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निम्नलिखित में से कौन सा राजनीति शास्त्री राजनीतिक विकास की अवधारणा से संबंधित है? 1. एल्वमैन 2. रुडोल्फ 3. लॉसवेल 4. गोल्ड हैमर

इस प्रश्न का सही उत्तर है…

(1) एल्वमैन

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व्याख्या

राजनीतिक विकास की अवधारणा से राजनीति शास्त्री ‘एल्वमैन’ संबंधित हैं। उन्होंने राजनीतिक विकास के सिद्धांतों और प्रक्रियाओं पर महत्वपूर्ण कार्य किया है एल्वमैन ने विकासशील देशों में राजनीतिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया।

रुडोल्फ प्रशासनिक चिंतन से संबंधित हैं। उन्होंने सार्वजनिक प्रशासन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
लॉसवेल राजनीतिक शक्ति की संकल्पना से जुड़े हैं। उनका काम राजनीतिक शक्ति के वितरण और उपयोग पर केंद्रित है।
गोल्ड हैमर  मुख्यतः अनुवादक के रूप में प्रसिद्ध हैं, न कि राजनीतिक विकास के सिद्धांतकार के रूप में।

यह सुधार राजनीति विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में विद्वानों के योगदान को सही ढंग से पहचानने में मदद करता है। यह हमें याद दिलाता है कि राजनीति विज्ञान एक व्यापक क्षेत्र है जिसमें विभिन्न विशेषज्ञ अलग-अलग पहलुओं पर काम करते हैं।


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इस प्रश्न का सही उत्तर होगा…

2. यूनानी शब्द है

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व्याख्या

अंग्रेजी के ‘पॉलिटिक्स’ (Politics) शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के ‘पोलिस’ (Polis) शब्द से हुई है। पोलिस (Polis) शब्द एक ग्रीक भाषा का शब्द है, जो प्राचीन यूनानी सभ्यता में नगर-राज्य के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाता था।

प्राचीन यूनानी नगर-राज्य को ‘पोलिस’ (Polis) कहा जाता था। इसी से ‘पॉलिटिक्स’ शब्द की उत्पत्ति हुई। ‘पॉलिटिक्स’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अरस्तू ने किया था।  यह एक महत्वपूर्ण भाषाई और ऐतिहासिक संबंध है जो राजनीति विज्ञान की जड़ों को प्राचीन यूनान से जोड़ता है।
निम्नलिखित बिंदुओं से समझते हैं…

  • पोलिस का अर्थ : प्राचीन यूनान में ‘पोलिस’ का अर्थ नगर-राज्य था। यह एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई थी जो अपने नागरिकों के जीवन के सभी पहलुओं को नियंत्रित करती थी।
  • राजनीतिक जीवन का केंद्र : पोलिस राजनीतिक गतिविधियों, नागरिक भागीदारी और सार्वजनिक जीवन का केंद्र था।
  • भाषाई विकास : ‘पोलिस’ से ‘पॉलिटिकोस’ (Politikos) शब्द बना, जिसका अर्थ है ‘नागरिकों या राज्य से संबंधित’। यह आगे चलकर लैटिन में ‘पॉलिटिकस’ (Politicus) और अंग्रेजी में ‘पॉलिटिक्स’ (politics) बन गया।
  • अवधारणात्मक संबंध : यह शब्द न केवल भाषाई रूप से बल्कि अवधारणात्मक रूप से भी राजनीति को नगर-राज्य और नागरिक जीवन से जोड़ता है।
  • यूनानी दर्शन का प्रभाव : प्लेटो और अरस्तू जैसे यूनानी दार्शनिकों ने पोलिस के संदर्भ में राजनीति पर विस्तार से लिखा, जो आधुनिक राजनीति विज्ञान की नींव बना।
  • सांस्कृतिक महत्व : यह शब्द यूनानी सभ्यता के राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है, जो पश्चिमी राजनीतिक चिंतन का आधार है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि ‘पोलिस’ से ‘पॉलिटिक्स’ तक की यात्रा न केवल एक शब्द के विकास की कहानी है, बल्कि यह राजनीतिक विचारों और संस्थाओं के विकास की भी कहानी है। यह हमें याद दिलाता है कि आधुनिक राजनीतिक अवधारणाएँ गहरे ऐतिहासिक जड़ों से जुड़ी हुई हैं।


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यूनानी नगर-राज्य का आधुनिक नाम क्या है? 1. नगर 2. सरकार 3. कस्बा 4. राज्य

इस प्रश्न का सही उत्तर होगा…

4. राज्य

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व्याख्या
‘यूनानी नगर-राज्य’ का आधुनिक नाम ‘राज्य’ (The State) है। प्राचीन समय में यूनानी विचारकों ने नगर राज्य के लिए ‘राज्य’ (The State) शब्द का प्रयोग किया था। यूनानी भाषा में नगर-राज्य यानी राज्य को पोलिस (Polis) कहा जाता है। आज के संदर्भ में राज्य का प्रयोग सबसे पहले इटली के राजनीतिक विचारक ‘मैकियावली’ ने 16वीं शताब्दी में किया था। उन्होंने इस शब्द का प्रयोग अपनी पुस्तक ‘द प्रिंस’ में किया था। इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद The State के नाम से छपा था। इसीलिए यूनानी नगर-राज्य का आधुनिक नाम राज्य माना गया।

यूनानी नगर राज्य या ‘पोलिस’ का आधुनिक समकक्ष वास्तव में राज्य है।

यह निम्नलिखित कारणों से उचित है..

  • संप्रभु इकाई : प्राचीन यूनानी पोलिस एक स्वतंत्र और संप्रभु इकाई थी, जैसे आज के राज्य होते हैं।
  • क्षेत्रीय नियंत्रण : पोलिस एक निश्चित भू-भाग पर नियंत्रण रखता था, जो आधुनिक राज्य की एक प्रमुख विशेषता है।
  • शासन प्रणाली : पोलिस में अपनी शासन प्रणाली थी, जो आधुनिक राज्यों की तरह कानून बनाने और लागू करने का अधिकार रखती थी।
  • नागरिकता की अवधारणा: पोलिस में नागरिकता की एक स्पष्ट अवधारणा थी, जो आधुनिक राज्यों में भी मौजूद है।
  • सार्वजनिक और निजी जीवन का केंद्र: पोलिस नागरिकों के सार्वजनिक और निजी जीवन का केंद्र था, जैसे आज राज्य अपने नागरिकों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • आर्थिक इकाई : पोलिस एक आर्थिक इकाई के रूप में कार्य करता था, जैसे आधुनिक राज्य करते हैं।

यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि हालांकि पोलिस आकार में आधुनिक राज्यों से छोटे थे, लेकिन उनके कार्य और महत्व आधुनिक राज्यों के समान थे। वे अपने समय के लिए पूर्ण राजनीतिक इकाइयां थीं, जैसे आज के राज्य हैं।


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इस प्रश्न का सही उत्तर होगा…

(3) स्वतंत्र व्यक्तियों के स्वामी

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व्याख्या

स्वतंत्र व्यक्तियों के स्वामी को ग्रीक नगर राज्यों का नागरिक माना जाता है।
प्राचीन ग्रीक नगर-राज्यों में नागरिकता की अवधारणा आधुनिक समय से काफी भिन्न थी। ग्रीक नगर-राज्यों में नागरिक वे लोग माने जाते थे जो स्वतंत्र व्यक्तियों के स्वामी थे। इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं,

  • स्वतंत्र पुरुष : नागरिकता केवल स्वतंत्र पुरुषों तक ही सीमित थी। महिलाओं, बच्चों और गुलामों को नागरिक नहीं माना जाता था।
  • जन्म से प्राप्त अधिकार : आमतौर पर नागरिकता जन्म से प्राप्त होती थी। नागरिक माता-पिता से जन्मे पुरुष बच्चे ही नागरिक बनते थे।
  • संपत्ति का स्वामित्व : नागरिकों के पास अपनी संपत्ति होती थी और वे दूसरों (गुलामों) के स्वामी होते थे।
  • राजनीतिक अधिकार : नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रियाओं में भाग लेने का अधिकार था, जैसे मतदान करना और सार्वजनिक कार्यालयों में सेवा करना।
  • सैन्य सेवा : नागरिकों से अपेक्षा की जाती थी कि वे नगर-राज्य की रक्षा के लिए सैन्य सेवा प्रदान करें।
  • धार्मिक कर्तव्य : नागरिकों का नगर-राज्य के धार्मिक उत्सवों और समारोहों में भाग लेना अनिवार्य था।

यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि:

  • मजिस्ट्रेट नागरिकों द्वारा चुने जाते थे, लेकिन सभी नागरिक मजिस्ट्रेट नहीं होते थे।
  • गुलाम नागरिक नहीं माने जाते थे।
  • राजनैतिक विचारक नागरिक हो सकते थे, लेकिन सभी नागरिक राजनैतिक विचारक नहीं होते थे।
  • इस प्रकार, स्वतंत्र व्यक्तियों के स्वामी होना ग्रीक नगर-राज्यों में नागरिकता का सबसे व्यापक और सटीक वर्णन है।

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सही उत्तर है…

(1) विलियम जोन्स

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व्याख्या

सर विलियम जोन्स (1746-1794) एक प्रसिद्ध ब्रिटिश ओरिएंटलिस्ट, भाषाविद् और न्यायाधीश थे। उन्होंने मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद किया था, जिसे उन्होंने “Institutes of Hindu Law” या “The Ordinances of Manu” शीर्षक से प्रकाशित किया। यह अनुवाद 1794 में प्रकाशित हुआ था।

विलियम जोन्स का यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि यह पहली बार था जब मनुस्मृति जैसे महत्वपूर्ण हिंदू धर्मग्रंथ का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया था। इससे पश्चिमी विद्वानों को हिंदू कानून और समाज व्यवस्था को समझने में मदद मिली।

यह ध्यान देने योग्य है कि जबकि अन्य विद्वानों ने भी मनुस्मृति पर काम किया है, जैसे मैक्समूलर ने संस्कृत साहित्य पर व्यापक काम किया, लेकिन मनुस्मृति का ‘विधि संहिता’ के रूप में अंग्रेजी अनुवाद का श्रेय विलियम जोन्स को जाता है।


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इस प्रश्न का सही उत्तर है…

(3) (1) एवं (2) दोनों

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व्याख्या

मनुस्मृति में वर्णित ‘मंडल सिद्धांत’ प्राचीन भारतीय राजनीतिक और कूटनीतिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सिद्धांत राज्यों के बीच संबंधों और रणनीतिक स्थितियों को समझने का एक तरीका प्रदान करता है। इस सिद्धांत में विभिन्न प्रकार के राज्यों और उनके संभावित व्यवहारों का वर्णन किया गया है।

‘आक्रान्दासार’ शब्द इस सिद्धांत में एक विशिष्ट प्रकार के शत्रु को संदर्भित करता है। इसका अर्थ है:

1. आगे का शत्रु : यह एक ऐसा राज्य है जो भौगोलिक रूप से सीधे सामने स्थित है और संभावित खतरा पेश करता है।

2. आगे से आक्रमण करने वाला : यह शब्द उस शत्रु की प्रकृति को भी दर्शाता है जो सीधे सामने से आक्रमण करने की क्षमता रखता है।

इस प्रकार, ‘आक्रान्दासार’ दोनों अर्थों को समाहित करता है – यह न केवल आगे स्थित शत्रु है, बल्कि वह शत्रु जो सीधे आक्रमण कर सकता है।

यह अवधारणा राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि:
○ यह राज्य को अपने सामने के खतरों के प्रति सतर्क रहने की याद दिलाती है।
○ यह रक्षात्मक और आक्रामक रणनीतियों की योजना बनाने में मदद करती है।
○ यह कूटनीतिक संबंधों और गठबंधनों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

‘मंडल सिद्धांत’ का यह पहलू दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में राज्यों के बीच संबंधों और संभावित खतरों का गहन विश्लेषण किया जाता था, जो आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों के समान है।


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‘राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञान का वह अंग है, जो राज्य के आधारभूत तत्वों तथा शासन के सिद्धांतों का विवेचन करता है।’ यह परिभाषा किसने दी? 1. गॉर्नर 2. लॉस्की 3. गिलक्रिस्ट 4. पॉल जैनेट

इस प्रश्न का सही उत्तर है…

(4) पॉल जैनेट

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व्याख्या

फ्रांसीसी लेखक पॉल जेनेट के मुताबिक अनुसार राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञान कब है अंग है जो राज्य के आधारभूत तत्व तथा शासन के सिद्धांतों का विवेचन करता है।

पॉल जैनेट (Paul Janet), एक फ्रांसीसी दार्शनिक और राजनीतिक विचारक, ने राजनीति विज्ञान की यह महत्वपूर्ण परिभाषा दी थी कि “राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञान का वह अंग है, जो राज्य के आधारभूत तत्वों तथा शासन के सिद्धांतों का विवेचन करता है।”

इस परिभाषा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं…

  • सामाजिक विज्ञान का अंग : जैनेट राजनीति विज्ञान को सामाजिक विज्ञानों का एक अभिन्न हिस्सा मानते हैं।
  • राज्य के आधारभूत तत्व : यह परिभाषा राज्य के मूलभूत घटकों के अध्ययन पर जोर देती है।
  • शासन के सिद्धांत : इसमें शासन प्रणालियों और उनके सिद्धांतों के अध्ययन को शामिल किया गया है।
  • विवेचनात्मक दृष्टिकोण : जैनेट का मानना है कि राजनीति विज्ञान केवल वर्णनात्मक नहीं, बल्कि विश्लेषणात्मक भी है।

यह परिभाषा राजनीति विज्ञान के क्लासिकल दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है, जो राज्य और शासन के अध्ययन पर केंद्रित है।


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किसे सभी सामाजिक संस्थाओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है? 1. राज्य 2. राष्ट्र 3. समाज 4. न्यायतंत्र

नागरिकता की अवधारणा में किसने गुलाम को बाहर रखा? 1. प्लेटो 2. अरस्तु 3. हॉब्स 4. ऑस्टिन

किसे सभी सामाजिक संस्थाओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है? 1. राज्य 2. राष्ट्र 3. समाज 4. न्यायतंत्र

इस प्रश्न का सही उत्तर होगा..

1. राज्य

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व्याख्या

राज्य को सभी सामाजिक संस्थाओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। राज्य, राष्ट्र, समाज और न्यायतंत्र जैसी अन्य सामाजिक संस्थाओं से अधिक शक्तिशाली होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य, राष्ट्र, समाज और न्यायतंत्र जैसी सामाजिक संस्थाओं का गठन स्वेच्छा अथवा राजा के नियमों पर आधारित होता है, किंतु राज्य एक ऐसी संस्था है जिसकी सदस्यता अनिवार्य होती है और राज्य के नियमों का पालन करना बाध्यकारी भी होता है।
राज्य को सभी सामाजिक संस्थाओं में सबसे शक्तिशाली माना जाता है।

इसके पीछे कई कारण हैं

  • वैध बल का एकाधिकार : राज्य के पास अपने क्षेत्र में वैध बल का उपयोग करने का एकमात्र अधिकार होता है। यह कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और सेना जैसे संगठनों का उपयोग कर सकता है।
  • कानून बनाने की शक्ति : राज्य कानून बनाने, लागू करने और उनकी व्याख्या करने का अधिकार रखता है। यह शक्ति समाज के सभी पहलुओं को नियंत्रित और निर्देशित करने की क्षमता प्रदान करती है।
  • संसाधनों पर नियंत्रण : राज्य के पास कर लगाने और संसाधनों के वितरण का अधिकार होता है, जो इसे आर्थिक शक्ति प्रदान करता है।
  • नीति निर्माण: राज्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीतियां बनाता है, जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं।
  • सार्वभौमिकता: राज्य की सत्ता उसके क्षेत्र में रहने वाले सभी व्यक्तियों और संस्थाओं पर लागू होती है।
  • अंतरराष्ट्रीय मान्यता : अंतरराष्ट्रीय कानून में, राज्य को एक संप्रभु इकाई के रूप में मान्यता दी जाती है।
  • सामाजिक नियंत्रण : राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में नियंत्रण रखता है, जो समाज के विकास और कल्याण को प्रभावित करते हैं।

हालांकि राष्ट्र, समाज और न्यायतंत्र भी महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थाएँ हैं, लेकिन राज्य की व्यापक शक्तियाँ और प्रभाव इसे सबसे शक्तिशाली बनाते हैं। राज्य की यह शक्ति अन्य संस्थाओं के साथ संतुलन में रहती है, जो एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है।


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इस प्रश्न का सही उत्तर है….

(2) अरस्तु

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व्याख्या

नागरिकता की अवधारणा में अरस्तु ने गुलाम को बाहर रखा था अरस्तु के अनुसार नागरिकता संबंधी अवधारणा में गुलामी का कोई स्थान नहीं है अरस्तु गुलाम को राज्य का नागरिक नहीं मानता था

अरस्तु (384-322 ईसा पूर्व), प्राचीन यूनानी दार्शनिक और राजनीतिक चिंतक, ने नागरिकता की अवधारणा में गुलामों को बाहर रखा। यह उनके राजनीतिक दर्शन का एक महत्वपूर्ण पहलू था, जो उस समय के यूनानी समाज की संरचना को प्रतिबिंबित करता था।

अरस्तु के विचार में…
  • नागरिकता का अर्थ : उन्होंने नागरिक को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जो राज्य के शासन में भाग लेने का अधिकार रखता है।
  • गुलामों की स्थिति : अरस्तु ने गुलामों को ‘जीवित उपकरण’ माना और उन्हें नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा।
  • समाज का वर्गीकरण : अरस्तू ने समाज को मुख्यतः दो वर्गों में बांटा – स्वतंत्र नागरिक और गुलाम।
  • प्राकृतिक दासता का सिद्धांत : अरस्तु ने तर्क दिया कि कुछ लोग स्वभाव से ही गुलाम होते हैं और उनका शासित होना उचित है।
  • राजनीतिक भागीदारी : अरस्तू के अनुसार, केवल स्वतंत्र पुरुष ही राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने के योग्य थे।

यह दृष्टिकोण आज के मानवाधिकारों और समानता के सिद्धांतों के विपरीत है, लेकिन यह प्राचीन यूनानी समाज की वास्तविकता को दर्शाता था। अरस्तु के इस विचार ने पश्चिमी राजनीतिक चिंतन को लंबे समय तक प्रभावित किया, हालांकि आधुनिक समय में इसे व्यापक रूप से अस्वीकार कर दिया गया है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि अरस्तु के विचार उनके समय के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में थे, और आज के नैतिक मानकों से इनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।


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इस प्रश्न का सही उत्तर है…

(c) इंग्लैंड में

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व्याख्या

न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था ‘इंग्लैंड’ में नही है। न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ होता है कि विधायिका जो भी कानून पारित करती है अथवा विधायिका द्वारा जो भी निर्णय ले जाते हैं, उन सभी कानून और निर्णयों की समीक्षा करने की शक्ति न्यायपालिका को प्राप्त है। इंग्लैंड में न्यायिक पुनरावलोकन की यह व्यवस्था नहीं है।

इंग्लैंड में न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था अन्य देशों की तुलना में अलग है। यहाँ परंपरागत रूप से न्यायिक पुनरावलोकन का अभाव रहा है, जो इसके संवैधानिक इतिहास और संसदीय संप्रभुता के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है।

इंग्लैंड में:
  • संसदीय संप्रभुता : इंग्लैंड में संसद को सर्वोच्च माना जाता है। यह सिद्धांत कहता है कि संसद द्वारा पारित किसी भी कानून को न्यायालय द्वारा अवैध घोषित नहीं किया जा सकता।
  • अलिखित संविधान : इंग्लैंड का कोई लिखित संविधान नहीं है, जिसके आधार पर न्यायालय कानूनों की वैधता की जांच कर सके।
  • न्यायिक समीक्षा का सीमित दायरा : हालांकि न्यायालय प्रशासनिक कार्यों की समीक्षा कर सकते हैं, लेकिन वे संसद द्वारा पारित कानूनों को चुनौती नहीं दे सकते।
  • मानवाधिकार अधिनियम 1998 : इस अधिनियम ने कुछ हद तक न्यायिक समीक्षा की शक्ति प्रदान की है, लेकिन यह अमेरिका या भारत जैसे देशों की तुलना में बहुत सीमित है।

यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि हाल के वर्षों में इंग्लैंड में भी न्यायिक पुनरावलोकन की दिशा में कुछ बदलाव आए हैं, लेकिन यह अभी भी अन्य देशों की तुलना में बहुत सीमित है। इसके विपरीत, अमेरिका, भारत और फ्रांस में न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था मौजूद है, जहाँ न्यायालय कानूनों और सरकारी कार्यों की संवैधानिकता की जांच कर सकते हैं।


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सही उत्तर है…

(2) राजदूतों के

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व्याख्या

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में निसृष्टार्थ, परिमितार्थ और शासनाहार ये तीन गुण राजदूतों के लिए वर्णित किए गए हैं। ये गुण राजनयिक कार्यों को सफलतापूर्वक संपन्न करने के लिए आवश्यक माने जाते हैं। आइए इन तीनों गुणों को समझें…

1. निसृष्टार्थ :  राजदूतों के इस गुण वाली श्रेणी में राजदूत को सर्वोच्च अधिकार प्राप्त थे। वह राजा का प्रतिनिधि बनकर जाता था और वार्ता के आधार पर वहीं पर किसी निर्णय की घोषणा भी कर सकता था। यह गुण राजदूत की वह क्षमता होती थी, जिसके द्वारा वह अपने राजा के संदेश को दूसरे राजा के समक्ष सटीक और प्रभावी ढंग से प्रेषित करता था और किसी भी वाद-विवाद की स्थिति में वहीं पर निर्णय भी ले सकता था। राजा की तरफ से उसे पूर्णाधिकार प्राप्त थे।

2. परिमितार्थ : इस गुण वाले राजदूतों को निसृष्टार्थ राजदूतों की तुलना में कम और सीमित अधिकार प्राप्त थे। वह अपने शब्दों और कार्यों में संयम रखकर अपने राजा का संदेश दूसरे राजा तक पहुँचाता था। वह केवल उतना ही बोलता था, जितना आवश्यक होता और अपने राजा के हितों की रक्षा करते हुए भी दूसरे राज्य के साथ संबंधों की मर्यादा का भी ध्यान रखता था।

3. शासनाहार : इस गुण वाले राजदूत केवल संदेशवाहक का कार्य करते थे। उनका कार्य अपने राजा के संदेश को दूसरे राजा तक पहुँचाना ही होता था। वह अपनी सीमा से बाहर किसी निर्णन को लेने का अधिकारी नहीं था।

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र ग्रंथ में इन गुणों को राजदूतों के लिए विशेष रूप से उल्लिखित किया है क्योंकि राजदूत राज्यों के बीच संबंधों के मुख्य माध्यम होते थे और उनकी भूमिका राज्य की सुरक्षा और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती थी।


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निम्नलिखित में से कौन सा एक कौटिल्य की ‘षाड्गुण्य नीति’ का अंग नहीं है? (1) विग्रह (2) मैत्री (3) संश्रय (4) द्वैधीभाव

सही उत्तर…

(2) मैत्री

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व्याख्या

‘मैत्री’ कौटिल्य की ‘षाड्गुण्य नीति’ का अंग नहीं है।

कौटिल्य की षाड्गुण्य नीति राजनीतिक रणनीति के छह गुणों या सिद्धांतों को संदर्भित करती है, जो उनके प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में वर्णित हैं। आपके द्वारा प्रदान किए गए श्लोक इस नीति की पुष्टि करते हैं। षाड्गुण्य नीति के छह अंग हैं:

1. संधि (शांति या समझौता)
2. विग्रह (युद्ध)
3. आसन (तटस्थता)
4. यान (आक्रमण की तैयारी)
5. संश्रय (शक्तिशाली राजा की शरण लेना)
6. द्वैधीभाव (दोहरी नीति)

मैत्री (मित्रता) इस सूची में शामिल नहीं है, इसलिए यह षाड्गुण्य नीति का अंग नहीं है। हालांकि मैत्री एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अवधारणा है, यह कौटिल्य की इस विशिष्ट नीति का हिस्सा नहीं है।

कौटिल्य की यह नीति प्राचीन भारतीय राजनीतिक और कूटनीतिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह नीति राजाओं को विभिन्न परिस्थितियों में उचित कार्रवाई करने का मार्गदर्शन प्रदान करती है, जिसमें शांति से लेकर युद्ध तक की स्थितियां शामिल हैं।

मैं फिर से अपने पूर्व गलत उत्तर के लिए खेद व्यक्त करता हूं और आपको इस महत्वपूर्ण सुधार के लिए धन्यवाद देता हूं।

कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में षाड्गुण्य का वर्नन इस प्रकार से किया गया है-

षाड्गुण्यस्य प्रकृति-मण्डलं योनिः ।। ०७.१.०१ ।।
संधि-विग्रह-आसन-यान-संश्रय-द्वैधीभावाः षाड्गुण्यम्” इत्याचार्याः ।। ०७.१.०२ ।।
द्वैगुण्यम्” इति वात-व्याधिः ।। ०७.१.०३ ।।
संधि-विग्रहाभ्यां हि षाड्गुण्यं सम्पद्यते” इति ।। ०७.१.०४ ।।
षाड्गुण्यं एवएतदवस्था-भेदादिति कौटिल्यः ।। ०७.१.०५ ।।
तत्र पण-बन्धः संधिः ।। ०७.१.०६ ।।
अपकारो विग्रहः ।। ०७.१.०७ ।।
उपेक्षणं आसनं ।। ०७.१.०८ ।।
अभ्युच्चयो यानं ।। ०७.१.०९ ।।
पर-अर्पणं संश्रयः ।। ०७.१.१० ।।
संधि-विग्रह-उपादानं द्वैधीभावः ।। ०७.१.११ ।।
इति षड्गुणाः ।। ०७.१.१२ ।।

Other questions

किसे उन्नीसवीं सदी का संक्रमणकालीन विचारक माना जाता है? (1) बॅथम (2) मिल (3) ग्रीन (4) स्पेन्सर

इतिहास की आर्थिक व्याख्या से तात्पर्य यह है कि अन्ततः इतिहास और ऐतिहासिक घटनाचक्र निर्धारित होता है- (1) महान पुरुषों के व्यक्तित्व से (2) माँग और पूर्ति के नियमों से (3) वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय विकास से (4) उत्पादन की पद्धति और उत्पादन के संबंधों से

किसे उन्नीसवीं सदी का संक्रमणकालीन विचारक माना जाता है? (1) बॅथम (2) मिल (3) ग्रीन (4) स्पेन्सर

सही उत्तर है…

(4) स्पेन्सर

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व्याख्या

हर्बर्ट स्पेन्सर (1820-1903) को उन्नीसवीं सदी का एक प्रमुख संक्रमणकालीन विचारक माना जाता है। वे एक अंग्रेज दार्शनिक, समाजशास्त्री और राजनीतिक विचारक थे जिन्होंने अपने समय के बौद्धिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव डाला।

स्पेन्सर को संक्रमणकालीन विचारक इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनके विचार पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोणों के बीच एक पुल का काम करते थे। उन्होंने विकासवाद के सिद्धांत को समाज और मानव व्यवहार पर लागू किया, जिसे ‘सामाजिक डार्विनवाद’ के नाम से जाना जाता है। यह दृष्टिकोण उस समय की वैज्ञानिक प्रगति और सामाजिक परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करता था।

स्पेन्सर ने व्यक्तिवाद और सरकारी हस्तक्षेप के सीमित रूप का समर्थन किया, जो उन्नीसवीं सदी के उदारवादी विचारों का प्रतिनिधित्व करता था। साथ ही, उनके विचारों ने बीसवीं सदी के कुछ सामाजिक और राजनीतिक सिद्धांतों की नींव रखी।

इस प्रकार, स्पेन्सर के विचार उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं, जो उन्हें एक प्रमुख संक्रमणकालीन विचारक बनाता है।


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रूसो के राजनीतिक विचारों का किस महत्वपूर्ण घटना पर प्रभाव देखा जा सकता है? (1) 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति (2) 1789 की फ्रांस की क्रांति (3) 1776 की अमरीकी क्रांति (4) 1917 की रूसी क्रांति

क्या आप जानते हैं कि एक पक्षी ऐसा भी है जो कभी भी जमीन पर पैर नही रखता।

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हम सभी जानते हैं कि पक्षी हवा में उड़ते हैं, वह जमीन पर नहीं रहते बल्कि पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं, अथवा किसी ऊंची जगह पर अपना घोंसला बनाते हैं। वह जमीन पर ज्यादा नहीं चलते हैं। लेकिन उन्हें जमीन पर थोड़े समय के लिए उतरना अवश्य पड़ता है। वह दाना चुगने के लिए जमीन पर उतरते हैं।

हम सभी लोगों ने कभी न कभी कबूतर आदि पक्षियों को दाना डाला होगा और हमने देखा होगा कि दाना जमीन पर दाना बनने पर बहुत सारे कबूतर या अन्य पक्षी आकर दाना चुगने लगते हैं। शहरों में हमने ऐसी कई जगह देखी है जो कबूतरखाने के नाम से प्रसिद्ध होती है और वहां पर कबूतर पक्षियों के लिए दाना बिखरा रहता है। इस तरह पक्षियों को कभी ना कभी जमीन पर उतना ही पड़ता है। भले ही पक्षी कितनी देर हवा में उड़े, पेड़ों की डाल पर रहें, लेकिन उन्हें जमीन पर आना ही पड़ता है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस संसार में एक पक्षी ऐसा भी है, जो कभी भी जमीन पर पैर नहीं रखता।

जी हाँ, यह बात बिल्कुल सच है। वह पक्षी कभी भी जमीन पर नहीं उतरता। हमेशा पेड़ों की डाल पर ही बैठा रहता है अथवा हवा में उड़ता रहता है। वह जमीन पर अपने पांव नही रखता है। चलिए उस पक्षी का नाम बता देतें हैं। उस पक्षी का नाम है…

हरियल पक्षी

जी हाँ, हरियल पक्षी कभी अपने पांव जमीन पर नही रखता है। यह पक्षी हमारे भारत में ही पाया जाता है और कभी भी जमीन पर नहीं यह कभी जमीन पर नहीं बैठता। यह भारत में बहुत अधिक पाया जाता है और महाराष्ट्र का राजपक्षी है। यदि किसी भी स्थिति में इस पक्षी को जमीन पर उतरना पड़ता भी है, तो यह लकड़ी का टुकड़ा लेकर जमीन पर उतरता है और उस लकड़ी के टुकड़े पर अपने पांव रखता है। यानि ये यह पक्षी किसी भी स्थिति में अपने पांव जमीन पर भी नहीं रखता।

