पारिवारिक जीवन पालन करने वाले बालगोबिन भगत को साधु कहना कहाँ तक तर्क-सम्मत है?

पारिवारिक जीवन पालन करने वाले बालगोबिन भगत को साधु कहना बिल्कुल तर्क-सम्मत है। साधु से तात्पर्य हाथ में कमंडल लेकर भगवा वस्त्र धारण कर जगह-जगह भटकने वाले व्यक्ति से नहीं होता। साधु से तात्पर्य सज्जन व्यक्ति से होता है, जिसका आचरण शुद्ध हो, वो सात्विक हो।

साधु कभी दूसरे के धन पर बुरी नजर नहीं रखता। साधु हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार रहता है, वह कभी झूठ नहीं बोलता और हमेशा ईश्वर का चिंतन मनन करता रहता है।बालगोबिन भगत पारिवारिक जीवन का पालन करने वाले एक व्यक्ति होने के साथ-साथ इन सभी गुणों से युक्त थे। वह हमेशा सच बोलते थे और कभी भी किसी दूसरे की वस्तु या धन पर कोई नजर नहीं रखते थे। वह किसी की वस्तु को बिना किसी कारण के नही छूते थे।

बालगोबिन भगत हमेशा ईश्वर का चिंतन करते रहते थे। सुबह सुबह उठकर ईश्वर के भजन गाते संध्या के समय भजन गाते। इसके अलावा उनके जो भी आचरण था, वह सज्जन व्यक्तियों वाला था। इसी कारण पारिवारिक जीवन का पालन करने वाले बालगोबिन भगत को साधु कहना बिल्कुल तर्क-सम्मत है।

संदर्भ पाठ :
‘बालगोबिन भगत’ पाठ रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखा गया है, जिसमें उन्होंने पारिवारिक जीवन का पालन करने वाले व्यक्ति का वर्णन किया है, जो पारिवारिक व्यक्ति होते हुए भी साधु और सज्जनों जैसा आचरण करते थे।


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