‘सच्ची तीर्थयात्रा’ कहानी क्या है। कहानी के आधार पर सच्ची तीर्थयात्रा कहानी का मूल भाव अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

‘सच्ची तीर्थयात्रा’ कहानी दो मित्रों की कहानी है। इस कहानी में दोनों मित्र अलग-अलग स्वभाव वाले मित्र हैं। एक मित्र बेहद परोपकारी तथा मानवता को प्राथमिकता देने वाला मित्र है तो दूसरा मित्र ईश्वर की दिखावटी भक्ति ही करता है। उसकी दीन-दुखियों की सेवा करने में कोई रुचि नहीं है।

यह कहानी एलिशा और एफिम नाम के दो वृद्ध मित्रों की कहानी है, जो रूस के एक गाँव में रहते हैं। दोनों बेहद घनिष्ठ मित्र थे। एक बार दोनों ने प्रसिद्ध तीर्थस्थान येरुशलम की तीर्थयात्रा करने का विचार किया। अपने इस विचार को पूरा करने के लिए दोनों अपने घर से येरुशलम की अपनी यात्रा के लिए निकल पड़े।

रास्ते में एक जगह विश्राम करने के लिए जब वह एक झोपड़ी में शरण लेने के लिए घुसे तो वहां झोपड़ी में रहने वाले तीनों प्राणियों की हालत बेहद खराब थी। वह लोग बीमार थे। एक महिला मरणासन्न अवस्था में झोपड़ी में पड़ी थी। एक बच्चा बेहद भूखा था।

उन लोगों की हालत देखकर एलिशा जो बेहद परोपकारी और मानवतावादी था, उसने वहीं पर रुककर उन तीनों की सेवा करने के विचार किया जबकि एफिम केवल दिखावटी ईश्वर भक्ति वाला व्यक्ति था उसने उन दीन-दुखियों की सेवा करने की जगह अपने आगे की तीर्थ यात्रा को पूरा करने का निश्चय किया और एलिशा को वहीं पर छोड़कर येरुशलम की अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ा।

यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि असहाय मानव तथा दीन-दुखियों की सेवा करना ही सबसे सच्ची तीर्थयात्रा है। तीर्थ यात्रा का सार्थक अर्थ तब है जब हम मानवता को प्राथमिकता दें।

बड़े-बड़े तीर्थ स्थान में जाकर ईश्वर के दर्शन करना ही तीर्थयात्रा नहीं होती। तीर्थयात्रा तब सच्ची होगी जब हम मानवता को प्राथमिकता देंगे। यदि रास्ते में हमें किसी दीन-दुखी की सहायता करने के अवसर मिले तो उसकी सहायता करने से ना चूकें।

किसी असहाय की सहायता करने के अवसर को ठुकराकर तीर्थयात्रा करने पर व्यक्ति का तीर्थयात्रा का सार्थक अर्थ नहीं रह पाता।

संक्षेप में यह कहानी असहाय और दीन-दुखियों की सेवा करने को ही सच्ची तीर्थयात्रा बताती है।


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