हरियल पक्षी के बारे में जानें

  • पक्षी का वैज्ञानिक नाम ट्रेरन फीनिकोप्टेरस (Treron phoenicopterus) है।
  • ये पक्षी कबूतर की प्रजाति का पक्षी है, जो एक विशिष्ट प्रकार का कबूतर है।
  • यह पक्षी अधिकतर भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है।
  • यह पक्षी कबूतर की प्रजाति का है और हरे-पीले रंग की कबूतर होता है।
  • यह पक्षी अपने पांव जमीन पर कभी भी नहीं रखता।
  • इस पक्षी का आकार 29 सेंटीमीटर से 35 सेंटीमीटर तक होता है।
  • इस पक्षी का वजन 225 ग्राम से 260 ग्राम तक होता है।
  • यह पक्षी झुंड में ही रहना पसंद करता है, और अक्सर 10-15 पक्षियों के झुंड में रहता है।
  • जब भी यह पक्षी अपने पंखों को फैलाता है, तो उसके पंखों का फैलाव 19 से 17 से 19 सेंटीमीटर तक हो जाता है।
  • इस पक्षी का रंग हरा और पीला मिश्रित होता है।
  • इस पक्षी के पैर चमकीले पीले रंग के होते हैं।
  • इस पक्षी को जंगल में ऊंचे ऊंचे पेड़ों पर रहना पसंद है।
  • यह पक्षी अधिकतर सदाबहार जंगलों में पाया जाता है।
  • इस पक्षी को पीपल और बरगद के पेड़ पर रहना अधिक पसंद है।
  • यह पक्षी पूर्णता शाकाहारी होता है और फल ही खाता है तथा अनाज और दाने चुगता है।
  • सुबह-सुबह इन पक्षियों को पेड़ों की ऊंची डाल पर बैठे हुए देखा जा सकता है।
  • इस पक्षी का अंडा चमकीले सफेद रंग का होता है।

तो जान गए ना आपकी एक पक्षी ऐसा भी है, जो कभी भी अपना जमीन पर पैर नहीं रखता। यह प्रकार का कबूतर ही है।


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क्या आप जानते हैं? एक गाँव ऐसा भी है, जहाँ के लोग 1 हफ्ते से लेकर 1 महीने तक सोते रहते हैं।

आशय स्पष्ट कीजिए – डॉक्टर का दरवाज़ा कभी बंद नहीं रहना चाहिए और पादरी का फ़ाटक हमेशा खुला होना चाहिए।

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इस कथन का आशय इस प्रकार होगा…

1. डॉक्टर का दरवाज़ा कभी बंद नहीं रहना चाहिए

आशय : इस वाक्यांश का तात्पर्य है कि एक चिकित्सक को हमेशा लोगों की सेवा के लिए तत्पर रहना चाहिए। यहाँ ‘दरवाज़ा’ शब्द प्रतीकात्मक रूप में उपयोग किया गया है। इसका आशय है कि चिकित्सक यानि डॉक्टर को हर समय, दिन-रात, किसी भी आपातकालीन स्थिति में उपलब्ध होना चाहिए। डॉक्टर को बिना किसी भेदभाव के सभी मरीजों का इलाज करना चाहिए, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, या आर्थिक पृष्ठभूमि से क्यों न हों। एक डॉक्टर को अपनी सेवाओं को सुलभ बनाना चाहिए और लोगों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

यदि देर रात में या किसी भी अनापेक्षित समय में डॉक्टर के पास कोई मरीज अपने उपचार के लिए आता है, तो डॉक्टर के बिना देर और संकोच किए पूरी तत्परता से उस मरीज का उपचार करना चाहिए।

2. पादरी का फ़ाटक हमेशा खुला होना चाहिए

आशय : पादरी शब्द भले ही किसी विशेष धर्म से संबंधित हो लेकिन सभी धर्मों के धार्मिक नेता या आध्यात्मिक गुरु के प्रतीक के रूप में लिया गया है। ‘फ़ाटक’ शब्द यहाँ भी प्रतीकात्मक है। यहाँ पर इस वाक्यांश का भी यही आशय है कि धार्मिक नेता या आध्यात्मिक गुरु को हमेशा लोगों के लिए सुलभ होना चाहिए। उन्हें किसी भी व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सहायता देने के लिए तैयार रहना चाहिए। धार्मिक स्थल या संस्थान को सभी के लिए खुला और स्वागतयोग्य होना चाहिए। धार्मिक स्थल में ऊँच-नीच के आधार पर किसी के साथ कोई भेद नहीं होना चाहिए।

ये दोनों कथन समाज के दो महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उनके समाज के प्रति आवश्यक कर्तव्य को स्पष्ट करते हैं।


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‘काई सा फटे नहीं’ पंक्तियों का आशय स्पष्ट करो।

आशय स्पष्ट कीजिये- भाई-भाई मिल रहें सदा ही टूटे कभी न नाता, जय-जय भारत माता।

विष भरे कनक घटों की संसार में कमी नहीं है। आशय स्पष्ट कीजिए।

आशय कीजिए- “यह वह समय है जब बच्चा मनाता होगा कि काश! उसके पिता अनपढ़ होते।”

‘गुरु पूर्णिमा’ पर निबंध लिखिए।

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निबंध

गुरु पूर्णिमा

 

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो शिक्षा और आध्यात्मिकता के बीच सेतु का काम करता है। यह पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो सामान्यतः जून या जुलाई के महीने में आता है।

‘गुरु’ शब्द संस्कृत से आया है, जिसका अर्थ है ‘अंधकार को दूर करने वाला’। गुरु वह व्यक्ति होता है जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है। भारतीय परंपरा में गुरु को ईश्वर के समान माना जाता है, क्योंकि वह हमें जीवन का सही मार्ग दिखाता है।

गुरु पूर्णिमा के पीछे कई पौराणिक कथाएँ हैं। एक मान्यता के अनुसार, इसी दिन गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। दूसरी मान्यता महर्षि वेदव्यास के जन्म से जुड़ी है, जिन्होंने वेदों का संकलन किया।

इस दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वे गुरु की पूजा करते हैं, उनके आशीर्वाद लेते हैं और दान-दक्षिणा देते हैं। यदि गुरु उपस्थित नहीं हैं, तो उनके चित्र या प्रतीक की पूजा की जाती है।

छात्रों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है। वे अपने शिक्षकों के प्रति आभार प्रकट कर सकते हैं, जो उन्हें ज्ञान और जीवन कौशल सिखाते हैं। यह दिन शिक्षक-छात्र संबंध को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।

गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है। यह जीवन के हर पहलू को समझने और उसमें सुधार लाने का माध्यम है। यह त्योहार हमें अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञ रहने और जीवन भर सीखते रहने की प्रेरणा देता है।

अंत में, गुरु पूर्णिमा हमें स्मरण कराती है कि ज्ञान और विनम्रता साथ-साथ चलते हैं। जैसे-जैसे हम अधिक सीखते हैं, हमें यह एहसास होता है कि अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। यह हमें जीवन भर विद्यार्थी बने रहने की प्रेरणा देती है।


और कुछ निबंध

‘गणेश चतुर्थी’ पर एक निबंध लिखिए।

शिक्षक दिवस (निबंध)

“दहेज हत्या एक कानूनी अपराध” इस विषय पर लघु निबंध लिखिए।

‘हमारे राष्ट्रीय पर्व’ पर निबंध लिखो।

सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ। धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ।। (भावार्थ बताएं)

सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ।।

भावार्थ : कबीरदास कहते हैं कबीर दास गुरु की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि यदि मैं इस संसार के सातों महासागरों के समस्त जल की स्याही बना लूं। यदि मैं इस संसार के सभी वन (जंगल) के पेड़ों से लेखनी बना लूं।

यदि मैं इस पूरी पृथ्वी को एक कागज के सामान मान लूं और सात समुद्रों के जल से बानी स्याही से संसार के सारे जंगलों के पेड़ों से बनी हुई लेखनी से, पृथ्वी रूपी कागज पर प्रभु (गुरु) के गुण लिखना शुरू करूं तो भी वह पूरी स्याही खत्म हो जाएगी, सारी लेखनियां घिस जाएंगी और पृथ्वी रूपी कागज कम पड़ जाएगा, फिर भी प्रभु (गुरु) के गुण को लिखा नहीं जा सकेगा।

व्याख्या :  इस दोहे के माध्यम से कबीर ने गुरु की अपार महिमा का बखान किया है। उन्होंने गुरु की महिमा का गुणगान करने में अतिश्योक्ति कर दी है। ये उनका अपने गुरु तथा संसार के सभी गुरुओं के प्रति उनके शिष्यों के भाव को दर्शाता है। कबीर के मन में अपने गुरु के प्रति कितना सम्मान था और वह अपने गुरु को कितना महान मानते थे यह इस दोहे से प्रकट होता है। उन्होंने पृथ्वी, वन, समुद्र जैसे प्राकृतिक प्रतीकों का उल्लेख करके अपने गुरु की महिमा गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सनातन संंस्कृति में गुरु को अत्यन्त उच्च स्थान दिया गया है।


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यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।। भावार्थ बताएं।

गुरू पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत। वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।। (भावार्थ बताएं)

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।। भावार्थ बताएं।

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भावार्थ :  कबीरदास कहते हैं की यह शरीर तो बुराइयों से भरा है। इस शरीर के अंदर विष रूपी बुराइयां ही बुराइयां भरी हुई हैं। एक गुरु ही है जो अमृत की खान है। जब ये विष रूपी रूपी शरीर गुरु की शरण में जाता है तो गुरु उन सभी विष रूपी बुराइयों का नाश कर देता है।

गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए आवश्यक है अपना शीश गुरु के चरणों में अर्पण कर दिया जाए, तब ही सच्चा ज्ञान प्राप्त हो सकता है। अपना शीश (सिर) गुरु के चरणों में अर्पण कर यदि गुरु से ज्ञान प्राप्त होता है, वो बहुत ही सस्ता सौदा है क्योंकि शिष्य ने कुछ भी नही खोया जबकि बहुत कुछ पा लिया।

यहाँ पर शीश से तात्पर्य अपने अंदर के अज्ञानता के अहंकार से है। अपने अंदर के अहंकार का त्याग करके ही गुरु से सच्चा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। अपने अहंकार को त्याग करके गुरु से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह बड़ा ही सस्ता सौदा है, क्योंकि हमने जो खोया वह हमारे लिए नुकसानदायक था और हमने जो पाया वह हमारे लिए बहुत मूल्यवान है।


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गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष। गुरू बिन लखै न सत्य को, गुरू बिन मिटै न दोष।। (भावार्थ बताएं)

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गुरू पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।

भावार्थ : कबीरदास कहते हैं कि गुरु पारस पत्थर के समान होता है। गुरु और पारस पत्थर के बीच अंतर तो केवल ज्ञानी पुरुष ही समझ सकते हैं। पारस पत्थर वह पत्थर होता है जो लोहे को भी सोना बना देता है। जिसके स्पर्श से कोई भी लोहा सोना बन जाता है। गुरु भी लोहे रूपी शिष्य को सोना रूपी शिष्य बना देता है।

शिष्य जब गुरु के पास आता है तो वह लोहे के समान होता है और गुरु पारस पत्थर है। गुरु के स्पर्श से वह शिष्य सोना बन जाता है अर्थात यहाँ पर गुरु के स्पर्श से तात्पर्य गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान से है। जब अज्ञानी शिष्य गुरु के पास आता है तो गुरु से ज्ञान ग्रहण करके उसके अंदर का अज्ञान मिट जाता है और ज्ञान का प्रकाश प्रज्वलित हो उठता है। तब वह शिष्य सोने के समान बन जाता है। इसीलिए गुरु महान है क्योंकि वह शिष्य को अपने जैसा बना देते हैं।


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गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष। गुरू बिन लखै न सत्य को, गुरू बिन मिटै न दोष।। (भावार्थ बताएं)

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।। कबीर के इस दोहे का भावार्थ बताएं। (गुरु पूर्णिमा पर विशेष)

गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष। गुरू बिन लखै न सत्य को, गुरू बिन मिटै न दोष।। (भावार्थ बताएं)

गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।
गुरू बिन लखै न सत्य को, गुरू बिन मिटै न दोष।।

भावार्थ : कबीरदास कहते हैं कि गुरु के बिना किसी भी प्रकार का ज्ञान प्राप्त होना बिल्कुल ही असंभव है। गुरु के बिना ना तो ज्ञान प्राप्त हो सकता है और ना ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। बिना गुरु के मनुष्य इस माया रुपी संसार के बंधनों में फंसा रहता है और संसार की मोह माया में उलझा रहता है।

जब तक गुरु की कृपा नहीं होती। गुरु की कृपा के कारण गुरु से ज्ञान प्राप्त नहीं होता, तब तक मनुष्य का उद्धार नहीं होता। गुरु ही है जो मनुष्य को सत्य का मार्ग दिखाते हैं। वह ही सत्य और असत्य का भेद करना सिखाते हैं। वह अच्छे और बुरे के बीच के अंतर को समझना सिखाते हैं। जब व्यक्ति गुरु से ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो उसकी मोक्ष प्राप्ति का मार्ग खुल जाता है। उसके भीतर के सारे दोष मिट जाते हैं। उसके अंदर अज्ञानता का अंधकार मिटकर ज्ञान का प्रकाश जल उठता है। इसलिए हमें सदैव अपने गुरु की शरण में ही जाना चाहिए, वह ही हमें सत्य की राह दिखा सकते हैं।


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गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।। कबीर के इस दोहे का भावार्थ बताएं। (गुरु पूर्णिमा पर विशेष)

सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सवद जु बाह्य एक। लागत ही मैं मिल गया,पड़ता कलेजे छेक।। संदर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए।

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।। कबीर के इस दोहे का भावार्थ बताएं। (गुरु पूर्णिमा पर विशेष)

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

भावार्थ : कबीर दास गुरु की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि मेरे सामने मेरे गुरु और साक्षात ईश्वर दोनों खड़े हैं। अब मैं संशय की स्थिति में हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं पहले किसे प्रणाम करूं?

संशय की स्थिति इस स्थिति में मैं मन ही मन विचार करता हूँ। फिर मैं निर्णय लेता हूँ कि मुझे सबसे पहले अपने गुरु को प्रणाम करना चाहिए। मेरे मन में विचार आता है कि ईश्वर को तो मैंने पहले कभी देखा नहीं था। ईश्वर के स्वरूप को मैं समझता नहीं था। ईश्वर को जानने और समझने का ज्ञान मुझ में नहीं था। ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता मुझे पता नही था यह सब मुझे मेरे गुरु ने सिखाया।

गुरु ने ही मुझे ईश्वर को जानने और समझने की सामर्थ दी। गुरु ने ही मुझे वह ज्ञान दिया, इससे में ईश्वर के स्वरूप को जान एवं समझ पाया। मैंने ईश्वर को पहले कभी नहीं देखा। लेकिन मैंने अपने गुरु को सदैव देखा। इसलिए मैं अपने गुरु को ही पहले प्रणाम करूंगा क्योंकि उन्होंने मुझे ईश्वर को जानने-समझने और उन तक पहुंचने का मार्ग सुझाया।

विशेष व्याख्या

कबीरदास का यहाँ ईश्वर से तात्पर्य ज्ञान से है। हमारे अंदर ज्ञान की जो ज्योति आलोकित होती है वह ही ईश्वर है। ईश्वर किसी शाखा सत्ता का नहीं बल्कि निराकार सत्ता का स्वरूप है। कबीर ज्ञान की उस ज्योति को ही ईश्वर की संज्ञा दे रहे हैं। लेकिन ज्ञान कि वह ज्योति जलाने में सबसे मुख्य योगदान गुरु ने दिया। कबीर के अंदर ज्ञान की ज्योति को उनके गुरु ने ही जलाया। यानि गुरु ने ही उन्हें ज्ञान रूपी ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग सुझाया। इसीलिए कबीर गुरु को सर्वोपरि रखते हैं।


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गुरु ज्ञान की बारिश अज्ञान रूपी गंदगी को कैसे साफ़ कर देती है?​​

सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सवद जु बाह्य एक। लागत ही मैं मिल गया,पड़ता कलेजे छेक।। संदर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए।

What are the poetic devices in the poem ‘The Trees’ by Adrienne Rich​?

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The poem ‘The Trees’ by Adrienne Rich employs several poetic devices to convey its themes and imagery. Here are some of the key poetic devices used in the poem:

1. Personification: The trees are given human-like qualities throughout the poem. For example, they are described as ‘walking,’ having ‘heads,’ and being able to ‘whisper.’

2. Metaphor: The trees are metaphorically compared to various human actions and characteristics, such as ‘walking,’ suggesting movement and life.

3. Imagery: Rich uses vivid sensory details to create strong visual and auditory images, like ‘bare branches’ and ‘rustling.’

4. Alliteration: There are instances of alliteration, such as ‘wind walks’ and ‘whisper without words.’

5. Assonance: The repetition of vowel sounds can be found in phrases like ‘trees are trees’ and ‘wind walks.’

6. Repetition: The phrase ‘The trees’ is repeated at the beginning of several lines, creating emphasis and rhythm.

7. Free verse: The poem doesn’t follow a strict rhyme scheme or meter, allowing for a more natural, conversational flow.

8. Enjambment: Lines often run into each other without punctuation, creating a sense of continuity and flow.

9. Symbolism: The trees likely symbolize aspects of human nature or society, possibly representing resilience, communication, or interconnectedness.

10. Paradox: The idea of trees walking and whispering without words presents a paradoxical image, challenging the reader’s perceptions.

These devices work together to create a rich, evocative poem that invites multiple interpretations and encourages readers to reconsider their relationship with nature and the world around them.


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What happens if you live in a place where day and night are equal. How you will be affected?

‘दुन-दुन टॉक-टॉक’ नीति किसकी थी? (1) माओ जेदोंग (2) लेनिन (3) कार्ल मार्क्स (4) काटस्की

सही उत्तर है…

(1) माओ जेदोंग

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व्याख्या

‘दुन-दुन टॉक-टॉक’ नीति माओ जेदोंग की थी।

माओ जेदोंग, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के पहले अध्यक्ष, ने ‘दुन दुन टॉक टॉक’ नीति को प्रस्तुत किया। यह नीति चीनी क्रांति के दौरान और उसके बाद के वर्षों में अपनाई गई थी। ‘दुन दुन’ का अर्थ है ‘हिलना’ या ‘डगमगाना’, जबकि ‘टॉक टॉक’ का अर्थ है ‘उठना’ या ‘खड़ा होना’। यह नीति चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति का प्रतीक थी, जिसमें वे कभी पीछे हटते (दुन दुन) और कभी आगे बढ़ते (टॉक टॉक) थे। इसका उद्देश्य था शत्रु को भ्रमित करना, अपनी शक्ति को संरक्षित करना, और सही समय आने पर आक्रमण करना। यह नीति गुरिल्ला युद्ध की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी, जिसने चीनी कम्युनिस्टों को अपने शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ लड़ने में मदद की। माओ ने इस नीति को न केवल सैन्य रणनीति के रूप में, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक नीतियों में भी लागू किया, जहाँ वे परिस्थितियों के अनुसार अपने दृष्टिकोण को लचीला रखते थे।


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सही उत्तर है…

(4) उत्पादन की पद्धति और उत्पादन के संबंधों से

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व्याख्या

इतिहास की आर्थिक व्याख्या से तात्पर्य उत्पादन की पद्धति और उत्पादन के संबंधों से निर्धारित होता है।

इतिहास की आर्थिक व्याख्या के अनुसार, इतिहास और ऐतिहासिक घटनाचक्र अंततः उत्पादन की पद्धति और उत्पादन के संबंधों से निर्धारित होता है। यह मार्क्सवादी दृष्टिकोण का एक मूल सिद्धांत है।

इस विचार के अनुसार, समाज की आर्थिक संरचना ही उसके राजनीतिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक स्वरूप को निर्धारित करती है। उत्पादन की पद्धति में तकनीकी, औजार, और कार्य प्रणालियाँ शामिल होती हैं, जबकि उत्पादन के संबंधों में वे सामाजिक संबंध आते हैं जो उत्पादन प्रक्रिया में लोगों के बीच स्थापित होते हैं, जैसे मालिक-मजदूर संबंध।

यह दृष्टिकोण मानता है कि जैसे-जैसे उत्पादन की पद्धतियाँ बदलती हैं, समाज के अन्य पहलू भी बदलते हैं। उदाहरण के लिए, औद्योगिक क्रांति ने न केवल उत्पादन की पद्धति को बदला, बल्कि समाज के वर्ग संरचना, शहरीकरण, राजनीतिक व्यवस्था, और यहाँ तक कि विचारधाराओं को भी प्रभावित किया।

इस सिद्धांत के अनुसार, ऐतिहासिक परिवर्तन मुख्य रूप से आर्थिक कारकों के परिणामस्वरूप होते हैं, न कि व्यक्तियों के कार्यों या विचारों के कारण। यह व्याख्या इतिहास को एक व्यवस्थित प्रक्रिया के रूप में देखती है, जहाँ आर्थिक आधार समाज के अन्य पहलुओं को प्रभावित करता है।

हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह दृष्टिकोण विवादास्पद रहा है और कई इतिहासकारों ने इसकी आलोचना की है, यह कहते हुए कि यह इतिहास के अन्य महत्वपूर्ण कारकों की उपेक्षा करता है। फिर भी, यह इतिहास की व्याख्या का एक प्रभावशाली मॉडल बना हुआ है।


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What happens if you live in a place where day and night are equal. How you will be affected?

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If I were to live in a place where day and night are equal, it would have several interesting effects on my daily life and overall well-being. Here’s how I might be affected:

1. Circadian rhythm: My body’s internal clock would likely adjust to the consistent 12-hour light-dark cycle. This could lead to more stable sleep patterns and potentially improved sleep quality.

2. Routine consistency: With equal days and nights, I might find it easier to maintain a consistent daily routine, as the timing of sunrise and sunset would remain constant throughout the year.

3. Seasonal affective disorder: I may be less prone to seasonal affective disorder (SAD), which is often associated with changes in daylight hours. The consistent light exposure could help maintain more stable mood and energy levels year-round.

4. Agriculture and gardening: If I were involved in growing plants, I’d need to adapt to the lack of seasonal changes in daylight. Some plants that require specific day lengths to flower or fruit might be challenging to cultivate.

5. Energy usage: My energy consumption patterns might become more predictable and balanced throughout the year, as the need for artificial lighting would remain constant.

6. Cultural adaptations: Traditional concepts of seasons and time-based cultural events might need to be redefined, as they often rely on changing day lengths.

7. Wildlife interactions: If living in a natural environment, I might notice different patterns in wildlife behavior, as many animals rely on changing day lengths for migration or hibernation cues.

8. Photography and outdoor activities: I’d have consistent lighting conditions for outdoor activities and photography, without the extended “golden hours” found in higher latitudes.

9. Work-life balance: The consistent day-night cycle might make it easier to maintain a regular work schedule and allocate time for personal activities.

10. Psychological perception of time: Without the changing day lengths as a marker of passing seasons, my perception of the passage of time throughout the year might be altered.

Living in such a location would require some adaptation, but it could also offer unique benefits in terms of lifestyle consistency and potentially improved well-being due to stable light exposure patterns.


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गौरव का चरित्र-चित्रण कीजिए। (पाठ – कपड़े के झोले)

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‘कपड़े के झोले’ पाठ के मुख्य पात्र गौरव का चरित्र-चित्रण

‘कपड़े के झोले’ पाठ में गौरव का चरित्र एक संवेदनशील, जागरूक और परिवर्तनकारी युवा के रूप में चित्रित किया गया है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

पर्यावरण के प्रति जागरूकता: गौरव पर्यावरण संरक्षण के प्रति बेहद सचेत है। वह प्लास्टिक के थैलों के हानिकारक प्रभावों को समझता है और उनके विकल्प के रूप में कपड़े के झोले का उपयोग करने का प्रचार करता है।

नवाचार की भावना: वह केवल समस्या की पहचान नहीं करता, बल्कि उसका समाधान भी खोजता है। कपड़े के झोले बनाने और उन्हें लोगों तक पहुंचाने का उसका विचार इस नवाचार की भावना को दर्शाता है।

सामाजिक उत्तरदायित्व: गौरव समाज के प्रति अपने दायित्व को समझता है। वह न केवल स्वयं पर्यावरण हितैषी व्यवहार अपनाता है, बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करता है।

दृढ़ संकल्प: अपने मिशन को पूरा करने के लिए वह कड़ी मेहनत करता है। स्कूल के बाद और छुट्टियों में भी वह अपने काम में लगा रहता है, जो उसके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।

सहयोग की भावना: गौरव अकेले काम नहीं करता। वह अपने दोस्तों और परिवार को भी इस कार्य में शामिल करता है, जो उसकी टीम भावना और सहयोग की क्षमता को दर्शाता है।

व्यावहारिक दृष्टिकोण: वह समझता है कि लोगों को प्लास्टिक छोड़ने के लिए एक व्यावहारिक विकल्प की आवश्यकता है। इसलिए वह कपड़े के झोले को एक सुविधाजनक और आकर्षक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है।

रचनात्मकता: झोलों को आकर्षक बनाने के लिए वह उन पर स्लोगन लिखता है और चित्र बनाता है, जो उसकी रचनात्मकता को दर्शाता है।

प्रभावशाली व्यक्तित्व: गौरव अपने विचारों और कार्यों से न केवल अपने साथियों को, बल्कि वयस्कों को भी प्रभावित करता है, जो उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व का प्रमाण है।

दूरदर्शिता: वह भविष्य की चिंता करता है और वर्तमान में ऐसे कदम उठाता है जो दीर्घकालिक लाभ पहुंचा सकते हैं।

आत्मविश्वास: अपने मिशन के प्रति गौरव का दृढ़ विश्वास उसके आत्मविश्वास को दर्शाता है।

इस प्रकार, गौरव एक आदर्श युवा के रूप में चित्रित किया गया है जो अपने समाज और पर्यावरण के प्रति जागरूक है और सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए प्रयासरत है।


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पाठ ‘स्मृति’ के आधार पर आपके जीवन में घटित किसी अविस्मरणीय घटना का वर्णन करें।​

‘मन की एकाग्रता’ इस विषय पर अपने विचार लिखो।

विचार लेखन

मन की एकाग्रता

 

मन की एकाग्रता एक ऐसी क्षमता है जो व्यक्ति के समग्र विकास और सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह मन को एक विशेष कार्य या विचार पर केंद्रित करने की कला है।

एकाग्रता के लाभ अनेक होते है। जब मन एकाग्र होता है, तो कार्य अधिक कुशलता और तेजी से पूरा होता है। एकाग्रता से किए गए कार्य में त्रुटियाँ कम होती हैं और गुणवत्ता बेहतर होती है। एकाग्रता से सीखी गई जानकारी दीर्घकाल तक याद रहती है। एकाग्रता से मानसिक शांति मिलती है, जो तनाव को कम करती है। गहन एकाग्रता से नए विचारों और समाधानों का जन्म होता है और व्यक्ति की रचनात्मकता में वृद्धि होती है।

नियमित ध्यान अभ्यास और योग और प्राणायाम से एकाग्रता को बढ़ाया जा सकता है। हालाँकि, आधुनिक जीवन में एकाग्रता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल उपकरण लगातार हमारा ध्यान भटकाते हैं। इसलिए, एकाग्रता को एक कौशल के रूप में विकसित करना आवश्यक है।

निष्कर्षतः, मन की एकाग्रता व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में उन्नति का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह एक ऐसी क्षमता है जिसे नियमित अभ्यास से विकसित किया जा सकता है, और जो जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक प्रभाव डालती है।


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इस विषय पर एक अनुच्छेद लिखिए – ‘जब मैं बीमार हुआ।’

अनुच्छेद

जब मैं बीमार हुआ

 

जब मैं बीमार हुआ, वह एक अनुभव था जिससे मुझे स्वास्थ्य का महत्व समझा आया। यह पिछली सर्दियों की बात है, जब अचानक मुझे तेज बुखार आ गया। शरीर में दर्द, सिर में भारीपन और लगातार खांसी ने मुझे बिस्तर पर ला दिया।

परिवार के सदस्यों ने मेरी देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी। माँ ने गर्म सूप और काढ़े बनाए, पिताजी दवाइयाँ लेकर आए। बहन ने मेरी हर जरूरत की पूरा करने की कोशिश की।

बीमारी ने मुझे अपने दैनिक जीवन के महत्व का एहसास कराया। स्कूल जाना, दोस्तों के साथ खेलना, बाहर घूमना – ये सब साधारण लगने वाली गतिविधियाँ अब मूल्यवान लगने लगी।

धीरे-धीरे, दवाओं और आराम के साथ, मेरी तबीयत सुधरने लगी। जब मैं ठीक हुआ, तो मैंने प्रण लिया कि अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखूँगा। यह अनुभव मेरे लिए एक सबक बन गया कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।


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विचार लेखन

कसरत उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है

 

कसरत उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। यह एक ऐसा सत्य है, जिसे चिकित्सा विज्ञान और दैनिक अनुभव दोनों समान रूप से प्रमाणित करते हैं।

नियमित व्यायाम शरीर को कई तरह से लाभान्वित करता है। यह हृदय को मजबूत बनाता है, रक्त संचार को बेहतर करता है, और फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है। इससे मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं और हड्डियाँ मजबूत बनती हैं। कसरत वजन नियंत्रण में सहायक होती है, जो मोटापे से संबंधित कई बीमारियों को रोकने में मदद करती है।

मानसिक स्वास्थ्य पर भी कसरत का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह तनाव को कम करती है, मूड को बेहतर बनाती है, और आत्मविश्वास बढ़ाती है। नियमित व्यायाम से नींद की गुणवत्ता में सुधार होता है और यह मस्तिष्क के कार्य को भी बेहतर बनाता है।

कसरत के कई रूप हो सकते हैं – चलना, दौड़ना, तैराकी, योग, या खेल। महत्वपूर्ण यह है कि यह नियमित और व्यक्ति की क्षमता के अनुरूप हो।

अंत में, कसरत एक ऐसी आदत है जो जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाती है और दीर्घायु प्रदान करती है। यह स्वस्थ जीवनशैली का एक अनिवार्य अंग है।


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किसी भी कार्य को करने दृढ़ता की आवश्यकता होती है

 

किसी भी कार्य को करने के लिए दृढ़ता की आवश्यकता होती है, इस बात में जरा भी संदेह नहीं है। दृढ़ इच्छा शक्ति से किया गया कोई भी कार्य सफल होने की गारंटी देता है। जब हम अपने किसी कार्य के प्रति दृढ़ता का भाव अपनाते हैं तो हमारा हमारा मनोबल मजबूत होता है। दृढ़ मनोबल से किया गये कार्य में व्यक्ति अपनी पूरी लगन लगा देता है। जब पूर्ण दृढ़ता से कोई कार्य को किया जाता है तो उसमें गलती की गुंजाइश कम होती है। गलती की गुंजाइश कम होने पर कार्य की सफलता की संभावनाएं अधिक बढ़ जाती है।

दृढ़ता हमें आत्मविश्वास प्रदान करती है। यह आत्मविश्वास कार्य की सफलता के लिए आवश्यक है। आत्मविश्वास कार्य को सफल बनाने का सबसे अचूक गुण है। एक आत्मविश्वासी व्यक्ति अपने कार्य को कुशलता और तत्परता से करता है और सफलता पाता है।

किसी भी कार्य को करने में अनेक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। उन चुनौतियों से मुकाबला करने के लिए भी दृढ़ता बेहद आवश्यक है। यदि पूर्ण दृढ़ता से कार्य को संपन्न किया जाता है तो हर चुनौती से निपटने की क्षमता भी स्वतः ही विकसित हो जाती है।

किसी भी कार्य को करने के लिए दृढ़ता का भाव अपनाने से हमारे अंदर समर्पण और कठोर परिश्रम पैदा करने का गुण उत्पन्न होता है जो हमें कार्य की सफलता के अधिक नजदीक ले जाता है। इसलिए किसी भी कार्यों को करने के लिए दृढ़ता की आवश्यकता है, इस विषय में कोई संदेह नहीं है।


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किसने हॉब्स को सर्वसत्तावादी विचारक माना है? (1) माइकल ओकशाट (2) सी.वी. मैकफर्सन (3) विलियम मैकगवर्न (4) सी.एल. वेबर

