‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी में कहानीकार कौन सा संदेश देते हैं? (हिंसा परमो धर्मः – मुंशी प्रेमचंद)

‘हिंसा परमो धर्मः’ कहानी के माध्यम से लेखक मुंशी प्रेमचंद ने यह संदेश देने का प्रयत्न किया है कि अहिंसा की बात करने वाले सभी धर्मों में छोटी सी बात पर हिंसा करना बेहद सामान्य बातें है। धार्मिक लोग जरा-जरा सी बात पर हिंसक हो उठते हैं। सभी धर्मों में अहिंसा की बातों को बड़े जोर-जोर से उठाया जाता है, लेकिन धर्म का पालन करने लोग और धर्माधीश छोटी-छोटी बातों पर हिंसक हो जाते हैं।

लेखक ने कहानी के माध्यम से यही संदेश दिया है कि सभी धर्म की मूल प्रवृत्ति हिंसा से भरी होती है। लेखक के अनुसार सभी धर्मं में सूत्र वाक्य ‘अहिंसा परमो धर्मः’ नही बल्कि ‘हिंसा परमो धर्मः’ होना चाहिए। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने धर्म में पहले पाखंड और दुराचार को भी उजागर करके धर्म की वास्तविकता को समझने का प्रतीक संदेश दिया है।

विशेष 

‘हिंसा परमो धर्मः’ कहानी को मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है। इस कहानी का मुख्य जामिद नाम का एक सीधा-सादा ग्रामीण व्यक्ति है। जो गाँव के अपने सीधे-सरल जीवन को छोड़कर शहर चला आता है। शहर में आकर वह हिंदू और इस्लाम दोनों धर्मों में धर्म के नाम पर हो रही हिंसा, पाखंड और दुराचार को देखता है। वह देखत है कि धर्म के नाम पर हिंदू और मुसलमान दोनों आपस में लड़ते हैं तो उसे अपने गाँव का सीधा-सरल जीवन याद आ जाता है, जहाँ पर पर धर्म के नाम पर ये सब नही होता था। वह वापस अपने गाँव लौट जाता है।


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