बिस्मिल ने अपनी माता जी के किन गुणों को अपनाया ?

‘बिस्मिल’ ने अपनी माँ के सदैव सत्य का पालन करने, शत्रु को भी क्षमा करने, किसी भी परिस्थिति में शत्रु को प्राणदंड न देने अथवा शत्रु का किसी भी तरह से अहित न करने के गुण को अपनाया। उन्होंने अपनी माँ के पढ़ने के शौक के गुण को भी अपनाया। बिस्मिल ने अपनी माँ के अच्छे विचारों को सदैव अपनाया। उन्होंने अपनी माँ के कठिन से कठिन संकट में भी धैर्य न खोने के गुना को गुण को अपनाया। जीवन को भोग-विलास एवं ऐश्वर्य के बिना सदा तरीके से जीने के गुण को अपनाया।

‘मेरी माँ’ आत्मकथा जो प्रसिद्ध क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा लिखी गई है, उसमें उन्होंने अपनी माँ के बारे में लिखते हुए कहा है कि उनकी माँ का जब केवल 11 वर्ष की आयु में जब विवाह हुआ था तो वह बेहद सीधी-सादी ग्रामीण और अशिक्षित कन्या थी, लेकिन उनके अंदर पढ़ने की रुचि थी। इसी कारण उन्होंने अपने आसपास की सखियों आदि की सहायता से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया और धीरे-धीरे उन्होंने हिंदी पढ़ना सीख लिया। इसके बाद वह हिंदी की पुस्तक पढ़ने लगीं। इस तरह वह पुस्तक प्रेमी बनी। उनके इसी गुण का असर उनके पुत्र यानी राम प्रसाद बिस्मिल पर भी पड़ा। राम प्रसाद बिस्मिल की माँ बेहद सीधी-सादी सात्विक विचारों वाली महिला थी, जिन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल को सदैव जीवन में अच्छा कार्य करने की शिक्षा दी। उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल से प्रतिज्ञा ली थी कि वह अपने किसी भी शत्रु को कभी भी प्राण-दंड नहीं देंगे अर्थात शत्रु के जीवन को हानि नहीं पहुंचाएंगे। चाहे कैसी भी स्थिति क्यों ना हो उन्होंने अपने बेटे को सदैव सत्य के मार्ग पर चलने की शिक्षा भी दी थी।


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