सही उत्तर है…

सी.बी. मैकफर्सन

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व्याख्या

सी. बी. मैकफर्सन (C. B. Macpherson) ने थॉमस हॉब्स को सर्वसत्तावादी विचारक के रूप में माना है। यह दृष्टिकोण मैकफर्सन की प्रसिद्ध पुस्तक “द पॉलिटिकल थ्योरी ऑफ पॉसेसिव इंडिविजुअलिज्म” में विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।

मैकफर्सन ने हॉब्स के राजनीतिक दर्शन का विश्लेषण करते हुए उनके ‘लेविएथन’ में प्रस्तुत राज्य के सिद्धांत को सर्वसत्तावादी प्रवृत्ति का माना। उन्होंने तर्क दिया कि हॉब्स का सम्प्रभु, जिसे सभी नागरिक अपने अधिकार सौंपते हैं, वास्तव में एक निरंकुश शासक का प्रतिनिधित्व करता है।

मैकफर्सन के अनुसार, हॉब्स का विचार कि मनुष्य स्वार्थी और संघर्षशील प्रकृति का है, उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुंचाता है कि केवल एक शक्तिशाली केंद्रीय सत्ता ही समाज में शांति और व्यवस्था स्थापित कर सकती है। यह केंद्रीय सत्ता, जिसे हॉब्स ‘लेविएथन’ कहते हैं, असीमित अधिकार रखती है और नागरिकों के अधिकारों को सीमित करती है।

हालांकि, यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि मैकफर्सन की यह व्याख्या विवादास्पद रही है और कई अन्य विद्वानों ने इसका खंडन किया है। कुछ का मानना है कि हॉब्स के विचारों को इस तरह से सरलीकृत नहीं किया जा सकता और उनके दर्शन में लोकतांत्रिक तत्व भी मौजूद हैं।

फिर भी, मैकफर्सन का विश्लेषण हॉब्स के राजनीतिक दर्शन की एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली व्याख्या बना हुआ है, जो राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन में अभी भी चर्चा का विषय है।


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रूसो के राजनीतिक विचारों का किस महत्वपूर्ण घटना पर प्रभाव देखा जा सकता है? (1) 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति (2) 1789 की फ्रांस की क्रांति (3) 1776 की अमरीकी क्रांति (4) 1917 की रूसी क्रांति

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सही उत्तर है…

(2) 1789 की फ्रांस की क्रांति

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व्याख्या

रूसो के राजनीतिक विचारों का सबसे महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष प्रभाव 1789 की फ्रांसीसी क्रांति पर देखा जा सकता है। यह क्रांति रूसो के विचारों से गहराई से प्रभावित थी और उसके सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप देने का एक प्रयास थी।

रूसो के ‘सामाजिक अनुबंध’ और ‘सामान्य इच्छा’ के सिद्धांतों ने क्रांतिकारियों को प्रेरित किया। उनका विचार कि सरकार जनता की इच्छा पर आधारित होनी चाहिए, फ्रांसीसी क्रांति का मूल आधार बना। रूसो का यह कथन कि ‘मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन हर जगह वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है’ क्रांति का नारा बन गया।

फ्रांसीसी क्रांति के दौरान ‘स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा’ के आदर्श, जो क्रांति के मूल सिद्धांत बने, रूसो के विचारों से प्रेरित थे। उनके लोकतांत्रिक विचारों ने राजतंत्र के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि रूसो की मृत्यु क्रांति से पहले हो गई थी, उनके लेखन और विचार क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहे। उनके विचारों ने न केवल क्रांति को प्रेरित किया, बल्कि उसके बाद के फ्रांसीसी समाज और राजनीति के पुनर्गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस प्रकार, 1789 की फ्रांसीसी क्रांति रूसो के राजनीतिक विचारों के प्रभाव का सबसे स्पष्ट और महत्वपूर्ण उदाहरण है।


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‘उपयोगितावाद’ का प्रतिपादक कौन है? (1) जेरमी बेन्थम (2) रूसो (3) प्लेटो (4) जीन बोंदा

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‘पहाड़ों का दृश्य’ इस विषय पर एक लघु निबंध लिखिए।

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लघु निबंध

पहाड़ों का दृश्य

पहाड़ों का दृश्य प्रकृति का एक अद्भुत और मनमोहक नज़ारा है। ऊँचे-ऊँचे शिखर, जो आकाश को छूते प्रतीत होते हैं, मानव मन को विस्मय से भर देते हैं। बर्फ़ से ढके चोटियाँ सूर्य की किरणों में चमकती हुई, एक अलौकिक सौंदर्य प्रस्तुत करती हैं।

पहाड़ों की ढलानों पर फैले हरे-भरे जंगल, जीवन की विविधता का प्रतीक हैं। झरने और नदियाँ, जो पहाड़ों से निकलकर बहती हैं, प्राकृतिक संगीत की धुन बिखेरती हैं। घाटियों में बसे छोटे-छोटे गाँव, मानव और प्रकृति के सामंजस्य को दर्शाते हैं।

सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पहाड़ों पर बिखरते रंग, एक कलाकार के कैनवास से कम नहीं होते। बादलों के साथ खेलते शिखर, कभी छिपते, कभी दिखते, एक रहस्यमय आभा उत्पन्न करते हैं।

पहाड़ों का दृश्य न केवल आँखों को तृप्त करता है, बल्कि आत्मा को भी शांति और स्फूर्ति प्रदान करता है। यह हमें प्रकृति की विशालता और अपनी क्षुद्रता का अहसास कराता है, साथ ही जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण देता है।


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‘गणेश चतुर्थी’ पर एक निबंध लिखिए।

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‘गणेश चतुर्थी’ पर एक निबंध लिखिए।

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निबंध

गणेश चतुर्थी

 

गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय और उत्साहपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर के महीने में पड़ता है। इस दिन भगवान गणेश के जन्म का उत्सव मनाया जाता है, जिन्हें बुद्धि, समृद्धि और शुभ शुरुआत का देवता माना जाता है।

त्योहार की शुरुआत घरों और सार्वजनिक स्थानों पर गणेश जी की मूर्तियों की स्थापना के साथ होती है। ये मूर्तियाँ विभिन्न आकारों और सामग्रियों से बनाई जाती हैं, जिनमें मिट्टी, प्लास्टर ऑफ पेरिस, और कभी-कभी पर्यावरण के अनुकूल सामग्री भी शामिल होती हैं। भक्त बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मूर्तियों की पूजा करते हैं, उन्हें फूल, फल, और मिठाइयाँ अर्पित करते हैं।

उत्सव के दौरान, लोग विशेष भोजन तैयार करते हैं, जिसमें मोदक (गणेश जी का प्रिय व्यंजन) प्रमुख है। परिवार और मित्र एक साथ इकट्ठा होकर पूजा करते हैं, भजन गाते हैं, और प्रसाद बाँटते हैं। कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जाती हैं।

गणेश चतुर्थी का उत्सव आमतौर पर 1 से 11 दिनों तक चलता है। अंतिम दिन, जिसे अनंत चतुर्दशी कहा जाता है, भक्त गणेश जी की मूर्तियों को जलाशयों में विसर्जित करते हैं। यह विसर्जन एक भव्य जुलूस के रूप में किया जाता है, जिसमें लोग नाचते-गाते हुए “गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या” (हे गणपति बप्पा, अगले साल जल्दी आना) का उद्घोष करते हैं।

गणेश चतुर्थी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। यह त्योहार लोगों को एक साथ लाता है, परंपराओं को जीवंत रखता है, और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़े रखता है। हालाँकि, हाल के वर्षों में पर्यावरण संरक्षण की चिंताओं के कारण, कई लोग पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से यह त्योहार मनाने की ओर रुख कर रहे हैं।

इस प्रकार, गणेश चतुर्थी भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो आध्यात्मिकता, परंपरा, और आधुनिकता का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है।


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“दहेज हत्या एक कानूनी अपराध” इस विषय पर लघु निबंध लिखिए।

सदाबहार वर्षावन ‘जीवोम’ की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए। ​

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सदाबहार वर्षावन जीवोम बहुत विशिष्ट और जैव विविधता से भरपूर पारिस्थितिक तंत्र हैं। इनकी कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं…

1. जैव विविधता

सदाबहार वर्षावन जीवोम दुनिया के सबसे अधिक जैव विविधता वाले क्षेत्रों में से एक हैं। यहाँ पेड़ों, पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों की असंख्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह विविधता न केवल प्रजातियों की संख्या में, बल्कि उनके बीच के जटिल संबंधों में भी दिखाई देती है, जो इस पारिस्थितिक तंत्र को अद्वितीय बनाती है।

2. सदाबहार वनस्पति

इन वनों की एक प्रमुख विशेषता उनकी सदाबहार प्रकृति है। यहाँ के पेड़ पूरे साल हरे-भरे रहते हैं। पत्तियों का झड़ना और नए पत्तों का आना एक निरंतर प्रक्रिया है, जो वन को हमेशा जीवंत और हरा-भरा बनाए रखती है। यह विशेषता इन वनों को अन्य प्रकार के वनों से अलग करती है।

3. स्तरित संरचना

सदाबहार वर्षावनों की एक और महत्वपूर्ण विशेषता उनकी स्तरित संरचना है। इन वनों में कई स्तर होते हैं – ऊपरी छत्र, मध्य स्तर, निचला स्तर और जमीनी स्तर। हर स्तर पर विशिष्ट पौधे और जानवर पाए जाते हैं, जो अपने विशेष आवास के अनुकूल विकसित हुए हैं। यह स्तरीकरण वन के संसाधनों के अधिकतम उपयोग को सुनिश्चित करता है।

4. जटिल खाद्य श्रृंखला

इन वनों में जटिल खाद्य श्रृंखला पाई जाती है। विभिन्न प्रजातियों के बीच जटिल खाद्य संबंध होते हैं, जो पारिस्थितिक तंत्र को स्थिर रखने में मदद करते हैं। यह जटिलता वन के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और किसी एक प्रजाति के विलुप्त होने से होने वाले नुकसान को कम करती है।

5. अनुकूलन

सदाबहार वर्षावनों के जीव गर्म और आर्द्र जलवायु के अनुकूल विकसित हुए हैं। उदाहरण के लिए, पेड़ों की पत्तियाँ अक्सर चमकीली और मोमी होती हैं जो अतिरिक्त पानी को बहाने में मदद करती हैं। यह अनुकूलन जीवों को इस चुनौतीपूर्ण वातावरण में जीवित रहने और फलने-फूलने में सहायता करता है।

6. तेज पोषक चक्र

इन वनों में पोषक तत्वों का चक्र तेजी से चलता है। गर्म और आर्द्र जलवायु के कारण मृत पदार्थ जल्दी से विघटित हो जाते हैं। यह तेज पोषक चक्र वन की उत्पादकता को बनाए रखने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि पोषक तत्व तेजी से पुनः उपयोग में आ जाएँ।

7. लियाना और एपिफाइट्स

सदाबहार वर्षावनों में बड़ी संख्या में लियाना (लताएँ) और एपिफाइट्स (जैसे ऑर्किड) पाए जाते हैं। ये पौधे प्रकाश और पोषण के लिए बड़े पेड़ों का उपयोग करते हैं। यह विशेषता वन की संरचना को और अधिक जटिल बनाती है और जैव विविधता को बढ़ाती है।

8. विशिष्ट प्रजनन रणनीतियाँ

इन वनों के जीवों में विशिष्ट प्रजनन रणनीतियाँ देखी जाती हैं। कई पौधे और जानवर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए नवीन तरीके अपनाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ पौधे चमकीले फूल या फल पैदा करते हैं जो जानवरों को आकर्षित करते हैं, जिससे परागण और बीज फैलाव में मदद मिलती है। ये रणनीतियाँ वन की जटिलता और विविधता को और बढ़ाती हैं।

ये विशेषताएँ सदाबहार वर्षावनों को एक अद्वितीय और जटिल पारिस्थितिक तंत्र बनाती हैं, जो पृथ्वी की जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


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सौर ऊर्जा क्या है? सौर ऊर्जा के क्या-क्या उपयोग है? बिजली की तुलना में सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाए तो उसके क्या लाभ हैं?

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वैज्ञानिक चेतना के वाहक डॉ. वेंकट रमन पाठ के द्वारा लेखक किस चेतना की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं? क्या आम जन वैज्ञानिक चेतना को अनुभूत करते हैं? अपने शब्दों में लिखें।

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‘वैज्ञानिक चेतना के वाहक – डॉ. वेंकट रमन’ पाठ के द्वारा लेखक उस वैज्ञानिक चेतना की ओर ध्यान आकर्षित कराना चाह रहा है, जो प्रकृति में मौजूद है। लेखक के अनुसार डॉ. रमन ने इसी वैज्ञानिक चेतना को खोजा।

डॉ, रमन का कहना था कि किसी भी बात को जानने के लिए, किसी भी जिज्ञासा के समाधान के लिए उसे प्राकृतिक दृष्टिकोण से जानना समझना चाहिए । किसी जिज्ञासा के मूल में जाने के लिए प्राकृतिक दृष्टिकोण से यदि समझेंगे तो उस समस्या का सही समाधान मिलेगा। प्रकृति के अंदर ही एक वैज्ञानिक चेतना छुपी है।

जितना हम प्रकृति को निकट से जानेंगे उतना ही हम प्रकृति के अनसुलझे रहस्य को समझने की दिशा में कदम बढ़ाएंगे। आम जन भी इस चेतना का अनुभूत कर सकता है, बशर्ते वह प्रकृति को बारीकी से समझे। प्रकृति को अधिक से अधिक जानना ही वैज्ञानिक चेतना को विकसित करता है, क्योंकि यह प्रकृति वैज्ञानिकता से भरी पड़ी है। प्रकृति के वैज्ञानिक रहस्यों का भेदन करने को ओर ही लेखक ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं।

संदर्भ पाठ : वैज्ञानिक चेतना के वाहक – चन्द्रशेखर वेंकट रामन, (कक्षा – 9, पाठ – 4, हिंदी स्पर्श)


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जीवों के प्रति राहुल कैसा भाव प्रकट करता है? (माँ कह एक कहानी- मैथिलीशरण गुप्त) ​

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मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘माँ कह एक कहानी’ को पूरा पढ़ने के बाद, राहुल के जीवों के प्रति भाव को इस प्रकार समझा जा सकता है…

राहुल जीवों के प्रति अत्यंत संवेदनशील और दयालु दृष्टिकोण रखता है। कविता में वर्णित कहानी में, जब एक हंस को तीर से घायल कर दिया जाता है, तो राहुल की प्रतिक्रिया इसे ‘करुणा भरी कहानी’ कहकर व्यक्त होती है। यह उसकी जीवों के प्रति सहानुभूति को दर्शाता है।

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?
कह दे निर्भय जय हो जिसका, सुन लूँ तेरी बानी”
“माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।

राहुल न्याय और दया के बीच एक संतुलन चाहता है। जब उसकी माँ उससे पूछती है कि वह किसका पक्ष लेता है – शिकारी का या पक्षी के रक्षक का, तो राहुल का उत्तर स्पष्ट रूप से जीव-रक्षा के पक्ष में होता है। वह कहता है, ‘कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे?’ यह वाक्य उसकी निर्दोष जीवों की रक्षा करने की इच्छा को दर्शाता है।

कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।”
“न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी।”

राहुल न्याय को दया से जोड़ता है। वह कहता है, ‘रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।’ यहाँ वह स्पष्ट करता है कि उसके लिए सच्चा न्याय वह है जो दया पर आधारित हो। वह मानता है कि निर्दोष जीवों की रक्षा करना और उन्हें बचाना न्यायसंगत है।

इस प्रकार, कविता से स्पष्ट होता है कि राहुल जीवों के प्रति गहरी करुणा, संरक्षण की भावना, और न्यायपूर्ण व्यवहार का समर्थन करता है। वह जीवों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को महत्व देता है, जो उसके उदात्त और संवेदनशील चरित्र को प्रकट करता है।

‘माँ कह एक कहानी’ कविता राष्ट्रकवि ‘मैथिलीशरण गुप्त ‘द्वारा रचित एक मर्मस्पर्शी कविता है। ये कविता गौतम बुद्ध, उनकी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को आधार बनाकर लिखी गई है। इस कविता के माध्यम से कवि ने जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव अपनाने को महत्व दिया है।


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पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए “लक्ष्य सिद्धि का मानी कोमल कठिन कहानी।”

पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए “वर्ण-वर्ण के फूल खिले थे, झलमलकर हिम बिन्दु झिले थे, हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।” “लहराता था पानी। ‘हाँ, हाँ यही कहानी।”

पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए “गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हंस ऊपर से, गिरा बिद्ध होकर खर-शर से, हुई पक्ष की हानी।” “हुई पक्ष की हानी। करुणा भरी कहानी।”

हामिद का परिचय दीजिये। (ईदगाह कहानी – मुंशी प्रेमचंद)

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मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी ‘ईदगाह’ में हामिद कहानी का एक मुख्य पात्र है। उसका परिचय इस प्रकार होगा…

  • हामिद की आयु 4 से 5 वर्ष के बीच है।
  • 4 से 5 वर्ष की आयु होने के बावजूद वह अपने आयु से अधिक समझदार दिखता है।
  • हामिद माता-पिता विहीन बालक है। उसके माता और पिता दोनों का निधन हो चुका है और वह अपनी बूढ़ी दादी अमीना के साथ रहता है।
  • हामिद और उसकी दादी बेहद गरीब हैं। हामिद की दादी अमीना दूसरों के घरों में काम करके हामिद का पालन-पोषण करती है।
  • हामिद पैसे का महत्व समझता है। वह अपनी आयु के बच्चों की तरह पैसे की फिजूलखर्ची नही करता। वह पैसों को मौज-मस्ती में खर्च नहीं करता बल्कि उपयोगी वस्तु ही खरीदता है।
  • अपनी गरीबी और अभाव के कारण समय से पहले परिपक्व हो गया है और अपनी आयु से अधिक आयु के बच्चों जैसा व्यवहार करता है।
  • हामिद के अंदर चतुराई का गुण भी है। मेले में वह उसे मालूम है कि उसके पास कम पैसे हैं तो खुद को शर्मिंदा होने से बचाने लिए अपने दोस्तों सामने वह खिलौनों और मिठाई की बुराइयां बताकर दोस्तों के सामने अपनी निर्धनता कर छुपा लेता है।
  • हामिद के मन में अपनी दादी अमीना के प्रति प्रेम और संवेदना है, इसी कारण मेले में से अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है क्योंकि उसे मालूम है उसकी दादी रोटी बनाती है, तो बिना चिमटे के कारण उसकी उंगलियां जल जाती है।
  • इस तरह हामिद एक चतुर, एक समझदार लड़का है।

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वैदिक शिक्षा और विज्ञान (निबंध)

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निबंध

वैदिक शिक्षा और विज्ञान

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प्रस्तावना

वैदिक युग में शिक्षा व्यक्ति के चहुँमुखी विकास के लिए थी। जब विश्व के शेष भाग बर्बर एवं प्रारम्भिक अवस्था में थे, भारत में ज्ञान, विज्ञान तथा चिन्तन अपने चरमोत्कर्ष पर था। उस समय अपने ज्ञान के कारण भारत विश्वगुरु कहलाता था। भारत में वैदिक शिक्षा का युग ज्ञान और चिंतन का युग था।

वैदिक युग में शिक्षा की विशेषताएँ

शिक्षा ज्ञान है और वह मनुष्य का तीसरा नेत्र है। शिक्षा के द्वारा समस्त मानव जीवन का विकास सम्भव है। ईश्वर-भक्ति तथा धार्मिकता की भावना, चरित्र- निर्माण, व्यक्तित्व का विकास, नागरिक तथा सामाजिक कर्तव्यों का पालन, सामाजिक कुशलता की उन्नति तथा राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण और प्रसार वैदिक काल में गुरुकुल प्रणाली थी। छात्र माता-पिता से अलग, गुरु के घर पर ही शिक्षा प्राप्त करता था, यह पद्धति गुरुकुल पद्धति कहलाती थी। अन्य सहपाठियों के साथ वह गुरुकुल मे ब्रह्मचर्य का पालन करता हुआ शिक्षा प्राप्त करता था। आचरण की शुद्धता व सात्विकता को प्रमुखता दी जाती थी। अविवाहित छात्रों को ही गुरुकुल में प्रवेश मिलता था।

वैदिक युग में शिक्षा

गुरु प्रत्येक छात्र का विकास करने के लिए प्रयत्नशील रहता था तथा उनका शारीरिक तथा मानसिक विकास करता था। वैदिक युग में शिक्षा मौखिक रूप से शिक्षण किया जाता था। इसका प्रमुख कारण था-लेखन कला तथा मुद्रण कला का अभाव। उस समय मौखिक रूप से अध्यापक आवश्यक निर्देश देते थे। छात्र उन निर्देशों का पालन करते थे। शिक्षण विधि में प्रयोग एवं अनुभव, कर्म तथा विवेक को महत्व दिया जाता था।

विज्ञान

वर्तमान युग में विज्ञान का प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में देखने को मिलता है। आज विज्ञान के बिना समाज की कल्पना करना असंभव है। हमारी संस्कृति में विज्ञान घुल-मिल गया है। विज्ञान की शिक्षा के प्रचार व प्रसार से मानव की विचारधारा में बहुत परिवर्तन आया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है।

प्राचीन समय में इसे भौतिक विज्ञान के नाम से जाना जाता था एवं उच्च शैक्षिक संस्थानों में छात्र इसे अत्यंत उत्साह से पढ़ते थे। भारतीय पुनर्जागरण के समय (बीसवीं सदी के प्रारंभ) में भारतीय वैज्ञानिकों ने उल्लेखनीय प्रगति की थी। 1947 में देश के आजाद होने के पश्चात संस्थाओं की स्थापना की गई ताकि विज्ञान के क्षेत्र में हुई इस सहज एवं रचनात्मक प्रगति को और बढ़ावा मिल सके। इस कार्य में विभिन्न राज्यों ने भी अपना भरपूर सहयोग दिया।

इसके बाद से भारत सरकार ने देश में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की आधुनिक अवसंरचना के निर्माण में कोई कसर नहीं छोड़ी है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग देश में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उपसंहार

इस प्रकार हम देखते हैं कि वैदिक शिक्षा का जहाँ प्राचीन काल में बेहद महत्व था, वहीं विज्ञान का आधुनिक काल में अपना महत्व है। हमें वैदिक शिक्षा के रूप में अपनी प्राचीन धरोहर को संजोते हुए विज्ञान के महत्व को स्वीकार करना चाहिए।


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आधुनिक राष्ट्र-राज्य का विशिष्ट लक्षण क्या है? (1) जनसंख्या (2) भू-भाग (3) सरकार (4) प्रभुसत्ता

इस प्रश्न का सही उत्तर है:

(4) प्रभुसत्ता

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व्याख्या

आधुनिक राष्ट्र-राज्य का विशिष्ट लक्षण प्रभुसत्ता है।

प्रभुसत्ता (Sovereignty) आधुनिक राष्ट्र-राज्य का सबसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण लक्षण है। यह वह गुण है जो एक राष्ट्र-राज्य को अन्य राजनीतिक संगठनों से अलग करता है और उसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित करता है।

प्रभुसत्ता के महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के द्वारा समझा जा सकता है।

1. सर्वोच्च अधिकार : प्रभुसत्ता का अर्थ है कि राज्य अपने क्षेत्र और जनता पर सर्वोच्च अधिकार रखता है। कोई बाहरी शक्ति राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

2. आंतरिक और बाहरी स्वतंत्रता : प्रभुसत्ता राज्य को आंतरिक मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र रूप से कार्य करने की शक्ति देती है।

3. कानून बनाने का अधिकार : प्रभुसत्तासंपन्न राज्य अपने लिए कानून बना सकता है और उन्हें लागू कर सकता है।

4. अंतरराष्ट्रीय मान्यता : प्रभुसत्ता एक राज्य को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत एक स्वतंत्र इकाई के रूप में मान्यता दिलाती है।

5. अन्य लक्षणों से अलग : जबकि जनसंख्या, भू-भाग और सरकार राष्ट्र-राज्य के महत्वपूर्ण तत्व हैं, ये अन्य प्रकार के राजनीतिक संगठनों में भी पाए जा सकते हैं। प्रभुसत्ता वह है जो एक राष्ट्र-राज्य को विशिष्ट बनाती है।

6. ऐतिहासिक महत्व : प्रभुसत्ता की अवधारणा 1648 के वेस्टफेलिया की संधि से उभरी, जो आधुनिक राष्ट्र-राज्य प्रणाली की नींव मानी जाती है।

यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के उदय के साथ, प्रभुसत्ता की प्रकृति बदल रही है। फिर भी, यह आधुनिक राष्ट्र-राज्य का सबसे विशिष्ट लक्षण बनी हुई है, जो इसे अन्य राजनीतिक इकाइयों से अलग करती है।


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सही उत्तर है…

(2) मैकियावली

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व्याख्या

निकोलो मैकियावली (1469-1527) को अक्सर ‘नवजागरण का शिशु’ कहा जाता है। यह उपाधि उनके जीवन काल और उनके विचारों के प्रभाव को दर्शाती है।

मैकियावली इटली के फ्लोरेंस में पैदा हुए थे, जो नवजागरण (Renaissance) का केंद्र था। नवजागरण 14वीं से 17वीं शताब्दी तक चला एक सांस्कृतिक आंदोलन था, जिसने कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और राजनीति में नए विचारों और दृष्टिकोणों को जन्म दिया।

मैकियावली को ‘नवजागरण का शिशु’ कहने के कई कारण हैं:

1. आधुनिक राजनीतिक विचार : मैकियावली को आधुनिक राजनीतिक विचार का जनक माना जाता है। उन्होंने राजनीति को धर्म और नैतिकता से अलग करके देखा, जो उस समय के लिए क्रांतिकारी था।

2. यथार्थवादी दृष्टिकोण : उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “द प्रिंस” में, उन्होंने राजनीति को जैसा है वैसा देखने का आह्वान किया, न कि जैसा होना चाहिए। यह दृष्टिकोण नवजागरण के वैज्ञानिक और तर्कसंगत सोच के अनुरूप था।

3. मानवतावादी परंपरा : मैकियावली ने मानव स्वभाव और इतिहास का गहन अध्ययन किया, जो नवजागरण के मानवतावादी दृष्टिकोण को दर्शाता है।

4. क्लासिकल ज्ञान का प्रयोग : उन्होंने प्राचीन रोमन और यूनानी विचारकों के कार्यों का उपयोग किया, जो नवजागरण की एक प्रमुख विशेषता थी।

5. इतालवी भाषा का प्रयोग : मैकियावली ने अपने लेखन में लैटिन के बजाय इतालवी भाषा का प्रयोग किया, जो नवजागरण के दौरान स्थानीय भाषाओं के उदय को दर्शाता है।

मैकियावली के विचारों ने न केवल उनके समय को प्रभावित किया, बल्कि आने वाली शताब्दियों में राजनीतिक चिंतन को भी आकार दिया। इस प्रकार, ‘नवजागरण का शिशु’ शीर्षक उनके नवजागरण के युग में जन्म लेने और उस युग के विचारों को आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।


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सही उत्तर है…

(4) ग्रीन

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व्याख्या

ग्रीन को मद्य निषेध का समर्थक विचारक का समर्थक विचारक माना जाता है। ग्रीन का पूरा नाम टी. एच. ग्रीन (Thomas Hill Green) था।

टी.एच. ग्रीन (Thomas Hill Green, 1836-1882) ब्रिटिश दार्शनिक और राजनीतिक विचारक थे, जो मद्य निषेध (शराबबंदी) के प्रमुख समर्थकों में से एक थे। ग्रीन के दर्शन में नैतिक और सामाजिक सुधार का विचार केंद्रीय था, और वे मानते थे कि शराब समाज के लिए एक गंभीर समस्या है।

ग्रीन का मानना था कि शराब व्यक्तियों की स्वतंत्रता और आत्म-निर्धारण की क्षमता को कमजोर करती है। उनका तर्क था कि शराब का सेवन लोगों को उनकी तार्किक और नैतिक क्षमताओं से वंचित करता है, जो कि एक स्वतंत्र और नैतिक जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं। इसलिए, उन्होंने माना कि शराब पर प्रतिबंध लगाना व्यक्तियों और समाज दोनों के हित में है।

ग्रीन के लिए, मद्य निषेध का समर्थन उनके व्यापक दार्शनिक दृष्टिकोण का हिस्सा था, जिसमें राज्य की भूमिका नागरिकों के नैतिक विकास को बढ़ावा देना था। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य का कर्तव्य है कि वह ऐसी परिस्थितियाँ बनाए जो लोगों को अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचने में मदद करें, और उनके विचार में, शराब इस लक्ष्य में एक बाधा थी।

यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि ग्रीन का दृष्टिकोण उनके समय के सामाजिक और नैतिक चिंताओं को प्रतिबिंबित करता है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में, शराब की लत को एक गंभीर सामाजिक समस्या के रूप में देखा जा रहा था, विशेष रूप से श्रमिक वर्ग में।

ग्रीन के विचार आधुनिक उदारवादी दर्शन के विकास में महत्वपूर्ण रहे हैं, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है। हालांकि आज शराबबंदी के प्रति दृष्टिकोण बदल गया है, ग्रीन के विचार सामाजिक नीति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संबंधों पर चल रही बहस में अभी भी प्रासंगिक हैं।


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संपत्ति के संबंध में ग्रीन का विचार है? (1) समाजवादी (2) उदारवादी (3) व्यक्तिवादी (4) इनमें से कोई नहीं

सही उत्तर है…

(2) उदारवादी

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व्याख्या

संपत्ति के संबंध में ग्रीन का विचार उदारवादी है।

टी.एच. ग्रीन (Thomas Hill Green, 1836-1882) एक प्रमुख ब्रिटिश दार्शनिक और राजनीतिक विचारक थे, जिन्हें नव-उदारवाद या आदर्शवादी उदारवाद के संस्थापकों में से एक माना जाता है। संपत्ति के संबंध में ग्रीन के विचार उदारवादी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करते हैं, लेकिन यह एक संशोधित और सामाजिक रूप से जागरूक उदारवाद है।

ग्रीन ने संपत्ति के अधिकार को मान्यता दी, लेकिन उन्होंने इसे एक निरपेक्ष या असीमित अधिकार नहीं माना। उनका मानना था कि संपत्ति का अधिकार व्यक्ति के नैतिक विकास और स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह अधिकार समाज के प्रति जिम्मेदारियों के साथ संतुलित होना चाहिए।

ग्रीन के दृष्टिकोण में, संपत्ति का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण में योगदान देना भी है। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य को संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन अधिकारों का उपयोग सामाजिक हित में हो।

यह दृष्टिकोण क्लासिकल उदारवाद से अलग है, जो संपत्ति के अधिकारों को अधिक निरपेक्ष रूप से देखता है, और समाजवाद से भी भिन्न है, जो निजी संपत्ति के विचार को ही चुनौती देता है। ग्रीन का उदारवाद एक मध्यम मार्ग प्रस्तुत करता है, जो व्यक्तिगत अधिकारों और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है।

इस प्रकार, ग्रीन का संपत्ति संबंधी दृष्टिकोण उदारवादी है, लेकिन यह एक सामाजिक रूप से जागरूक और नैतिक रूप से प्रेरित उदारवाद है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता है।


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जेरेमी बेंथम किस देश का रहने वाला था? (1) फ्रांस (2) इंग्लैंड (3) अमेरिका (4) यूनान

सही उत्तर है…

(2) इंग्लैंड

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व्याख्या

जेरेमी बेंथम (1748-1832) इंग्लैंड के प्रसिद्ध दार्शनिक, कानूनवेत्ता और सामाजिक सुधारक थे। वे लंदन में जन्मे और वहीं रहे। बेंथम उपयोगितावाद के संस्थापक माने जाते हैं, जो एक नैतिक और राजनीतिक दर्शन है। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी कार्य या नीति का मूल्यांकन उसके परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए, विशेष रूप से यह देखते हुए कि वह कितने लोगों को कितना खुश करती है।

बेंथम ने ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम हित’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जो आधुनिक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बना। उन्होंने कानूनी और सामाजिक सुधारों के लिए भी काम किया, जिसमें जेल सुधार, शिक्षा का विस्तार, और गरीबी उन्मूलन शामिल थे।

बेंथम के विचारों ने न केवल इंग्लैंड बल्कि पूरे यूरोप और अमेरिका में भी गहरा प्रभाव डाला। उनके शिष्य जॉन स्टुअर्ट मिल ने उपयोगितावाद के सिद्धांत को और आगे बढ़ाया। बेंथम की विरासत आज भी नीति निर्माण, कानून, और नैतिक दर्शन में देखी जा सकती है।

यह उल्लेखनीय है कि हालांकि बेंथम इंग्लैंड के थे, उनके विचारों का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय था, जो दर्शाता है कि महान विचारकों के योगदान अक्सर राष्ट्रीय सीमाओं से परे होते हैं।


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पतझर में टूटी पत्तियाँ (I) गिन्नी का सोना (II) झेन की देन : रवींद्र केलेकर (कक्षा-10 पाठ-13 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

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NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

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पतझर में टूटी पत्तियाँ (I) गिन्नी का सोना (II) झेन की देन : रवींद्र केलेकर

पाठ के बारे में…

प्रस्तुत पाठ ‘पतझर में टूटी पत्तियां’ रविंद्र केलेकर द्वारा रचित एक निबंध है, उसमें उन्होंने दो प्रसंगों का वर्णन किया है। पहला प्रसंग उन लोगों से परिचित कराता है, जो अपने लिए जीवन में सुख सुविधा नहीं जुटाते बल्कि इस जगत को जीने और रहने योग्य बनाए हुए हैं।

दूसरा प्रसंग जापान के लोगों के बारे में बताता है, जो अपने व्यस्ततम दिनचर्या के बीच टी-सेरेमनी जैसे कुछ आयोजनों द्वारा अपने जीवन में कुछ चैन भरे पल जुटा लेते हैं। पाठ में दोनों प्रसंगों के माध्यम से लेखक ने थोड़े शब्दों में ही बहुत बड़ी और गूढ़ बातें कह दी हैं।

लेखक के बारे में…

रविंद्र केलेकर हिंदी मराठी और कोंकणी भाषा के लेखक और पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 7 मार्च 1925 को महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में हुआ था। वह गोवा मुक्ति आंदोलन के सेनानी भी थे। वह गांधीवादी चिंतक विचारक के रूप में प्रसिद्ध रहे । उन्होंने कोंकणी भाषा में 25, मराठी भाषा में 3 तथा हिंदी और गुजराती भाषा में भी कुछ पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें गोवा कला अकादमी का साहित्य पुरस्कार भी मिल चुका है।

उनकी प्रमुख कृतियों में हिंदी भाषा में ‘पतझर में टूटी पत्तियां’ प्रसिद्ध है, जबकि कोंकणी भाषा में उजबाढ़ाचे सूर, समिधा, सांगली, ओथांबे तथा मराठी भाषा में कोंकणीचे राजकरण, जापान जैसा दिसला आदि के नाम प्रमुख हैं। उनका निधन 2010 में हुआ।



हल प्रश्नोत्तर

मौखिक
प्रश्न 1 :  शुद्ध सोना और गिन्नी का सोना अलग क्यों होता है?

