क्या इंटरनेट पुस्तकों का विकल्प बन सकता है? (निबंध)

निबंध

इंटरनेट पुस्तकों का विकल्प

 

प्रस्तावाना

प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जो क्रांति हुई है उसने हमारे जीवन कि दशा और दिशा दोनों ही बदल दी है । सूचना प्रौद्योगिकी की तीव्र गति और सही और सटीक सूचना को अपना आधार बनाकर चलती है । आज विश्व के किसी भी कोने से समाचार कुछ क्षणों में ही आप तक पहुँच जाते है ।

क्या इंटरनेट पुस्तकों का विकल्प बन सकता है?

आप अपने कंप्यूटर से ई-मेल करके अपना संदेश किसी को भी क्षण भर मे ही भेज सकते है । ई-कॉमर्स की एक पूरी दुनिया हमारे सामने खुल रही है । घर बैठे कंप्यूटर की सहायता से व्यापार किया जा रहा है ।

इंटरनेट, पुस्तक का विकल्प नहीं, सहायक है

प्रकाशकों को लग सकता है कि इंटरनेट पर पुस्तकें आ जाने से उनका व्यवसाय खतरे में पड़ जाएगा । यह विचार भ्रामक है । मनुष्य के ज्ञान का मूल स्रोत पुस्तकें है, पुस्तकें ही रहेंगी । अमेरिका और यूरोप में इंटरनेट का सर्वाधिक प्रयोग होता है, परंतु वह पुस्तकों का व्यापार फल फूल रहा है । एक–एक उपन्यास की दस–दस लाख प्रतिया बिक रही है । पुस्तकों को स्थाई संपत्ति के रूप में देखा जाता है । जिन्हें पाठक अपने साथ कही भी ले जा सकता हैं ।

पाठक और पुस्तक

पाठक की दृष्टि से देखे तो इंटरनेट कभी भी पुस्तक का विकल्प नहीं बन सकता। यह ठीक है कि किसी सूचना विशेष को पाने के लिए इंटरनेट का प्रयोग किया जा सके परंतु किसी उपन्यास अथवा काव्य संग्रह को इंटरनेट पर पढ़कर उसका आनंद नहीं लिया जा सकता । लेकिन एक पुस्तक को हाथ में लेकर जो सुख मिलता है वह टीवी अथवा कंप्यूटर स्क्रीन में आंखें गाड़कर नहीं मिल सकता ।

पुस्तक पाठक की संपत्ति भी होती हैं और साथी भी। पाठक के लिए आवश्यक नहीं है कि वह उससे कुर्सी पर बैठ के पढ़े। वह हरी घास पर चलते हुए, बैठे या चलते हुए भी पुस्तक पढ़ने का आनंद ले सकता है। लंबी यात्राओं में पुस्तक एक अच्छे साथी का काम करती है और होटल के एकांत में पुस्तक आनंद देती है।

पाठक पुस्तक को जब चाहे बंद करके सुस्ता सकता है, घूमने जा सकता है और लौटकर पुस्तक वही से आगे पढ़ सकता है। पुस्तक की जो पंक्ति अच्छी लगी उससे रेखांकित किया जा सकता है। पुस्तक कि छपाई, रंग-रूप में भी अपना ही आकर्षण होता हैं। इंटरनेट में यह सुविधा कहा। इंटरनेट पर तो अलग से फाइल खोल कर उससे अपने कंप्यूटर में सुरक्षित करना होगा जो एक झंझट का काम हैं। इंटरनेट तो बेजान माध्यम हैं, उसमें आकर्षण नहीं है।

भारत में कंप्यूटर का प्रयोग

कंप्यूटर का प्रयोग करने वाले और इंटरनेट का लाभ उठा सकने वालों कि संख्या बहुत कम है । जिस देश में बच्चों को दो समय का भोजन न मिलता हो और बच्चों को स्कूलों में टाट–फटी और पुस्तकें भी उपलब्ध न हो, वहाँ पर इंटरनेट से पुस्तकों को भला कैसा खतरा। पुस्तक व्यवसाय और पाठक–पुस्तक व्यवसाय में लेखक, प्रकाशन और पाठकों की प्रमुख भूमिका रहती हैं लेखकों के लिए क्या इंटरनेट खतरा हैं? लेखकों को अपनी पुस्तक इंटरनेट पर डालने के बदले रियलिटी मिलेगी, अधिक धन मिलेगा, लेखक का महत्व बढ़ेगा। आज लेखक के लिए लिखना सरल हो गया है।

इंटरनेट की सहायता से वह नवीनतम जानकारियाँ प्राप्त कर अपनी पुस्तक में लिख सकता हैं। इंटरनेट कि सहायता से लेखक कि रचना विश्व–बाजार में पहुँच जाती है। एक विशाल पाठक समुदाय से मिल जाता है। पुस्तक छपवाने के लिए प्रकाशक खोजने, पुस्तकें बाजार में पहुंचाने के झंझट से लेखक मुक्त हो जाता है। इंटरनेट ने लेखक–व्यवसाय को अतिरिक्त गरिमा, मान और धन दिया है। लेखक के लिए इंटरनेट खतरा नहीं है।

पुस्तक व्यवसाय की कमियां

पुस्तक व्यवसाय को खतरा इंटरनेट से नहीं अपनी ही आंतरिक कमियों से हैं । पुस्तकों का अत्यधिक महंगा होना , पुस्तक कि सामग्री का पाठकों कि इच्छा और आवश्यकता से अनुकूल न होना तथा पुस्तकों का सहज उपलब्ध न होना कुछ कारण है। पुस्तक प्रशासन व्यवसाय में अनेक अनपढ़ व्यापारी आ गए हैं जो पुस्तकों को भी अन्य सामान की तरह तैयार करवाने तथा बेचने का काम करते हैं। पुस्तक विक्रेताओं को अपने तौर तरीके बदलने होंगे और उचित दामों पर अच्छी पुस्तकें तैयार करनी होगी। पुस्तकें पढ़ने की आदत बचपन से ही बनती है और हमारे प्रकाशक बच्चों के लिए अच्छी पुस्तकें छपवाने पर ध्यान ही नहीं देते । यदि पुस्तक व्यवसाय को विकसित होना है तो बच्चों की पुस्तकों पर अधिक बल देना होगा।

समापन

जो लोग इंटरनेट की प्रतिस्पर्धा में पुस्तक व्यवसाय के नष्ट होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं वे मानव के स्वभाव से परिचित नहीं है । पुस्तकें सदा से मानव के साथ रही हैं और रहेंगी। कुछ लोगों ने तो साहित्य, इतिहास, धर्म, विवाह प्रथा तथा प्रजातन्त्र के समाप्त होने की भविष्यवाणी भी की थी जो गलत सिद्ध हुई है। भारत में अभी भी साक्षरता के लिए संघर्ष चल रहा है, पचास प्रतिशत भारतीय अभी भी निरक्षर हैं। इंटरनेट और कंप्यूटर अभी भी बहुत कम लोगों की पहुँच में है इसलिए भारत में इस माध्यम से पुस्तक व्यवसाय को कोई खतरा नहीं है। पुस्तकों की लोकप्रियता साक्षरता बढ़ने के साथ बढ़ेगी।


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