‘परिस्थिति के सामने हार न मानकर उसे सहर्ष स्वीकार करने में ही जीवन की सार्थकता है।’ स्पष्ट कीजिए। (पाठ – अपराजेय)

‘परिस्थिति के आगे हार ना मानकर उसे सहर्ष स्वीकार करने में ही जीवन की सार्थकता है।’ इस पंक्ति के माध्यम से जीवन जीने की कला के विषय में प्रेरणा मिलती है। जीवन में सुख और दुख का चक्र जीवन का आवश्यक पहलू हैष जीवन में सुख और दुखों का आना-जाना लगा रहता है। मनुष्य को सुख और दुःख दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।

जिस तरह कोई भी व्यक्ति सुख के समय को आनंदित होकर जीता है, उसी प्रकार उसे दुख के समय को भी सच्चाई से स्वीकार करना चाहिए उसे यह समझा लेना चाहिए कि यदि सुख है तो वह स्थायी नहीं है, कभी ना कभी तो दुःख भी आ सकता है और दुख है, तो वह भी स्थायी नहीं है। दुःख के बाद सुख आना ही है।

मनुष्य को अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य न खोने की कला सीखनी चाहिए। उसे बेहद सूझबूझ से अपनी जीवन की परेशानियों को सुलझाने का प्रयत्न करना चाहिए।

कभी-कभी जीवन में ऐसी विकट परिस्थितियों आ जाती है कि व्यक्ति जीवन के प्रति अपनी आशा को छोड़ देता है लेकिन उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। उसे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपने जीवन की आशा को छोड़ना नहीं चाहिए और परिस्थितियों से लड़कर संघर्ष करते हुए  स्वयं को सक्षम बनाना चाहिए। जीवन के संघर्षों से लड़कर जीवन जीने में ही जीवन की सार्थकता है, यही इस पंक्ति के माध्यम से स्पष्ट हुआ है।

विशेष

‘अपराजेय’ पाठ जो अमरनाथ नाम के जीवटशील व्यक्ति की जीवनगाथा है। इस पाठ में अमरनाथ के जीवन की जीवटता का परिचय दिया गया है। उन्होंने अपने जीवन में आने वाले अनेक कठिनाइयों से लड़ते हुए अपने जीवन को पूरी सार्थकता से दिया। उन्हें अपने शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पैर और हाथ करवाने पड़े, अपनी आवाज खोनी पड़ी, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने जीवन में हार नहीं मानी और अपने जीवन को सामान्य रूप से जीने की कोशिश लगातार जारी रखी।


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