घटते संयुक्त परिवार – बढ़ते एकल परिवार (निबंध)

निबंध

घटते संयुक्त परिवार – बढ़ते एकल परिवार

 

घटते संयुक्त परिवार – बढ़ते एकल परिवार – संयुक्त परिवार हमारे प्राचीन भारतीय समाज की एक मजबूत व्यवस्था थी, जो हमारे भारत की पहचान थी। लेकिन आज बदलते समय में संयुक्त परिवार बढ़ते जा रहे हैं और एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं।

प्रस्तावना

संयुक्त परिवार भारत की वह प्राचीन पारिवारिक व्यवस्था थीं या हैं, जिसके अंतर्गत परिवार के सभी सदस्य माता-पिता हो, दादा-दादी, चाचा चाची सभी मिलकर साथ रहते थे। भारतीय समाज में परिवार कुटुंब का प्रतीक है। कुटुंब यानि बहुत बड़ा परिवार। संयुक्त परिवार भारतीय परिवारों की एकता का परिचायक था और संयुक्त परिवार होना पहले भारत के हर परिवार की पारिवारिक व्यवस्था थी।

संयुक्त परिवार क्या है ?

संयुक्त परिवार वह परिवार है, जिसमें परिवार के अनेक सदस्य मिलकर एक साथ रहते हैं, जिसमें पति-पत्नी, उनके बच्चे, उनके माता-पिता, उनके भाई बहन सभी मिलकर साथ रहते हैं। संयुक्त परिवार में दादा-दादी होते हैं, चाचा-चाची होते हैं, ताऊ-ताई होते हैं, काका-काकी होते हैं, तथा उन सभी के बच्चे होते हैं। संयुक्त परिवार में सभी भाई-बहन साथ मिलकर रहते हैं।

शादी होने के बाद भी सभी भाई-बहन साथ रहते हैं और अलग अलग नहीं होते। उनके बूढ़े माता-पिता भी उनके साथ रहते हैं। यह संयुक्त परिवार का प्रारूप है। भारतीय समाज में संयुक्त परिवार का प्रचलन बेहद सहज और आम था। भारतीय समाज में संयुक्त परिवार का प्रचलन आम ही नही बल्कि यह एक जरूरी व्यवस्था भी थी। आज से कुछ वर्ष पूर्व तक भारतीय समाज में संयुक्त परिवार के बिना परिवार की कल्पना नहीं की जा सकती थी।

सयुंक्त परिवार का सही अर्थ

संयुक्त परिवार सच्चा अर्थ ये है कि संयुक्त परिवार वह परिवार होता था, जहाँ पर बूढ़े माँ-बाप को बूढ़ा होने पर उनका साथ नही छोड़ा जाता था, बल्कि उनकी सेवा की जाती थी, उन्हें साथ रखा जाता था। संयुक्त परिवार वह परिवार होता है, जहाँ पर पुत्र-पुत्री बड़े और सक्षम होने पर माँ-बाप को छोड़कर अलग नही रहने लगते है। सयुंक्त परिवार वह परिवार है, जहाँ पर सभी भाई-बहन मिलजुक एक साथ प्रेम से रहते हैं और सुख-दुख में एक दूसरे के काम आते हैं। संयुक्त परिवार एकता का परिवार होता है। संयुक्त परिवार वह परिवार है, जहां पर एकता, प्रेम, सद्भाव ही सब कुछ है।

सयुंंक्त परिवार के लाभ

संयुक्त परिवार के लाभ यह है कि एक परिवार में सभी सदस्य मिलकर एक ही घर में साथ साथ रहते हैं। इससे वे एक दूसरे के सुख दुख में काम आते हैं। किसी भी तरह की बीमारी या संकट की अवस्था में एक सदस्य के लिए परिवार के अन्य सदस्य तत्पर रहते हैं। संयुक्त परिवार में किसी भी तरह का संकट आने पर उसे मिलकर निपटा दिया जाता है। किसी भी तरह की आर्थिक समस्या होने पर परिवार के अन्य सदस्य उसकी मदद करते हैं और आगे बढ़ने मदद करते हैं।

