कैलाश गौतम की कविता ‘नौरंगिया’ की व्याख्या कीजिए।

नौरंगिया कविता की संदर्भ सहित व्याख्या

संदर्भ : ‘नौरंगिया’ कविता कवि कैलाश गौतम द्वारा रचित कविता है। इस कविता में उन्होंने एक ग्रामीण स्त्री ‘नौरंगिया’ की जीवन दशा का वर्णन किया है। नौरंगिया सभी ग्रामीण स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है। वह उस कमजोर वर्ग का भी प्रतिनित्व करती है, जो समाज में सांमती वर्ग के लोगों द्वारा शोषण का शिकार है।

व्याख्या

देवी-देवता नहीं मानती, छक्का-पंजा नहीं जानती
ताकतवर से लोहा लेती, अपने बूते करती खेती,
मरद निखट्टू जनख़ा जोइला, लाल न होता ऐसा कोयला,
उसको भी वह शान से जीती, संग-संग खाती, संग-संग पीती
गाँव गली की चर्चा में वह सुर्ख़ी-सी अख़बार की है
नौरंगिया गंगा पार की है ।

व्याख्या : कवि कहते हैं कि नौरंगिया देवी-देवता अर्थात किसी भी भगवान को नहीं मानती। वह अपने कर्म में विश्वास रखने वाली एक कर्मठ स्त्री है। वह एक निष्कपट स्त्री है और किसी भी तरह के छल-कपट-षड्यंत्र से दूर रहती है। वह एक जुझारू और साहसी स्त्री है, जो ताकतवर सामंतवर्गी लोगों जैसे कि जमींदार, महाजन, ठेकेदार आदि से भी नहीं डरती और उनका डटकर सामना करती है।

नौरंगिया अपने बूते पर खेती करती है यानी वह एक परिश्रमी स्त्री है और अपने दम पर परिश्रम कर कर अपना पेट पालती है। नौरंगिया का पति एकदम कामचोर है। वह कोई कार्य नहीं करताष उसका रंग कोयले की तरह काला है। इस सबके बावजूद नौरंगिया उसके साथ हंसी-खुशी रहती है और उसके साथ अपना जीवन हंसी-खुशी निर्वाह कर रही है। नौरंगिया के कर्मठ, जीवट और परिश्रमी स्वभाव के कारण उसके गाँव की हर गली में उसकी चर्चा रहती है। सब लोग उसके बारे में बातें करते हैं। वह गंगा पार के एक गाँव में रहती है।

कसी देह औ’ भरी जवानी शीशे के साँचे में पानी
सिहरन पहने हुए अमोले काला भँवरा मुँह पर डोले
सौ-सौ पानी रंग धुले हैं, कहने को कुछ होठ खुले हैं
अद्भुत है ईश्वर की रचना, सबसे बड़ी चुनौती बचना
जैसी नीयत लेखपाल की वैसी ठेकेदार की है ।
नौरंगिया गंगा पार की है ।

व्याख्या : कवि नौरंगिया के शारीरिक बनावट के बारे में बताते हुए कहते हैं कि नौरंगिया एक जवान स्त्री है। उसका शरीर बेहद गठीला और सुंदर है। अपनी जवानी में उसका शरीर शीशे के सांचे में पानी के जैसा दिखाई देता है। उसकी सुंदर माथे पर उसके काले बालों की लटें ऐसी दिखाई देती है, जैसे काला भंवरा मुँह पर डोल रहा हो। उसके शरीर का रंग एकदम साफ है और ऐसे लग रहा है कि उसके शरीर को 100 बार धोया गया हो, जिसका कारण शरीर एकदम चमकता रहता है। उसको भगवान ने सुंदर शरीर दिया है। उसका यह सुंदर शरीर ही उसके लिए अभिशाप बन गया है। उसकी सुंदरता के कारण लिखा-पढ़ी करने वाला लेखपाल और गाँव का ठेकेदार भी उस पर बुरी नीयत रखते हैं।

जब देखो तब जाँगर पीटे, हार न माने काम घसीटे
जब तक जागे, तब तक भागे, काम के पीछे, काम के आगे
बिच्छू, गोंजर, साँप मारती, सुनती रहती विविध-भारती
बिल्कुल है लाठी सी सीधी, भोला चेहरा बोली मीठी
आँखों में जीवन के सपने तैय्यारी त्यौहार की है ।
नौरंगिया गंगा पार की है ।

