‘युगे-युगे क्रांति’ नाटक में नई और पुरानी पीढ़ी का संघर्ष है। सोदाहरण स्पष्ट कीजिए ।

‘युगे युगे क्रांति’ नाटक हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार ‘विष्णु प्रभाकर’ द्वारा लिखा गया एक सामाजिक पृष्ठभूमि का नाटक है, जिसमें पारिवारिक संबंधों के ताने-बाने को आधार बनाकर उपन्यास की कथावस्तु रची गई है। विष्णु प्रभाकर बहुमुखी प्रतिभा वाले साहित्यकार थे। वह सामाजिक संबंधों पर आधारित उपन्यासों की रचना के सिद्धहस्त साहित्यकार रहे हैं। उन्होंने समाज में फैली सामाजिक कुरुतियों को आधार बनाकर अनेक उपन्यासों की रचना की है।

‘युगे-युगे क्रांति’ उपन्यास भी ऐसा ही एक उपन्यास है, जिसमें नई एवं पुरानी पीढ़ी के बीच उपजे संघर्ष को दर्शाया गया है। इस उपन्यास में दो पीढ़ियों नहीं बल्कि पांच पीढ़ियों के बीच संघर्ष के को दर्शाया गया है।

उपन्यास में घटित घटनाओं का कालक्रम 1875 से लेकर 1942 तक समय का दर्शाया गया जिसमें एक ही परिवारी की पाँच अलग-अलग पीढ़ियों का संघर्ष दिखाया गया है। उपन्यास में यह स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया है कि एक पीढ़ी यदि अपनी तात्कालिक सामाजिक मान्यता के विरुद्ध कोई नया एवं साहसिर कदम उठाती है तो वह तात्कालिक समय में भले ही क्रांतिकारी कदम माना जाता हो, लेकिन यही पीढ़ी जब पुरानी हो जाती है, तो उसका यही क्रांतिकारी कदम क्रांतिकारी नहीं रह जाता और उसके आगे की नई पीढ़ी उससे भी आगे बढ़कर नया साहसिक कदम उठाती है। तब वही पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी द्वारा उठाए गए साहसिक कदम का विरोध करती है, भले उस पुरानी पीढ़ी ने अपने समय में खुद कोई क्रांतिकारी कदम क्यो न उठाया हो।

इस तरह किसी भी पीढ़ी द्वारा उठाया गया कदम क्रांतिकारी कदम सर्वकालिक क्रांतिकारी कदम नहीं मान जाया जाता। नई पीढ़ियों ने हमेशा पुरानी पीढ़ियों की मान्यताओ का विरोध ही किया है। यह क्रम निरंतर चलता रहता है।

इस उपन्यास में लाल जी, कल्याण सिंह, प्यारेलाल, शारदा-विमल, प्रदीप, अनिरुद्ध जैसी पांच पीढ़ियो की क्रांतियों को दर्शाया गया है। पहली पीढ़ी की क्रांति 1875 के समयकाल की है, जब सामाजिक मान्यता के अनुसार अपनी पत्नी का मुख देखने तक को पाप माना जाता था। पत्नी को परिवार में परदे मे रहना पड़ता था। यहाँ तक कि उसका पति भी उसका मुख नही देख सकता था।

उस समय कल्याण सिंह स्वामी दयानंद के आधुनिक विचारों से प्रभावित है। वह अपनी पत्नी रामकली का मुँह देखना चाहता है, लेकिन उसके पिता लाल जी इसे कुल की मर्यादा का उल्लंघन मानते हैं। पत्नी भी मुँह दिखाने से मना करती है, लेकिन कल्याण सिंह इसे पाप नहीं मानता और वह अपनी पत्नी रामकली का मुँह देखता है। जब कल्याण सिंह के पिता लाल जी को यह बात पता चलती है तो वह अपने पिता के हाथों मारा खाता है. लेकिन वह इस सामाजिक कुरीति के विरुद्ध आगे बढ़कर एक क्रांतिकारी कदम उठाता है। इस तरह यह पहली क्रांति हुई।

दूसरी पीढ़ी की क्रांति 1901 में हुई, जब कल्याण सिंह का पुत्र प्यारेलाल अपनी मर्जी से एक विधवा स्त्री से विवाह करता है। कल्याण सिंह विधवा स्त्री से विवाह के समर्थन में नहीं है, लेकिन प्यारेलाल अपने पिता कल्याण सिंह की इच्छा के विरुद्ध क्रांतिकारी कदम उठाता है और विधवा से आर्य समाज मंदिर में विवाह कर लेता है। यहाँ तक कि वह अपने पिता कल्याण सिंह का घर तक छोड़ देता है।

तीसरी क्रांति 1921 में हुई जब प्यारे लाल की पुत्री शारदा प्यारेलाल की इच्छा के विरुद्ध जाकर अपनी मर्जी से विमल से अंतर्जातीय विवाह करती है। वह आधुनिक विचारों की समर्थक है।

चौथी क्रांति 1942 में तब हुई, जब विमल और शारदा का पुत्र प्रदीप अपनी मर्जी से जाकर जेनेट नामक ईसाई स्त्री से अंतर्धार्मिक विवाह कोर्ट में जाकर करता है।

पांचवी क्रांति और अधिक आधुनिक युग में घटती है, जब प्रदीप और जेनेट की संतान अनिरुद्ध विवाह के बंधन को ही नहीं मानती और वह बिना विवाह के ही साथ स्त्री पुरुष के साथ रहने को उचित मानती है। अनिरुद्ध अलग अलग स्त्रियों के साथ बिना विवाह के ही रहता है और वह कुछ समय बाद उससे संबंध विच्छेद भी कर लेता है, इस तरह वह विवाह को जरूरी नही मानता।

निष्कर्ष

‘युगे-युगे क्रांति’ उपन्यास में हर पीढ़ी दर पीढ़ी कोई ना कोई क्रांतिकारी कदम उठाने की घटना हुई है, लेकिन जिस भी पीढ़ी ने क्रांतिकारी कदम उठाया है, उसने अपनी अगली पीढ़ी द्वारा उठाए गए क्रांतिकारी कदम का विरोध ही किया है। इस तरह यह उपन्यास नई एवं पुरानी पीढ़ी के बीच उपजे संघर्ष की कथा को स्पष्ट करता है।


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