‘गिरी का गौरव गाकर झर-झर’ इस पंक्ति में कौन सा अलंकार है?

गिरी का गौरव गाकर झर-झर में ‘अनुप्रास अलंकार’ है।

गिरी का गौरव गाकर झर-झर

अंलकार का नाम : अनुप्रास अलंकार

स्पष्टीकरण :

इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ‘ग’ वर्ण की तीन बार आवृत्ति हो रही है। इसके अतिरिक्त यहाँ पर ‘झर-झर’ ये शब्द भी प्रयुक्त हुआ है।

‘अनुप्रास अलंकार’ की परिभाषा के अनुसार जब किसी काव्य पंक्ति में किसी शब्द के प्रथम वर्ण की एक से अधिक बार पुनरावृति हो तो वहां पर ‘अनुप्रास अलंकार’ प्रकट होता है। यहाँ पर ‘ग’ वर्ण इसी नियम की पुष्टि करता है।

दूसरे नियम के अनुसार जब किसी समान शब्द की किसी काव्य पंक्ति में अनेक बार समान अर्थ में पुनरावृति हो तो भी वहाँ पर ‘अनुप्रास अलंकार’ प्रकट होता है। यहाँ पर ‘झऱ-झर’ शब्द युग्म इसी नियम की पुष्टि करता है।

अलंकार से तात्पर्य काव्य के सौंदर्य को बढ़ाने वाले शब्दों से होता है। अलंकार का काव्य के लिए आभूषण की तरह कार्य करते हैं। जिस तरह मानव के लिए आभूषण उसका सौंदर्य बढ़ाने का कार्य करते हैं। उसी तरह अलंकार काव्य के सौंदर्य को बढ़ाने का कार्य करते हैं, इसीलिए अलंकारों को काव्य का आभूषण कहा जाता है।


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