केंचुआ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।​

केंचुआ पर टिप्पणी

केंचुआ एक स्थलीय अकेशरुकीय प्राणी होता है, इसे हिंदी में केंचुआ के अलावा ‘भूकृमि’ भी कहा जाता है। भारत के कई क्षेत्रों में इस ‘घेंसा’ भी कहा जाता है। अंग्रेजी में केंचुआ को Earthworm कहते हैं।

कछुआ ऐनेलिडा संघ का प्राणी है। ऐनेलिडा संघ के प्राणियों के शरीर अनेक खंडों में विभक्त होता है, इसी कारण केंचुआ का शरीर भी 100 से 120 खंड में विभक्त होता है।

क्योंकि केंचुआ अकेशरुकीय प्राणी है इसलिए इसमें कंकाल का अभाव होता है। केंचुआ का रंग ताम्र वर्ण यानि तांबे के रंग का होता है। इसका आकार वर्तुलाकर लंबा होता है और यह रेंग कर चलने वाला प्राणी है।

केंचुआ के शरीर पर जितने भी खंड होते हैं, हर खंड छोटे-छोटे सुई जैसे अंग होते हैं, जिन्हें ‘सीटा’ कहा जाता है। इन्हीं अंगों की सहायता से केंचुआ रेंगता है।

केंचुआ उभयलिंगी प्राणी है, क्योंकि इसके अंदर नर और मादा दोनों के प्रजनन अंग पाये जाते हैं। प्रजनन के समय दो केंचुए प्रजनन करते हैं और एक दूसरे के अंडे को सींचते है। इस तरह हर केंचुआ अंडे देता है।

कछुआ आमतौर पर मिट्टी में पाया जाने वाला प्राणी है। यह अधिकतर बरसात में दिखाई देता है तथा बरसात के समय गीली मिट्टी पर रेंगता हुआ पाया जाता है।

आमतौर केंचुआ और मिट्टी के अंदर बिल बनाकर निवास करता है। वर्षा ऋतु में इसके बिलों में पानी भर ये अपने बिल से बाहर निकलकर भूमि पर रेंगते दिखाई पड़ते हैं।

केंचुआ अलग-अलग कार्बनिक पदार्थ को खाता है। इन कार्बनिक पदार्थ में जीवित-अजीवित सूक्ष्म जंतु, जीवाणु, कवक तथा अन्य कई तरह के सूक्ष्म जीव शामिल हैं।

कछुआ अपनी त्वचा सेसांस लेता है उसके अंदर सामान्य श्वसन अंग नहीं पाए जाते और वह त्वचा से सांस लेता है।

केचुआ पारिस्थिति की तंत्र के लिए बेहद उपयोगी प्राणी है क्योंकि यह मिट्टी की उर्वरकता बढ़ाने का कार्य करता है। यह किसानों का मित्र जीव माना जाता है।


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