एलिशा ने येरूशलम जाने का विचार इसलिए त्याग दिया क्योंकि येरुशलम की आगे यात्रा के लिए उसके पास पर्याप्त पैसे नही बचे थे। पैसे समाप्त हो जाने के कारण उसने अपनी आगे तीर्थयात्रा को स्थगित कर दिया और येरुशलम जाने का विचार त्याग दिया।
येरुशलम की अपनी तीर्थयात्रा के दौरान विश्राम करने के लिए रात में वह जिस झोपड़ी में रुका था, उस झोपड़ी के रहने वाले तीनों प्राणी असहाय और बीमार थे। एलिशा उन तीनों प्राणियों की हालत देखकर उनकी सेवा करने के लिए वहीं पर रुक गया।
उसने मानवता का कर्तव्य निभाया। तीनों प्राणियों के लिए उसने पर्याप्त भोजन का प्रबंध किया। उन लोगों को आगे नियमित रूप से दूध मिलता रहे, इसलिए गाय खरीदी। उनके खेत में जुताई के लिए बैल खरीदा और उनके लिए आने वाले कुछ महीनो के लिए पर्याप्त अनाज खरीद कर रख दिया। इस सारी प्रक्रिया में उसके सारे पैसे खर्च हो गए। अब वह येरुशलम नहीं जा सकता था क्योंकि उसके पास पर्याप्त धन नहीं था। इसलिए उसने येरूशलम जाने का अपना विचार त्याग दिया और वापस अपने घर की ओर चल पड़ा।
विशेष
‘सच्चा तीर्थयात्री’ कहानी दो मित्रों एलिशा और एफिम की कहानी है। दोनों येरुशलम जाने के लिए तीर्थ यात्रा पर निकले हैं। रास्ते में विश्राम के लिए उन्हें एक झोपड़ी में रुकना पड़ता है। उस झोपड़ी में तीन प्राणी रहते हैं जो बेहद बीमार और भूखे हैं।
एलिशा उन तीनों प्राणियों की सेवा करने के लिए वहीं पर रुक जाता है जबकि एफिम को येरुशलम जाने की जल्दी है। वह एलिशा को वहीं पर अकेला छोड़कर येरुशलम जाने के लिए अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ता है। एलिशा मानवता की सेवा को प्राथमिकता देता है जबकि एफिम मानवता की सेवा को ठुकराकर अपनी तीर्थयात्रा के लिए आगे निकल जाता है। इस तरह एलिशा एक सच्चा तीर्थयात्री है क्योंकि वह दीन-दुखियों की सेवा करने को प्राथमिकता देता है, क्योंकि दीन-दुखिओ की सेवा करना ही सच्ची तीर्थयात्रा है।
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