कौन सा तत्व आधुनिक राजनीतिक चिंतन की विशेषता नहीं है? (1) राष्ट्रवाद (2) लौकिकवाद (3) सार्वभौमवाद (4) प्रभुसत्ताधारी राज्य

सही विकल्प होगा…

3) सार्वभौमवाद

 

विस्तृत विवरण

इन विकल्पों में से, सार्वभौमवाद आधुनिक राजनीतिक चिंतन की विशेषता नहीं है।
आधुनिक राजनीतिक चिंतन की मुख्य विशेषताएँ हैं:

1. राष्ट्रवाद: राष्ट्र की एकता और पहचान पर जोर।
2. लौकिकवाद: धर्म और राज्य के बीच अलगाव।
3. प्रभुसत्ताधारी राज्य: राज्य की सर्वोच्च सत्ता का सिद्धांत।

सार्वभौमवाद एक ऐसा विचार है जो किसी एक विश्वव्यापी सत्ता या शासन व्यवस्था की कल्पना करता है, जो आधुनिक राज्य व्यवस्था के विपरीत है। आधुनिक राजनीतिक चिंतन में स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र-राज्यों पर अधिक जोर दिया जाता है।

आधुनिक राजनीतिक चिंतन मे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के शासन और सरकार की सीमित भूमिका पर जोर दिया जाता है। इसमें नागरिकों की भागीदारी और प्रतिनिधि सरकार के माध्यम से शासन का सिद्धांत को महत्व दिया जाता है।

आधुनिक राजनीतिक चिंतन की अन्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं…

  • सभी नागरिकों के लिए कानूनी और राजनीतिक समानता का विचार।
  • व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों की मान्यता और संरक्षण।
  • सरकार और नागरिकों के बीच एक समझौते के रूप में राज्य का विचार।
  • सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का बंटवारा।
  • आर्थिक स्वतंत्रता और निजी संपत्ति के अधिकार पर जोर।
  • तर्क और प्रमाण पर आधारित नीति निर्माण।
  • राष्ट्र-राज्यों के बीच कूटनीति और सहयोग का महत्व।
  • समाज में संसाधनों और अवसरों के न्यायसंगत वितरण का विचार।

ये सिद्धांत आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाओं और विचारधाराओं के आधार हैं। हालांकि, विभिन्न देशों और संस्कृतियों में इनका कार्यान्वयन और व्याख्या अलग-अलग हो सकती है।

सार्वभौमवाद (Universalism) एक दार्शनिक और नैतिक दृष्टिकोण है जो मानता है कि कुछ विचार, मूल्य या नैतिक सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं। यह विचारधारा विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाती है, जैसे दर्शन, धर्म, राजनीति और नैतिकता। सार्वभौमवाद मानता है कि कुछ मूल्य और नैतिक सिद्धांत सभी मनुष्यों पर लागू होते हैं, चाहे उनकी संस्कृति या पृष्ठभूमि कुछ भी हो। सार्वभौमिक मानवाधिकारों का विचार इसी दर्शन से उपजा है। कुछ सार्वभौमवादी एक विश्व सरकार या वैश्विक संस्थाओं की वकालत करते हैं जो सभी देशों पर लागू हों। कई धर्म अपने सिद्धांतों को सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

सार्वभौमवाद  मानता है कि नैतिक सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं और सांस्कृतिक सापेक्षवाद का विरोध करता है।

आधुनिक राजनीतिक चिंतन में, जबकि कुछ सार्वभौमिक मूल्यों (जैसे मानवाधिकार) को स्वीकार किया जाता है, सार्वभौमवाद की अवधारणा को पूरी तरह से नहीं अपनाया गया है। इसके बजाय, राष्ट्र-राज्य प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर अधिक जोर दिया जाता है।


Related questions

मार्क्स की विचारधारा का अंतिम लक्ष्य है…? (1) जाति विहीन समाज (2) वर्ग विहीन समाज (3) वर्ग विहीन व राज्य विहीन समाज (4) इनमें से कोई नहीं

व्यक्ति के स्व-विषयक कार्यों में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए यह विचार किसका है? (1) बेथम (2) ग्रीन (3) जे.एस. मिल (4) लॉक

Related Questions

Comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Recent Questions