उत्तर : शुद्ध सोना और गिन्नी का सोना अलग-अलग इसलिए होता है, क्योंकि शुद्ध सोना पूरी तरह शुद्ध खरा सोना होता है। लेकिन शुद्ध सोने में अधिक चमक नहीं होती। जबकि गिन्नी के सोने में ताँबा मिलाया जाता है और यह अधिक चमकीला होता है। चमकीला होने के साथ-साथ  गिन्नी का सोना शुद्ध सोने की तुलना में अधिक मजबूत होता है।


प्रश्न 2 : प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट किसे कहते हैं?

उत्तर : प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट उन लोगों को कहते हैं, जो अपने जीवन में आदर्श और व्यवहार का घालमेल कर देते हैं। वे अपने आदर्शों में व्यवहारिकता को भी मिला देते हैं। लेकिन जब व्यवहारिकता का बखान अधिक होने लगता है, तो वह अपने आदर्शों को भूलकर व्यवहारिकता पर अधिक जोर देते हैं यानी वे आदर्शों पर टिके नही रहते है। ऐसे लोगों को प्रैक्टिकल आयडियालिस्ट कहते हैं।


प्रश्न 3 : पाठ के संदर्भ में शुद्ध आदर्श क्या है?

उत्तर : ‘पतझर में टूटी पत्तियां’ पाठ के संदर्भ में शुद्ध आदर्श वे आदर्श हैं जिनमें व्यवहारिकता का कोई भी मिश्रण ना हो। शुद्ध आदर्श शुद्ध सोने की तरह है, जिनमें व्यवहारिकता नही मिलाई जा सकती है। शुद्ध सोने में ताँबा मिलाने से भले भी वह अधिक चमकदार और टिकाऊ हो जाता हो लेकिन उसकी शुद्धता जाती रहती है। उसी तरह शुद्ध आदर्शों में व्यवहारिकता का मेल नहीं किया जा सकता, वह हमेशा शुद्ध आदर्श ही रहते हैं।


प्रश्न 4 : लेखक ने जापानियों के दिमाग में ‘स्पीड’ का इंजन लगने की बात क्यों कही है?

उत्तर : लेखक ने जापानियों के दिमाग में ‘स्पीड’ इंजन लगने की बात इसलिए कही है, क्योंकि जापानी लोग हर कार्य को बेहद तेज गति से करते हैं। जापानी लोग हमेशा अमेरिका के साथ होड़ में रहते हैं और वह अमेरिका से हर हालत में आगे निकलना चाहते हैं। जापानी लोग एक महीने का काम एक दिन में ही पूरा करना चाहते हैं और उनका दिमाग हमेशा तेज रफ्तार से कुछ ना कुछ सोचता रहता है, इसीलिए लेखक ने जापानियों के दिमाग में ‘स्पीड’ इंजन लगा होने की बात कही है।


प्रश्न 5 : जापानी में चाय पीने की विधि को क्या कहते हैं?

उत्तर : जापान में चाय पीने की विधि यानी टी सेरेमनी को ‘चा-नो-यू’ कहते हैं। जापान में चाय पिलाने की एक विशेष विधि होती है। यह विधि चा-नो-यू’ के नाम से जानी जाती है, जो जापानी लोगों में मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए एक विशिष्ट पारंपरिक विधि है। चाय पिलाने वाले व्यक्ति को ‘चाजीन’ कहा जाता है।


प्रश्न 6 : जापान में जहाँ चाय पिलाई जाती है, उस स्थान की क्या विशेषता है?

उत्तर : जापान में जहाँ चाय पिलाई जाती है, उस स्थान की विशेषता यह होती है कि ये स्थान अत्यंत शांतिपूर्ण होता है। यह स्थान शालीन तरीके से सजाई हुई कुटी होती है। इस स्थान पर बेहद गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाता है। इस स्थान में शांति बनाए रखने का बेहद ध्यान रखा जाता है।

इस स्थान पर चाय पीने आने वाले लोगों के लिए शांति मानसिक शांति प्राप्त करना महत्वपूर्ण होता है। इसी कारण यहां पर अधिकतम एक बार में तीन लोग ही आकर चाय पी सकते हैं। चाय बनाकर पिलाने वाले व्यक्ति को चाजीन कहते हैं। और वह बेहद कलात्मक तरीके से चाय बनाकर खिलाता है। एक डेढ़ घंटे तक चलने वाली ये टी-सेरेमनी जापान के लोगों में मानसिक शांति प्राप्त करने का एक पारंपरिक उपाय है।


लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-

प्रश्न 1 : शुद्ध आदर्श की तुलना सोने से और व्यावहारिकता की तुलना ताँबे से क्यों की गई है?

उत्तर : शुद्ध आदर्श की तुलना सोने से एवं व्यवहारिकता की तुलना ताँबे से इसलिए की गई है, क्योंकि शुद्ध आदर्श हमेशा शुद्ध सोने के समान होते हैं। जिस तरह शुद्ध सोने में किसी तरह की मिलावट नहीं की जा सकती, उसी कारण वो शुद्ध कहलाता है, उसी तरह शुद्ध आदर्शों में भी किसी तरह की मिलावट नहीं की जाती, इसी कारण वह शुद्ध आदर्श कहे जाते हैं।

तांबे की तुलना व्यवहारिकता से इसलिए की गई है, क्योंकि शुद्ध सोने में यदि ताँबे की कुछ मात्रा मिला दी जाए तो सोना अधिक उपयोगी बन जाता है यानी वह अधिक चमकीला एवं अधिक मजबूत हो जाता है। हमारा जीवन भी इसी तरह का होता है। जीवन केवल आदर्शों से नहीं चलता बल्कि उसमें व्यवहारिकता का भी मेल होना चाहिए। यदि आदर्शों में थोड़ा व्यवहारिकता का मेल कर दिया जाए तो उन आदर्शों का अच्छी तरह पालन किया जा सकता है।

आदर्शों का एकदम शुद्ध रूप में पालन करना हर समय संभव नहीं हो पाता। आवश्यकता पड़ने पर उसमें थोड़ा बहुत व्यवहारिकता का मेल कर देने से आदर्श अधिक उपयोगी और सार्थक बन जाते हैं।


प्रश्न 2 : चाजीन ने कौन-सी क्रियाएँ गरिमापूर्ण ढंग से पूरी कीं?

उत्तर : चाजीन ने शुरू से लेकर आखिर तक सभी क्रियाएं बेहद गरिमापूर्ण ढंग से संपन्न की थीं। जब अतिथियों ने प्रवेश किया तो चाजीन ने सिर झुका कर उनका स्वागत किया और कहा ‘दो झो’ यानी आइए तस्वीर लाइए। चाजीन ने अतिथियों को बैठने की जगह दिखाई। फिर उसने अंगीठी सुलगाई और उस पर चायदानी रखी और चाय बनाने लगा। फिर वह बगल के कमरे से जाकर कुछ बर्तन ले आया। उसने तौलिये से बर्तन साफ करके रखें। उसने यह सारी क्रियाएं शांतिपूर्ण ढंग से की थी।

सारी क्रियायें करने में उसने जरा भी आवाज नहीं की और वातावरण इतना शांत था कि चाय बनाने को रखी केतली के खदबदाने की आवाज भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी। उसने सलीके से चाय को केतली से प्यालों में डाला और प्याले अतिथियों के सामने रख दिए। इस तरह उसने शुरू से लेकर आखिर सारी क्रियायें गरिमापूर्म ढंग से की।


प्रश्न 3 : टी-सेरेमनी’ में कितने आदमियों को प्रवेश दिया जाता था और क्यों?

उत्तर : टी-सेरेमनी में केवल तीन आदमियों को प्रवेश दिया जाता था। केवल तीन आदमियों को प्रवेश देने का मुख्य उद्देश्य शांति बनाए रखना था। जापान में ‘टी सेरेमनी ‘चा-नो-यू’ मानसिक शांति प्राप्त करने की एक पारंपरिक विधि थी। इसके अंतर्गत लोग विशेष रूप जो टी सेरेमनी के लिए विशेष रूप से बनाया गया होता था। वहां पर जाकर कुछ समय तक तक चाय पीते हैं।

इस स्थान पर शांति और गरिमापूर्ण व्यवहार का विशेष ध्यान रखा जाता । अधिक लोगों के होने से शांति भंग होने की संभावना होती थी, इसलिए केवल 3 लोगों को एक बार में प्रवेश किया जाता था, जो एक या डेढ़ घंटे तक धीरे-धीरे चाय पी कर अपने मन की मानसिक शांति प्राप्त करते थे।


प्रश्न 4 : चाय पीने के बाद लेखक ने स्वयं में क्या परिवर्तन महसूस किया?

उत्तर : चाय पीने के बाद लेखक से दिमाग की रफ्तार धीरे-धीरे धीमी पड़ती गई। लेखक को ऐसा लगा कि उसका दिमाग सुन्न पड़ गया हो। लेखक को ऐसा महसूस होने लगा कि जैसे वह अनंतकाल में जी रहा हो। लेखक को चारों तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा महसूस होने लगा। और लेखक भूत एवं भविष्य के बारे में नहीं सोच रहा था। उसे केवल वर्तमान ही दिखाई दे रहा था। भूत और भविष्य के काल अब हवा में उड़ गए थे। लेखक को जो नजर आ रहा था वह उसका वर्तमान है , वही सच है। जो सच होता है, वह ही लेखक वह ही सामने नजर आ रहा था।


(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-

प्रश्न 1 : गांधी जी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी; उदाहरण सहित इस बात की पुष्टि कीजिए।

उत्तर : गांधी जी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी, इस बात में कोई भी संशय नहीं था। उनके अद्भुत नेतृत्व के कारण ही भारत स्वाधीनता संग्राम के आंदोलन को इतने विशाल स्तर पर सफल बना पाया। उनके सफल नेतृत्व के गुण के कारण ही भारत का स्वाधीनता संग्राम एक विशाल आंदोलन में एकजुट हो गया था। उनकी लोकप्रियता पूरे भारत में एक समान थी और लोग उनकी एक आवाज पर उनके पीछे चल पड़ते थे।

उन्होंने अनेक सफल आंदोलनों का नेतृत्व किया जिसमें असहयोग आंदोलन, दांडी मार्च, भारत छोड़ो आंदोलन आदि प्रमुख थे। गांधीजी आदर्शवादी नेता थे। उनके जीवन में आदर्शों का बेहद महत्व था। वह आदर्श में व्यवहारिकता का नहीं बल्कि व्यवहारिकता में  आदर्शों को मिला देते थे। यानि वह में सोने में तांबे को मिलाकर नहीं बल्कि तांबे में सोना मिलाकर तांबे के मूल्य को बढ़ा देते थे। इसी कारण वह अपने आदर्शों को इतना अधिक लोकप्रिय बना पाये कि उनके आदर्श आज भी पालन किए जाते है।


प्रश्न 2 : आपके विचार से कौन-से ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं? वर्तमान समय में इन मूल्यों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : हमारे विचार में सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, दया, करुणा, प्रेम एवं भाईचारा यह जीवन के शाश्वत मूल्य हैं, जो प्राचीन काल से व्यवहार में लाए जाते रहे हैं और हर समय प्रासंगिक रहेंगे। मानव जीवन को इन मूल्यों की हमेशा आवश्यकता रही है। सत्य एवं अहिंसा का मूल्य गांधी जी द्वारा प्रतिपादित किया गया था लेकिन यह भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही रहा है। ईमानदारी, दया, सब के प्रति करुणा, आपसी प्रेम एवं आपसी भाईचारा यह सभी मूल जीवन के शाश्वत मूल्य हैं, जिनका निरंतर पालन किए जाने की आवश्यकता है।

इन मूल्यों के पालन से ही समाज की अवधारणा बनी रह सकती है। यदि इन शाश्वत मूल्यों का पूरी तरह से तैयार कर दिया तो समाज भी बिखर जाएगा और यह सभ्य समाज आदिम समाज में बढ़कर रह जाएगा। ऐसा संभव नहीं है क्योंकि प्राचीन काल से यह मूल्य किसी न किसी रूप में पालन किए जाते रहे हैं और आगे पालन किए जाते हैं, भले ही आज किसी भी तरह की नकारात्मकता क्यों ना हो, लेकिन इन मूल्यों ने ही समाज की अवधारणा को कायम रखा है।


प्रश्न 3 : अपने जीवन की किसी ऐसी घटना का उल्लेख कीजिए जब
  1. शुद्ध आदर्श से आपको हानि-लाभ हुआ हो।
  2. शुद्ध आदर्श में व्यावहारिकता का पुट देने से लाभ हुआ हो।

उत्तर : ऐसी दो घटनाएं इस प्रकार हैं…

(1) शुद्ध आदर्श से आपको हानि-लाभ हुआ हो।

हमने एक नई मिठाई की दुकान खोली। हमने यह निश्चित किया था कि हम मिठाई में किसी भी तरह की मिलावट नहीं करेंगे।  हम शुद्ध खोये की मिठाई बनाएंगे। चाहे किसी भी त्यौहार का सीजन क्यों ना हो। हम लाभ कमाने के चक्कर में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करेंगे। हमने इस आदर्श को सख्ती से दृढ़ता से अपनाया। हमारे आसपास के कई प्रतिद्वंदी भी दुकानदार मिठाई में मिलावट करते थे और त्योहारों के समय अधिक मिठाई का उत्पादन कर खूब लाभ कमाते थे, लेकिन हमने मिलावट ना करने का आदर्श अपनाया। धीरे-धीरे हमारी दुकान की साख बढ़ती गई। आज हमारी दुकान अन्य मिलावटी दुकानदारों से अधिक चलती है और हमारी दुकान की एक ब्रांड वैल्यू बन चुकी है। यह हमारे द्वारा मिलावट ना करने के आदर्श के कारण ही संभव हो पाया।

(2) शुद्ध आदर्श में व्यावहारिकता का पुट देने से लाभ हुआ हो।

मैंने यह निश्चित किया था कि रोज सुबह 5 बजे उठ जाना है और रात 11 बजे से पहले सो जाना है। यह आदर्श का मैं हमेशा पालन करता था लेकिन कभी-कभी इस आदत में ढील भी दे देता था क्योंकि कभी-कभी किसी काम के लिए देर रात तक जगना पड़ता था। इससे मैं अपने जल्दी सोने और जल्दी उठने के आदर्श का आसानी से पालन कर पाता हूँ और मुझे यह आदर्श बोझ नहीं लगता। यदि मैं  इसमें व्यावहारिकता का पुट नहीं देता तो एक समय आदर्श बोझ लगने लगता।


प्रश्न 4 : ‘शुद्ध सोने में ताँबे की मिलावट या ताँबे में सोना’, गांधी जी के आदर्श और व्यवहार के संदर्भ में यह बात किस तरह झलकती है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : गाँधी जी पक्के आदर्शवादी थे। वह अपने आदर्शों के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं कर सकते थे। लेकिन जीवन में व्यवहारिकता भी जरूरी थी। वह सोने में ताँबा नहीं मिला सकते थे, इसलिए उन्होंने ताँबे में ही सोना मिला दिया, इससे ताँबे की कीमत बढ़ गई।

उन्होंने अपने आदर्शों के साथ किसी भी तरह का समझौता तो नहीं किया और व्यवहारिकता को भी अपनायें उन्होंने व्यावहारिकता में अपने आदर्शों को भी थोड़ा बहुत मिला दिया । इससे व्यवहारिकता का अच्छे से पालन भी कर पाए और उनके आदर्श भी शुद्ध रहे।  इस तरह उन्होंने व्यावहारिकता का मूल्य भी बढ़ा दिया और अपने आदर्शों को अशुद्ध भी नहीं होने दिया।


प्रश्न 5 : ‘गिरगिट’ कहानी में आपने समाज में व्याप्त अवसरानुसार अपने व्यवहार को पल-पल में बदल डालने की एक बानगी देखी। इस पाठ के अंश ‘गिन्नी का सोना’ के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए कि ‘आदर्शवादिता’ और ‘व्यावहारिकता’ इनमें से जीवन में किसका महत्त्व है?

उत्तर : गिरगिट कहानी का पुलिस इंस्पेक्टर आदर्शवादी नहीं था बल्कि वह पल पल रंग बदलने वाला व्यक्ति था, जो जीवन में जरूरत से ज्यादा व्यवहारिक था। उसके जीवन में आदर्श का कोई महत्व नहीं था। ऐसे व्यक्ति समाज के लिए बिल्कुल भी जरूरी नहीं और समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। जीवन में आदर्श और व्यवहारिकता दोनों जरूरी है, लेकिन आदर्श अधिक जरूरी है।

हर समय व्यावहारिकता अपनाना स्वार्थी प्रवृत्ति को जन्म देता है। जो लोग जरूरत से अधिक व्यवहारिक होते हैं, वह किसी एक बात पर टिके नहीं रहते और जहां उन्हें लाभ दिखाई दे रहा है, वहाँ खिंचे चले जाते हैं। आदर्शवादी होना बेहद आवश्यक गुण है। आदर्शों से ही समाज की संरचना होती है और सांस्कृतिक मूल्य विकसिती होते हैं।

यह अलग बात है कि थोड़े बहुत आदर्शों के साथ समझौता करके व्यवहारिकता का पुट दिया जा सकता है, लेकिन जीवन में आदर्शों का अधिक महत्व है। आदर्शों और थोड़ी बहुत व्यवहारिकता के मेल ही सबसे उपयुक्त संयोजन है।


प्रश्न 6 : लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए? आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर : लेखक के मित्र ने इस पाठ में मानसिक रोग के अनेक कारण बताए हैं। लेखक ने जापानी लोगों के मानसिक रोग के यह कारण बताए हैं कि जापानी लोग बहुत तेज गति से कार्य करना पसंद करते हैं। उनके अंदर हर समय अमेरिका से प्रतिस्पर्धा करने की भावना बनी रहती है। वे  हर हालत में अमेरिका से आगे निकलना चाहते हैं।

जापानी लोगों की मनोवृति ऐसी है कि वह 1 महीने का काम 1 दिन में ही कर देना चाहते हैं जो कि व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं है। जापानी लोगों ने स्वयं के ऊपर काम का अत्याधिक बोझ ग्रहण कर लिया है जापानी लोग यह नहीं समझते कि वह एक मानव है, मशीन नहीं। क्षमता से अधिक कार्य करने और जिम्मेदारी लेने से उनके शारीरिक और मानसिक स्तर पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है और अनेक तरह के मानसिक रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं।

मनुष्य की तरह ही काम कर सकता है। वह मशीन की तरह काम नहीं कर सकता। इसलिए जापानी लोगों ने जिस तरह की मशीन की तरह काम करने की प्रवृत्ति अपनाई, वही उनके मानसिक रोगों का कारण बनी। लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के जो कारण बताए हम सभी कारणों से पूरी तरह सहमत हैं।


प्रश्न 7 : लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि वर्तमान ही  प्रत्यक्ष प्रमाण का रूप होता है। वर्तमान हमें सामने स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भूतकाल समय बीत गया, वह बदलना हमारे हाथ में नहीं है। जो हो गया वह हो गया उसमें अब हम कुछ नहीं कर सकते।

हम भूतकाल की गलतियों पर पछता कर कुछ हासिल नहीं कर सकते। उसी तरह भविष्य बदलना भी हमारे हाथ में पूरी तरह नहीं है। हम अपने वर्तमान को ही बदल सकते हैं, क्योंकि वह हमारे सामने है । वही सत्य के प्रमाण के रूप में हमारे सामने प्रत्यक्ष है। इसीलिए हमें एवं भविष्य की चिंता करते हुए वर्तमान में ही जीना चाहिए तभी जीवन का सच्चा आनंद मिल सकता है, लेखक ने यही समझाने का प्रयत्न किया है।



(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए-

 1. I. : समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है।

आशय : यह पंक्ति आदर्श के महत्व को स्पष्ट करती है। वास्तव में समाज में जो भी आदर्श व्याप्त हैं, वह  आदर्शवादी लोगों के कारण ही व्याप्त हैं। शाश्वत मूल्य समाज के वह मूल्य हैं जो प्राचीन काल से अभी तक निरंतर चले आ रहे हैं। सत्य, अहिंसा, त्याग, परोपकार, बंधुत्व, ईमानदारी, दया, करुणा यह सभी शाश्वत मूल्य हैं, जो किसी भी आदर्श समाज के मूल्य होते हैं। इन मूल्यों का पालन करने वाले लोग ही आदर्शवादी लोग कहलाते हैं। यदि यह मूल्य अभी तक हैं, तो इसका मुख्य कारण ऐसे आदर्शवादी व्यक्ति महान व्यक्ति हैं जो इन मूल्यों को निरंतर आगे बढ़ाते रहे और कभी भी इन मूल्यों के स्तर को गिरने नहीं दिया। आगे भी ऐसे आदर्शवादी व्यक्ति उत्पन्न होते रहेंगे जो इन मूल्यों को आगे बढ़ाते रहेंगे।


II : जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब ‘प्रैक्टिकल आइडियालिस्टों’ के जीवन से आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी त्यावहारिक सूझ-बूझ ही आगे आने लगती है।

आशय : इस पंक्ति का आशय यह है कि जब-जब व्यावहारिकता आदर्शों पर हावी होने लगती है, तो आदर्श पीछे छूट जाते हैं और व्यक्ति की स्वार्थी प्रवृत्ति आगे आ जाती है। पूरी तरह व्यवहारिक होने का तात्पर्य है कि व्यक्ति पूरी तरह यदि स्वार्थ केंद्रित हो गया है। व्यवहारिकता होनी जरूरी है लेकिन आवश्यकता से अधिक व्यावहारिक होना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं। आदर्शों का अपना अलग महत्व होता है उसमें थोड़ा बहुत व्यवहारिकता का पुट दिया जा सकता है, लेकिन जो लोग व्यवहारिकता को अधिक महत्व देने लगते हैं, तो वह अपने आदर्शों को भूल जाते हैं और आदर्शों के महत्व को नहीं समझते। लेखक ने यही बताने का प्रयत्न किया है।


2. I : हमारे जीका की रफ्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं बल्कि दौड़ता है। कोई बोलता नहीं, बकता है। हम जब अकेले पड़ते हैं तब अपने आपसे लगातार बड़बड़ाते रहते हैं।

आशय :  इन पंक्तियों के माध्यम से जापानी लोगों की अत्याधिक तेज गति से काम करने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया गया है। जापानी इतनी तेज गति से काम करना पसंद करते हैं कि वह हर काम को मिनटों में समाप्त कर देना चाहते हैं। वे एक दिन के काम को एक मिनट में और एक महीने के काम को एक दिन में खत्म कर लेना चाहते हैं। उनमें अमेरिकियों से आगे निकलने की होड़ मची हुई है। वे बोलते नहीं, बकते हैं, चलते नहीं दौड़ते हैं। वे मशीन की तरह कार्य करना चाहते हैं, जबकि वह मानव हैं। वे अपने ऊपर अत्याधिक बोझ डालने के कारण वह मानसिक एवं शारीरिक रोगों से सारे लोगों से ग्रस्त होने लगे हैं और तनाव के शिकार हो रहे हैं।


2. II : अभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उसकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूंज रहे हों।

आशय :  इस पंक्ति के माध्यम से लेखक ने चाजीन के द्वारा की जाने वाली शालीनतापूर्ण गतिविधियों को बताया है। लेखक जब अपने मित्र के साथ टी सेरेमनी में शामिल होने गया तो चार्जिंग ने बेहद शालीनतापूर्वक उन लोगों का स्वागत किया। चाजीन ने बेहद सलीके से सारे कार्य संपन्न किए। उसके हर क्रियाकलाप से शालीनता और सलीकेपन और शिष्टता झलक रही थी। चाजीन ने बेहद शालीनता से अंगीठी सुलगाई, चाय बनाई, बर्तनों को साफ किया, चाय को प्यालों में डाला और मेहमानों के सामने चाय परोसी।  चाजीन की ये सारी क्रियायें बेहद शांत, गरिमामय और शालीन थीं, इसलिए लेखक ने ये पंक्तियां कहीं।



भाषा अध्ययन

प्रश्न 1 : नीचे दिए गए शब्दों का वाक्य में प्रयोग कीजिए-
व्यावहारिकता, आदर्श, सूझबूझ, विलक्षण, शाश्वत

उतर : दिए गए शब्दों को वाक्यों में प्रयोग इस प्रकार होगा…

1. व्यावहारिकता
जीवन में सफलता पाने के लिए सिर्फ ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यावहारिकता का होना भी बहुत जरूरी है।

2. आदर्श
महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्श आज भी दुनिया भर में लोगों को प्रेरित करते हैं।

3. सूझबूझ
कठिन परिस्थितियों में सूझबूझ से काम लेने वाला व्यक्ति हमेशा सफल होता है।

4. विलक्षण
आइंस्टीन की विलक्षण प्रतिभा ने विज्ञान के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए।

5. शाश्वत
प्रेम और करुणा जैसे मूल्य शाश्वत हैं, जो हर युग और संस्कृति में महत्वपूर्ण रहे हैं।


प्रश्न 2 : लाभ-हानि’ का विग्रह इस प्रकार होगा-लाभ और हानि
यहाँ द्वंद्व समास है जिसमें दोनों पद प्रधान होते हैं। दोनों पदों के बीच योजक शब्द का लोप करने के लिए योजक चिह्न लगाया जाता है। नीचे दिए गए द्वंद्व समास का विग्रह कीजिए-
  1. माता-पिता = ……..
  2. पाप-पुण्य = …….
  3. सुख-दुख = ………
  4. रात-दिन = ……….
  5. अन्न-जल = ……….
  6. घर-बाहर = ………..
  7. देश-विदेश = ………..