संयुक्त परिवार के लाभ

संयुक्त परिवार की हानि यह है कि संयुक्त परिवार में अक्सर व्यक्ति को निजता नहीं मिल पाती। संयुक्त परिवार में अक्सर झगड़े और मनमुटाव होने की संभावनाएं बनी रहती हैं। विचारों का टकराव होता है। संयुक्त परिवार में खर्चे अधिक होते हैं। अक्सर किसी एक सदस्य पर ही बाकी सदस्यों के खर्चे का बोझ आ पड़ता है। संयुक्त परिवार का कोई न कोई सदस्य अक्सर नकारा निकल जाता है क्योंकि बाकी सदस्यों द्वारा उसका खर्चा वहन कर लेने के कारण उसे अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं होता।

एकल परिवार क्या है?

एकल परिवार वो परिवार है, जिसमें केवल पति-पत्नी और उनके बच्चे होते हैं। जिनमें अधिकतर एक या दो बच्चे ही होते हैं। ऐसे एकल परिवार अपने माता पिता और भाई-बहन तथा परिवार के अन्य सदस्यों से दूर रहते हैं। यह परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों पर केंद्रित परिवार होता है। आजकल के समय में महानगरों के अधिकतर परिवार एकल परिवार ही होते हैं।

एकल परिवार के लाभ

एकल परिवार के लाभ यह है कि एकल परिवार में पति पत्नी अपने बच्चों की अच्छी परवरिश कर पाते हैं।उनके बच्चों की संख्या एक या दो ही होती है, इससे वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवा पाते हैं और अच्छी परवरिश कर पाते हैं। एकल परिवार में निजता भंग होने की कोई समस्या नहीं होती और लोग अपनी इच्छा अनुसार अपना जीवन जीते हैं। उन्हें रोक-टोक करने वाला कोई नहीं होता।

एकल परिवार की हानि

एकल परिवार के सदस्य अक्सर एकाकीपन के शिकार हो जाते हैं। किसी संकट आदि में उनकी सहायता करने वाला कोई नहीं होता। एकल परिवार के बच्चे भी अक्सर एकाकीपन के शिकार होते हैं, क्योंकि उनके माता-पिता काम पर जाते हैं। उन्हें कहानी सुनाने वाला दादा-दादी आदि नही होते और उनको सही सहयोग नहीं मिल पाता। एकल परिवार के बच्चे अक्सर अंतर्मुखी बन जाते हैं। एकल परिवार स्वार्थ का परिवार होता है, जिससे बूढ़े माँ-बाप और पारिवारिक सदस्यों की कोई परवाह नहीं होती है।

घटते संयुक्त परिवार : बढ़ते एकल परिवार

घटते अकल संयुक्त परिवार आज के समय का फैशन हो गया है। अब कुछ ग्रामीण इलाकों को छोड़ दें तो अधिकतर शहरों और महानगरों में एकल परिवार का ही प्रचलन निरंतर बढ़ता जा रहा है। व्यक्ति जैसे ही पढ़-लिखकर नौकरी पर लग जाता है, या व्यापार करने लगता है तो वह तुरंत अपने माँ-बाप को छोड़कर अपना अलग अलग घर बसा लेता है।

एकल परिवार का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। एकल परिवार आज के समाज के स्वार्थी होने के परिचायक बन गए हैं, क्योंकि जिन माँ-बाप ने हमें पाल पोस कर बड़ा किया, उन्हीं माँ-बाप को लोग अपना स्वार्थ सिद्ध होने पर छोड़ देते हैं और अपना ही जीवन जीने में व्यस्त हो जाते हैं। एकल परिवार की सार्थकता तब है, जब अलग रहते हुए भी अपने माँ-बाप की सेवा की जाए। यथासंभव माता-पिता को अपने साथ रखा जाए नहीं तो उनकी देखभाल की पूरी व्यवस्था की जाए।


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