व्याख्या : कवि कहते हैं कि नौरंगिया बेहद परिश्रमी स्त्री है और वह जब देखो हमेशा काम में मगन रहती है। वह कभी भी हार नहीं मानती और हर समय अपने काम में लगी रहती है। वह सुबह-सुबह उठते ही अपने खेतों की तरफ भागती है और अपने खेतों में जी-तोड़ मेहनत में लग जाती है। उसके खेतों में बिच्छू, गोंजर, सांप जैसे जीव जंतु अक्सर निकलते रहते हैं। वह उनसे भी नहीं डरती और उनको मार देती है या भगा देती है।

वह अपना काम करते-करते रेडियो पर विविध भारती सुनती रहती है, जिससे उसका काम में मन लगा रहता है। उसका शरीर लाठी के जैसा सीधा है। उसके चेहरे पर भोली-भाली मासूमियत है। उसकी वाणी भी बेहद मधुर है और वह सबसे मीठी बोली में बात करती है। उसकी आँखों में अपने सुंदर भविष्य के लिए सपने तैरते रहते हैं और वह अपने भविष्य और आने वाले तीज-त्योहारों की कल्पनाओं और तैयारियों में डूबी रहती है।

ढहती भीत पुरानी छाजन, पकी फ़सल तो खड़े महाजन
गिरवी गहना छुड़ा न पाती, मन मसोस फिर-फिर रह जाती
कब तक आख़िर कितना जूझे, कौन बताए किससे पूछे
जाने क्या-क्या टूटा-फूटा, लेकिन हँसना कभी न छूटा
पैरों में मंगनी की चप्पल, साड़ी नई उधार की है ।
नौरंगिया गंगा पार की है।

व्याख्या : कवि कहते हैं कि नौरंगिया जिस घर में रहती है, वह घर बेहद कमजोर हो चुका है। उस घर की दीवारें गिर चुकी हैं और पुराने छज्जे की हालत भी जर्जर है। नौरंगिया इस टूटे-फूटे घर में रहती है। वह अपने घर की मरम्मत तक नहीं कर पाती क्योंकि जब भी उसके खेतों की फसल पककर तैयार होती है तो महाजन उसके दरवाजे पर आकर खड़े हो जाते हैं और अपने पैसों की वसूली के नाम पर उसकी पकी हुई फसल को ले जाते हैं।

नौरंगिया ने संकट के समय अपने कुछ गहने गिरवी महाजनी के पास रख दिए थे, जिन्हें वह अभी तक छुड़वा नहीं पा रही है। वह अपना मन-मसोसकर रह जाती है। वह स्वयं से पूछती है कि वह आखिर कितना संघर्ष करे। वह अपने मन की बात किस से कहे। वह किसी से अपने मन की व्यथा को नहीं कह पाती। उसके वह सारे सपने टूट कर बिखर गए जो उसने अपने सुंदर भविष्य के लिए देखे थे।

इन सब विषम परिस्थितियों और दुखों के बावजूद भी नौरंगिया हमेशा खुश रहने का प्रयत्न है और वह निरंतर हँसती-मुस्कुराती रहती है। उसकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि उसके पास पहनने के लिए ढंग की चप्पलें तक नहीं है। वह मांगी हुई चप्पल को पहन कर अपना गुजारा करती है। उसके पास पहनने के लिए ढंग से कपड़े तक नहीं है। उसने जो साड़ी पहनी हुई है, वह भी उसने किसी से उधार लेकर पहनी है। इस तरह नौरंगिया की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है।

कैलाश गौतम

कैलाश गौतम हिंदी जनवादी कवि के रूप में मशहूर रहे हैं। अपनी कलम से वे भारत के ग्रामीण और आमजन से संबंधित कविताओं को उकेरने का कार्य करते रहे हैं। उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से अनेक सामाजिक व्यथा से भरी कविताओं की रचना की है।

उनका जन्म 1 अगस्त 1944 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी नमक जिले के चंदौली नामक गाँव में हुआ था। उन्होंने एमए और बीएड तक शिक्षा हासिल की।उन्होंने लंबे समय तक आकाशवाणी, इलाहाबाद में कार्य किया।

उनकी प्रसिद्ध रचना रचनाओं में सीली माचिस की तीलियां, कविता लौट, पड़ी, बिना कान का आदमी, सर पर आग, तीन चौथाई आन्हर, जोड़ा लाल जैसे काव्य संग्रहों के नाम प्रमुख हैं।

उनका निधन 9 अक्टूबर 2006 में हुआ।


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