उत्तर : दिए गए द्वंद्व समास का विग्रह इस प्रकार होगा…

  1. माता-पिता : माता और पिता
  2. पाप-पुण्य : पाप और पुण्य
  3. सुख-दुख : सुख और दुख
  4. रात-दिन : रात और दिन
  5. अन्न-जल : अन्न और जल
  6. घर-बाहर : घर और बाहर
  7. देश-विदेश : देश और विदेश

प्रश्न 3 : नीचे दिए गए विशेषण शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाइए-
  1. सफल = ………
  2. विलक्षण = ………….
  3. व्यावहारिक = ……………
  4. सजग = ………..
  5. आदर्शवादी = ……….
  6. शुद्ध = ………

उत्तर : दिए गए शब्दों की भाववाचक संंज्ञा इस प्रकार होगी…

  1. सफल = सफलता
  2. विलक्षण = विलक्षणता
  3. व्यावहारिक = व्यावहारिकता
  4. सजग = सजगता
  5. आदर्शवादी = आदर्शवादिता
  6. शुद्ध = शुद्धता

प्रश्न 4 : नीचे दिए गए वाक्यों में रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए और शब्द के अर्थ को समझिए-
(क) शुद्ध सोना अलग है।
(ख) बहुत रात हो गई अब हमें सोना चाहिए।
ऊपर दिए गए वाक्यों में सोना” का क्या अर्थ है? पहले वाक्य में ‘सोना” का अर्थ है धातु ‘स्वर्ण’। दूसरे वाक्य में ‘सोना’ को अर्थ है ‘सोना’ नामक क्रिया। अलग-अलग संदर्भो में ये शब्द अलग अर्थ देते हैं अथवा एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। ऐसे शब्द अनेकार्थी शब्द कहलाते हैं। नीचे दिए गए शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ स्पष्ट करने के लिए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
उत्तर, कर, अंक, नग

उत्तर :
उत्तर : सड़क की उत्तर दिशा में डाकखाना है।
मुझे इस प्रश्न का उत्तर नहीं मालूम है।
कर – हमें आय कर चुका कर देश की प्रगति में योगदान देना चाहिए।
अध्यापक को दखते ही मैंने कर बद्ध प्रणाम किया।
अंक – माँ ने सोते बच्चे को अंक में उठा लिया।
एक अंक की कुल 4 संख्याएँ हैं।
नग – हिमालय को नग राज कहा जाता है।
उसके घर में कीमती नग जड़ा है।


प्रश्न 5 : नीचे दिए गए वाक्यों को संयुक्त वाक्य में बदलकर लिखिए-
(क) 1. अँगीठी सुलगायी।
2. उस पर चायदानी रखी।
(ख) 1. चाय तैयार हुई।
2. उसने वह प्यालों में भरी।
(ग) 1. बगल के कमरे से जाकर कुछ बरतन ले आया।
2. तौलिये से बरतन साफ़ किए।

उत्तर : संयुक्त वाक्यों में प्रयोग इस प्रकार होगा…
(क) अँगीठी सुलगायी और उस पर चायदानी रखी।
(ख) चाय तैयार हुई और उसने वह प्यालों में भरी।
(ग) बगल के कमरे से जाकर कुछ बरतन ले आया और तौलिये से बरतन साफ़ किए।


प्रश्न 6 : नीचे दिए गए वाक्यों से मिश्र वाक्य बनाइए-
(क) 1. चाय पीने की यह एक विधि है।
2. जापानी में चा-नो-यू कहते हैं।
(ख) 1. बाहर बेढब-सा एक मिट्टी का बरतन था।
2. उसमें पानी भरा हुआ था।
(ग) 1. चाय तैयार हुई।
2. उसने वह प्यालों में भरी।
3. फिर वे प्याले हमारे सामने रख दिए।

उत्तर : दिए गए वाक्यों से मिश्र वाक्य इस प्रकार होंगे।
(क) चाय पीने की यह एक विधि है, जिसे जापानी में चा-नो-यू कहते हैं।
(ख) उस बर्तन में पानी भरा था, जो बाहर बेढब-सा मिट्टी का बना था।
(ग) जब चाय तैयार हुई, तब वह प्यालों में भर कर हमारे सामने रखी गई।



योग्यता विस्तार

प्रश्न 1 : गांधी जी के आदर्शों पर आधारित पुस्तकें पढ़िए; जैसे- महात्मा गांधी द्वारा रचित ‘सत्य के प्रयोग’ और गिरिराज किशोर द्वारा रचित उपन्यास ‘गिरमिटिया’।

उत्तर : यह एक प्रायोगिक कार्य है। विद्यार्थी दोनों पुस्तकों के पढ़ें। वह इन पुस्तकों को पाने के लिए अपने गाँव-शहर की निकटतम लाइब्रेरी में जा सकते हैं अथवा किसी बुक स्टॉल के पुस्तक को खरीदें अथवा ऑनलाइन पुस्तक को मंगाएं। ये पुस्तकें अत्यन्त महत्वपूर्ण और संग्रह करने लायक पुस्तकें है। इसलिए यदि विद्यार्थियों को पुस्तकों को खरीदने की आवश्यकता पड़े तो संकोच न करें।


प्रश्न 2 : पाठ में वर्णित ‘टी-सेरेमनी’ का शब्द चित्र प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर : टी-सेरेमनी का शब्द चित्र

‘टी-सेरेमनी’ का दृश्य एक छह मंजिला इमारत की छत पर स्थित एक सादे झोपड़ीनुमा कक्ष में उभरता है। कमरे की दीवारें दफ़्ती से निर्मित हैं और फर्श पर एक सरल चटाई बिछी हुई है। परिवेश अत्यंत शांत और सुकून भरा है। प्रवेश द्वार के बाहर एक विशाल, अनगढ़ मिट्टी का बर्तन रखा है, जिसमें आगंतुक अपने हाथ-पैर धोते हैं।

अंदर, चाजीन विनम्रतापूर्वक झुककर अभिवादन करता है। वह मेहमानों को बैठने का संकेत देता है और चाय तैयार करने के लिए अँगीठी प्रज्वलित करता है। उसके उपकरण अत्यंत स्वच्छ और सुंदर हैं। वातावरण इतना निस्तब्ध है कि चायदानी में उबलते जल की ध्वनि स्पष्ट सुनाई देती है।

चाजीन धैर्यपूर्वक, बिना किसी शीघ्रता के चाय तैयार करता है। वह प्रत्येक कप में केवल दो-तीन घूँट चाय परोसता है, जिसे अतिथि धीरे-धीरे, छोटी-छोटी चुस्कियों में लेते हुए, लगभग डेढ़ घंटे में आस्वादित करते हैं। यह प्रक्रिया चाय पीने को एक ध्यानपूर्ण, आध्यात्मिक अनुभव में परिवर्तित कर देती है।


परियोजना कार्य

प्रश्न 1 : भारत के नक्शे पर वे स्थान अंकित कीजिए जहाँ चाय की पैदावार होती है। इन स्थानों से संबंधित भौगोलिक स्थितियों और अलग-अलग जगह की चाय की क्या विशेषताएँ हैं, इनका पता लगाइए और परियोजना पुस्तिका में लिखिए।

उत्तर : ये एक प्रायोगिक कार्य है, जिसमें विद्यार्थियों को नक्शे पर वह स्थान अंकित कर सकते हैं। विद्यार्थियों की सहायता के लिए भारत के उन महत्वपूर्ण स्थान दिए जा रहे हैं…

1. असम
भौगोलिक स्थिति: पूर्वोत्तर भारत, ब्रह्मपुत्र नदी घाटी
विशेषताएँ: मजबूत, मालदार स्वाद, तांबई रंग
जलवायु: गर्म, आर्द्र

2. दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल)
भौगोलिक स्थिति: पूर्वी हिमालय की तलहटी
विशेषताएँ: हल्का, फूलों जैसी सुगंध, मस्कैटल फ्लेवर
जलवायु: ठंडी, पहाड़ी

3. नीलगिरि (तमिलनाडु)
भौगोलिक स्थिति: दक्षिणी भारत की नीलगिरि पहाड़ियाँ
विशेषताएँ: हल्का, सुगंधित, फलों का स्वाद
जलवायु: उष्णकटिबंधीय पहाड़ी

4. कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)
भौगोलिक स्थिति: उत्तर-पश्चिमी हिमालय
विशेषताएँ: हल्का, फूलों की सुगंध
जलवायु: शीतोष्ण

5. मुन्नार (केरल)
भौगोलिक स्थिति: पश्चिमी घाट
विशेषताएँ: गहरा रंग, मजबूत स्वाद
जलवायु: उष्णकटिबंधीय

6. सिक्किम
भौगोलिक स्थिति: पूर्वी हिमालय
विशेषताएँ: हल्का, फूलों की सुगंध
जलवायु: उप-उष्णकटिबंधीय


पतझर में टूटी पत्तियाँ (I) गिन्नी का सोना (II) झेन की देन : रवींद्र केलेकर (कक्षा-10 पाठ-13 हिंदी स्पर्श 2) (NCERT Solutions)


कक्षा-10 हिंदी स्पर्श 2 पाठ्य पुस्तक के अन्य पाठ

साखी : कबीर (कक्षा-10 पाठ-1 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पद : मीरा (कक्षा-10 पाठ-2 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

मनुष्यता : मैथिलीशरण गुप्त (कक्षा-10 पाठ-3 हिंदी स्पर्श भाग 2) (हल प्रश्नोत्तर)

पर्वत प्रदेश में पावस : सुमित्रानंदन पंत (कक्षा-10 पाठ-4 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तोप : वीरेन डंगवाल (कक्षा-10 पाठ-5 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

कर चले हम फिदा : कैफ़ी आज़मी (कक्षा-10 पाठ-6 हिंदी स्पर्श भाग-2) (हल प्रश्नोत्तर)

आत्मत्राण : रवींद्रनाथ ठाकुर (कक्षा-10 पाठ-7 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

बड़े भाई साहब : प्रेमचंद (कक्षा-10 पाठ-8 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

डायरी का एक पन्ना : सीताराम सेकसरिया (कक्षा-10 पाठ-9 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तताँरा-वामीरो की कथा : लीलाधर मंडलोई (कक्षा-10 पाठ-10 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र : प्रहलाद अग्रवाल (कक्षा-10 पाठ-11 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले : निदा फ़ाज़ली (कक्षा-10 पाठ-12 हिंदी स्पर्श 2) (हल प्रश्नोत्तर)

‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम हित’ की धारणा किसने प्रतिपादित किया? (1) आदर्शवादियों ने (2) साम्यवादियों ने (3) उपयोगितावादियों ने (4) व्यक्तिवादियों ने

सही उत्तर है…

(3) उपयोगितावादियों ने

══════════════════════

व्याख्या:

‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम हित’ की धारणा उपयोगितावाद के मूल सिद्धांतों में से एक है। यह विचार मुख्य रूप से जेरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे उपयोगितावादी दार्शनिकों द्वारा प्रतिपादित किया गया था। उपयोगितावाद एक नैतिक सिद्धांत है जो मानता है कि कोई कार्य या नीति तभी सही है जब वह अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम खुशी या कल्याण लाती है।

इस सिद्धांत के अनुसार, किसी भी नैतिक निर्णय या सामाजिक नीति का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वह कितने लोगों को लाभ पहुँचाती है और किस हद तक। यह दृष्टिकोण व्यक्तिगत हितों की तुलना में सामूहिक हित को प्राथमिकता देता है, लेकिन साथ ही यह भी मानता है कि समाज का कल्याण अंततः उसके सदस्यों के कल्याण पर निर्भर करता है।

यह धारणा आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों और कल्याणकारी राज्य के विचार में भी प्रतिबिंबित होती है, जहाँ सरकारें अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने का प्रयास करती हैं। हालाँकि, इस सिद्धांत की आलोचना भी की गई है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि यह कभी-कभी अल्पसंख्यक समूहों के अधिकारों की अनदेखी कर सकता है।


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क्या आप जानते हैं? एक गाँव ऐसा भी है, जहाँ के लोग 1 हफ्ते से लेकर 1 महीने तक सोते रहते हैं।

0
क्या आप जानते हैं? किस जगह के लोग सबसे ज्यादा सोते हैं।

आमतौर पर हमारी सोने की अवधि 6 से 8 घंटे की होती है। इससे अधिक न तो मनुष्य सो पाता है, और न ही सोना चाहिए। सामान्यतः एक मनुष्य 8 घंटे नींद रात में लेकर सुबह तरोताजा हो जाता है। उसे अगली नींद दिनभर के कामकाज की थकान के बाद अगली रात को ही आती है। यानि हम सभी सामान्यतः 24 घंटों में 6-8 या 10 घंटे सोते हैं।

लेकिन क्या जानते हैं कि इस दुनिया में एक गाँव ऐसा भी है, जहाँ के लोग पूरे दिन के 24 घंटे ही नही बल्कि सप्ताह के सात दिन और कभी-कभी तो पूरे महीने सोते रहते हैं।

है न हैरान करने वाली! चलिए हम आपको उस गाँव का नाम बताते हैं, तो उस गाँव का नाम है…

कालाची (KALACHI)

कालाची (KALACHI) गाँव कजाख़स्तान (Kazakhstan) में है।

कजाखस्तान का कालाची नामक गाँव एक ऐसा गाँव है, जहाँ के लोग बहुत अधिक सोने के लिए जाने जाते हैं। कालाची गाँव के लोग हर समय सोते रहते हैं। उनकी सोने की अवधि इतनी लंबी होती है कि कभी-कभी वह 1 सप्ताह से लेकर 1 महीने तक सोते रहते हैं।

दरअसल कालाची गाँव जोकि कजाख़स्तान के उत्तरी क्षेत्र में पड़ता है, उस गाँव के लोग ‘स्लीप सिंड्रोम’ नामक एक बीमारी से पीड़ित होते हैं। जिस कारण इन लोगों पर के दिमाग पर मतिभ्रम या नशा या उनींदी जैसा अवस्था छाई रहती है। इस कारण गाँव के लोग हफ्तों से लेकर महीनों तक सोते रहते हैं।

इस गाँव के अधिकतर लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। इस बीमारी के होने का मुख्य कारण यहाँ के भूजल का प्रदूषित होना बताया जाता है। ये भूजल उन रसायनों से दूषित हो गया जो सोवियत संघ द्वारा प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अलग-अलग युद्ध अभियानों में प्रयोग में लाया जाए। यहाँ की हवा में कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा अधिक है और ऑक्सीजन की मात्रा कम है। गाँव के लोगों के दिमाग पर इसका असर होता है और उनका दिमाग नशे की अवस्था में रहता है और उन्हें हर समय नींद सी आती रहती है। यही कारण है इस गाँव के लोग ज्यादातर समय सोने के लिए जाने जाते हैं।

तो क्या आप ये बात जानते थे, या अभी आपको पता चला। वैसे है न ये हैरान करने वाली बात।


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सही उत्तर है…

(1) जेरमी बेन्थम

○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

‘उपयोगितावाद’ (Utilitarianism) का प्रतिपादक जेरेमी बेन्थम (Jeremy Bentham) है। उन्होंने इस सिद्धांत को विकसित किया और उसे स्पष्टीकृत किया कि किस प्रकार से किसी कार्रवाई की प्राथमिकता उसकी उपयोगिता या सुखदायकता के आधार पर होनी चाहिए।

जेरमी बेन्थम (1748-1832) उपयोगितावाद के प्रमुख प्रतिपादक और आधुनिक उपयोगितावादी दर्शन के संस्थापक माने जाते हैं। उन्होंने 18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में इस सिद्धांत को विकसित किया।

बेन्थम का मूल विचार था कि किसी कार्य या नीति की नैतिकता का निर्धारण उसके परिणामों से होना चाहिए, विशेष रूप से वह कितने लोगों को कितना सुख या दुख पहुंचाती है। उन्होंने “अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम खुशी” के सिद्धांत को प्रतिपादित किया, जो उपयोगितावाद का मूल मंत्र बन गया। बेन्थम ने अपने विचारों को विभिन्न क्षेत्रों जैसे कानून सुधार, अर्थशास्त्र और नैतिक दर्शन में लागू किया, जिससे उपयोगितावाद एक व्यापक दार्शनिक और नैतिक सिद्धांत बन गया।


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इनमें से कौन सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादक नहीं है? (1) थॉमस हॉब्स (2) जॉन लॉक (3) जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल (4) जाँ जाक रूसो

उदारवाद का जनक कौन है? (1) थॉमस हॉब्स (2) जाँ जाक रूसो (3) जॉन लॉक (4) जीन बोंदा

‘सामाजिक समझौते’ नामक पुस्तक का लेखक कौन है? (1) जे.एस. मिल (2) हॉप्स (3) लॉक (4) रूसो

सही उत्तर है…

(4) रूसो

○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

‘सामाजिक समझौता’ (Du Contrat Social या The Social Contract) जीन-जैक्स रूसो (Jean-Jacques Rousseau) द्वारा लिखी गई एक प्रसिद्ध पुस्तक है। यह पुस्तक 1762 में प्रकाशित हुई थी और राजनीतिक दर्शन में एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।

इस पुस्तक में रूसो ने अपने सामाजिक समझौते के सिद्धांत को विस्तार से प्रस्तुत किया, जिसमें ‘सामान्य इच्छा’ (General Will) की अवधारणा केंद्रीय है।

रूसो का मानना था कि एक न्यायसंगत समाज के लिए, व्यक्तियों को अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कुछ हिस्सा समुदाय की भलाई के लिए त्यागना चाहिए। यह पुस्तक फ्रांसीसी क्रांति और बाद के लोकतांत्रिक आंदोलनों पर बहुत प्रभावशाली रही।

हॉब्स और लॉक ने भी सामाजिक समझौते के सिद्धांत पर लिखा, लेकिन उनकी कोई पुस्तक विशेष रूप से ‘सामाजिक समझौता’ शीर्षक से नहीं है।

जे.एस. मिल उदारवादी दर्शन के एक महत्वपूर्ण चिंतक थे, लेकिन वे सामाजिक समझौते के सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादकों में नहीं गिने जाते।


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इनमें से कौन सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादक नहीं है? (1) थॉमस हॉब्स (2) जॉन लॉक (3) जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल (4) जाँ जाक रूसो

‘संप्रभुता’ शब्द का सबसे पहले स्पष्ट प्रयोग किया…? (1) प्लेटो (2) जीन बोंदा (3) हॉब्स (4) हीगल

इनमें से कौन सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादक नहीं है? (1) थॉमस हॉब्स (2) जॉन लॉक (3) जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल (4) जाँ जाक रूसो

सही उत्तर है…

जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल

○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

उपरोक्त चारों विकल्पों में ‘जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल’ (Georg Wilhelm Friedrich Hegel) सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादक नही है। बाकी तीनों विचारक थॉमस हॉब्स, जॉन लॉक और जीन-जैक्स रूसो ने सामाजिक समझौते के सिद्धांत पर महत्वपूर्ण काम किया और इसे विकसित किया। ये तीनों सामाजिक समझौते के सिद्धांत के प्रतिपादक रहे हैं।

जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल, हालांकि एक महत्वपूर्ण दार्शनिक थे, लेकिन वे सामाजिक समझौते के सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादकों में नहीं गिने जाते। हीगल का समाजिक समझौते के सिद्धांत से सीधा संबंध नहीं है। उनका मुख्य ध्येय था विकासवाद और आध्यात्मिक इतिहास का अध्ययन। हीगल ने राज्य और समाज के विकास पर अलग दृष्टिकोण रखा, जो द्वंद्वात्मक प्रक्रिया पर केंद्रित था, न कि सामाजिक समझौते पर।

थॉमस हॉब्स ने माना कि प्राकृतिक अवस्था में जीवन नासूर, गरीब, दुष्ट, पशुवत और छोटा था। लोग एक शक्तिशाली शासक (लेवियाथन) के पक्ष में अपने अधिकारों को त्यागने के लिए सहमत हुए। हॉब्स का मुख्य सिद्धांत था कि लोगों ने समाज को स्थापित करने के लिए समाजिक समझौते किया है, जिसमें वे अपने अधिकारों का कुछ हिस्सा सरकार को सौंपते हैं।

जॉन लॉक ने भी सामाजिक समझौते के सिद्धांत को प्रतिपादित किया, जिसमें उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संपत्ति के संरक्षण के साथ-साथ सरकार के अधिकारों की सीमाओं को भी मान्यता दी। लॉक ने एक अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण रखा, जहां लोग अपने प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार बनाने पर सहमत हुए।

जाँ जाक रूसो ने सामाजिक समझौते के सिद्धांत को सामाजिक संविदान के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें समाज के सभी सदस्यों के साथ समान और स्थायी समझौते की आवश्यकता को माना गया। रूसो ने सामान्य इच्छा की अवधारणा पेश की, जहां समाज का प्रत्येक सदस्य अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को समुदाय की भलाई के लिए समर्पित करता है।


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उदारवाद का जनक कौन है? (1) थॉमस हॉब्स (2) जाँ जाक रूसो (3) जॉन लॉक (4) जीन बोंदा

सही उत्तर है…

(3) जॉन लॉक

○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

प्रसिद्ध विचारक ‘जॉन लॉक’ को ‘उदारवाद का जनक’ माना जाता है।

उदारवाद (Liberalism) का जनक जॉन लॉक (John Locke) को माना जाता है। जॉन लॉक के राजनीतिक और दार्शनिक विचारों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्राकृतिक अधिकारों और सामाजिक अनुबंध के सिद्धांतों को स्थापित किया, जो आधुनिक उदारवाद की नींव बने। उन्होंने अपनी कृतियों ‘टू ट्रीटाइसेज़ ऑफ गवर्नमेंट’ में इन विचारों को विस्तार से प्रस्तुत किया और यह बताया कि सरकार का मुख्य उद्देश्य जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा करना है। लॉक के विचारों ने आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों और पश्चिमी राजनीतिक विचारधारा पर गहरा प्रभाव डाला।

जॉन लॉक 17वीं शताब्दी के अंग्रेज दार्शनिक थे, जिन्हें आधुनिक उदारवाद का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सीमित सरकार, और प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धांतों पर जोर दिया, जो उदारवादी विचारधारा के मूल में हैं।

जॉन लॉक का जन्म 1632 में इंग्लैंड में हुआ था और उनकी मृत्यु 1704 में हुई। वे प्रबोधन काल के प्रमुख दार्शनिक थे।

जॉन लॉक ने माना कि सभी मनुष्यों के पास जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के प्राकृतिक अधिकार हैं। उन्होंने सिद्धांत दिया कि सरकार लोगों की सहमति पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने सरकार की शक्तियों को विभाजित करने का समर्थन किया।

लॉक के विचारों ने अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा को प्रभावित किया। उनके सिद्धांतों ने फ्रांसीसी क्रांति के दौरान स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचारों को प्रेरित किया। लॉक के विचार आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों की नींव बने और उदारवादी राजनीतिक दर्शन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जॉन लॉक की प्रमुख कृतियां हैं…

•  टू ट्रीटाइसेज़ ऑफ गवर्नमेंट (Two Treatises of Government)
•  एन एस्से कन्सर्निंग ह्यमन अंडरस्टैडिंग (An Essay Concerning Human Understanding


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आधुनिक युग का जनक किस विचारक को कहा जाता है। (1) जॉन लॉक (2) मार्क्स (3) मैकियावेली (4) रूसो

सनकी व्यक्तियों को भी विचार की स्वतंत्रता देने के पक्ष में कौन था? (1) बेथम (2) जेम्स मिल (3) जे. एस. मिल (4) हीगल

आधुनिक युग का जनक किस विचारक को कहा जाता है। (1) जॉन लॉक (2) मार्क्स (3) मैकियावेली (4) रूसो

सही उत्तर है…

(3) मैकियावेली

○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

आधुनिक युग का जनक निकोलो मैकियावली (Niccolò Machiavelli) को कहा जाता है। मैकियावली ने राजनीति के क्षेत्र में यथार्थवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और अपने समय की पारंपरिक नैतिक और धार्मिक धारणाओं से हटकर शासन और सत्ता की व्यावहारिकता पर बल दिया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘द प्रिंस’ (The Prince) ने राजनीति को एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में स्थापित किया, जो शक्ति और राज्य की स्थिरता पर केंद्रित था। उनके विचारों ने आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों की नींव रखी और उन्हें आधुनिक राजनीतिक दर्शन का संस्थापक माना जाता है।

निकोलो मैकियावेली, 16वीं शताब्दी के इतालवी राजनीतिक दार्शनिक और लेखक, को इस उपाधि से सम्मानित किया जाता है। उनके विचारों ने राजनीतिक चिंतन में एक नए युग की शुरुआत की, जो मध्ययुगीन विचारधारा से एक स्पष्ट विच्छेद था।

मैकियावेली की प्रसिद्ध कृति ‘द प्रिंस’ ने राजनीति को धर्म और नैतिकता से अलग करके देखने का एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने राजनीति को एक स्वतंत्र विषय के रूप में प्रस्तुत किया, जो अपने स्वयं के नियमों और तर्कों पर आधारित है। मैकियावेली ने राजनीतिक यथार्थवाद की नींव रखी, जहां उन्होंने राज्य के हित और स्थिरता को सर्वोपरि माना।

उनके विचारों ने पारंपरिक धार्मिक और नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीतिक चिंतन को चुनौती दी। मैकियावेली ने तर्क दिया कि एक शासक को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कभी-कभी अनैतिक साधनों का भी उपयोग करना पड़ सकता है। यह विचार उस समय के लिए क्रांतिकारी था और इसने बाद के राजनीतिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया।

मैकियावेली के कार्य ने राज्य, सत्ता, और राजनीति के आधुनिक सिद्धांतों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। उनके विचारों ने धर्मनिरपेक्ष राजनीति और राष्ट्र-राज्य की अवधारणाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आधुनिक युग की प्रमुख विशेषताएं हैं। इस प्रकार, मैकियावेली को आधुनिक राजनीतिक चिंतन का अग्रदूत और आधुनिक युग का जनक माना जाता है।


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सनकी व्यक्तियों को भी विचार की स्वतंत्रता देने के पक्ष में कौन था? (1) बेथम (2) जेम्स मिल (3) जे. एस. मिल (4) हीगल

सही उत्तर है…

(3) जे. एस. मिल

○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

सनकी व्यक्तियों को भी विचार की स्वतंत्रता देने के पक्ष में जे. एस. मिल (John Stuart Mill) थे। जे. एस. मिल ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘ऑन लिबर्टी’ (On Liberty) में स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर गहन विचार व्यक्त किए। उन्होंने यह तर्क दिया कि समाज को व्यक्तियों को उनके विचारों और अभिव्यक्तियों की स्वतंत्रता देनी चाहिए, चाहे वे विचार कितने ही अपरंपरागत या सनकी क्यों न हों।

जे. एस. मिल का मानना था कि किसी भी विचार को दबाने से सत्य और ज्ञान की खोज बाधित होती है। उन्होंने कहा कि विचारों के मुक्त आदान-प्रदान से समाज का बौद्धिक और नैतिक विकास होता है। इस प्रकार, मिल ने स्वतंत्र विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन में जोर दिया, जो आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

जॉन स्टुअर्ट मिल, 19वीं शताब्दी के प्रसिद्ध ब्रिटिश दार्शनिक और अर्थशास्त्री, ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ऑन लिबर्टी’ में इस विचार को विस्तार से प्रस्तुत किया।

मिल का मानना था कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, चाहे वे विचार कितने ही असामान्य या विवादास्पद क्यों न हों। उन्होंने तर्क दिया कि यहां तक कि सनकी या अतिवादी विचारों को भी दबाया नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इससे समाज में विचारों के स्वतंत्र आदान-प्रदान और बौद्धिक विकास पर रोक लग सकती है। मिल का मानना था कि विचारों की खुली बहस से ही सत्य का पता चल सकता है और समाज प्रगति कर सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी विचार को गलत मानकर दबाने से यह संभावना बनी रहती है कि वह विचार सही हो सकता है, या उसमें सत्य का कुछ अंश हो सकता है। इसलिए, मिल ने सभी प्रकार के विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का समर्थन किया, जब तक वे दूसरों को प्रत्यक्ष नुकसान न पहुंचाएं। यह विचार आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार के रूप में महत्वपूर्ण माना जाता है।


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राजनीति का नैतिकता से पृथक्करण करने वाला विचारक है? (1) प्लेटो (2) अरस्तू (3) मैकियावली (4) लॉक

मार्क्स की विचारधारा का अंतिम लक्ष्य है…? (1) जाति विहीन समाज (2) वर्ग विहीन समाज (3) वर्ग विहीन व राज्य विहीन समाज (4) इनमें से कोई नहीं

राजनीति का नैतिकता से पृथक्करण करने वाला विचारक है? (1) प्लेटो (2) अरस्तू (3) मैकियावली (4) लॉक

सही उत्तर है…

(3) मैकियावली

○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

राजनीति का नैतिकता से पृथक्करण करने वाला विचारक निकोलो मैकियावली (Niccolò Machiavelli) है। मैकियावली की कृति ‘द प्रिंस’ (The Prince) में उन्होंने यह तर्क दिया कि शासकों को अपने राज्य की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए नैतिकता की परवाह किए बिना कोई भी उपाय अपनाना चाहिए। उनके विचार में, राजनीति की सफलता नैतिक सिद्धांतों के बजाय व्यावहारिकता और परिणामों पर आधारित होनी चाहिए।

निकोलो मैकियावली (Niccolò Machiavelli), 16वीं शताब्दी के इतालवी राजनीतिक दार्शनिक और लेखक थे।

मैकियावली ने राजनीति को एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में देखा, जो पारंपरिक नैतिक मूल्यों से अलग है। उनका मानना था कि एक शासक को राज्य के हित और स्थिरता के लिए कभी-कभी नैतिक मूल्यों की अवहेलना करनी पड़ सकती है। मैकियावली ने तर्क दिया कि राजनीतिक सफलता के लिए कुछ परिस्थितियों में धोखा, बल प्रयोग, या अन्य अनैतिक माने जाने वाले कार्य भी उचित हो सकते हैं।

यह दृष्टिकोण पारंपरिक दार्शनिक विचारों से एक महत्वपूर्ण विचलन था, जो राजनीति और नैतिकता को अभिन्न मानते थे। मैकियावली का यह विचार ‘राजनीतिक यथार्थवाद’ का आधार बना और आधुनिक राजनीतिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया। हालांकि उनके विचारों की अक्सर आलोचना की गई, लेकिन इन्होंने राजनीतिक सिद्धांत और व्यवहार में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जो आज भी विवादास्पद और प्रासंगिक बना हुआ है।


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हॉब्स के कॉमनवेल्थ की अवधारणा में कौन शामिल नहीं है? (1) समाज (2) राज्य (3) सरकार (4) संसद

राजनीतिक शक्ति बन्दूक की नली से उत्पन होती है किसका कथन है (1) माओत्लो तुंग (2) वी आई. लेनिन (3) कार्ल मार्क्स (4) इनमें से कोई नहीं

‘संप्रभुता’ शब्द का सबसे पहले स्पष्ट प्रयोग किया…? (1) प्लेटो (2) जीन बोंदा (3) हॉब्स (4) हीगल

सही उत्तर है…

(2) जीन बोंदा

○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

‘संप्रभुता’ शब्द का सबसे पहले स्पष्ट प्रयोग ‘जीन बोंदा’ ने किया था। जीन बोंदा (Jean Bodin), 16वीं शताब्दी के फ्रांसीसी राजनीतिक दार्शनिक और कानूनविद थे, जिन्होंने राजनीतिक सिद्धांत में ‘संप्रभुता’ की अवधारणा को व्यापक रूप से विकसित किया।

बोंदा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Six Books of the Commonwealth’ (1576) में संप्रभुता की अवधारणा को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने संप्रभुता को राज्य की सर्वोच्च, स्थायी और निरपेक्ष शक्ति के रूप में परिभाषित किया, जो किसी भी कानूनी सीमा से परे होती है। बोंदा का यह विचार तत्कालीन युग में राजतंत्र की शक्ति को सैद्धांतिक आधार प्रदान करने में महत्वपूर्ण था।

हालांकि संप्रभुता की अवधारणा के तत्व प्राचीन यूनानी और रोमन विचारकों के लेखन में भी पाए जाते हैं, बोंदा ने इसे एक व्यवस्थित और स्पष्ट रूप दिया। उनके बाद के विचारकों जैसे थॉमस हॉब्स ने इस अवधारणा को आगे विकसित किया। बोंदा का योगदान इस अवधारणा को आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत का एक केंद्रीय विषय बनाने में महत्वपूर्ण था, जो आज भी राज्य की शक्ति और उसकी सीमाओं पर चल रही बहस में प्रासंगिक है।


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“संप्रभुता नागरिकों और प्रजाजनो के ऊपर एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति जो कानून द्वारा मर्यादित नहीं की जा सकती” किसका कथन है? (1) प्लेटो (2) जीन बोंदा (3) सिसरो (4) अरस्तू​

रूसो के अनुसार सामान्य इच्छा है? (1) बहुमत की इच्छा (2) सबकी इच्छा (3) व्यक्तिगत इच्छाओं का योग (4) मानव की आदर्श इच्छाओं का योग

हॉब्स के कॉमनवेल्थ की अवधारणा में कौन शामिल नहीं है? (1) समाज (2) राज्य (3) सरकार (4) संसद

सही उत्तर है…

(4) संसद

○○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या :

हॉब्स के कॉमनवेल्थ की अवधारणा में संसद शामिल नहीं है। थॉमस हॉब्स, 17वीं शताब्दी के अंग्रेज दार्शनिक, ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘लेविएथन’ में कॉमनवेल्थ या राज्य की एक विशिष्ट संकल्पना प्रस्तुत की।

