईमान डोल जाते हैं, लेकिन दरोगा मुंशी वंशीधर का ईमान इतनी बड़ी राशि को देखकर भी नहीं डोला और उसने अपनी कर्तव्य निष्ठा का पालन किया और रिश्वत लेना स्वीकार नहीं किया।

मुंशी वंशीधर धर्म का प्रतीक था। धर्म हमेशा बुद्धिहीन और देव-दुर्लभ त्याग के लिए जाना जाता है। इसीलिए मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘नमक का दरोगा’ में दरोगा मुंशी वंशीधर को धर्म का प्रतीक और देव-दुर्लभ त्याग कहा है।


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भगवद्गीता के किस श्लोक में बतलाया गया हैं कि हर मनुष्य को अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए. जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना है। देह निर्वाह के लिए त्याग (संन्यास) का अनुमोदन न तो भगवान करते हैं और न कोई धर्मशास्त्र ही। (1) अध्याय 4 श्लोक 12 (2) अध्याय 16 श्लोक 12 (3) अध्याय 8 श्लोक 2 (4) अध्याय 3 श्लोक 8

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इस प्रश्न का सही विकल्प होगा :

अध्याय 3 श्लोक 8

विस्तार से समझें…

भगवद्गीता के अध्याय 3 श्लोक संख्या 8 में बताया गया है कि मनुष्य को अपना कर्म अपने धर्म के अनुसार ही करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि…

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
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अर्थात हर मनुष्य को अपने धर्म के अनुसार कर्म का आचरण करना चाहिए। यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे किसी विद्यार्थी का धर्म विद्या प्राप्त करना है, किसी सैनिक का कर्म देश की रक्षा करना है। जो लोग कर्म नहीं करते उनसे श्रेष्ठ तो वे लोग होते हैं, जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, क्योंकि धर्म के अनुसार कर्म किए बिना शरीर का पालन पोषण करना संभव नहीं। जिस व्यक्ति का जो धर्म है, उसे निभाते हुए अपना कर्म पूरा करना चाहिए।


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अपने चाचा-चाची को अपने जन्मदिन के लिए निमंत्रण पत्र लिखें।

औपचारिक पत्र

चाचा-चाची को जन्मदिन का निमंत्रण पत्र

 

श्री अशोक चंद्र,
14, शारदा भवन,
करोल बाग,
नई दिल्ली

30-06-2024

आदरणीय चाचा और चाची जी,
चरण स्पर्श

मैं यहाँ पर परिवार सहित कुशल से हूँ और आशा करता हूं कि आप भी वहाँ स्वस्थ और सानंद से होंगे । पिछली बार मैं छुट्टियों में आपसे मिलने नहीं आ पाया इसलिए आप मुझसे नाराज़ हो । जब आप इस शहर में रहते थे तब आपके साथ मुझे बहुत अच्छा लगता था लेकिन जब तबादले के कारण आपको यहाँ से जाना पड़ा और हम अलग हो गए और मिलने के अवसर भी कम हो गए ।

शायद आपको याद ही होगा कि 20 जुलाई को एक ऐसा अवसर आने वाला है जिसमें हमारी मुलाकात हो सकती हैं और वह है मेरा जन्मदिन। मैं जानता हूँ कि आप लोग मेरा जन्म दिन कभी नहीं भूल सकते । इस बार मेरे जन्मदिन पर माँ और पापा ने दिन में सत्यनारायण की कथा रखी है और शाम को एक छोटी-सी पार्टी का आयोजन किया अगर आप और चाची जी मेरे जन्मदिन पर आते हो तो यही मेरे लिए मेरे जन्मदिन का तोहफा होगा और मुझे बहुत अच्छा लगेगा। मैं जनता हूँ कि आप यह तोहफा मुझे जरूर दोगे । चाची जी को मेरी ओर से चरण – स्पर्श कहना। शेष मिलने पर…

आपका भतीजा,
निलेश

 


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मान लीजिए आपके चाचा जी आपके मित्र के पड़ोसी हैं। आपने अपने मित्र को कुछ सामान अलग-अलग लिफाफों में डालकर उन्हें देने के लिए दिया। मित्र द्वारा सामान चाचा जी को पहुंचाने के बाद उसका विवरण देते हुए आपके मित्र और आप में हुई बातचीत को लिखें।​