“अगर तुम्हें कोई ज़्यादा दे तो अवश्य चले जाओ जाओ। मैं तनख्वाह नहीं बढ़ाऊँगा।” |
a) उपरोक्त कथन का वक्ता बाबू जगत सिंह है, जो पेशे से इंजीनियर हैं। वह अपने नौकर रसीला से यह बात कह रहे हैं। समाज में यूँ तो वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के तौर पर जाने जाते हैं, लेकिन वह एक रिश्वतखोर व्यक्ति भी हैं और उनका स्वभाव बेहद कठोर है। उनका नौकर रसीला उनसे वेतन बढ़ाने की प्रार्थना कर रहा है। इसीलिए उसी संदर्भ में उन्होंने ये कथन कहा है। जब उसने अपना वेतन बढ़ाने की बात कही तो बाबू जगत सिंह ने बेहद कठोर स्वर में उसे यह कथन कहा।
b) इस कथन का श्रोता रसीला है। वह इंजीनियर बाबू जगत सिंह के यहाँ नौकर था। उसका वेतन केवल ₹10 था। उसके परिवार में बूढ़े पिता, उसकी पत्नी और उसके तीन बच्चे थे। सभी के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उसके ऊपर ही था। ₹10 में उसका गुजारा नहीं हो पता था, इसलिए उसने इंजीनियर बाबू जगत सिंह से वेतन बढ़ाने की प्रार्थना की थी।
c) ‘बात अठन्नी की’ कहानी का मुख्य उद्देश्य समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों के पाखंड को उजागर करना है। समाज में ये तथाकथित प्रतिष्ठित और सम्माननीय लोग अंदर से कितने संकीर्ण हृदय वाले होते हैं, यही इस कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास किया गया है।
लेखक ने कहानी के माध्यम से यह बताया है कि यह सम्माननीय लोग बाहर से ईमानदार और अच्छे होने का ढोंग करते हैं, लेकिन ये खुद संकीर्ण हृदय वाले और बेईमान होते हैं। यह अपने गरीब नौकर की मामूली सा वेतन बढ़ाने में भी संकोच करते हैं और केवल अठन्नी कैसे मामूली रकम के लिए नौकर को जेल भिजवाने से भी नहीं चूकते। लेकिन खुद हजारों रुपये की रिश्वत लेते हैं। अदालत भी गरीबों के साथ न्याय नही करती।
इस कहानी के माध्यम से ये बताने का प्रयास किया गया है कि हमारी सामाजिक और न्यायिक व्यवस्था केवल गरीब और कमजोर लोगों के अपराध पर ही सजा दिलवा पाती है। बड़े चोरों और बड़े अपराधी आराम से बच निकलते हैं। ‘बात अठन्नी की’ जैसी मामूली रकम के हेरफेर के लिए नौकर रसीला को 6 महीने की कठोर सजा हो जाती है, लेकिन हजारों रुपए की रिश्वत लेने वाले बाबू जगतसिंह जैसे तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों का कुछ नहीं होता।
‘बात आठन्नी की’ सुदर्शन द्वारा लिखी गई एक सामाजिक पृष्ठभूमि की कहानी है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने समाज में बैठे तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों के पाखंड को उजागर किया है। कहानी के मुख्य पात्रों में दो नौकर रसीला और रमजान हैं तो वही बाबू जगत सिंह भी कहानी के प्रमुख पात्र हैं।
बाबू जगत सिंह इंजीनियर हैं। रसीना उनके यहां नौकर है। एक बार उसे अपने परिवार के पास कुछ पैसे भेजने की जरूरत पड़ी तो वह अपने मालिक से वेतन बढ़ाने की बात करता है लेकिन उसका मालिक बाबू जगत सिंह उसका वेतन बढ़ाने से इनकार कर देते हैं। उसे एडवांस पैसे भी नही देते। रसीला अपने दोस्त रमजान जोकि पड़ोस में ही जज साहब के यहां नौकर था, उससे कुछ पैसे उधार लेता है। उन पैसों को वह अपने गाँव भेज कर अपनी समस्या को सुलझाता है। धीरे-धीरे वह रमजान के लगभग सभी पैसे चुका देता है, केवल अठन्नी की रकम रह जाती है।
एक बार बाबू जगत सिंह उसे कुछ सामान लाने के लिए पैसे देते हैं तो रसीला उनमें से अठन्नी बचा लेता है और उसे रमजान को दे देता है ताकि उसका पूरा कर्ज चुक जाए। बाबू जगत सिंह उसकी एक छोटी सी चोरी को पकड़ लेते हैं और उसे पुलिस के हवाले कर देते हैं। जहां पर अदालत भी उसके खिलाफ फैसला सुनाती है और उसे 6 महीने की सजा होती है।
बाबू जगत सिंह अठन्नी जैसी मामूली रकम के लिए भी उसको क्षमा नहीं करते और अपने धनबल और जज के साथ अपनी दोस्ती के कारण उसे 6 महीने की सजा दिलवा देते हैं। जबकि बाबू जगत सिंह और जज दोनों बड़े रिश्वतखोर हैं और हजारों रुपए की रिश्वत लेते हैं, लेकिन उन लोगों का कुछ नहीं होता ।
इस कहानी के माध्यम से यही बताने का प्रयास किया है कि समाज में केवल छोटे और गरीब चोरों को ही सजा हो पाती है, बड़े-बड़े सफेदपोश चोर समाज में खुलेआम घूमते रहते हैं। उनका कोई कुछ नहीं कर पाता।