‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ बेरहम महानगर में धीरे-धीरे टूटते हुए परिवार की करुण गाथा है। सोदाहरण पुष्टि कीजिए ।

‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ उपन्यास की समीक्षा

‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ हिंदी के जाने-माने उपन्यासकार और कहानीकार ‘कमलेश्वर’ द्वारा लिखित एक उपन्यास है। ये उपन्यास रोजगार के लिए महानगरों के आकर्षण में खिंचे चले आए लोग और महानगर की समस्याओं में उलझकर महानगरों के प्रति घटते उनके मोहभंग को दर्शाती एक कहानी है।

उपन्यास की कथावस्तु एक मध्यमवर्गीय परिवार की है। परिवार का मुखिया श्यामलाल है, जो रोजगार की तलाश में अपने गाँव को छोड़कर दिल्ली जैसे बड़े महानगर में आता है। यहाँ पर उसकी एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी लग जाती है, लेकिन कुछ समय बाद में ट्रांसपोर्ट कंपनी बंद होने के कारण उसे नौकरी छोड़नी पड़ती है। ऐसी स्थिति में घर परिवार के सामने जीवन-यापन की समस्या खड़ी हो जाती है। श्यामलाल गाँव से रोजगार के लिए अपने परिवार सहित दिल्ली महानगर में आया था, लेकिन यहां पर उसका रोजगार कुछ समय बाद ही छूट गया। अब महानगरीय खर्चो की भरपाई कैसे करें। यही आर्थिक समस्या उसके सामने खड़ी रहती है। वह आर्थिक उपार्जन की जद्दोजहद में काम को ढूंढता रहता है।

श्यामलाल की दो बेटियां तारा और समीरा है तो एक बेटा बीरन है। श्यामलाल की बेटियां बड़ी हो रही हैं और वह अपने पिता का हाथ बंटाने के लिए काम करना चाहती हैं, लेकिन श्यामलाल पुराने विचारों वाला व्यक्ति है। उसे अपने घर की स्त्रियों का काम बाहर काम करना पसंद नहीं। अंत में घर की जरूरत के आगे समझौता करते हुए श्यामलाल अपनी बेटी तारा को पैटर्न हाउस में काम करने की अनुमति दे देता है। यह पैटर्न हाउस हरबंस का है। अब तारा पर ही घर की सारी जिम्मेदारी आ जाती है।

श्यामलाल को कोई काम नहीं मिलता और वह यूं ही समय काट रहा होता है। श्यामलाल को अपनी बेटियों से अधिक उम्मीद नहीं थी। वह दकियानूसी सोच वाला पिता था जो अपने बेटियों के अपेक्षा अपने बेटों से अधिक उम्मीद रखते हैं। उसे अपना एकमात्र सहारा अपना पुत्र बीरन ही नजर आ रहा था। बीरन 12वीं परीक्षा पास करने के बाद सेना में भर्ती हो जाता है और ट्रेनिंग के लिए दिल्ली से दूर चला जाता है। नौकरी लगने के कुछ माह तक वह घर के खर्चे के लिए मनी ऑर्डर भेज देता है, लेकिन फिर उसका मनी ऑर्डर आना बंद हो जाता है। ऐसी स्थिति में अब घर के खर्चों को देखने की सारी जिम्मेदारी श्यामलाल के हाथ में आ गई थी।

उसकी बड़ी बेटी तारा भी उसी व्यक्ति हरबंस से विवाह कर लेती है, जिसके यहाँ वह काम करती है। श्यामलाल ऐसा नहीं चाहता था, लेकिन उसे मजबूरी में उसकी मंजूरी देनी पड़ती है। उधर बीरन का जहाज समुद्र में खो गया है और वह अब कभी ना लौट कर आएगा, यह बात श्यामलाल को पता चल चुकी है, लेकिन वह इस सच्चाई को स्वीकारना नहीं चाहता। बीरन का मनीआर्डर बंद होने के बाद अब घर के खर्चों के प्रबंध की सारी जिम्मेदारी श्यामलाल के पास, फिर तारा के आ जाती है।

श्याम लाल की छोटी बेटी समीरा नर्स की ट्रेनिंग करने लगती है। श्यामलाल को घर के खर्च के लिए फैक्ट्री में दरबार की नौकरी करनी पड़ती है। इस तरह श्यामलाल का पूरा परिवार महानगरीय जनसमुद्र में खो जाता है। महानगरी खर्चों और महानगरीय जीवन शैली के आगे उसका पूरा परिवार बिखर जाता है। यही व्यथा इस उपन्यास के माध्यम से व्यक्त की गई है।

कमलेश्वर का यह उपन्यास महानगरों में टूटे हुए परिवारों की कहानी की करुण गाथा को ही प्रकट करता है। श्यामलाल की कहानी को भले ही इस उपन्यास का आधार बनाया गया हो, लेकिन यह हर महानगरीय मध्यम वर्गीय परिवार की करुण गाथा है। महानगर के भारी भरकम खर्चों के बोझ तले मध्यमवर्गीय परिवार के हर सदस्य को काम करने के लिए विवश होना पड़ता है और इसी बेरहम महानगर के भंवरजाल में फंसकर परिवारों टूट जाते हैं। परिवार के सदस्यों को रोजगार के बेहतर अवसर के लिए अलग-अलग रास्ते अपनाने पड़ते हैं, यही महानगरों की सच्चाई है।

अंत में…

कमलेश्वर जी ने ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’ उपन्यास के माध्यम से श्यामलाल के परिवार की करुण गाथा को आधार बनाकर जिस कथानक की रचना की है, वह एक प्रतीक है। यह कहानी केवल श्यामलाल की कहानी ही नहीं, बल्कि हर उस मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है, जो महानगर में बेहतर जीवन की तलाश में आते हैं और फिर बेरहम महानगरों की कठोर और बनावटी जीवन-शैली में उलझ कर रह जाते हैं।

परिवार के जो सदस्य छोटे गाँव-कस्बों में मिलजुल कर रहते थे, इन महानगरों में आकर उनके सोच विचार बदल जाते हैं अथवा उन्हें विवश होकर अपने रास्तों और विचारों को बदलना पड़ता है। किसी जद्दोजहद में परिवार टूट कर बिखर जाते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि समुद्र में खोया हुआ आदमी महानगर में धीरे-धीरे टूटे हुए परिवार की करुण गाथा है।


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