हॉब्स के अनुसार, कॉमनवेल्थ एक ऐसी संस्था है जो मनुष्यों को प्राकृतिक अवस्था की अराजकता से बचाती है और उन्हें सुरक्षा प्रदान करती है। इस संकल्पना में समाज, राज्य, और सरकार अंतर्निहित हैं। समाज वह आधार है जिस पर कॉमनवेल्थ का निर्माण होता है। राज्य कॉमनवेल्थ का मूर्त रूप है, जबकि सरकार इसकी कार्यकारी शाखा है।

हालांकि, हॉब्स ने अपने कॉमनवेल्थ में संसद को एक अलग संस्था के रूप में नहीं देखा। उनका मानना था कि सत्ता एक व्यक्ति (संप्रभु) में निहित होनी चाहिए, जो निरंकुश हो। हॉब्स ने शक्तियों के विभाजन या संसदीय नियंत्रण की अवधारणा का समर्थन नहीं किया। उनके लिए, कॉमनवेल्थ एक एकीकृत और अविभाज्य इकाई थी, जिसमें सत्ता का विकेंद्रीकरण या विभाजन नहीं था। इसलिए, हॉब्स के कॉमनवेल्थ में संसद एक अलग संस्था के रूप में शामिल नहीं है।


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हॉब्स के वर्णित सामाजिक समझौते से किस प्रकार का शासन स्थापित होता है : (1) निरंकुश राजतंत्र (2) लोकतंत्र (3) कुलीनतंत्र (4) इनमें से कोई नहीं

हॉब्स की अध्ययन शैली को क्या नाम दिया जा सकता है : (1) आर्थिक नियतिवादी (2) यांत्रिक नियतिवादी 3) ऐतिहासिक नियतिवादी (4) इनमें से कोई नहीं

“संप्रभुता नागरिकों और प्रजाजनो के ऊपर एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति जो कानून द्वारा मर्यादित नहीं की जा सकती” किसका कथन है? (1) प्लेटो (2) जीन बोंदा (3) सिसरो (4) अरस्तू​

सही उत्तर है…

(3) जीन बोंदा

○○○○○○○○

व्याख्या

उपरोक्त कथन ‘संप्रभुता नागरिकों और प्रजाजनों के ऊपर एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति है, जो कानून द्वारा मर्यादित नहीं की जा सकती’ प्रसिद्ध राजनीतिक दार्शनिक जीन बोंदा (Jean Bodin) का है।

जीन बोंदा (Jean Bodin) एक फ्रांसीसी राजनीतिक दार्शनिक और कानूनविद थे, जिन्होंने 16वीं शताब्दी में संप्रभुता की अवधारणा पर महत्वपूर्ण कार्य किया। उनका यह विचार संप्रभुता की निरंकुश प्रकृति को दर्शाता है, जो राज्य की सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक है।

बोंदा का यह कथन संप्रभुता की अविभाज्यता और असीमितता पर जोर देता है। उनका मानना था कि संप्रभु शक्ति किसी भी कानूनी सीमा से परे होती है, क्योंकि वह स्वयं कानून का स्रोत है। यह विचार तत्कालीन युग में राजतंत्र की शक्ति को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण था। हालांकि, आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में इस अवधारणा को चुनौती दी गई है, जहां संविधान और कानून की सर्वोच्चता पर जोर दिया जाता है। फिर भी, बोंदा का यह सिद्धांत राज्य की शक्ति और उसकी सीमाओं पर चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण बिंदु बना हुआ है।


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सांस्कृतिक क्रांति किसने चलाई? (1) कार्ल मार्क्स (2) माओत्से तुंग (3) लेनिन (4) इनमें से कोई नहीं

अपने अंतिम चरण में मार्क्सवाद किस सिद्धान्त से मिल जाता है? (1) व्यक्तिवाद (2) समाजवाद (3) अराजकतावाद (4) साम्यवाद

सही उत्तर है…

(4) साम्यवाद

○○○○○○○○○○○

विस्तृत वर्णन

अपने अंतिम चरण में मार्क्सवाद साम्यवाद में मिल जाता है।  मार्क्सवाद के अनुसार, इसका अंतिम चरण साम्यवाद में परिणत होता है।

कार्ल मार्क्स ने समाज के विकास को एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखा, जिसमें विभिन्न चरण होते हैं। उनका मानना था कि पूंजीवाद, जो एक शोषणकारी व्यवस्था है, का अंत समाजवाद की स्थापना में होगा। समाजवाद के इस चरण में उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व होगा और राज्य मजदूर वर्ग के हाथों में होगा। लेकिन यह अंतिम चरण नहीं है।

मार्क्सवाद का चरम लक्ष्य साम्यवाद है, जो इसका अंतिम चरण माना जाता है। इस चरण में वर्ग विभाजन पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा और राज्य की आवश्यकता नहीं रहेगी। साम्यवाद में “प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार” का सिद्धांत लागू होगा। यह अवस्था व्यक्तिवाद, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर देता है, से भिन्न है। यह समाजवाद से भी आगे की अवस्था है, जो साम्यवाद की ओर ले जाने वाला एक मध्यवर्ती चरण है। साथ ही, यह अराजकतावाद से भी अलग है, क्योंकि अराजकतावाद सभी प्रकार के शासन को खारिज करता है, जबकि साम्यवाद एक विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था की कल्पना करता है। इस प्रकार, मार्क्सवाद के अनुसार, समाज का विकास अंततः साम्यवाद में परिणत होता है, जो एक वर्गविहीन और राज्यविहीन समाज की आदर्श अवस्था है।


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राजनीतिक दायित्व के सिद्धान्त पर व्याखान का लेखक कौन है। (1) ग्रीन (2) हीगाल (3) प्लेटो (4) अरस्तू

रूसो के अनुसार सामान्य इच्छा है? (1) बहुमत की इच्छा (2) सबकी इच्छा (3) व्यक्तिगत इच्छाओं का योग (4) मानव की आदर्श इच्छाओं का योग

सही उत्तर है…

(4) मानव की आदर्श इच्छाओं का योग

स्पष्टीकरण

रूसो की सामान्य इच्छा (General Will) की अवधारणा राजनीतिक दर्शन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उनके अनुसार, सामान्य इच्छा मानव की आदर्श इच्छाओं का योग है, जो समुदाय के सामूहिक हित को दर्शाती है। यह अवधारणा व्यक्तिगत या विशेष हितों से ऊपर होती है और समाज के लिए क्या सबसे अच्छा है, इस पर केंद्रित रहती है। रूसो का मानना था कि सामान्य इच्छा बहुमत की इच्छा या सबकी इच्छा से भिन्न है। यह न तो लोकप्रियता या जनमत का प्रतिनिधित्व करती है, न ही यह सभी व्यक्तियों की इच्छाओं का सरल योग है।

सामान्य इच्छा की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह नैतिक और तर्कसंगत विचारों पर आधारित है। यह समाज के सदस्यों की सर्वोत्तम और सबसे तर्कसंगत इच्छाओं को प्रतिबिंबित करती है, जो व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज के समग्र हित को देखती है। रूसो का मानना था कि सामान्य इच्छा समाज के लिए क्या सही और न्यायसंगत है, इस पर फोकस करती है। यह एक ऐसी अवधारणा है जो समुदाय के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देती है, लेकिन साथ ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक कल्याण के बीच एक संतुलन बनाने का प्रयास करती है।

इस प्रकार, रूसो की सामान्य इच्छा की अवधारणा एक जटिल और गहन विचार है जो व्यक्तिगत स्वार्थों, बहुमत के निर्णयों या सभी इच्छाओं के सरल योग से परे जाती है। यह एक आदर्श स्थिति को दर्शाती है जहां समाज के सदस्य अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर, समुदाय के समग्र कल्याण के लिए सोचते और कार्य करते हैं। यह अवधारणा आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों और सामाजिक अनुबंध के विचारों पर गहरा प्रभाव डालती है, जो समाज और शासन के संगठन में सामूहिक हित की महत्ता पर जोर देती है।


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‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के’ कविता की भाषा कौन सी है? (1) ब्रजभाषा (2) राजस्थानी भाषा (3) खड़ी बोली (4) अवधी भाषा

0

सही उत्तर है…

(3) खड़ी बोली

 

स्पष्टीकरण :

‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के’ कविता की भाषा ‘खड़ी बोली’ है। ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के’ कविता ‘शिवमंगल सिंह सुमन’ द्वारा रचित एक कविता है। यह कविता खड़ी बोली में रची गई है। खड़ी बोली वह बोली होती है, जो सामान्य हिंदी कहलाती है। हिंदी का जो मानक रूप राजभाषा और सामान्य हिंदी के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, वही खड़ी बोली है।

यह कविता भी खड़ी बोली में रचित की गई है। खड़ी बोली का मूल उद्गम दिल्ली और मेरठ के आसपास के क्षेत्र से माना जाता है। धीरे-धीरे यही खड़ी बोली लोकप्रिय होकर हिंदी की मुख्य बोली और मुख्य भाषा बन गई। ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन’ के कविता में कवि शिवमंगल सिंह सुमन ने पिंजरे में कैद पंछी के मनोभावों को व्यक्त किया है। उनके अनुसार पिंजरे में बंद होने से पिंजरे में बंद पंछी अपनी दास्तान से खुश नहीं है। वह आजाद होना चाहते हैं, भले ही आजाद होकर उन्हें कितने भी कष्ट क्यों ना सहने पड़े, लेकिन वह आजाद होकर रहना चाहते हैं। सोने के पिंजरे के में बंद रहकर उन्हें ऐशो आराम पसंद नहीं। यहाँ पर कविता के माध्यम से कवि ने स्वतंत्रता के महत्व को बताया है। स्वतंत्रता के आगे सभी तरह के ऐशो-आराम तुच्छ है।

पूरी कविता इस प्रकार है…

हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाएँगे।

हम बहता जल पीनेवाले
मर जाएँगे भूखे-प्यासे,
कहों भली है कटुक निबौरी
कनक-कटोरी की मैदा से,

स्वर्ण-श्रंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले,
बस सपनों में देख रहे हैं
तरु की फुनगी पर के झूले।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने,
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक अनार के दाने,

होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी।

नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो,
लेकिन पंख दिए हैं, तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो।

— शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 


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‘दीवानों की हस्ती’ कविता में निहित संदेश को स्पष्ट कीजिए।

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‘दीवानों की हस्ती’ कविता हिंदी के प्रसिद्ध कवि भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित है। ‘दीवानों की हस्ती’ कविता में भगवतीचरण वर्मा ने एक गहरा और प्रेरणादायक संदेश दिया है। यह कविता उन लोगों की महानता को दर्शाती है जो अपने आदर्शों और सिद्धांतों के लिए जीते हैं। कवि ऐसे व्यक्तियों की प्रशंसा करता है जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर, समाज और देश के लिए त्याग और बलिदान करते हैं। यह कविता साहस, दृढ़ता और आत्मसम्मान के महत्व को रेखांकित करती है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से नहीं डिगते।

कवि ने मानवता और करुणा के मूल्यों पर भी जोर दिया है। वे उन लोगों की महानता को दर्शाते हैं जो दूसरों के दुख में दुखी होते हैं और समाज की भलाई के लिए कार्य करते हैं। यह कविता स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करती है, जो न्याय और समानता के लिए संघर्ष करते हैं। इसके साथ ही, कवि एक आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, यह बताते हुए कि ऐसे ‘दीवाने’ लोग ही समाज और देश को आगे ले जाते हैं।

अंत में, ‘दीवानों की हस्ती’ का मूल संदेश यह है कि जीवन का सच्चा अर्थ स्वार्थ से ऊपर उठकर, उच्च आदर्शों और मूल्यों के लिए जीने में है। यह कविता समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत के रूप में कार्य करती है, जो लोगों को अपने व्यक्तिगत हितों से परे, समाज और मानवता की सेवा के लिए प्रेरित करती है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची महानता और जीवन का वास्तविक अर्थ दूसरों के लिए जीने और आवश्यकता पड़ने पर बलिदान देने में निहित है।


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आशय स्पष्ट कीजिए – देश जातियों का कब होगा, नव मानवता में रे एका, काले बादल में कल की, सोने की रेखा!

आशय स्पष्ट दीजिए- काले बादल जाति द्वेष के काले बादल विश्व क्लेश के काले बादल उठते पथ पर नव स्वतंत्रता के प्रवेश के!

‘डाँडे’ में खून होने पर भी खूनी को सजा क्यों नहीं मिलती थी?

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तिब्बत के डाँडे में खून हो जाने पर भी खूनी को सजा इसलिए नहीं मिलती थी, क्योंकि तिब्बत में डाँडे बेहद निर्जन स्थान होते थे। यह स्थान मुख्य जमीन से 16-17000 फीट की ऊंचाई पर स्थित होते थे। इन जगहों के दोनों तरफ मीलों तक कोई भी आबादी या गाँव आदि नहीं होता था। नदियों के मोड़ों और पहाड़ों के कोनों के कारण बहुत दूर तक आदमी को देखा भी नहीं जा सकता था।

इन स्थानों पर चोर-डाकुओं का डेरा लगा रहता था। चोर-डाकुओं के लिए यह सुरक्षित स्थान होता था। यहाँ से गुजरने वाले राहगीरों को ये चोर-डाकू लूट लेते थे। यहाँ पर आम आदमी नहीं होता था, इसलिए चोर-डाकू जब किसी का खून कर देते थे तो ना तो उसके लिए कोई गवाह रहता था और ना ही कोई सबूत। पुलिस भी ऐसे खतरनाक जगहों पर आने से कतराती थी, इसलिए यहां पर पुलिस की व्यवस्था भी नहीं थी। इसी कारण डाँडे में खून हो जाने पर किसी खूनी को कोई सजा नहीं मिलती थी, क्योंकि चोर डाकू यहाँ पर सब कुछ नष्ट कर डालते थे।

‘ल्हासा की ओर’ पाठ में लेखक राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत के इन्हीं डाँडों का जिक्र किया है। लेखक को भी इन डाँडों वाले क्षेत्र से गुजरना पड़ा था। लेखक ने चोर-डाकुओं से बचने के लिए भिखमंगे का वेश धारण कर लिया था। चोर-डाकू भिखमंगों को छोड़ देते क्योंकि वे समझते थे कि भिखमंगों के पास से लूटने लायक कोई कीमती सामान नहीं मिलेगा। लेखक ने इसी बात का फायदा उठाते हुए भिखमंगे का वेश बना लिया और आसानी से डाँडे वाले क्षेत्र को पार किया।

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पाठ ‘स्मृति’ के आधार पर आपके जीवन में घटित किसी अविस्मरणीय घटना का वर्णन करें।​

मन लागा उन मन्न सौं, गगन पहुँचा जाइ। देख्या चंद बिहूँणां, चांदिणाँ, तहाँ अलख निरंजन राइ।। भावार्थ बताएं।

बंगाल में छापेखाने का विकास किस प्रकार हुआ? समझाएं।

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बंगाल में छापेखाने का विकास धीरे-धीरे एक सतत् प्रक्रिया द्वारा अनेक चरणों में हुआ।

शुरुआत और प्रारंभिक चरण

बंगाल में छापेखाने का विकास 18वीं शताब्दी के अंत में शुरू हुआ। 1778 में कोलकाता में पहला छापाखाना स्थापित किया गया, जो मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा के प्रकाशनों के लिए था। धीरे-धीरे बंगाली भाषा में भी पुस्तकें छापी जाने लगीं। 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना ने बंगाली भाषा के प्रकाशनों को और बढ़ावा दिया। इस दौरान, ईसाई मिशनरियों ने भी बंगाली में धार्मिक पुस्तकें छापने के लिए छापेखाने स्थापित किए, जिनमें श्रीरामपुर मिशन प्रेस एक प्रमुख उदाहरण है।

विस्तार और प्रभाव

19वीं शताब्दी की शुरुआत में, बंगाली बुद्धिजीवियों और उद्यमियों ने अपने छापेखाने शुरू किए, जिससे बंगाली साहित्य और संस्कृति का प्रसार हुआ। इस समय बंगाली भाषा के समाचार पत्र और पत्रिकाएँ भी प्रकाशित होने लगीं, जिसने जन जागरूकता और राजनीतिक चेतना को बढ़ाया। पाठ्यपुस्तकों और शैक्षणिक सामग्री का प्रकाशन बढ़ने से शिक्षा का प्रसार हुआ। समय के साथ छापाखानों की तकनीक में सुधार हुआ, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा में वृद्धि हुई।

सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान

छापेखानों ने बंगाली भाषा और संस्कृति के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह बंगाल नवजागरण का एक प्रमुख कारक बना। छापेखानों के विकास ने न केवल सूचना के प्रसार को सुगम बनाया, बल्कि यह सामाजिक सुधार, शैक्षिक प्रगति और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बना। इस प्रकार, बंगाल में छापेखानों का विकास एक तकनीकी प्रगति से कहीं अधिक था; यह एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का वाहक बन गया।


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What do you understand by the term ‘nabobs’? Why were some British officials given this title post the Battle of Plassey and Buxar?

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The term ‘nabob’ is derived from the Urdu word ‘nawab’, which itself comes from the Arabic word ‘naib’, meaning deputy or governor. In the context of British India, ‘nabob’ took on a specific meaning:

1. Original meaning: In the Mughal Empire, a nawab was a provincial governor or viceroy.

2. British usage: The British adopted the term ‘nabob’ to refer to Englishmen who had become wealthy through their involvement in the East India Company’s activities in India.

British officials were given this title post the Battles of Plassey (1757) and Buxar (1764) for several reasons:

1. Sudden wealth: After these battles, many British officials amassed enormous fortunes through various means, including:

  • Territorial control and revenue collection
  • Private trade
  • Accepting ‘gifts’ from Indian rulers and merchants

2. Power and influence: These battles significantly increased British control over Bengal and other parts of India, giving Company officials unprecedented power.

3. Lavish lifestyles: Many of these officials returned to Britain with their newfound wealth, living extravagantly and often buying their way into British high society and politics.

4. Cultural impact: The term became associated with ostentatious displays of wealth and a degree of cultural hybridity, as these men often brought back Indian customs and goods.

5. Criticism: The term also carried negative connotations, with ‘nabobs’ often criticized for corruption, exploitation, and bringing ‘oriental’ influences to British society.

6. Political implications: The wealth and influence of returning ‘nabobs’ became a matter of concern in British politics, leading to increased scrutiny of the East India Company’s activities.

The use of this term reflects the complex cultural and economic exchanges that occurred during the early period of British colonialism in India. It highlights how the conquest of India not only changed the subcontinent but also had significant impacts on British society and politics.


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Who was Titu Mir? What was his contribution?

What is runoff a election?

What is a runoff election?

A runoff election is a second round of voting held when no candidate in an initial election manages to secure the required threshold of votes to win outright. Here’s a brief explanation of runoff elections:

  • Purpose: To ensure the winning candidate has a clear majority of support.
  • Trigger: Typically occurs when no candidate receives more than 50% of the votes in the first round.
  • Participants: This usually involves the top two candidates from the first round.
  • Timing: Held after the initial election, often a few weeks later.
  • Outcome: The candidate with the most votes in the runoff wins, regardless of whether they achieve a majority.
  • Common usage: Used in many countries for presidential elections and in some U.S. states for various offices.
  • Advantages: Can prevent a candidate from winning with only a small plurality of votes.
  • Disadvantages: This can lead to lower voter turnout and increased election costs.

Runoff elections aim to provide a clearer mandate for the winning candidate and ensure broader support from the electorate. They’re particularly useful in multi-candidate races where the vote might otherwise be split among several options.


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Why is the living room called a living room? Besides we live in the bedroom, the kitchen, and the study room, we don’t die. We live in every room, so why is it called a Living Room? Then, the Bedroom should also be called the living room, and so do the others.

Describe the role of women before and after the French Revolution.

Who was Titu Mir? What was his contribution?

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Titu Mir, born Syed Mir Nisar Ali, was a prominent Bengali Muslim peasant leader and freedom fighter in early 19th century British India. He led a significant peasant uprising against oppressive landlords and British colonial rule in Bengal from 1830 to 1831.

Titu Mir’s contributions include:

  • Peasant mobilization: He organized and united peasants against the exploitation by zamindars (landlords) and British authorities.
  • Religious reform: He advocated for Islamic revivalism and opposed Hindu landlords’ attempts to impose taxes on Muslim religious practices.
  • Resistance against oppression: Titu Mir led armed resistance against excessive taxation, forceful collection of revenues, and other forms of exploitation.
  • Establishment of alternative governance: He set up a parallel administration in parts of Bengal, challenging British authority.
  • Symbol of anti-colonial struggle: His rebellion, though short-lived, became a symbol of resistance against British colonialism in Bengal.
  • Inspiration for future movements: Titu Mir’s uprising inspired later anti-colonial and peasant movements in the region.
  • Promotion of social justice: He fought against social and economic inequalities, striving to improve the conditions of the peasantry.

Though Titu Mir’s rebellion was eventually suppressed by British forces in 1831, and he was killed in battle, his legacy lived on. His struggle against oppression and injustice continues to be remembered as an important chapter in the history of peasant movements and anti-colonial resistance in India.


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Describe the role of women before and after the French Revolution.

Write in detail about the Gandhara Civilization.

Describe the role of women before and after the French Revolution.

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The role of women before and after the French Revolution underwent significant changes, though these changes were not always immediate or comprehensive.

Before the French Revolution:

  • Limited rights: Women had very few legal rights and were considered subordinate to men.
  • No political voice: Women couldn’t vote or hold political office.
  • Limited education: Most women received little to no formal education.
  • Economic restrictions: Married women couldn’t own property or run businesses without their husband’s permission.
  • Domestic roles: Women were primarily expected to be wives and mothers, managing the household.

After the French Revolution:

  • Increased political awareness: Women became more politically active, participating in protests and debates.
  • Clubs and societies: Women formed political clubs and societies to discuss revolutionary ideas.
  • Demands for rights: Some women began demanding equal rights, including the right to vote and receive education.
  • Limited legal changes: The revolution brought some improvements in divorce laws and inheritance rights for women.
  • Symbolic representation: Women became symbols of liberty and the republic in art and propaganda.
  • Continued restrictions: Despite some progress, women still couldn’t vote or hold office, and many traditional gender roles persisted.
  • Education reforms: Gradually, more educational opportunities became available to women, though progress was slow.

While the French Revolution didn’t immediately grant women equal rights, it did spark important discussions about gender equality and laid the groundwork for future feminist movements.


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Write in detail about the Gandhara Civilization.

Discuss the role of Planning Commission in India

Write in detail about the Gandhara Civilization.

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The Gandhara Civilization was a significant ancient culture that flourished in the northwestern regions of the Indian subcontinent, primarily in what is now modern-day Pakistan and eastern Afghanistan. Existing from around the 6th century BCE to the 5th century CE, Gandhara played a crucial role in the development of art, religion, and cultural exchange between East and West.

Geographically, Gandhara was strategically located at the crossroads of major trade routes, including the Silk Road. This position allowed it to become a melting pot of diverse cultures, incorporating influences from Persia, Greece, Central Asia, and India. The region’s principal cities included Taxila, Peshawar (ancient Purushapura), and Swat.

One of Gandhara’s most significant contributions was its distinctive art style, known as Greco-Buddhist art. This unique fusion emerged after Alexander the Great’s invasion of the region in 326 BCE, blending Hellenistic artistic techniques with Buddhist themes. Gandharan artists were renowned for their stone sculptures, particularly their depictions of the Buddha in human form, which was a departure from earlier aniconic representations. These sculptures often featured the Buddha with wavy hair, a prominent ushnisha (topknot), and wearing Greco-Roman style robes.

Buddhism flourished in Gandhara, and the region became an important center for Buddhist learning and pilgrimage. The famous Buddhist university at Taxila attracted scholars from far and wide. Gandhara also played a crucial role in the spread of Buddhism to Central Asia and China, with many Buddhist texts being translated into Chinese from the Gandhari language.

The Gandhara Civilization saw rule under various dynasties, including the Achaemenids, Greeks, Mauryans, Indo-Greeks, Scythians, Parthians, and Kushans. Each of these ruling powers left their mark on Gandharan culture and contributed to its cosmopolitan nature.

Economically, Gandhara prospered through trade, agriculture, and craftsmanship. The region was known for its fine textiles, precious stones, and metalwork. The use of Kharosthi script for administrative and commercial purposes further facilitated trade and governance.

The decline of the Gandhara Civilization began with the invasion of the White Huns (Hephthalites) in the 5th century CE. Despite its eventual fall, the legacy of Gandhara continued to influence art and culture across Asia for centuries to come, cementing its place as a significant chapter in world history.


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Write a paragraph on Charles Dickens (300 words)

Why is the living room called a living room? Besides we live in the bedroom, the kitchen, and the study room, we don’t die. We live in every room, so why is it called a Living Room? Then, the Bedroom should also be called the living room, and so do the others.

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The term ‘living room’ has an interesting history that explains its specific use.

The living room, historically, was a space in the house intended for social activities, family gatherings, and entertaining guests. The name ‘living room’ gained popularity in the early 20th century. Before this, such spaces were often referred to as ‘parlours’ or ‘drawing rooms.’ The term ‘living room’ emerged to signify a space dedicated to the daily living activities of the household, distinct from areas like the kitchen (used for cooking), the bedroom (used for sleeping), or the study (used for work or study).

In essence, the living room was designed as a communal space where family members could spend time together, relax, and entertain guests. It’s a versatile space for various living activities, hence the name ‘living room.’
Each room in a house has a specific primary function, which is why they have different names:

  • Bedroom: Primarily for sleeping.
  • Kitchen: Primarily for cooking and preparing food.
  • Study: Primarily for working or studying.
  • Living Room: Primarily for social and communal living activities.

The Living Room’s Unique Role
The living room serves as a communal space where various activities happen:

  • Social Hub: It’s the main area where family members and guests come together to socialize.
  • Versatility: It accommodates multiple activities like watching TV, playing games, reading, and having conversations.
  • Central Space: It often acts as the heart of the home, connecting to other areas like the kitchen, dining room, and sometimes the outdoors.

So, while we do live in every room of a house, the living room is specifically named for its role as a central, versatile space for everyday family life and social interactions.


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Is educational institution a primary group or a secondary group? Give reason to justify your answer.

Write a letter to your principal to organize an essay competition in school.

Is educational institution a primary group or a secondary group? Give reason to justify your answer.

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An educational institution, such as a school or university, is generally considered a secondary group. Here’s the reasoning behind this classification:

1. Nature of relationships:
– Primary groups are characterized by intimate, personal, and long-lasting relationships (e.g., family, close friends).
– In educational institutions, relationships are typically more formal, impersonal, and temporary.

2. Purpose:
– Primary groups form naturally and serve emotional needs.
– Educational institutions are deliberately created for specific purposes (education, skill development) and have formal goals.

3. Size:
– Primary groups are usually small.
– Educational institutions are often large, with many members.

4. Duration:
– Primary group memberships tend to be long-lasting or lifelong.
– Membership in educational institutions is usually temporary (limited to the duration of study).

5. Interaction frequency:
– Primary groups involve frequent, face-to-face interactions.
– In educational institutions, interactions are often scheduled and less frequent.

6. Emotional involvement:
– Primary groups involve deep emotional bonds.
– Relationships in educational institutions are generally less emotionally intense.

7. Formality:
– Primary groups have informal structures and rules.
– Educational institutions have formal structures, rules, and hierarchies.

8. Role of individual:
– In primary groups, individuals are valued for who they are.
– In educational institutions, individuals are often valued for their roles (student, teacher) rather than their personal qualities.

However, it’s worth noting that within the larger secondary group of an educational institution, primary group-like relationships can form (e.g., close friendships among classmates). But the institution as a whole remains a secondary group.


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Write a letter to your principal to organize an essay competition in school.

Write an essay on the Importance of AI in Education.

Write a letter to principal of your school to organize an essay competition in school.

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Formal Letter

Letter to principal to organize essay competition in school

 

Date: 15 July 2024

To,
The Principal
Mount View Public School,
Shimla.

Subject: Request to Organize an Essay Competition

Respected Ma’am,

I hope this letter finds you in good health. I am writing to request your permission and support to organize an essay competition for our school students.

The proposed competition would aim to enhance students’ writing skills, encourage creative thinking, and provide a platform for expressing ideas on various topics. I believe such an event would greatly benefit our student community by:

1. Improving written communication skills
2. Fostering critical thinking and research abilities
3. Boosting confidence in self-expression
4. Preparing students for future academic and professional writing tasks

If approved, we suggest the competition be open to all classes, with separate categories for junior and senior students. We could have engaging themes like ‘The Future of Technology,’ ‘Climate Change Solutions,’ or ‘The Importance of Cultural Diversity.’

We would be grateful if you could provide guidance on:
— Selecting judges from our teaching staff
— Arranging prizes for the winners
— Scheduling the event

Your support in this initiative would be invaluable in promoting literary skills among our students.

Thank you for your time and consideration. I look forward to your positive response.

Yours sincerely,
Sangeeta Sharma,
Class – 10th A
Roll no. 26,
Mount View Public School,
Shimla.


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Write a letter to the editor of the newspaper about complaining the government hospital.

Your friend wants to visit Rajasthan for a trip. Write an E-mail to your friend giving the knowledge about Rajasthan.

Write an essay on the Importance of AI in Education.

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Essay

Importance of AI in Education

 

Artificial Intelligence (AI) is revolutionizing the education sector, offering unprecedented opportunities to enhance learning experiences and outcomes. AI-powered tools can personalize education, adapting to each student’s unique learning pace and style, thereby addressing individual needs more effectively than traditional one-size-fits-all approaches. These systems can analyze vast amounts of data to identify learning patterns and difficulties, enabling educators to provide timely interventions and support.

AI also facilitates administrative tasks, freeing up teachers to focus more on student interaction and mentoring. Virtual tutors and chatbots offer 24/7 support to students, answering queries and providing explanations at any time. Furthermore, AI can create immersive learning experiences through virtual and augmented reality, making complex concepts more accessible and engaging.

However, the integration of AI in education also raises concerns about data privacy and the potential loss of human touch in teaching. Striking a balance between technological advancement and maintaining the crucial human elements of education is essential. Despite these challenges, AI’s potential to democratize education, improve accessibility, and prepare students for a tech-driven future makes it an invaluable tool in modern education systems.


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Write an essay about ‘Save Water’

Write a shore essay on the importance of healthy eating habits.

‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर बताइए कि नगर पालिका ने नेताजी की प्रतिमा क्यों लगवाई थी? इससे नेताजी के जीवन का कौन सा पहलू उजागर होता है? उनके जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए​।

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सम्मान में नगर पालिका द्वारा प्रतिमा लगाने का निर्णय कई महत्वपूर्ण कारणों पर आधारित था। यह न केवल एक महान नेता के प्रति श्रद्धांजलि थी, बल्कि शहर के लोगों में देशभक्ति की भावना जागृत करने का एक प्रयास भी था। प्रतिमा नेताजी के असाधारण नेतृत्व, अटूट साहस और देश के लिए उनके बलिदान को प्रतिबिंबित करती है।

इस प्रतिमा से नेताजी के जीवन के अनेक पहलू उजागर होते हैं। यहाँ पर उनका नेतृत्व और देशभक्ति वाला पहलू उजागर होता है।  उनका साहस और दृढ़ संकल्प भी उजाग होता है। इस प्रतिमा से देश के लिए उनका त्याग और बलिदान भी प्रकट होता है।

नेताजी का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अद्वितीय योगदान, उनके साहस, और देश के लिए उनके बलिदान के लिए याद किया जाता है। उनका आदर्शवाद और देशभक्ति आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश:

नेताजी का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ज्वलंत अध्याय है। 1897 में कटक में जन्मे सुभाष चंद्र बोस ने अपनी उच्च शिक्षा कोलकाता और कैम्ब्रिज से प्राप्त की। वे जल्द ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक प्रमुख नेता बन गए। 1943 में उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया और ‘दिल्ली चलो’ का प्रसिद्ध नारा दिया। नेताजी पूर्ण स्वराज और सामाजिक समानता के लिए दृढ़ता से लड़े। हालांकि 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में उनकी कथित मृत्यु हो गई, उनका जीवन और कार्य आज भी लाखों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। नेताजी की प्रतिमा उनके इसी साहस, त्याग और देशभक्ति का स्मारक है, जो आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र के प्रति समर्पण का संदेश देती रहेगी।


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नेताजी की मूर्ति से क्षमा मांगने के पीछे कैप्टन का क्या भाव छिपा होता था ? (नेताजी का चश्मा)

मूर्ति निर्माण में नगर पालिका को देर क्यों लगी होगी नेताजी का चश्मा पाठ के आधार पर बताइए? (अ) धन के अभाव के कारण (ब) मूर्तिकार ना मिलने के कारण (स) मूर्ति स्थापना के स्थान का निर्णय न कर पाने के कारण (द) संगमरमर ना मिलने के कारण

‘नेताजी का चश्मा’ पाठ के आधार पर शासन-प्रशासन के कार्यालयों की कार्यशैली बारे में आपकी क्या धारणा बनती है?

हालदार साहब ने जब मूर्ति के नीचे मूर्तिकार ‘मास्टर मोतीलाल’ पढ़ा, तब उन्होंने क्या-क्या सोचा?

मन लागा उन मन्न सौं, गगन पहुँचा जाइ। देख्या चंद बिहूँणां, चांदिणाँ, तहाँ अलख निरंजन राइ।। भावार्थ बताएं।

मन लागा उन मन्न सौं, गगन पहुँचा जाइ।
देख्या चंद बिहूँणां, चांदिणाँ, तहाँ अलख निरंजन राइ।।

संदर्भ : ये दोहा कबीर की साखियां है। इस दोहे के माध्यम से कबीर ने उस अवस्था का वर्णन किया है, जब मन में ज्ञान का उदय हो जाता है और मनुष्य जिस आनंद का अनुभव करता है कबीर ने उसी अवस्था का वर्णन किया है।

भावार्थ : कबीर कहते हैं कि जब मन में ज्ञान का प्रकाश प्रज्ज्वलित हुआ और मन ज्ञान के प्रकाश से आलोकिक हो गया तो वह संसार रूपी बंधनों से मुक्त हो गयाष संसार रूपी बंघनों से मुक्त होकर मन ज्ञान की उच्चतम अवस्था में पहुंच गया और ब्रह्मांड में लीन हो गया। इस ब्रह्मांड में मन ने परम आनंद का अनुभव कियाष उसके चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश बिखरा हुआ था। उसने प्रकाश के एक पुंज के रूप में साक्षात ब्रह्म के दर्शन किए।

व्याख्या : यहाँ पर कबीर ने मन की उस अवस्था का वर्णन किया है, जब वह ज्ञानोदय की चरम अवस्था में पहुंच जाता है। जब मनुष्य का मन ज्ञान के उच्चतम स्तर पर पहुंचकर पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लेता है तो उसके मन से सारे अंधकार मिट जाते हैं, तो वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसका मन ब्रह्मांड में परम आनंद में लीन हो जाता है। तब वह उस ब्रह्म के दर्शन करता है जो साक्षात ज्ञान का प्रतीक है।

कठिन शब्दों के अर्थ

उन मन्न : अन्तर्मन
गगन : ब्रहाण्ड
बिहूँणा : प्रकाश
चांदिणा : प्रकाश पुंज
अलख निरंजन : निराकार परमात्मा


Related दोहे…

पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भया उजास। मुख कस्तूरी महमहीं, बाँणी फूटी बास।।​ भावार्थ बताएं।

कबीर घास न निंदिए, जो पाऊँ तलि होइ। उड़ी पडै़ जब आँखि मैं, खरी दुहेली हुई।। अर्थ बताएं।

पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भया उजास। मुख कस्तूरी महमहीं, बाँणी फूटी बास।।​ भावार्थ बताएं।

पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भयाभया उजास।
मुख कस्तूरी महमहीं, बाँणी फूटी बास।।​

संदर्भ : ये दोहे की कबीर की साखियां है। इस दोहे के माध्यम से कबीर ने मन में प्रेम के उत्पन्न होने और ज्ञान के जाग्रत होने की अवस्था और उसके अनुभव का वर्णन किया है। उन्होंने प्रेम और ज्ञान के महत्व को समझाया है।

भावार्थ : कबीर कहते हैं कि जैसे ही इस मन और शरीर में प्रेम उत्पन्न हुआ वैसे ही प्रेम की चमक से पूरा अन्तर्मन उजला हो गया। मन का अंधकार मिट गया और ज्ञान का प्रकाश फैल गया। ज्ञानोदय होने पर मुँह कस्तूरी जैसी सुंगध से महक उठा और वाणी से भी अद्भुत सुगंध फूटने लगी।

व्याख्या : यहाँ पर कबीर ने प्रेम और ज्ञान के महत्व को बताया है। कबीर का कहना है कि जब मनुष्य प्रेम का महत्व समझ लेता है, तो उसके ज्ञान चक्षु खुल जाते है। ज्ञान चक्षु अर्थात ज्ञान रूपी आँखें खुल जाने पर मन ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो उठता है। जब मनुष्य प्रेममय और ज्ञानमय हो जाता है तो न केवल उसके मुख से बल्कि उसकी आवाज से भी सुगंध बिखरने लगती है। प्रेम और ज्ञान के प्रभाव से मनुष्य का पूरा शरीर ही सुगंधमय हो जाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ

पिंजर : शरीर
उजास : उजाला, प्रकाश
बाँणी : आवाज, बोली
बास : गंध, सुगंध
अंतरि : ह़दय, मन
प्रकासिया : प्रकाश से आलोकित होना


Related दोहे..

ठगनी क्यूँ नैना झमकावै, तेरे हाथ कबीर न आवै।। “इस पंक्ति में ‘ठगनी’ किसे कहा गया है?

कबीर सुमिरन सार है, और सकल जंजाल। आदि अंत सब सोधिया, दूजा देखौं काल।। अर्थ बताएं?

अंजलि और राधिका अपनी सहेली पूजा के जन्मदिन का उपहार खरीदने के लिए बाजार जा रही हैं। दोनों के बीच होने वाले संवाद को लिखें।

संवाद लेखन

सहेली के जन्मदिन के उपहार की खरीदारी के विषय में दो सहेलियों के बीच संवाद

 

अंजलि ⦂ अरे राधिका, चलो जल्दी करें। पूजा के जन्मदिन में अब सिर्फ दो दिन बचे हैं।

राधिका ⦂ हाँ, मैं भी सोच रही थी। क्या खरीदें उसके लिए?

अंजलि ⦂ मुझे लगता है कि हमें कोई अच्छी सी किताब लेनी चाहिए। पूजा को पढ़ना बहुत पसंद है।

राधिका ⦂ हम्म, यह तो सही है। लेकिन क्या वो थोड़ा सा निजी नहीं होगा?

अंजलि ⦂ तो फिर क्या सोच रही हो?

राधिका ⦂ क्यों न हम उसके लिए एक सुंदर सा लॉकेट लें? वो हमेशा गले में कुछ पहनती है।

अंजलि ⦂ वाह! यह तो बहुत अच्छा विचार है। और साथ में एक छोटी सी किताब भी ले लेते हैं।

राधिका ⦂ बिलकुल! इस तरह हम दोनों की पसंद का मिश्रण हो जाएगा।

अंजलि ⦂ चलो फिर, पहले ज्वैलरी शॉप में चलते हैं, फिर बुक स्टोर।

राधिका ⦂ ठीक है, और हाँ, एक प्यारा सा कार्ड भी लेना है।

अंजलि ⦂ हाँ, बिल्कुल। चलो, जल्दी करें। मुझे यकीन है पूजा को हमारा उपहार बहुत पसंद आएगा।


Other संवाद

गुड टच और बैड टच के बारे में बात करते हुए दो मित्रों के बीच हुए संवाद को लिखिए।

गर्मियों की छुट्टियों के बाद कक्षा में मिले दो सहेलियों के बीच हुई बातचीत को संवाद के रूप में लिखिए।

हीरा-मोती के प्रति गया का व्यवहार आपको कैसा लगता है और क्यों ?

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हीरा-मोती के प्रति गया का व्यवहार हमें बिल्कुल ही अमानवीय लगता है। गया एक बेहद असंवेदनशील व्यक्ति था जिसने हीरा-मोती जैसे मूक प्राणियों के प्रति जरा भी दया नही दिखाई। उसका व्यवहार मानवता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता था।

गया बिल्कुल ही स्वार्थी व्यक्ति था, वह अपने बहनोई झूरी से उसके दोनों बैल हीरा और मोती को इसलिए मांग कर ले गया था क्योंकि उसे अपने खेतों में जुताई की जरूरत थी। वह अपने काम को कराने के लिए दोनों बैलों को ले तो गया लेकिन वह दोनों बैलों की देखभाल करने में बेहद लापरवाह निकला। उसके अंदर दया और संवेदना नहीं थी। उसने दोनों बैलों से भरपूर काम तो लिया लेकिन उन्हें दाना-पानी देने के नाम पर सूखा भूसा दे देता था। यह उसकी असंवेदनशीलता थी। इसी कारण गया का यह व्यवहार हमें बिल्कुल भी अनुचित लगा।

हमारी दृष्टि में उसे ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था। यदि वह बैलों के साथ अनुचित व्यवहार नहीं करता और दोनों बैल हीरा और मोती को अच्छी तरह से रखता तो शायद बैलों को उसके घर से भागने की जरूरत नहीं पड़ती। इस तरह दोनों बैलों को इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता। उन्हें परेशान भी नहीं होना पड़ता और ना ही सारा वह घटनाक्रम घटता जो इस कहानी में घटा है।

हमें सभी पालतू और घरेलू पशुओं के साथ संवेदनशील व्यवहार करना चाहिए। पशुओं के अंदर भी संवेदनाएं होती हैं। उन्हें भी कष्ट होता है। उन्हें भी दुख होता, यह बात हमें समझनी चाहिए। वह भले ही पशु हैं, लेकिन वह हमारी तरह ही प्राणी हुई हैं। उनके अंदर भी प्राण हैं।


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यासुकी चान जैसे शारीरिक चुनौतियों से जूझने वाले व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधा की आवश्यकता होती है। विद्यालयों अथवा सार्वजनिक स्थलों पर ऐसे कौन-कौन से भौतिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। आपसी चर्चा के पश्चात् एक सूची तैयार कीजिए। ​

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यासुकी चान जैसे शारीरिक चुनौतियों से जूझने वाले व्यक्तियों के लिए विद्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर विशेष सुविधाओं की आवश्यकता होती है। इन व्यक्तियों की सहायता के लिए सभी सार्वजनिक स्थानों पर अनेक विशेष सुविधाएं और संसाधनों को आवश्कता होती है। इन सबकी सूची इस प्रकार हो सकती है…

1. व्हीलचेयर : सभी सार्वजनिक स्थानों पर सभी प्रवेश द्वारों और निकास पर व्हीलचेयर की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि चलने-असमर्थ व्यक्ति को वहाँ पर आने-जाने में कोई असुविधा न हो।

2. लिफ्ट या एलिवेटर : सभी बहुमंजिला इमारतों में आसान आवागमन के लिए लिफ्ट या एलिवेटर अवश्य होनी चाहिए।

3. विशेष शौचालय : सभी सार्वजनिक स्थानों पर विशेष चुनौतियों वाले व्यक्तियों के लिए विशेष शौचालय होना चाहिए। ऐसे शौचालयों में व्हीलचेयर आसानी से आ जा सके। यहाँ सीढ़ियां नहीं बल्कि छलवाँ रैंप होना चाहिए जिससे व्हील चेयर आसानी से चढ़ सके।

4. ब्रेल साइनेज : सभी सार्वजनिक स्थानों पर दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए दिशा-निर्देश हेतु ब्रेल साइनेज की व्यवस्था होनी चाहिए।

5. श्रवण सहायक उपकरण : श्रवण बाधित व्यक्तियों के लिए श्रवण सहायक यंत्रों की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि उस सार्वजनिक स्थान पर मिलने वाले सूचना को वह समझ सकें।

6. समायोज्य डेस्क और कुर्सियां : सार्वजनिक स्थान जैसे विद्यालय आदि में विभिन्न प्रकार की शारीरिक चुनौतियों वाले छात्रों के लिए विशेष समायोज्य डेस्क और कुर्सियों की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि उन्हें बैठने में आसानी हो।

7. विशेष खेल उपकरण : विद्यालयों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि विशेष चुनौती वाले छात्र खेलों में भाग ले सकें। इसके लिए समावेशी खेल गतिविधियां संबंधी उपकरणों की व्यवस्था होनी चाहिए।

8. टैक्टाइल पथ : सभी सार्वजनिक स्थलों पर दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए मार्गदर्शन संबंधी व्यवस्था होनी चाहिए।

9. अनुकूलित कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर : विभिन्न प्रकार की अक्षमताओं वालो व्यक्तियों के लिए अनुकूलित कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर की व्यवस्था होनी चाहिए।

10. विशेष पार्किंग स्थल : शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण व्यक्ति विशेष वाहनों का प्रयोग करते हैं। अतः सभी सार्वजनिक स्थलों पर उनकी सुविधा के लिए ऐसे विशेष पार्किंग स्थल होने चाहिए जहाँ पर वे अपना वाहन आदि पार्क करके आसानी से मुख्य स्थल तक पहुँच सकें।

11. हैंडरेल : गलियारों और सीढ़ियों पर चढ़ने में आसानी हेतु हैंडरेल लगी होनी चाहिए।

12. दरवाजों पर स्वचालित खोलने की व्यवस्था : सभी सार्वजनिक स्थलों विशेष चुनौती वाले व्यक्ति आसनी से प्रवेश कर सकें इसके लिए वहाँ पर स्वचलित दरवाजे होने चाहिए। उन्हें दरवाजे खोलने के लिए असुविधा न हो।

13. आपातकालीन अलार्म और प्रकाश व्यवस्था : अंधे व्यक्ति अपना रास्ता न भटक जाएं इसके लिए हर जगह आपातकालीन अलार्म होने चाहिए संकट आने पर वह सूचित कर सकें।

14. विशेष पुस्तकालय सामग्री : दृश्यबाधित लोगों के लिए सभी सार्वजनिक स्थलों पर ब्रेल पुस्तकें और ऑडियो बुक्स होनी चाहिए ताकि वह भी आसनी से उस स्थान के बारे में सूचना पा सकें।

15. सांकेतिक भाषा दुभाषिए : मूक-बधिर व्यक्तियों की सहायता के लिए सभी सार्वजनिक स्थलों पर कुछ कर्मचारीर ऐसे होने चाहिए जो सांकेतिक भाषा को समझ सकें। इस तर मूक-बधिर लोग भी अपनी बात को आसानी से कह समझ सकेंगे।

यह सूची विभिन्न प्रकार की शारीरिक चुनौतियों का सामना करने वाले व्यक्तियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इन सुविधाओं का उद्देश्य सभी के लिए शिक्षा और सार्वजनिक स्थलों तक समान पहुंच सुनिश्चित की जा सकती है।


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‘अपूर्व अनुभव’ पाठ में दूसरों की सहायता करने की प्रेरणा है। सिद्ध कीजिए।

पाठ ‘स्मृति’ के आधार पर आपके जीवन में घटित किसी अविस्मरणीय घटना का वर्णन करें।​

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‘स्मृति’ पाठ में लेखक श्रीराम शर्मा ने अपने बचपन की एक घटना का वर्णन किया है, जो स्मृति के रूप में उनके मानस पटल पर अंकित हो गई थी। ऐसी एक अविस्मरीय घटना मेरे जीवन में भी घटित हुई, मेरे मन स्मृति के रूप में अंकित रही।

मैं अपने शहर में अपने माता-पिता के साथ रहता था। हमारे दादा दादी गाँव में रहते थे, हम लोग अक्सर त्योहारों की छुट्टियों में या गर्मियों में छुट्टियां बिताने के लिए जाया करते थे। मेरे स्कूल में जब गर्मी की छुट्टियां पड़ गई तो हम सब गाँव में बिताने के लिए गाँव गए। पहले दिन ही मैं गाँव के लड़कों के साथ घूमने निकल गया। मेरे दादाजी के खेत के पास ही एक बड़ा सा तालाब था। मैं गाँव के लड़कों के साथ राहत तालाब के किनारे खेलने लगा। गाँव के लड़के तालाब में उतरकर नहाने लगे और मौज-मस्ती करने लगे। उन्हें देखकर मेरा मन भी किया कि मैं भी तालाब में जाकर नहाऊं और मौज-मस्ती करू। लेकिन मुझे डरना नहीं आता था इसलिए मैं तालाब में उतरने से डर रहा था। अपने साथियों द्वारा बार-बार बुलाने मैं अपने आप को रोक नहीं सका और तालाब में उतर गया।

क्योंकि मुझे जानना नहीं आता था, इसलिए मैं तलाक में उतरने ही थोड़ी देर बाद पानी में डूबने लगा और अपने बचाव के लिए हाथ पैर मार कर चिल्लाने लगा। ये देखकर मेरे साथी लड़के मुझे बचाने का प्रयास करने लगे लेकिन वो मुझे संभाल नही पा रहे थे। आवाज सुनकर गाँव के कुछ लोग दौड़े-दौड़े आए और मुझे तालाब में से निकाला। मेरे पेट में पानी भर गया था और मैं लगभग बेहोश हो गया था। किसी तरह मेरे पेट से पानी निकाल गया और मुझे होश आया तो मैंने अपने आसपास लोगों को घिरा हुआ पाया। मेरे माता-पिता को भी सूचना दे दी गई थी और वह भी दौड़े-दौड़े आए।

बाद में घर पर माता-पिता ने डांट लगाई और कहा कि तुम अब कभी तालाब के पास नहीं जाओगे। तालाब में डूबने की वह घटना मेरे मन में अंकित हो गई और मुझे हमेशा याद रही। शहर आकर मैंने इस बार तैरना सीखा और उसके बाद में जब कभी भी गाँव गया तो उसे तालाब जाकर जरूर तैरा, लेकिन तालाब में डूबने की वह घटना मुझे हमेशा याद रही। वह घटना मेरे जीवन की अविस्मरणीय घटना बन गई।


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‘पिटने का डर और जिम्मेदारी की दुधारी तलवार उनके कलेजे पर फिर रही थी।’ पंक्ति का आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि लेखक ने किस का साथ दिया और क्यों? (पाठ-स्मृति)

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कौन सा तत्व आधुनिक राजनीतिक चिंतन की विशेषता नहीं है? (1) राष्ट्रवाद (2) लौकिकवाद (3) सार्वभौमवाद (4) प्रभुसत्ताधारी राज्य

सही विकल्प होगा…

3) सार्वभौमवाद

 

विस्तृत विवरण

इन विकल्पों में से, सार्वभौमवाद आधुनिक राजनीतिक चिंतन की विशेषता नहीं है।
आधुनिक राजनीतिक चिंतन की मुख्य विशेषताएँ हैं:

1. राष्ट्रवाद: राष्ट्र की एकता और पहचान पर जोर।
2. लौकिकवाद: धर्म और राज्य के बीच अलगाव।
3. प्रभुसत्ताधारी राज्य: राज्य की सर्वोच्च सत्ता का सिद्धांत।

सार्वभौमवाद एक ऐसा विचार है जो किसी एक विश्वव्यापी सत्ता या शासन व्यवस्था की कल्पना करता है, जो आधुनिक राज्य व्यवस्था के विपरीत है। आधुनिक राजनीतिक चिंतन में स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र-राज्यों पर अधिक जोर दिया जाता है।

आधुनिक राजनीतिक चिंतन मे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के शासन और सरकार की सीमित भूमिका पर जोर दिया जाता है। इसमें नागरिकों की भागीदारी और प्रतिनिधि सरकार के माध्यम से शासन का सिद्धांत को महत्व दिया जाता है।

आधुनिक राजनीतिक चिंतन की अन्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं…

  • सभी नागरिकों के लिए कानूनी और राजनीतिक समानता का विचार।
  • व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों की मान्यता और संरक्षण।
  • सरकार और नागरिकों के बीच एक समझौते के रूप में राज्य का विचार।
  • सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का बंटवारा।
  • आर्थिक स्वतंत्रता और निजी संपत्ति के अधिकार पर जोर।
  • तर्क और प्रमाण पर आधारित नीति निर्माण।
  • राष्ट्र-राज्यों के बीच कूटनीति और सहयोग का महत्व।
  • समाज में संसाधनों और अवसरों के न्यायसंगत वितरण का विचार।

ये सिद्धांत आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाओं और विचारधाराओं के आधार हैं। हालांकि, विभिन्न देशों और संस्कृतियों में इनका कार्यान्वयन और व्याख्या अलग-अलग हो सकती है।

सार्वभौमवाद (Universalism) एक दार्शनिक और नैतिक दृष्टिकोण है जो मानता है कि कुछ विचार, मूल्य या नैतिक सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं। यह विचारधारा विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाती है, जैसे दर्शन, धर्म, राजनीति और नैतिकता। सार्वभौमवाद मानता है कि कुछ मूल्य और नैतिक सिद्धांत सभी मनुष्यों पर लागू होते हैं, चाहे उनकी संस्कृति या पृष्ठभूमि कुछ भी हो। सार्वभौमिक मानवाधिकारों का विचार इसी दर्शन से उपजा है। कुछ सार्वभौमवादी एक विश्व सरकार या वैश्विक संस्थाओं की वकालत करते हैं जो सभी देशों पर लागू हों। कई धर्म अपने सिद्धांतों को सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

सार्वभौमवाद  मानता है कि नैतिक सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं और सांस्कृतिक सापेक्षवाद का विरोध करता है।

आधुनिक राजनीतिक चिंतन में, जबकि कुछ सार्वभौमिक मूल्यों (जैसे मानवाधिकार) को स्वीकार किया जाता है, सार्वभौमवाद की अवधारणा को पूरी तरह से नहीं अपनाया गया है। इसके बजाय, राष्ट्र-राज्य प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर अधिक जोर दिया जाता है।


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सही उत्तर है…

(3) वर्ग विहीन व राज्य विहीन समाज

○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○

विस्तृत विवरण

मार्क्स की विचारधारा का अंतिम लक्ष्य वर्ग विहीन व राज्य विहीन समाज है। यह मार्क्सवादी दर्शन का केंद्रीय तत्व है और इसे साम्यवाद की अवस्था के रूप में जाना जाता है। मार्क्स का मानना था कि समाज का विकास एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जो अंततः एक ऐसी स्थिति में पहुंचेगी जहां वर्ग विभाजन और राज्य की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। इस आदर्श समाज में, उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व होगा, और प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देगा तथा अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त करेगा।

मार्क्स का मानना था कि इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है, जहाँ एक वर्ग दूसरे का शोषण करता है। उनके अनुसार, पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग का शोषण करता है।

मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि अंततः सर्वहारा वर्ग क्रांति करेगा और एक ऐसा समाज स्थापित करेगा जहाँ उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व होगा। इस वर्गविहीन समाज में आर्थिक असमानता समाप्त हो जाएगी, शोषण का अंत होगा, और सभी लोग समान होंगे। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम करेगा और अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त करेगा। यह समाज मानव मुक्ति का अंतिम चरण होगा, जहाँ व्यक्ति आर्थिक बंधनों से मुक्त होकर अपने पूर्ण विकास की ओर अग्रसर होगा।

मार्क्स के अनुसार, वर्ग संघर्ष समाज के विकास का प्रमुख चालक है। उनका मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था में मौजूद वर्ग विभाजन और शोषण अंततः एक क्रांति की ओर ले जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग का शासन स्थापित होगा। यह समाजवाद का चरण होगा। लेकिन मार्क्स ने इसे अंतिम लक्ष्य नहीं माना। उनका विश्वास था कि समाजवाद धीरे-धीरे एक ऐसी अवस्था में विकसित होगा जहां वर्ग भेद और राज्य की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो जाएगी। यह वर्ग विहीन और राज्य विहीन समाज की अवस्था होगी, जहां सामाजिक संबंध पूरी तरह से समतामूलक होंगे और व्यक्तियों का पूर्ण विकास संभव होगा। इस प्रकार, मार्क्स की विचारधारा का अंतिम लक्ष्य एक ऐसे समाज की स्थापना है जहां न तो वर्ग विभाजन होगा और न ही राज्य की आवश्यकता रहेगी।

इसलिए मार्क्स की विचारधारा का अंतिम लक्ष्य वर्ग विहीन और राज्यविहीन समाज की स्थापना करना है।


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सही उत्तर है…

3) जे.एस. मिल

विस्तृत वर्णन

जॉन स्टुअर्ट मिल (1806-1873) ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांत में यह विचार प्रस्तुत किया कि व्यक्ति के स्व-विषयक कार्यों में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस विचार के पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सिद्धांत: मिल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “On Liberty” में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व पर जोर दिया।
2. हानि का सिद्धांत: उन्होंने कहा कि राज्य केवल तभी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है जब उसके कार्य दूसरों को हानि पहुंचाते हों।
3. स्व-विषयक कार्यों की परिभाषा: मिल ने स्पष्ट किया कि जो कार्य केवल व्यक्ति स्वयं को प्रभावित करते हैं, उनमें राज्य का हस्तक्षेप अनुचित है।
4. व्यक्तित्व के विकास का महत्व: उन्होंने माना कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है।
5. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: मिल ने विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेष बल दिया।
6. बहुलवाद का समर्थन: उन्होंने समाज में विचारों और जीवन शैलियों की विविधता को महत्वपूर्ण माना।
7. प्रगति का आधार: मिल का मानना था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सामाजिक और वैचारिक प्रगति का आधार है।
8. बहुसंख्यक अत्याचार का विरोध: उन्होंने बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यकों पर अपने विचारों को थोपने का विरोध किया।
मिल के ये विचार उदारवादी दर्शन के आधार बने और आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


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सही उत्तर है…

(2) माओत्से तुंग

विस्तृत विवरण

सांस्कृतिक क्रांति चीन में माओत्से तुंग द्वारा 1966 से 1976 तक चलाई गई एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन थी। इस क्रांति के प्रमुख पहलू और कारण निम्नलिखित हैं…

1. उद्देश्य: माओ का मुख्य उद्देश्य चीनी समाज से ‘पूंजीवादी’ और ‘पारंपरिक’ तत्वों को हटाना था।
2. विचारधारात्मक शुद्धता: इसका लक्ष्य माओवादी विचारधारा को मजबूत करना और विरोधी विचारों को समाप्त करना था।
3. युवा शक्ति का उपयोग: माओ ने इस आंदोलन में युवाओं, विशेषकर लाल रक्षकों का व्यापक उपयोग किया।
4. शैक्षणिक सुधार: परंपरागत शिक्षा प्रणाली को बदलकर क्रांतिकारी शिक्षा पर जोर दिया गया।
5. सत्ता संघर्ष: यह आंदोलन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में माओ के प्रतिद्वंद्वियों को हटाने का माध्यम भी था।
6. आर्थिक नीतियां: इसके तहत ग्रामीण औद्योगीकरण और सामूहिक कृषि पर जोर दिया गया।
7. कला और संस्कृति: पारंपरिक चीनी कला और संस्कृति के कई पहलुओं को नष्ट किया गया।
8. अंतरराष्ट्रीय संबंध: इसने चीन के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी प्रभावित किया।

सांस्कृतिक क्रांति चीन के इतिहास का एक विवादास्पद अध्याय रहा है, जिसने देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। यह माओ के विचारों और नेतृत्व शैली का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।


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सही उत्तर है…

(1) निरंकुश राजतंत्र

विस्तृत विवरण

थॉमस हॉब्स के वर्णित सामाजिक समझौते से निरंकुश राजतंत्र की स्थापना होती है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

1. लेवियाथन की अवधारणा: हॉब्स ने राज्य को ‘लेवियाथन’ के रूप में वर्णित किया, जो एक शक्तिशाली और निरंकुश शासक का प्रतीक है।
2. पूर्ण सत्ता का हस्तांतरण: हॉब्स के अनुसार, लोग अपनी सभी शक्तियाँ एक शासक को सौंप देते हैं।
3. अविभाज्य संप्रभुता: शासक की सत्ता अविभाज्य और असीमित होती है।
4. शासक की निरंकुशता: शासक किसी भी प्रकार के नियंत्रण या सीमाओं से मुक्त होता है।
5. प्राकृतिक अवस्था से बचाव: हॉब्स का मानना था कि केवल एक मजबूत शासक ही ‘प्राकृतिक अवस्था’ की अराजकता से बचा सकता है।
6. शांति और सुरक्षा का महत्व: निरंकुश शासक को शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक माना गया।
7. नागरिक अधिकारों का त्याग: लोग अपने अधिकारों का त्याग करके शासक को पूर्ण अधिकार देते हैं।
8. शासक के प्रति निरपेक्ष आज्ञाकारिता: नागरिकों से शासक के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता की अपेक्षा की जाती है।
हॉब्स का यह सिद्धांत 17वीं शताब्दी के राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण था, लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। यह सिद्धांत तत्कालीन यूरोप के राजतंत्रों के औचित्य को सिद्ध करने में सहायक था।


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आशय स्पष्ट कीजिए – देश जातियों का कब होगा, नव मानवता में रे एका, काले बादल में कल की, सोने की रेखा!

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देश जातियों का कब होगा,
नव मानवता में रे एका,
काले बादल में कल की,
सोने की रेखा!

संदर्भ : ये पंक्तिया कवि ‘सुमित्रानंदन पंत’ द्वारा रचित कविता काले बादल से ली गई है। इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने यह उम्मीद ही आशा जताने का भाव प्रकट किया है कि देश कब जातिगत भेदभाव की भावना से मुक्त हो सकेगा।

व्याख्या : कवि सुमित्रानंदन पंत स्वयं से सवाल करते हुए कहते हैं कि इस देश में जातियों के आधार पर उपजी भेदभावना कब मिटेगी? कब लोग जातिगत सोच से ऊपर उठकर मानवता के सुर में एक दूसरे को बाँध पाएंगे। कब देश के लोग एक ही जाति यानी मानव जाति को अपनी जाति बना लेंगे और एकता के सूत्र में बंध पाएंगे। वह समय कब आएगा जब जब देश ऊँच-नीच की भावना से मुक्त हो पाएगा और देश के सभी वासी एक समान भाव से रहेंगे।

कवि कहते हैं जिस तरह काले बादल में सूर्य की किरणों की एक सुनहरी सी रेखा दिखाई देती है, जो मन में आशा का संचार करती है। इसी तरह उन्हें भी भविष्य में एक आशा की किरण दिखाई दे रही है। उन्हें लगता है कि देश भविष्य जातिगद भेद से ऊपर उठकर एक दिन एकजुट होगा और सभी केव मानवता को महत्व देंगे।


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काले बादल जाति द्वेष के,
काले बादल विश्‍व क्‍लेश के,
काले बादल उठते पथ पर
नव स्‍वतंत्रता के प्रवेश के!
सुनता आया हूँ, है देखा,
काले बादल में हँसती चाँदी की रेखा!

संदर्भ : ये काव्य पंक्तियां ‘सुमित्रा नंदन पंत’ द्वारा रचित कविता ‘काले बादल’ नामक कविता से ली गई हैं। इन काव्य पंक्तियों के माध्यम से कवि पंत जी ने प्रकृति के तत्वों को प्रतीक बनाकर देश की तात्कालीन परिस्थितियों का विवेचन किया है।

व्याख्या : कवि सुमित्रानंदन पंत देश की हालत पर और जातिगत भेदभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि देश में जाति पर आधारित भेदभाव की भावना कब तक रहेगी? कब तक इस संसार के लोग एक दूसरे के प्रति राग और द्वेष का भाव मन में पाले रहेंगे। देश अभी-अभी स्वतंत्र हुआ है, इस नई नवेले स्वतंत्र देश की आजादी की राह में जातिगत भेदभाव और आपसी राग-द्वेष की भावनाएं बाधा बनकर खड़ी हैं। इन बाधाओं के पार किए बिना देश आगे नही बढ़ पाएगा।

कवि ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। वह कहते हैं कि जिस तरह काले बादलों के बीच एक चाँदी सी पतली रेखा दिखाई देती है, और मन में आशा का संचार करती है। इस तरह उन्हें भी इन विभिन्न समस्याओं रूपी काले बादल के बीच उम्मीद की एक किरण भी दिखाई दे रही है और उन्हें लगता है कि भारतवासी इन सभी आपसी भेदभाव की भावना को मिटाकर देश को आगे बढ़ाएंगे।


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परिमल-हीन पराग दाग-सा बना पड़ा है, हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।” आशय स्पष्ट करें

किसने हॉब्स को वैज्ञानिक राजनीति का पिता कहा है? (1) डानिंग (2) फोस्टर (3) लियो स्ट्रास (4), इनमें से कोई नहीं

सही उत्तर:

(1) डानिंग

व्याख्या:
विलियम आर्चिबाल्ड डानिंग ने थॉमस हॉब्स को ‘वैज्ञानिक राजनीति का पिता’ कहा है। यह उल्लेख डानिंग की प्रसिद्ध पुस्तक “A History of Political Theories” में मिलता है। इस विशेषण के पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

  • हॉब्स ने राजनीतिक सिद्धांतों के अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया।
  • उन्होंने मानव समाज और राज्य को एक यांत्रिक प्रणाली के रूप में देखा।
  • हॉब्स ने राजनीतिक घटनाओं का तर्कसंगत और व्यवस्थित विश्लेषण किया।
  • उन्होंने अपने राजनीतिक सिद्धांतों में प्राकृतिक विज्ञान की अवधारणाओं का उपयोग किया।
  • हॉब्स ने राजनीतिक घटनाओं में कारण-प्रभाव संबंधों की खोज की।
  • उन्होंने मानव स्वभाव का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया।
  • राज्य की उत्पत्ति का सिद्धांत: हॉब्स ने राज्य की उत्पत्ति का एक तार्किक और व्यवस्थित सिद्धांत प्रस्तुत किया।

डानिंग का यह कथन हॉब्स के राजनीतिक दर्शन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्व को रेखांकित करता है और उन्हें आधुनिक राजनीतिक विज्ञान के अग्रदूत के रूप में स्थापित करता है।

 

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ग्रीन के अनुसार दण्ड में निम्न में से किस तत्व का समावेश होना चाहिए: (1) प्रतिशोध (2) निवारक (3) सुधार (4) इनमें से कोई नहीं

राजनीतिक दायित्व के सिद्धान्त पर व्याखान का लेखक कौन है। (1) ग्रीन (2) हीगाल (3) प्लेटो (4) अरस्तू

सही उत्तर है…

(1) ग्रीन

विस्तृत विवरण
प्रमुख ब्रिटिश दार्शनिक और राजनीतिक विचारक ग्रीन जिनका पूरा नाम थॉमस ग्रीन था, वे ही ‘राजनीतिक दायित्व के सिद्धांत पर व्याख्यान’ (Lectures on the Principles of Political Obligation) नामक रचना के लेखस थे। हालाँकि उनकी ये रचना उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हुई थी। उनकी कोई भी रचना उनके जीवन काल में प्रकाशित हुई। उनके निधन के बाद उनके शिष्य आर. एल. नेटलशिप ने उनकी रचनाओं को प्रकाशित किया। उन्हीं रचनाओं में ‘राजनीतिक दायित्व के सिद्धांत पर व्याख्यान’ (Lectures on the Principles of Political Obligation) नामक रचना भी थी।

अतः स्पष्ट है कि ‘राजनीतिक दायित्व के सिद्धांत पर व्याख्यान’ का लेखक ‘थॉमस हिल ग्रीन’ है। यह उनके प्रमुख कार्यों में से एक है, जिसमें उन्होंने राजनीतिक दायित्व की अवधारणा को विस्तार से समझाया है। इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं:
1. ग्रीन ने राजनीतिक दायित्व को नागरिकों और राज्य के बीच एक नैतिक संबंध के रूप में परिभाषित किया।
2. उन्होंने राजनीतिक दायित्व को समाज की सामान्य इच्छा से जोड़ा।
3. ग्रीन ने राजनीतिक दायित्व को एक नैतिक बाध्यता के रूप में देखा, न कि केवल कानूनी बाध्यता के रूप में।
4. ग्रीन ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक हित के बीच संतुलन पर जोर दिया।
5. ग्रीन के अनुसार, राज्य का उद्देश्य नागरिकों के नैतिक विकास को बढ़ावा देना है।
6. ग्रीन ने सक्रिय नागरिक भागीदारी के महत्व पर बल दिया।
7. ग्रीन ने राजनीतिक दायित्व को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ा।

ग्रीन का यह कार्य 19वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश राजनीतिक दर्शन में महत्वपूर्ण योगदान था। उनके विचारों ने आधुनिक लिबरल लोकतंत्र की अवधारणाओं को प्रभावित किया और राजनीतिक दर्शन में नए विचारों को जन्म दिया।

 

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ग्रीन के अनुसार दण्ड में निम्न में से किस तत्व का समावेश होना चाहिए: (1) प्रतिशोध (2) निवारक (3) सुधार (4) इनमें से कोई नहीं

राजनीतिक शक्ति बन्दूक की नली से उत्पन होती है किसका कथन है (1) माओत्लो तुंग (2) वी आई. लेनिन (3) कार्ल मार्क्स (4) इनमें से कोई नहीं

ग्रीन के अनुसार दण्ड में निम्न में से किस तत्व का समावेश होना चाहिए: (1) प्रतिशोध (2) निवारक (3) सुधार (4) इनमें से कोई नहीं

सही उत्तर होगा..

(3) सुधार

विस्तृत विवरण
थॉमस हिल ग्रीन के अनुसार, दंड का मुख्य उद्देश्य अपराधी का सुधार होना चाहिए। ग्रीन का मानना था कि दंड का लक्ष्य केवल सजा देना या प्रतिशोध लेना नहीं होना चाहिए, बल्कि अपराधी को समाज का एक बेहतर सदस्य बनाने में मदद करना होना चाहिए। उनका विचार था कि:

1. सुधारात्मक दृष्टिकोण: दंड अपराधी के व्यवहार और मानसिकता में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए।
2. पुनर्वास: दंड प्रणाली में अपराधी के पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए।
3. शिक्षा और कौशल विकास: दंड के दौरान अपराधी को शिक्षा और कौशल विकास के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
4. सामाजिक एकीकरण: दंड का उद्देश्य अपराधी को समाज में पुनः एकीकृत करना होना चाहिए।
5. नैतिक सुधार: ग्रीन का मानना था कि दंड अपराधी के नैतिक चरित्र में सुधार लाने में मदद करना चाहिए।

थॉमस हिल ग्रीन (1836-1882) एक प्रमुख ब्रिटिश दार्शनिक और राजनीतिक विचारक थे। वे आदर्शवादी दर्शन के प्रमुख प्रतिनिधि थे। ग्रीन ने नैतिकता, राजनीति, और समाज पर महत्वपूर्ण लेखन किया। उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन पर जोर दिया।

 

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राजनीतिक शक्ति बन्दूक की नली से उत्पन होती है किसका कथन है (1) माओत्लो तुंग (2) वी आई. लेनिन (3) कार्ल मार्क्स (4) इनमें से कोई नहीं

लॉक ने किस प्रकार के शासन का समर्थन किया हैः (1) निरंकुश राजतंत्र (2) संवैधानिक राजतंत्र (3) अधिनायकतंत्र (4) इनमें से कोई नहीं

राजनीतिक शक्ति बन्दूक की नली से उत्पन होती है किसका कथन है (1) माओत्लो तुंग (2) वी आई. लेनिन (3) कार्ल मार्क्स (4) इनमें से कोई नहीं

सही उत्तर होगा…

(1) माओत्से तुंग

विस्तृत विवरण
“राजनीतिक शक्ति बंदूक की नली से उत्पन्न होती है” यह प्रसिद्ध कथन चीनी क्रांतिकारी नेता और चीन के संस्थापक माओत्से तुंग द्वारा कहा गया था। चीन के प्रसिद्ध कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग जिन्हें माओ का नाम से भी जाना जाता था, उनका मानना था कि राजनीतिक परिवर्तन के लिए सशस्त्र संघर्ष आवश्यक है।
उन्होंने राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने और बनाए रखने में सैन्य शक्ति के महत्व पर जोर दिया। माओ ने वर्ग संघर्ष को क्रांति का आधार माना, जिसमें हथियारबंद संघर्ष एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने चीनी क्रांति में गुरिल्ला युद्ध तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया। माओ ने साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध का समर्थन किया।

यह कथन माओवादी विचारधारा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और उनके क्रांतिकारी दृष्टिकोण को दर्शाता है। हालांकि, यह दृष्टिकोण विवादास्पद रहा है और इसकी आलोचना भी हुई है।

 

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लॉक ने किस प्रकार के शासन का समर्थन किया हैः (1) निरंकुश राजतंत्र (2) संवैधानिक राजतंत्र (3) अधिनायकतंत्र (4) इनमें से कोई नहीं

हॉब्स की अध्ययन शैली को क्या नाम दिया जा सकता है : (1) आर्थिक नियतिवादी (2) यांत्रिक नियतिवादी 3) ऐतिहासिक नियतिवादी (4) इनमें से कोई नहीं

 

लॉक ने किस प्रकार के शासन का समर्थन किया हैः (1) निरंकुश राजतंत्र (2) संवैधानिक राजतंत्र (3) अधिनायकतंत्र (4) इनमें से कोई नहीं

सही उत्तर है…

संवैधानिक राजतंत्र

 

विस्तृत वर्णन

जॉन लॉक ने संवैधानिक राजतंत्र का समर्थन किया। जॉन लॉक (1632-1704) ने अपने राजनीतिक दर्शन में संवैधानिक राजतंत्र का समर्थन किया। उनका मानना था कि शासन की सत्ता जनता से प्राप्त होती है और शासक को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।

लॉक ने निम्नलिखित कारणों से संवैधानिक राजतंत्र का समर्थन किया…

  • सीमित शासन: उन्होंने शासक की शक्तियों पर संवैधानिक सीमाओं का समर्थन किया।
  • प्राकृतिक अधिकार: लॉक ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया।
  • विधायिका की भूमिका: उन्होंने कानून बनाने के लिए एक प्रतिनिधि विधायिका का समर्थन किया।
  • शक्तियों का पृथक्करण: लॉक ने सरकार की शक्तियों के विभाजन का समर्थन किया।
  • जनता की सहमति: उन्होंने शासन के लिए जनता की सहमति के महत्व पर बल दिया।

इस प्रकार, लॉक का संवैधानिक राजतंत्र का समर्थन व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा और शासक की निरंकुशता को रोकने पर केंद्रित था।


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हॉब्स की अध्ययन शैली को क्या नाम दिया जा सकता है : (1) आर्थिक नियतिवादी (2) यांत्रिक नियतिवादी 3) ऐतिहासिक नियतिवादी (4) इनमें से कोई नहीं

भारत के संविधान में प्रदत्त 6 मौलिक अधिकारों का विस्तार से वर्णन करें।

हॉब्स की अध्ययन शैली को क्या नाम दिया जा सकता है : (1) आर्थिक नियतिवादी (2) यांत्रिक नियतिवादी 3) ऐतिहासिक नियतिवादी (4) इनमें से कोई नहीं

सही उत्तर है…

(2) यांत्रिक नियतिवादी

○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○○

व्याख्या

हॉब्स की अध्ययन शैली को ‘यांत्रिक नियतिवादी’ कहा जा सकता है।

थॉमस हॉब्स ((Thomas Hobbes ) (1588-1679) 17वीं सदी के अंग्रेज दार्शनिक थे, जिन्होंने राजनीतिक दर्शन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी अध्ययन शैली को यांत्रिक नियतिवादी इसलिए कहा जाता है क्योंकि हॉब्स ने मानव व्यवहार और समाज को भौतिक नियमों के आधार पर समझने का प्रयास किया। उन्होंने मानव को एक जटिल मशीन के रूप में देखा जो प्राकृतिक नियमों से संचालित होती है। उन्होंने मानव व्यवहार और सामाजिक घटनाओं को कारण-प्रभाव के सिद्धांत पर आधारित माना, जो यांत्रिक प्रक्रियाओं की तरह काम करते हैं।

हॉब्स का मानना था कि मानव व्यवहार पूर्व निर्धारित नियमों द्वारा नियंत्रित होता है, जिसे समझकर भविष्य की घटनाओं का अनुमान लगाया जा सकता है। उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण में गणितीय तर्क का उपयोग किया, जो यांत्रिक सोच को दर्शाता है। हॉब्स न्यूटन और गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों से प्रभावित थे, जिन्होंने प्रकृति को यांत्रिक नियमों से संचालित माना।

इस प्रकार, हॉब्स की अध्ययन शैली मानव समाज और व्यवहार को यांत्रिक नियमों और सिद्धांतों के आधार पर समझने का प्रयास करती है, इसलिए इसे यांत्रिक नियतिवादी कहा जाता है।


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भारत के संविधान में प्रदत्त 6 मौलिक अधिकारों का विस्तार से वर्णन करें।

भ्रष्टाचार मुक्त भारत विकसित भारत (निबंध)

भारत के संविधान में प्रदत्त 6 मौलिक अधिकारों का विस्तार से वर्णन करें।

भारत के संविधान में नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। ये अधिकार भारतीय लोकतंत्र के आधार स्तंभ हैं। भारतीय संविधान में प्रदत्त छह मौलिक अधिकार नागरिकों के जीवन को सुरक्षित और समृद्ध बनाते हैं। संवैधानिक उपचारों का अधिकार इन सभी अधिकारों की रक्षा का माध्यम प्रदान करता है। ये अधिकार मिलकर एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज की नींव रखते हैं।

स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार इस प्रकार हैं…

1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 1418)

मुख्य बिंदु
  • कानून के समक्ष समानता
  • धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध
  • सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता

समानता का अधिकार भारतीय संविधान का मूल आधार है। यह सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान मानता है, चाहे उनकी जाति, धर्म, लिंग या जन्मस्थान कुछ भी हो। इस अधिकार के तहत सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश, रोजगार में अवसर की समानता, और अस्पृश्यता का उन्मूलन शामिल है। यह सामाजिक समानता और न्याय सुनिश्चित करता है, जिससे समाज में सभी व्यक्तियों को समान अवसर और सम्मान मिलता है।

2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 1922):

मुख्य बिंदु
  • वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • शांतिपूर्ण सम्मेलन की स्वतंत्रता
  • संघ या संगम बनाने की स्वतंत्रता
  • भारत के किसी भी भाग में स्वतंत्र संचरण की स्वतंत्रता
  • किसी भी भाग में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता
  • कोई भी पेशा अपनाने या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता

स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विकास का आधार है। इसमें वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सम्मेलन, संघ बनाने, देश में कहीं भी आनेजाने, निवास करने और व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता शामिल है। यह अधिकार लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह नागरिकों को अपने विचार व्यक्त करने, संगठित होने और अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की अनुमति देता है।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 2324):

मुख्य बिंदु
  • मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध
  • कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध

शोषण के विरुद्ध अधिकार मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करता है। यह मानव तस्करी, बलात् श्रम और बाल श्रम पर रोक लगाता है। इस अधिकार का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा करना है। यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति दूसरों द्वारा शोषित न हो और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 2528):

मुख्य बिंदु
  • अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता
  • धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता
  • किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भारत की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को दर्शाता है। यह प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म मानने, उसका आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। इसमें धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन की स्वतंत्रता भी शामिल है। यह अधिकार सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान सुनिश्चित करता है और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देता है।

5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 2930):

मुख्य बिंदु
  • अल्पसंख्यकवर्गों के हितों का संरक्षण
  • शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार

संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार भारत की सांस्कृतिक विविधता और शैक्षिक विकास को संरक्षित करता है। यह अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार देता है। साथ ही, यह उन्हें अपनी शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने और प्रबंधित करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस अधिकार का उद्देश्य देश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना और शिक्षा के क्षेत्र में विविधता को प्रोत्साहित करना है।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32):

मुख्य बिंदु
  • इस अधिकार के तहत नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं
  • ये अधिकार भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं और उन्हें स्वतंत्र, समान और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्रदान करते हैं।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार अन्य सभी मौलिक अधिकारों की रक्षा का साधन है। यह नागरिकों को अपने अधिकारों के हनन की स्थिति में सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। इसमें रिट जारी करने की शक्ति शामिल है, जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा। यह अधिकार संविधान को जीवंत दस्तावेज बनाता है और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है।


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‘कर्तव्य एवं अधिकार’ विषय पर 250 शब्दों में अनुच्छेद लिखिए।​

Discuss the role of Planning Commission in India

The Planning Commission of India was established in 1950 as a non-constitutional body to promote a rapid rise in the standard of living of the people through efficient exploitation of resources. It played a crucial role in India’s economic development until its dissolution in 2014.

Key functions of the Planning Commission included:

1. Formulating Five-Year Plans: It designed comprehensive plans for economic growth and social justice, setting targets for various sectors.
2. Resource allocation: It determines the allocation of resources among different sectors and states.
3. Policy formulation: It advised the government on economic and social policies.
4. Progress evaluation: It monitored and evaluated the implementation of plans and suggested necessary adjustments.
5. Coordination: Coordination between various ministries and state governments for efficient plan implementation.

The Commission’s approach evolved over time, shifting from a Soviet-style centralized planning model to a more market-oriented approach. It played a significant role in India’s industrialization, agricultural development, and poverty alleviation efforts.’

However, the Planning Commission faced criticism for being too bureaucratic and out of touch with ground realities. It was also accused of hampering the federal structure by interfering with state-level planning.

In 2014, the Planning Commission was replaced by NITI Aayog (National Institution for Transforming India), which aims to be a more collaborative and adaptive think tank for guiding India’s development strategy.

While the Planning Commission’s legacy is mixed, it undeniably played a crucial role in shaping India’s economic policies and development trajectory for over six decades.


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The economic policies pursued by the colonial government in India were concerned more with the protection and promotion of the economic interests of their home country than with the development of the Indian economy. Critically evaluate the shortcomings of the agricultural and industrial policies pursued by the colonial administration.

In which country was a democratically elected government controlled by an absolute power?

निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए। 1. समाज की सेवा करने वाला 2. जिसमें दया न हो 3. काम करने वाला 4. जिसमें शर्म न हो 5. जिसका दोष न हो 6. जिसे पाना कठिन हो

दिए गए सभी वाक्यांशों के लिए एक शब्द इस प्रकार होंगे…

1. समाज की सेवा करने वाला व्यक्ति : समाजसेवी
2. जिसमें दया का भाव न हो, कठोर हृदय वाला : निर्दयी
3. जो लगन से काम करता हो, मेहनती :  कर्मठ
4. जिसमें शर्म या लज्जा न हो, बेशर्म : निर्लज्ज
5. जिसमें कोई दोष न हो, शुद्ध या पवित्र : निर्दोष
6. जिसे पाना कठिन हो, अत्यंत मुश्किल से मिलने वाला : दुर्लभ

शब्दों के बारे में विस्तार से…

1. समाजसेवी: समाज के हित के लिए काम करने वाला व्यक्ति। ये लोग निःस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करते हैं।
2. निर्दयी: दया-रहित व्यक्ति। ऐसे लोग दूसरों के दुख या कष्ट से प्रभावित नहीं होते और कठोर व्यवहार करते हैं।
3. कर्मठ: परिश्रमी और लगनशील व्यक्ति। ये लोग अपने काम को पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ करते हैं।
4. निर्लज्ज: शर्म या लज्जा से रहित व्यक्ति। ऐसे लोग समाज के नियमों या मर्यादाओं की परवाह नहीं करते। इनको सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता।
5. निर्दोष: दोष-रहित या शुद्ध। यह शब्द किसी व्यक्ति, वस्तु या कार्य की पवित्रता या निष्कलंकता को दर्शाता है।
6. दुर्लभ: जो आसानी से न मिले। यह शब्द किसी वस्तु, व्यक्ति या अवसर की कमी या मुश्किल से उपलब्धता को बताता है।


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‘देवों की वाणी’ अनेक शब्दों के लिए एक शब्द क्या होगा?

इन शब्दों के लिए अनेक शब्दों के लिए एक शब्द बताइए। ‘जो विश्वास न करता हो’ ‘जो सब पर विश्वास करता हो’ जिसके पास बहुत साधन हो’

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए। क. विनोबा जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था? ख. विनोबा जी की प्रारंभिक शिक्षा कहाँ हुई? ग. विनोबा जी देश में किस प्रकार के समाज की स्थापना करना चाहते थे? घ. विनोबा जी का एकमात्र मार्ग क्या था?

0
क. विनोबा जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर : विनोबा जी का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले (अब रायगढ़ जिला) के गागोदा गांव में हुआ था।

ख. विनोबा जी की प्रारंभिक शिक्षा कहाँ हुई?

उत्तर : विनोबा जी की प्रारंभिक शिक्षा उनके पैतृक गाँव में हुई। बाद में, वे वडोदरा और मुंबई में अपनी शिक्षा के लिए गए। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा मुंबई के वेलिंग्टन कॉलेज में पूरी की।

ग. विनोबा जी देश में किस प्रकार के समाज की स्थापना करना चाहते थे?

उत्तर : विनोबा जी देश में एक समानतावादी समाज की स्थापना करना चाहते थे, जहाँ सामाजिक और आर्थिक समानता हो। उन्होंने भूदान आंदोलन के माध्यम से भूमि का समान वितरण करने का प्रयास किया ताकि हर व्यक्ति को जीने का अधिकार मिल सके। उनका आदर्श समाज “सर्वोदय समाज” था, जिसका उद्देश्य था सबका कल्याण।

घ. विनोबा जी का एकमात्र मार्ग क्या था?

उत्तर : विनोबा जी का एकमात्र मार्ग अहिंसा था। वे महात्मा गांधी के अनुयायी थे और गांधीजी के अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाया। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लाने के लिए अहिंसा को अपने मुख्य हथियार के रूप में प्रयोग किया।


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दी गई कविता के आधार पर पूछ गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। कविता चिडि़या को लाख समझाओ कि पिंजड़े के बाहर धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है, वहाँ हवा में उन्हें अपने जिस्म की गंध तक नहीं मिलेगी। यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है, पर पानी के लिए भटकना है, यहाँ कटोरी में भरा जल गटकना है। बाहर दाने का टोटा है, यहाँ चुग्गा मोटा है। बाहर बहेलिए का डर है, यहाँ निर्द्वंद्व कंठ-स्वर है। फिर भी चिडि़या मुक्ति का गाना गाएगी, मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी, पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी, हरसूँ ज़ोर लगाएगी और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी। 1. धरती को बहुत बड़ी और निर्मम क्यों कहा गया है? 2. पिंजरे के अंदर दाने-पानी की क्या व्यवस्था है? 3. कौन-सी मुश्किलों के बाद भी चिड़िया मुक्त होना चाहेगी? 4. चिड़िया मुक्ति के लिए किस तरह प्रयास करेगी? 5. पिंजरे में बंद चिड़िया कैसे उड़ पाएगी ?

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए – महात्मा निराले भगत की किस बात से खुश हुए? भगत को पारस देते समय महात्मा ने उससे क्या कहा? बनिए और भगत के बीच हुई बातचीत से भगत के स्वभाव के विषय में क्या पता चलता है? गाड़ियों के समय पर न पहुँचने पर बनिए ने भगत को क्या समझाया? इस कहानी से कैसे पता चलता है कि समय अनमोल है?

नैतिक शिक्षा से क्या अभिप्राय है?

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नैतिक शिक्षा का अभिप्राय व्यक्ति को सही और गलत के बीच अंतर करने की समझ विकसित करना और समाज में सदाचारपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देना है। यह शिक्षा केवल शैक्षणिक ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय मूल्यों, नैतिकता, और सामाजिक जिम्मेदारियों का समावेश होता है। नैतिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों और युवाओं में ईमानदारी, सहानुभूति, करुणा, और अनुशासन जैसे गुणों को विकसित करना है।

नैतिक शिक्षा से व्यक्ति में अपने और दूसरों के प्रति जिम्मेदारी की भावना उत्पन्न होती है। यह उन्हें समाज में एक सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करती है। इसके माध्यम से लोग अपने कार्यों के परिणामों के बारे में जागरूक होते हैं और समाज के लिए हानिकारक गतिविधियों से बचते हैं। नैतिक शिक्षा के द्वारा समाज में आपसी सहयोग, प्रेम, और सद्भावना का वातावरण बनता है।

आज के समय में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता और भी बढ़ गई है, जब समाज में नैतिक मूल्यों का पतन होता दिख रहा है। तकनीकी विकास और भौतिकवाद की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच, नैतिक शिक्षा व्यक्ति को सच्ची खुशी और संतोष का मार्ग दिखाती है। विद्यालयों और परिवारों में नैतिक शिक्षा को प्रोत्साहित करना आवश्यक है ताकि भविष्य में हम एक अच्छे और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण कर सकें।

इस प्रकार, नैतिक शिक्षा व्यक्ति और समाज दोनों के विकास के लिए आवश्यक है। यह न केवल व्यक्तियों को बेहतर इंसान बनाती है बल्कि समाज को भी एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।


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महिलाओं को परेशान करने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ शिकायत करते हुए थानाध्यक्ष को पत्र लिखिए।

औपचारिक पत्र

असामाजिक तत्वों के खिलाफ थानाध्यक्ष को पत्र

 

दिनांक : 12 जुलाई 2024

सेवा में,
श्रीमान थानाध्यक्ष महोदय,
जनविहार थाना क्षेत्र,
राजनगर (हिम प्रदेश)।

विषय: महिलाओं को परेशान करने वाले असामाजिक तत्वों के विरुद्ध शिकायत

माननीय थानाध्यक्ष महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं रूपनगर थाना क्षेत्र की निवासी हूँ। मैं आपका ध्यान हमारे क्षेत्र में बढ़ती हुई एक गंभीर समस्या की ओर आकर्षित करना चाहती हूँ।

पिछले कुछ महीनों से, हमारे इलाके में कुछ असामाजिक तत्व महिलाओं को लगातार परेशान कर रहे हैं। यह परेशानी विशेषकर शाम के समय और सुनसान इलाकों में ज्यादा होती है। ये लोग अश्लील टिप्पणियाँ करते हैं, महिलाओं का पीछा करते हैं, और कभी-कभी शारीरिक छेड़छाड़ की कोशिश भी करते हैं।

इस स्थिति के कारण महिलाएँ और युवतियाँ असुरक्षित महसूस कर रही हैं और उनकी आवाजाही पर प्रतिबंध लग रहा है। कई माता-पिता अपनी बेटियों को शाम के बाद बाहर जाने से मना कर रहे हैं, जो कि उनकी शैक्षिक और व्यावसायिक गतिविधियों को प्रभावित कर रहा है।

मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि इस मामले को गंभीरता से लें और निम्नलिखित कदम उठाएँ:
1. इस क्षेत्र में पुलिस गश्त बढ़ाई जाए, विशेषकर शाम और रात के समय।
2. सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाई जाए और उनकी नियमित निगरानी की जाए।
3. महिला सुरक्षा के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया जाए।
4. स्थानीय युवाओं और समुदाय के सदस्यों को जागरूक किया जाए और उन्हें इस समस्या से निपटने में शामिल किया जाए।

आशा है आप इस संबंध में त्वरित कार्रवाई करते हुए हम निवासियों को राहत प्रदान करेंगे।

धन्यवाद।

भवदीया,
रजनी शर्मा,
जनविहार कॉलोनी,
राजनगर (हिम प्रदेश) ।


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अपने मोहल्ले से आवागमन की सुविधा नहीं है इसके लिए हरियाणा रोडवेज को पत्र लिखो।

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‘प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ’ इस विषय पर एक अनुच्छेद लिखें।

अनुच्छेद

प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ

 

प्राकृतिक संकट और आपदाएं मानव जीवन के लिए बड़ी चुनौतियाँ हैं। ये अचानक आती हैं और अपने पीछे विनाश का एक लंबा सिलसिला छोड़ जाती हैं। बाढ़, सूखा, भूकंप, चक्रवात, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं न केवल जान-माल का नुकसान करती हैं बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं।

इन आपदाओं से निपटने के लिए हमें पूर्व तैयारी और सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। सरकार द्वारा आपदा प्रबंधन योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन नागरिकों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हमें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना चाहिए और पर्यावरण संतुलन बनाए रखना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। ऐसे में वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पूर्व चेतावनी प्रणालियों का विकास, मजबूत बुनियादी ढांचे का निर्माण और आपदा प्रतिरोधी भवन निर्माण जैसे उपाय आवश्यक हैं।

समुदाय स्तर पर जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए ताकि लोग आपदा के समय सही कदम उठा सकें। अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई आपदाएं सीमाओं को पार कर जाती हैं।

अंत में, हमें यह समझना होगा कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर ही हम इन चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना होगा ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और स्थिर ग्रह छोड़ सकें।


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किस बात से पता चलता है कि सुंदर पिचाई की स्मरण शक्ति तेज थी?

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सुंदर पिचाई सुंदर पिचाई की स्मरण शक्ति बचपन से ही बहुत ही बेहद तेज थी। इस बात का पता उनके जीवन में घटित उस घटना से चलता है कि जब सुंदर पिचाई स्कूल में पढ़ रहे थे। एक बार सुंदर पिचाई के घर उनके एक पारिवारिक मित्र मिलने आए थे। सुंदर पिचाई के भाई को उनके पारिवारिक मित्र ने अपना फोन नंबर दिया। उनके भाई श्रीनिवासन ने अपनी पत्नी को वह नंबर लिख लेने के लिए कहा, लेकिन उनकी पत्नी वह नंबर लिखना भूल गई। उस समय सुंदर पिचाई भी वहाँ पर थे।

कुछ महीनों के बाद जब सुंदर पिचाई के भाई को उस परिचित के फोन नंबर की जरूरत पड़ी तो उन्होंने अपनी पत्नी से फोन नंबर को मांगा तो पत्नी ने बताया कि वह नंबर लिखना भूल गई थी, लेकिन सुंदर पिचाई को वह नंबर याद था और भाई के पूछने पर सुंदर पिचाई ने तुरंत वह फोन नंबर बता दिया। इस तरह उन्हें अपने हर बात याद रहती थी और उनकी स्मरण शक्ति बचपन से ही बहुत तेज थी। यह घटना उनकी तीव्र स्मरण शक्ति के बारे में बताती है।


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